वैक्सीन मैत्री – सर्वे सन्तु निरामया
प्रशांत पोळ कोरोना ने, पूरे विश्व में वैक्सीन का महत्व फिर से अधोरेखित (underline) किया। कोरोना की महामारी को रोकना, वैक्सीन के बगैर संभव ही नहीं था। भारत ने प्रारंभ से ही कोरोना महामारी की वैक्सीन विकसित करने का निश्चय प्रकट किया था। लॉकडाउन के दूसरे चरण में ही, प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल 2020 को […] The post वैक्सीन मैत्री – सर्वे सन्तु निरामया appeared first on VSK Bharat.
प्रशांत पोळ
कोरोना ने, पूरे विश्व में वैक्सीन का महत्व फिर से अधोरेखित (underline) किया। कोरोना की महामारी को रोकना, वैक्सीन के बगैर संभव ही नहीं था। भारत ने प्रारंभ से ही कोरोना महामारी की वैक्सीन विकसित करने का निश्चय प्रकट किया था। लॉकडाउन के दूसरे चरण में ही, प्रधानमंत्री ने 14 अप्रैल 2020 को भारत के युवा वैज्ञानिकों से वैक्सीन विकसित करने का आह्वान किया। देश में इसके प्रयास प्रारंभ हो गए। कई विकसित देशों ने भारत की पहल को गंभीरता से नहीं लिया। कुछ तथाकथित बुद्धिजीवियों ने इस घोषणा की खिल्ली भी उड़ाई।
वैसे बहुत से लोग मान कर चल रहे थे कि वैक्सीन बनाने की हमारी क्षमता ही नहीं है।
पोलियो वैक्सीन का ही उदाहरण लेते हैं।
विश्व में पहला सफल पोलियो वैक्सीन बना, 1955 में, Jonas Salk द्वारा। पहली मुंह से दी जाने वाली वैक्सीन, Albert Sabin ने बनाई, 1961 में। उन दिनों भारत ने यह मान लिया था कि किसी रोग या महामारी पर वैक्सीन खोज कर बनाना तो बहुत दूर की बात, पर दूसरे किसी द्वारा खोजी गई वैक्सीन बनाने की भी हमारी क्षमता नहीं है। इसलिए हम सारे वैक्सीन, अमेरिका या यूरोप से आयात करते थे। विश्व में पोलियो के वैक्सीन की खोज के लगभग 35 वर्ष बाद, भारत ने इस फार्मूले पर वैक्सीन बनाना प्रारंभ किया था।
आप ढूंढेंगे या शोध करेंगे, तो आपको पता चलेगा कि वैक्सीन (चेचक) की खोज एडवर्ड जेनर ने वर्ष 1796 में की। किंतु एडवर्ड जेनर को वैक्सीन की कल्पना और प्रेरणा कहां से मिली, यह बात सामने नहीं आती। डेविड अर्नाल्ड ने 1993 में एक सुंदर और महत्वपूर्ण पुस्तक लिखी है – Colonizing the Body : State, Medicine and Epidemic Disease in Nineteenth Century India. इस पुस्तक में डेविड अर्नाल्ड ने यह सप्रमाण सिद्ध किया है कि वैक्सीनेशन की पद्धति भारत में सैकड़ों वर्षों से चली आ रही थी। भारतीय समाज के रचयिता पुरखों ने, इस पद्धति को भारत की धार्मिक परंपराओं से जोड़ दिया। ‘शीतला माता व्रत’ यह मूलतः वैक्सीनेशन की पद्धती थी, जो बच्चों में माता (अर्थात चिकन पॉक्स) को रोकती थी। इसी पद्धति को ओलिवर कोल्ट ने पत्रों के माध्यम से, तो डॉक्टर जॉन हॉलवेल ने भाषणों के माध्यम से, इंग्लैंड में पहुंचाया। इसी से प्रेरणा लेकर, एडवर्ड जेनर ने वैक्सीन बनाई।
अर्थात, किसी जमाने में विश्व में महामारी की रोकथाम के लिए सबसे पहले वैक्सीन बनाने वाले हम, स्वतंत्रता के बाद सब कुछ भूल गए थे। हम हमारी शक्ति को पहचानने से इन्कार करते थे। इस हीन भावना से भारत को बाहर निकाला, कोरोना काल में तत्कालीन सरकार ने।
24 नवंबर, 2020 को प्रधानमंत्री ने, देश के आठ सबसे अधिक कोरोना प्रभावित राज्यों के मुख्यमंत्रियों के साथ बैठक की। बैठक में उन्होंने कोरोना वैक्सीन पर देशव्यापी योजना की बात की। उन्होंने राज्यों से वैक्सीन वितरण पर लॉजिस्टिक के साथ प्लान देने की भी बात की।
इस बीच हमारे वैज्ञानिक चुपचाप काम कर रहे थे। इस वैक्सीन के क्लिनिकल ट्रायल्स भी प्रारंभ हुए।
अंततः शनिवार, 16 जनवरी 2021 को प्रधानमंत्री ने भारत की स्वदेशी वैक्सीन ‘को-वैक्सीन’ का लोकार्पण किया।
