पद्म पुरस्कार और जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण की मौन तपस्या
पद्मश्री पुरस्कार 2026 की सूची में दुर्गम क्षेत्रों में कार्य कर रहे अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से लंबे समय से जुड़े समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम को शामिल किया गया है। इनमें तेची गुविन, त्रिपुरा के नरेशचंद्र देव वर्मा, बस्तर की बुधरी ताती, बस्तर से ही राम गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले, असम के चरण […] The post पद्म पुरस्कार और जनजातीय क्षेत्रों में राष्ट्र निर्माण की मौन तपस्या appeared first on VSK Bharat.
पद्मश्री पुरस्कार 2026 की सूची में दुर्गम क्षेत्रों में कार्य कर रहे अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से लंबे समय से जुड़े समर्पित सामाजिक कार्यकर्ताओं के नाम को शामिल किया गया है। इनमें तेची गुविन, त्रिपुरा के नरेशचंद्र देव वर्मा, बस्तर की बुधरी ताती, बस्तर से ही राम गोडबोले एवं सुनीता गोडबोले, असम के चरण हेम्ब्रम एवं पोखिला लेप्थेपी, तथा राजस्थान के तगाराम भील शामिल हैं। देश के विभिन्न भौगोलिक क्षेत्रों और सेवा-क्षेत्रों में कार्यरत व्यक्तियों को मिला यह सम्मान केवल व्यक्तिगत उपलब्धि का उत्सव नहीं है, बल्कि भारत के वनवासी समाज के समग्र उत्थान के लिए दशकों से चल रहे एक व्यापक सामाजिक आंदोलन की राष्ट्रीय स्वीकृति है।
सामान्यतः सार्वजनिक विमर्श में वही उपलब्धियाँ प्रमुखता पाती हैं जो तेज़ी से दिखाई देती हैं। किंतु इन पद्म सम्मानों के पीछे जो कार्य है, वह एक अलग प्रकृति का है। उसका स्वरूप है – शांत, निरंतर और जनसाधारण के बीच रहकर किया गया कार्य। इन व्यक्तियों के माध्यम से राष्ट्र ने अप्रत्यक्ष रूप से उस संस्था को भी मान्यता दी है, जिसके साथ वे वर्षों से जुड़े हैं, अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम (ABVKA)।
जनजातीय विकास का एक विशिष्ट दृष्टिकोण
1952 में स्थापित वनवासी कल्याण आश्रम आज भारत का सबसे बड़ा गैर-सरकारी संगठन है, जो विशेष रूप से जनजातीय समाज के सर्वांगीण विकास के लिए कार्यरत है। मध्य भारत के वन क्षेत्रों से लेकर पूर्वोत्तर की पहाड़ियों और पश्चिम और दक्षिण भारत के जनजातीय अंचलों तक, संगठन का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत है। और सबसे बड़ी विशेषता इसका दृष्टिकोण है।
पारंपरिक कल्याण मॉडल जहाँ जनजातीय समाज को सहायता का पात्र मानते हैं, वहीं वनवासी कल्याण आश्रम उन्हें भारत की प्राचीन सांस्कृतिक परंपराओं का वाहक और समान भागीदार मानता है। इसका विकास मॉडल सांस्कृतिक आत्म सम्मान, सामुदायिक सहभागिता और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित है। यह दृष्टिकोण उस धारणा को चुनौती देता है कि विकास के लिए सांस्कृतिक पहचान का क्षरण आवश्यक है।
शिक्षा कल्याण आश्रम के कार्य का केंद्रीय स्तंभ रही है। आवासीय विद्यालयों, छात्रावासों, अनौपचारिक शिक्षा केंद्रों और छात्रवृत्ति योजनाओं के माध्यम से संगठन ने लाखों प्रथम-पीढ़ी के विद्यार्थियों को शिक्षा से जोड़ा है। यह कार्य विशेषकर उन क्षेत्रों में किया जा रहा है, जहाँ राज्य की शैक्षिक पहुँच सीमित रही है।
महत्वपूर्ण यह है कि इन शैक्षिक प्रयासों में जनजातीय भाषाओं, परंपराओं और ज्ञान-प्रणालियों को स्थान दिया जाता है। शिक्षा को सांस्कृतिक जड़ों से विच्छेदन नहीं, बल्कि सशक्तिकरण का माध्यम माना जाता है। इन पहलों से जुड़े अनेक विद्यार्थी आज अपने ही समुदायों में शिक्षक, स्वास्थ्य कर्मी, प्रशासक और सामाजिक कार्यकर्ता के रूप में योगदान दे रहे हैं।
