सामाजिक समरसता के लिए सेवा
सामाजिक समरसता के संदर्भ में सेवाकार्य का योगदान अनन्य साधारण है। समाज में कई प्रकार के सेवा के कार्य चलते रहते हैं। उनकी प्रेरणा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की रहती है। अनेक सेवाकार्य पुण्य संचय के हेतु से होते हैं। किसी सेवा कार्य की प्रेरणा भूतदया होती है। कई लोग प्रसिद्धि पाने के लिए सेवा कार्य […] The post सामाजिक समरसता के लिए सेवा appeared first on VSK Bharat.
सामाजिक समरसता के संदर्भ में सेवाकार्य का योगदान अनन्य साधारण है। समाज में कई प्रकार के सेवा के कार्य चलते रहते हैं। उनकी प्रेरणा भी भिन्न-भिन्न प्रकार की रहती है। अनेक सेवाकार्य पुण्य संचय के हेतु से होते हैं। किसी सेवा कार्य की प्रेरणा भूतदया होती है। कई लोग प्रसिद्धि पाने के लिए सेवा कार्य करते हैं। किसी को सेवाकार्य से चरितार्थ चलाना होता है। इसलिए सेवा कार्य करते रहते हैं। अन्य कोई राजनीति में प्रवेश पाने के लिए सेवाकार्य को एक माध्यम समझते हैं। श्री गुरुजी ने सेवा का एक अतिव्यापक दृष्टिकोण सब के सामने रखा है।
श्री गुरुजी के व्यक्तित्व तथा सोच पर स्वामी विवेकानंद जी के विचारों का गहरा प्रभाव था। स्वामी विवेकानंद जी ने “दरिद्र नारायण’ शब्द दिया है। दरिद्र आदमी में नारायण का वास है, ऐसा मान कर शिवभाव से जीव की सेवा करनी चाहिए। श्री गुरुजी इसी मार्ग पर चलने वाले एक साधक थे। वे कहते हैं, “जितने दीन-दुखी मिलें, वे सब भगवान के स्वरूप हैं और इस प्रकार भगवान ने अपनी सेवा का अवसर हमें प्रदान किया है, ऐसा समझें और इस भाव से उनकी प्रत्यक्ष सेवा करने के लिए उद्यत हों”। (श्री गुरुजी समग्रः खंड ५, पृष्ठ ३६)
आज समाज में दुःख दैन्य प्रचुर मात्रा में है। एक तरफ ऐसा समाज का वर्ग है, जिसके पास साधन संपत्ति की कमी नहीं तो दूसरी जगह ऐसा वर्ग है जो सर्वथा निर्धन है। एक समय का पेट भी भर नहीं पाते। ऐसे बंधुओं का श्री गुरुजी को अहोरात्र स्मरण रहा करता था। किसी एक कार्यकर्ता ने बड़ी आत्मीयता से श्री गुरुजी को शुद्ध घी का एक डिब्बा भेज दिया और लिखा कि शरीर स्वास्थ्य के लिए रोज शुद्ध घी खाना चाहिए। उसको पत्र में श्री गुरुजी लिखते हैं कि अपने देश में करोड़ों बंधुओं को एक समय का भोजन तक नहीं मिलता, ऐसे में रोज शुद्ध घी खाना मेरे लिए संभवनीय नहीं है। इसी कारण श्री गुरुजी केवल एक समय ही भोजन करते थे। समरसता का इससे बढ़कर श्रेष्ठ आचरण और कौन सा हो सकता है?
भूखे, प्यासे, बीमार दिखते हैं। उनका स्मरण रखते हुए श्री गुरुजी कहते हैं, “इस स्थिति में हम सब ऐसा प्रयत्न करें कि मनुष्य को भूखा नहीं रहने देंगे। प्रत्येक को ऐसा समझना है कि किसी एक पीड़ित बंधु का भार उसके ऊपर ही है।” अपना सच्चा धर्म क्या है, इसका भी बार-बार उन्होंने स्मरण कराया है। “समाज की ओर दुर्लक्ष करना अपना धर्म नहीं। कई बार लोग धार्मिक बनने का अर्थ विचित्र सा लगा लेते हैं। वे त्रिपुंड लगाते हैं, चंदन लगाते हैं, घंटी बजा-बजाकर लंबी-चौड़ी पूजा करते हैं, परंतु समाज का ध्यान नहीं लगाते। यह सब धर्म नहीं, यह तो धार्मिक बनने का आभास उत्पन्न करना मात्र हुआ। हमारा सच्चा धर्म तो यही है कि यह समाज अपना है, अतः हम इसका चिंतन करें और हर एक आदमी स्वयं-भू पोषण कर सके, ऐसा स्वाभिमान उसमें निर्माण करें।” (श्री गुरुजी समग्रः खंड ५, पृष्ठ ३६)
नर को भगवत्स्वरूप मानकर उसकी सेवा करनी चाहिए, यह श्री गुरुजी का कथन था। सेवा के माध्यम से क्या होना चाहिए, इसको स्पष्ट करते हुए वे कहते हैं – “समाज को स्वत्वसंपन्न, उत्कर्षमय, स्वाभिमानी बनाना है। समाज की सुरक्षा के लिए प्रयत्न करना है। इसलिए आवश्यक है कि अपने सब बंधुओं को इन विकृतियों से दूर रखकर, हम सच्ची, हार्दिक तथा आत्मीयतापूर्ण एकता उत्पन्न करें। अंतःकरण की आत्मीय भावना थोथी नहीं, सच्ची होनी चाहिए। मुँह में कुछ और मन में कुछ ऐसी दिखावटी सहानुभूति नहीं चाहिए। समाज के प्रत्येक बंधु के लिए हृदय में खरी आत्मीयता का भाव आवश्यक है”। (श्री गुरुजी समग्रः खंड ३, पृष्ठ २४६)
दूसरे शब्दों में समाज में समरसता लाने के लिए अपने मन का भाव कैसा होना चाहिए, इसको श्री गुरुजी ने परिभाषित किया है। सामाजिक समरसता यह मन का गुण है, आत्मीयता के बिना वह उत्पन्न होना संभव नहीं। इसलिए हम देखते हैं कि श्री गुरुजी बार-बार आत्मीय भावना का स्मरण दिलाते हैं।
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