UP लखनऊ: अपनों के मतभेद-मनभेद सुलझाना भाजपा के लिए चुनौती
करीब एक दशक बाद भाजपा कार्यकर्ता फिर से विरोधी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। कहीं टिकट वितरण को लेकर, तो कहीं उपेक्षा को लेकर नाराजगी है
अपनों के मतभेद-मनभेद सुलझाना भाजपा के लिए चुनौती
नाराज कार्यकर्ताओं के बगावती तेवर से हो सकता है नुकसान
लखनऊ। करीब एक दशक बाद भाजपा कार्यकर्ता फिर से विरोधी तेवर दिखाने शुरू कर दिए हैं। कहीं टिकट वितरण को लेकर, तो कहीं उपेक्षा को लेकर नाराजगी है। अपनों के मतभेद और मनभेद सुलझाना भाजपा के लिए बड़ी चुनौती है। वर्षों से पार्टी के लिए जमीन पर काम करने वाले कार्यकर्ताओं में सरकार बनाने को लेकर उत्साह तो है, पर कुछ बातों को लेकर मलाल भी है। जो वजहें सामने आ रही हैं, उसके मुताबिक जब भी आगे बढ़ने का मौका आता है, तो उन्हें पीछे धकेल दिया जाता है।
हाल ही में बरेली और घोसी में हुआ वाकया ताजा उदाहरण है। यहां आपसी अंतर्कलह का खुलासा तो खुद प्रत्याशी छत्रपाल गंगवार ने ही सार्वजनिक रूप से कर दिया। वहीं, घोसी में भाजपा के स्थानीय पदाधिकारियों ने सहयोगी सुभासपा के प्रत्याशी अरविंद राजभर के खिलाफ मोर्चा खोल दिया। उन्हें मनाने के लिए राजभर को घुटनों पर आकर माफी मांगनी पड़ी। अंतर्कलह की आग सिर्फ इन्हीं दो सीटों पर ही सुलग रही है, ऐसा भी नहीं है। कई सीटों पर कार्यकर्ताओं में नाराजगी है। टिकट कटने से खफा सांसद और उनके समर्थक उनकी नाराजगी को हवा दे रहे हैं। वहीं, कई जगहों पर टिकट वितरण में उपेक्षा से आहत जातीय संगठन भी संकट खड़ा करने में जुटे हुए हैं।
इन सीटों पर दिख रही नाराजगी मुजफ्फरनगर में पार्टी के ही विधायक के भाजपा प्रत्याशी का विरोध कर रहे हैं। ऐसे ही मेरठ, गाजियाबाद, फतेहपुर सीकरी, पीलीभीत, चंदौली, गाजीपुर, बाराबंकी जैसी कई सीटों पर अंतर्कलह की चातें सामने आ रही हैं। वहीं, पीलीभीत में वरुण गांधी का टिकट कटने से सिख समुदाय खुलेआम नाराजगी जाहिर कर चुका है। अभी तक भाजपा ने अपने कोटे की 75 सीटों में से 63 पर ही प्रत्याशी उतारे हैं।
इनमें से गाजियाबाद, मेरठ, बरेली, पीलीभीत, कानपुर, बदायूं, बाराबंकी, हाथरस और बहराइच के सांसदों के टिकट कटे हैं। हालांकि बहराइच सीट से सांसद अक्षयवर लाल गौड का टिकट काटा तो उनके बेटे को ही मैदान में उतार दिया। पर, चाकी 8 सीटों पर टिकट कटने से नाराज समर्थक विरोधी स्वर को हवा दे रहे हैं। वहीं, 12 सीटों पर उम्मीदवार उतारने में हो रही देरी के पीछे भी अंदरूनी खींचतान को ही वजह बताया जा रहा है।
संगठन की अनदेखी भी है जिम्मेदार
कार्यकर्ताओं के बीच नाराजगी के बीज प्रदेश संगठन के पुनर्गठन के समय ही पड़ गए थे। राज्य, क्षेत्र और जिला स्तर पर हुई पदाधिकारियों की नियुक्ति में अपनी अनदेखी से पुराने कार्यकर्ता तभी से नाराज बैठे हैं। ये लोग चुनाव में भाजपा के लिए मुश्किलें खड़ी कर सकते हैं।