समाचार पत्रों में प्रसिद्धि
डॉक्टर जी के यहां स्वयंसेवकों से अनौपचारिक वार्तालाप के समय पुणे के एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार का उल्लेख हुआ। समाचार पुणे में सम्पन्न स्वयंसेवकों के निजी कार्यक्रम से सम्बन्धित था। एक स्वयंसेवक ने कहा कि संघ के कार्यक्रमों को यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाए तो संघ के विचार लोगों तक पहुंचाना […] The post समाचार पत्रों में प्रसिद्धि appeared first on VSK Bharat.
डॉक्टर जी के यहां स्वयंसेवकों से अनौपचारिक वार्तालाप के समय पुणे के एक समाचार पत्र में प्रकाशित समाचार का उल्लेख हुआ। समाचार पुणे में सम्पन्न स्वयंसेवकों के निजी कार्यक्रम से सम्बन्धित था। एक स्वयंसेवक ने कहा कि संघ के कार्यक्रमों को यदि समाचार पत्रों में प्रकाशित किया जाए तो संघ के विचार लोगों तक पहुंचाना आसान होगा। इस पर अन्य स्वयंसेवक ने कहा, यदि यही पद्धति अपनायी गयी तो आगे चलकर स्वयंसेवक यह भी सोचने लगेंगे कि संघ के उत्सवों की निमंत्रण पत्रिकाएं घर-घर जाकर देने की अपेक्षा वर्तमान पत्रों में ही उसका प्रकाशन करना उचित होगा। फिर एक अन्य स्वयंसेवक ने यह आशंका प्रकट की कि समाचार पत्र संघ के कार्यक्रमों का वृत्त सही ढंग से प्रकाशित करेंगे, इसका क्या भरोसा। कुछ स्वयंसेवकों की राय में संघ के विचारों का प्रसार-प्रचार करने के लिए समाचार पत्रों का उपयोग किया जाना चाहिए। डॉक्टर जी ने कहा, समाचार पत्रों में प्रसिद्धि के चक्कर में संघ कार्य को क्षति पहुंचे तो उसे उचित नहीं माना जा सकता। यह विषय महत्व का है। इस पर सभी को सावधानी पूर्वक विचार करने की आवश्यकता है, सभी इसका विचार करें। अवसर मिलने पर, पुनः इसका विचार हम अवश्य करेंगे।
दो-चार दिन बाद विचार-विनिमय अवसर उपलब्ध हुआ। इस बीच दिल्ली का संघ से सम्बन्धित समाचार प्रकाशित हुआ था। उस समाचार में कहा गया था कि श्री बाबासाहेब आपटे और श्री वसंतराव ओक, ये दोनों संघ प्रचारक इन दिनों संघ कार्य करने हेतु दिल्ली में आए हुए हैं और वे यहां संघ की शाखाएं खोलेंगे। भारत की राजधानी में संघ का कार्य प्रारंभ होने जा रहा है, यह जानकर स्वाभाविकतया स्वयंसेवकों के मन में प्रसन्नता और समाधान की भावना पैदा हुई। डॉक्टर जी ने कहा, दिल्ली में अभी हाल ही में जैसे-तैसे संघ का कार्य प्रारंभ होने जा रहा है। अतः ऐसे समय इस प्रकार समाचार पत्र में, ऐसा समाचार प्रकाशित होना ठीक नहीं हुआ। संघ का कार्य वहां जड़ जमाए इसके पूर्व ही ऐसे समाचार के प्रकाशन से चतुर और तीक्ष्ण बुद्धि वाले अंग्रेज शासकों का ध्यान भी उस ओर आकर्षित होगा जो यह नहीं चाहते कि संघ कार्य बढ़े, ऐसे लोग भी हमारे काम में नाहक कठिनाईयां पैदा करने का प्रयास कर सकते हैं। कार्य बढ़ने के बाद सार्वजनिक कार्यक्रम का वृत्त भले ही वह संक्षेप में क्यों न हो, अगर प्रकाशित होता है तो वह हमें चल सकता है और उसमें अनुचित ऐसा कुछ भी नहीं। बाद में, समाचार पत्र भी हमारे कार्य की उपेक्षा नहीं कर पाएंगे। हमारे कार्य की प्रसिद्धि और प्रचार संघ शाखाओं के प्रभाव से होनी चाहिए। डॉक्टर जी के विचार स्वयंसेवकों के मन में बैठ रहे थे। डॉक्टर जी ने कहा, उक्त आशय का पत्र मैंने श्री वसंतराव के नाम भेजा है और भविष्य में इस बारे में सावधानी बरतने की सूचना भी दी है।
