कई शताब्दियों तक खगोल विज्ञान का प्रतिष्ठित केंद्र था उज्जैन
उज्जैन, मध्य प्रदेश, कई शताब्दियों तक खगोल विज्ञान का प्रतिष्ठित केंद्र था। ग्रीनविच मध्याह्न रेखा के अस्तित्व में आने से बहुत पहले भारत की अपनी प्रधान मध्याह्न रेखा थी, जिसे "मध्य रेखा" कहा जाता था।
खगोल विज्ञान में भारत की गौरव गाथा और नई पाठ्यपुस्तक
भारत में खगोल विज्ञान की प्रतिष्ठा और मेधा को बच्चों को शुरुआती कक्षाओं से ही पढ़ाया जाएगा। एनसीईआरटी की सामाजिक विज्ञान की कक्षा छह की नई पाठ्यपुस्तक में अब कई नए तथ्यों के साथ यह भी पढ़ाया जाएगा। इस पुस्तक में उज्जैन की प्राचीन खगोल विज्ञान केंद्र के रूप में महत्वपूर्ण भूमिका को भी शामिल किया गया है।
उज्जैन का खगोल विज्ञान में महत्व
उज्जैन, मध्य प्रदेश, कई शताब्दियों तक खगोल विज्ञान का प्रतिष्ठित केंद्र था। ग्रीनविच मध्याह्न रेखा के अस्तित्व में आने से बहुत पहले भारत की अपनी प्रधान मध्याह्न रेखा थी, जिसे "मध्य रेखा" कहा जाता था। यह रेखा उज्जैन से होकर गुजरती थी। पुस्तक के अनुसार, प्रसिद्ध खगोल शास्त्री वराहमिहिर करीब 1,500 वर्ष पूर्व उज्जैन में रहते और काम करते थे। वह अक्षांश व देशांतर रेखाओं की अवधारणा से अवगत थे, जिसमें शून्य या प्रधान मध्याह्न रेखा की आवश्यकता शामिल थी। उज्जैन की मध्याह्न रेखा सभी भारतीय खगोलीय ग्रंथों में गणनाओं के लिए संदर्भ बन गई थी।
सरस्वती नदी का उल्लेख
भारतीय सभ्यता की शुरुआत से संबंधित अध्याय में सरस्वती नदी का उल्लेख है। इसमें हड़प्पा सभ्यता को "सिंधु-सरस्वती" सभ्यता के रूप में संदर्भित किया गया है। सरस्वती बेसिन में राखीगढ़ी, गंवरीवाला जैसे प्रमुख शहरों संग छोटे शहर और कस्बे शामिल थे। यह नदी आज भारत में घग्गर और पाकिस्तान में हकरा नाम से जानी जाती है।
जाति-आधारित भेदभाव का उल्लेख नहीं
नई पाठ्यपुस्तक में जाति-आधारित भेदभाव का उल्लेख नहीं किया गया है। वैदिक ग्रंथों में महिलाओं और शूद्रों को अध्ययन की अनुमति नहीं थी, यह उल्लेख है, परन्तु जाति व्यवस्था का विस्तार से वर्णन नहीं किया गया है। पिछली पाठ्यपुस्तक में जाति व्यवस्था का विस्तृत विवरण था, जिसमें महिलाओं और शूद्रों की स्थिति का उल्लेख था।
नए दृष्टिकोण के साथ पाठ्यपुस्तक
एनसीईआरटी के निदेशक दिनेश सकलानी के अनुसार, "हमने बड़े विचारों पर ध्यान केंद्रित करके पाठों को न्यूनतम रखने की कोशिश की है।" इसके तहत, प्राचीन भारत के राज्यों की विस्तृत खोज को काफी हद तक हटा दिया गया है। पुरानी पुस्तक के चार अध्याय, जैसे अशोक एवं चंद्रगुप्त मौर्य के राज्यों के विवरण, चाणक्य और उनके अर्थशास्त्र के साथ-साथ गुप्त, पल्लव और चालुक्य राजवंशों का उल्लेख नहीं किया गया है। सांची स्तूप, अजंता की गुफाओं में चित्रों का उल्लेख भी हटा दिया गया है।
नई पाठ्यपुस्तक में खगोल विज्ञान और भारतीय सभ्यता के अन्य महत्वपूर्ण पहलुओं को शामिल किया गया है, जिससे बच्चों को प्रारंभिक स्तर पर ही इन महत्वपूर्ण तथ्यों की जानकारी मिल सके।