स्वास्थ्य सेवाएँ वनवासी कल्याण आश्रम के कार्य का एक और महत्वपूर्ण पक्ष है। दुर्गम वन और पहाड़ी क्षेत्रों में बुनियादी स्वास्थ्य सुविधाओं की कमी लंबे समय से एक गंभीर समस्या रही है। मोबाइल चिकित्सा इकाइयों, मातृ एवं शिशु स्वास्थ्य कार्यक्रमों, पोषण अभियानों और स्वास्थ्य-जागरूकता पहलों के माध्यम से कल्याण आश्रम ने कमी को भरने का प्रयास किया है।
रोकथाम आधारित स्वास्थ्य दृष्टिकोण और समुदाय के साथ विश्वास-निर्माण पर विशेष बल दिया गया है। स्वास्थ्य आपदाओं और प्राकृतिक संकटों के समय आश्रम के कार्यकर्ता अक्सर अग्रिम पंक्ति में दिखाई देते हैं, हालाँकि यह योगदान प्रायः आँकड़ों में दर्ज नहीं हो पाता।
आजीविका, स्वावलंबन और पारिस्थितिक संतुलन
आर्थिक असुरक्षा जनजातीय समाज की प्रमुख चुनौतियों में से एक है। वनवासी कल्याण आश्रम की आजीविका संबंधी पहलें कौशल विकास, वन-आधारित रोजगार, सतत कृषि और पारंपरिक शिल्प के संवर्धन पर केंद्रित हैं। विशेष रूप से जनजातीय महिलाओं के लिए स्वयं सहायता समूहों और सहकारी मॉडल्स ने आर्थिक आत्मनिर्भरता को बढ़ावा दिया है। यह दृष्टिकोण इस बुनियादी समझ को दर्शाता है कि विकास आर्थिक रूप से व्यवहार्य होने के साथ-साथ सांस्कृतिक रूप से संवेदनशील और पर्यावरणीय रूप से टिकाऊ भी होना चाहिए।
अमूर्त सांस्कृतिक धरोहर का संरक्षण
वनवासी कल्याण आश्रम का एक अत्यंत महत्वपूर्ण योगदान जनजातीय सांस्कृतिक विरासत के संरक्षण और पुनर्जीवन के क्षेत्र में है। लोक परंपराएँ, मौखिक इतिहास, अनुष्ठान, पर्व-त्योहार, संगीत, नृत्य और भाषाएँ भारत की बहुलतावादी संस्कृति की आत्मा हैं। सांस्कृतिक उत्सवों, खेल आयोजनों और भाषा-संवर्धन कार्यक्रमों के माध्यम से कल्याण आश्रम जनजातीय पहचान को हाशिए पर जाने से रोकता है। यह प्रयास सांस्कृतिक समरूपता और विस्थापन के दबावों के बीच विशेष महत्व रखता है।
सेवा कार्यों के साथ-साथ आश्रम ने अनुसूचित जनजातियों के संवैधानिक अधिकारों, जैसे भूमि अधिकार, वन अधिकार, शिक्षा और राजनीतिक प्रतिनिधित्व के प्रति जागरूकता बढ़ाने का निरंतर प्रयास किया है। विधिक साक्षरता और सामुदायिक संगठन के माध्यम से जनजातीय समाज को संवैधानिक ढाँचे के भीतर सशक्त किया जाता है।
यह दृष्टिकोण लोकतंत्र को सुदृढ़ करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण योगदान है।
बस्तर, असम, त्रिपुरा, अरुणाचल प्रदेश और राजस्थान जैसे विविध क्षेत्रों में कार्यरत पद्मश्री सम्मानित कार्यकर्ता दशकों की सतत सेवा का प्रतिनिधित्व करते हैं। उनका जीवन उस सेवा-परंपरा का उदाहरण है, जो धैर्य, नैतिक प्रतिबद्धता और मौन तपस्या पर आधारित है।
इनका सम्मान इस बात की पुष्टि करता है कि राष्ट्र-निर्माण केवल नीतिगत दस्तावेजों या बजटीय घोषणाओं से नहीं होता; यह गाँवों, विद्यालयों, स्वास्थ्य शिविरों और सांस्कृतिक आयोजनों में भी आकार लेता है।
अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम से जुड़े कार्यकर्ताओं को मिला पद्म सम्मान निस्संदेह गौरव का विषय है। यह उस विकास मॉडल की स्वीकृति है, जो प्रगति और परंपरा, अधिकार और उत्तरदायित्व, तथा सेवा और सम्मान के बीच संतुलन स्थापित करता है।
समावेशी विकास पर चल रही चर्चाओं के बीच, वनवासी कल्याण आश्रम का कार्य एक महत्वपूर्ण संदेश देता है कि जनजातीय क्षेत्रों में सतत विकास तभी संभव है, जब वह सहभागी, सांस्कृतिक रूप से निहित और संवैधानिक मूल्यों पर आधारित हो। इस दृष्टि से, ये पद्म सम्मान केवल पुरस्कार नहीं, बल्कि राष्ट्र-निर्माण की मौन तपस्या को नमन है।
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