कुछ दिनों बाद, प्रसिद्धि का यह विषय पुनः चर्चा में आया। नागपुर के विजयादशमी महोत्सव के अध्यक्षीय भाषण का वृत्त तैयार कर समाचार पत्रों में प्रकाशनार्थ भेजा गया था। वह प्रकाशित हो, ऐसा अनुरोध भी डॉक्टर जी ने संपादकों से किया था। भूतपूर्व राज्यपाल श्री तांबे और सर मोरोपंत जोशी संघ के उत्सव में अध्यक्ष और प्रमुख अतिथि के नाते उपस्थित हुए थे। सरकारी दरबार में उनके शब्दों का वजन था। इस कारण, समाचार पत्रों में प्रकाशित उनके भाषणों का अच्छा परिणाम हुआ। संघ पर तथा सरकारी सेवाओं में कार्यरत स्वयंसेवकों पर किसी प्रकार की पाबन्दी लगाने का विचार करने वाले वरिष्ठ अधिकारियों को, इन भाषणों के बाद, संघ पर कोई आरोप लगाने या आपत्ति उठाने का विचार कुछ काल के लिए त्यागने को विवश होना पड़ा। क्योंकि, उक्त दोनों वक्ताओं ने अपने भाषणों में संघ कार्य की प्रशंसा ही की थी।
एक बैठक में, विजयादशमी की निमंत्रण पत्रिकाओं की वितरण व्यवस्था पर चर्चा हो रही थी। उत्सव के पूर्व 8-10 दिन में पत्रिकाओं का वितरण हो जाना चाहिए। निमंत्रण पत्र बांटने में काफी समय लगता है। किसी कम परिचित या अपरिचित व्यक्ति के यहां निमंत्रण पत्र देते समय उसके साथ इसी निमित्त परस्पर वार्तालाप करना ही पड़ता है। संघ कार्य विषयक जानकारी उसे देनी पड़ती है और वह उत्सव में अवश्य पधारे, इसका प्रयास किया जाता है। यह प्रयास कुछ मात्राओं में सफल भी होता है। किन्तु इस प्रकार निमंत्रण पत्र के वितरण में प्रतिदिन केवल 4-6 सज्जनों के यहां जाना ही संभव हो पाता है। एक स्वयंसेवक ने अपना उक्त अनुभव सुनाया।
डॉक्टर जी ने कहा, हां इसी पद्धति से निमंत्रण पत्रों का वितरण होना चाहिए। इससे अपने समाज के सज्जनों से निकटता प्रस्थापित होती है और आगे चलकर उन्हें भी कार्य से जोड़ा जा सकता है। इसकी बजाय यदि हम निमंत्रण पत्र को समाचार पत्रों में प्रकाशित कर सार्वजनिक निमंत्रण देने की व्यवस्था करें तो लोग हमारे कार्यक्रम में कम अधिक मात्रा में आएंगे ही, किन्तु प्रत्यक्ष सम्पर्क द्वारा अपना विचार घर-घर तक पहुंचाने और उसके द्वारा सम्पूर्ण समाज को संगठित करने का काम नहीं हो पाएगा। हां, निमंत्रण पत्रों का ठीक ढंग से वितरण करने के बाद यदि हम उसे समाचार पत्रों में प्रकाशित करवाएं तो वह उपयोगी हो सकता है।
संघ की कार्यपद्धति में उत्कृष्ट संघ शाखाओं के निर्माण पर ही अधिक बल दिया जाता है। कुछ ठोस कार्य होने पर अपनी योजना से ही आवश्यकतानुसार प्रसिद्धि का सहारा लिया गया। उसका लाभ भी मिला। लोग संघ पर यह आरोप लगाते थे कि Sangh is shy of publicity – संघ प्रसिद्धि से दूर भागना चाहता है। हम इस आरोप को चुपचाप सहन करते रहे। इसलिए कुछ लोग कहते भी हैं कि संघ प्रसिद्धि के पीछे कभी नहीं रहा, इसलिए संघ की शक्ति कितनी है, उसकी जड़ें समाज जीवन में किस गहराई तक पहुंच चुकी हैं, इससे हम बेखबर रहे। संघ के प्रारंभिक काल में, प्रसिद्धि के सम्बन्ध में इस प्रकार समन्वय साधने की नीति संघ कार्य पद्धति का स्वाभाविक अंग बन गई।
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