यह को-वैक्सीन, हैदराबाद की भारत बायोटेक कंपनी ने ‘भारतीय चिकित्सा अनुसंधान संस्थान’ (ICMR) के सहयोग से विकसित की थी। वहीं पुणे का सिरम इंस्टीट्यूट, एस्ट्रोजेनिका कंपनी की ‘कोविशील्ड’ वैक्सीन बना रहा था। इन वैक्सीन के भारत में बनने के कारण, भारत में वैक्सीन के टीकाकरण का कार्यक्रम तीव्र गति से चलाया गया। विश्व के पहले कुछ देशों में भारत का यह टीकाकरण अभियान शामिल था।
भारत, कोरोना की वैक्सीन का विश्व का सबसे बड़ा उत्पादक देश रहा। विश्व के कुल वैक्सीन का 60% उत्पादन भारत में हुआ।
भारत ने कोविड के कठिन समय में, ‘वसुधैव कुटुंबकम्’, सर्वे सन्तु निरामया की संकल्पना ‘वैक्सीन मैत्री’ अभियान के द्वारा प्रत्यक्ष में उतारी। न केवल अपने नागरिकों के लिए वैक्सीन का निर्माण किया, बल्कि विश्व के 100 से ज्यादा देशों को वैक्सीन उपलब्ध कराई। इसका स्वरूप व्यावसायिक आपूर्ति (Commercial Supply) के रूप में तो था ही, पर छोटे देशों को भारत ने दान (Grant) के रूप में भी वैक्सीन के टीके उपलब्ध कराए।
विश्व में इसका जबरदस्त सकारात्मक परिणाम हुआ। जब अधिकांश विकसित देश अपने लिए वैक्सीन जमा कर रहे थे (vaccine hoarding), तब भारत गरीब और विकासशील देशों की सहायता कर रहा था। भूटान, भारत से वैक्सीन प्राप्त करने वाला पहला देश था। 20 जनवरी, 2021 को भारत ने भूटान को वैक्सीन की पहली खेप भेजी। भूटान के प्रधानमंत्री डॉ. लोटे शेरिंग ने कहा कि, “भारत ने न केवल अपने मित्र भूटान का साथ दिया, वरन् मानवता की मिसाल पेश की। भारत ने भूटान को जीवनदान दिया।”
इसी प्रकार की भावनाएं नेपाल, बांग्लादेश, मालदीव्स, श्रीलंका जैसे पड़ोसी देशों ने व्यक्त की। मॉरीशस के प्रधानमंत्री प्रविंद्र जगन्नाथ ने वैक्सीन की पहली खेप मिलने पर कहा, “भारत ने केवल दवा नहीं भेजी, बल्कि उम्मीद भेजी है…” ब्राजील के राष्ट्रपति जैर बोल्सोनारो ने ट्वीट के साथ, ‘हनुमान जी संजीवनी बूटी ला रहे हैं’ यह चित्र जोड़ा और लिखा, “धन्यवाद भारत, हम इसे वैक्सीन संजीवनी कहते हैं।” डोमिनिका के प्रधानमंत्री रूजवेल्ट स्केरिट भावुक होकर बोले, “भारत ने भगवान का काम किया है। हमारी छोटी सी आबादी की परवाह की, जब हमें इसकी सबसे अधिक जरूरत थी।”
संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंतोनियो गुटेरेस ने कहा, “भारत की वैक्सीन उत्पादन क्षमता, विश्व की सबसे बड़ी संपत्ति है।” कई अमेरिकी समाचार पत्रों ने भारत को ‘Moral Leadership in the Global South’ कहा।
इसका प्रभाव लंबे समय तक रहा।
21 मई 2023 को प्रधानमंत्री, ‘भारत प्रशांत द्वीप समूह सहयोग’ (FIPIC) के शिखर सम्मेलन के लिए पापुआ न्यू गिनी पहुंचे। हवाई अड्डे पर उनकी अगवानी करने को वहां के प्रधानमंत्री जेम्स मारापे उपस्थित थे। जैसे ही भारत के प्रधानमंत्री विमान से उतरे, जेम्स मारापे ने पांव छुए। यह अभूतपूर्व घटना थी। विश्व के किसी भी राष्ट्र प्रमुख ने, दूसरे राष्ट्र प्रमुख का पांव छूकर सार्वजनिक रूप से अभिवादन, इससे पहले कभी नहीं किया था। यह सम्मान इसलिए था, कारण भारत ने अत्यंत मैत्रीपूर्ण भाव से, कोरोना के कठिन कालखंड में पापुआ न्यू गिनी की मदद की थी।
भारत के वैक्सीन मैत्री अभियान ने, भारत को विश्व की औषधि शाला (फार्मेसी ऑफ द वर्ल्ड) के रूप में प्रतिष्ठित किया।
संक्षेप में, भारत को अपनी विस्मृत क्षमता का, विस्मृत शक्ति का पुर्नस्मरण हुआ। अपने अंदर की ऊर्जा की अनुभूति हुई। और फिर भारत ने, मात्र आठ – दस वर्षों में ही ऐसा कर दिखाया, जो हम स्वतंत्रता के बाद, साठ – पैंसठ वर्ष भी नहीं कर सके थे..!
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