विविधता में एकता का भाव भारतीय संस्कृति का आधारभूत तत्व है – डॉ. मोहन भागवत जी
मेरठ, 20 फरवरी 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज माधव कुंज शताब्दी नगर में मेरठ व बृज प्रान्त के राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के साथ संवाद किया। संवाद कार्यक्रम में सरसंघचालक जी ने कहा कि यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं है। आप सभी ने देश का विभिन्न […] The post विविधता में एकता का भाव भारतीय संस्कृति का आधारभूत तत्व है – डॉ. मोहन भागवत जी appeared first on VSK Bharat.
मेरठ, 20 फरवरी 2026।
राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने आज माधव कुंज शताब्दी नगर में मेरठ व बृज प्रान्त के राष्ट्रीय व अन्तरराष्ट्रीय स्तर के खिलाड़ियों के साथ संवाद किया। संवाद कार्यक्रम में सरसंघचालक जी ने कहा कि यह कोई सामान्य कार्यक्रम नहीं है। आप सभी ने देश का विभिन्न खेलों में प्रतिनिधित्व किया है। आज आप राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के आमंत्रण पर यहां हैं, मुझे संघ की सौ वर्षों की यात्रा पर आप से बातचीत करनी है। आज संघ को जानने समझने के लिए कौतुहल है। यदि संघ को समझना है तो संघ में अन्दर आना होगा। संघ के स्वयंसेवक आज विविध क्षेत्रों में कार्य कर रहे हैं। संघ की शाखा में लगभग तीस से पैंतीस मिनट व्यायाम होता है, उसमें से लगभग बीस मिनट खेल ही होते हैं। इसका यह तात्पर्य नहीं है कि संघ को केवल खेल की दृष्टि से ही समझा जा सकता है। संघ के स्वयंसेवक राजनीतिक क्षेत्र में काम कर रहे हैं। इसका यह मतलब नहीं है कि संघ को राजनीतिक दृष्टिकोण से समझा जा सकता है। कहने का अभिप्राय यह है कि संघ को समझने के लिए समग्र दृष्टिकोण और भीतर आकर ही समझा जा सकता है।
उन्होंने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ किसी वर्ग विशेष के विरोध के लिए नहीं बना, संघ किसी से स्पर्धा के लिए भी नहीं बना, संघ को किसी प्रकार की सत्ता भी नहीं चाहिए। संघ का मूल उद्देश्य समस्त हिन्दू समाज का संगठन करना है। देश का पहला स्वतंत्रता संग्राम मेरठ से ही आरम्भ हुआ, जिसके कारण देश भर में जागृति आयी। सम्पूर्ण देश में इस दिशा में प्रयास हुए और एक धारा सशस्त्र आन्दोलन की पक्षकार बनी, जिसमें चन्द्रशेखर आजाद, भगत सिंह, सुभाष चन्द्र बोस, सुखदेव, राजगुरू जैसे क्रान्तिकारियों ने नेतृत्व दिया। दूसरी ओर जनता को जोड़ने तथा उनका समर्थन प्राप्त करने एवं राजनीतिक जागरूकता लाने के लिए इंडियन नेशनल कांग्रेस को बनाया गया। वहीं तीसरी धारा समाज सुधार के आन्दोलनों से जुड़ी। डॉ. हेडगेवार जी सभी धाराओं को देख रहे थे और अपनी बाल्यावस्था से ही क्रान्तिकारी विचारों से ओत-प्रोत अपने विद्यालय में भी कई अंग्रेज शासकों द्वारा आयोजित कार्यक्रमों का विरोध किया था
कलकत्ता से डॉक्टरी की पढ़ाई पूर्ण कर जब वह नागपुर पहुंचे तो वह कई आन्दोलनों के साथ जुड़े। वह अक्सर कहते कि हम अंग्रेजों से पूर्व भी सात बार गुलाम हुए। इसका मूल कारण क्या है? उन्होंने यह खोजने का प्रयास किया। उस समय अक्सर एक बात कही जाती थी कि चार हिन्दू कभी एक साथ एक दिशा में नहीं चल सकते, वह तभी चलते हैं जब पांचवा कन्धे पर हो, ऐसी सब बातों पर गहनता से विचार कर उन्होंने निश्चय किया कि राष्ट्र का बहुसंख्यक वर्ग जब तक एकजुट नहीं होगा, तब तक बाहर से आक्रान्ता आते रहेंगे और हम पर राज करते रहेंगे। इसलिए 1925 में डॉ. हेडगेवार जी ने संघ की स्थापना की।
सरसंघचालक जी ने कहा कि कुछ लोग संघ को इनक्लूसिव मानते हैं, उनको यह समझना चाहिए कि यह देश भगवान राम, कृष्ण, बुद्ध, महावीर, स्वामी विवेकानन्द, स्वामी दयानन्द और गांधी जी का देश है।
भारत को भौगोलिक सीमाओं में नहीं बांधा जा सकता। उन्होंने हिन्दू शब्द को उद्घृत करते हुए बताया कि हिन्दू कोई जाति नहीं है, यह तो एक विशेषण है। हम देखते हैं कि जब-जब हमारी एकता में कमी आयी, तब-तब भारत संकट में आया है।
उन्होंने कहा कि भारत भूमि पर रहने वाले नागरिकों की पूजा पद्धति भिन्न-भिन्न हो सकती है, देवी देवता अलग-अलग हो सकते हैं तथा स्वभाव में विविधता हो सकती है। लेकिन इस विविधता में एकता का भाव भारतीय संस्कृति का आधारभूत तत्व है। मुख्यतः हमारा समाज चार स्तम्भ पर खड़ा है, संस्कार की प्रक्रिया, सनातन संस्कृति, धर्म का भाव और सत्य का साकार। संघ का केवल एक ही काम है और वह है सम्पूर्ण हिन्दू समाज के संगठन के लिए व्यक्ति निर्माण करना। आज देश भर में संघ के 45 प्रान्तों में संघ एवं संघ के स्वयंसेवकों द्वारा एक लाख तीस हजार से अधिक सेवा प्रकल्प चल रहे हैं और यह सभी सेवा कार्य किसी सरकारी सहायता से नहीं, बल्कि अपने संसाधनों से चलते हैं।
उन्होंने कहा कि आज समाज में अक्सर बुराई की चर्चा होती है, लेकिन मैं यह मानता हूं कि समाज में जितना बुरा हो रहा है, उससे 40 प्रतिशत से भी अधिक अच्छा हो रहा है और यह अच्छा कार्य समाज की सज्जन शक्ति कर रही है।
उन्होंने कहा कि संघ से जुड़ने के चार-पांच तरीके हो सकते हैं। पहला संघ के कार्यक्रमों में सम्मिलित हों, संघ को अन्दर से देखें और किसी दायित्व पर कार्य करें। दूसरा संघ के किसी सम विचारी संगठन से जुड़ें, वहां कार्य करें। तीसरा संघ के विभिन्न कार्यक्रमों में किसी न किसी तरह सहयोग करें, चौथा आप अपना काम करें, साथ ही संघ द्वारा आयोजित कार्यक्रम अथवा स्वयंसेवकों से संवाद बनाए रखें और अन्तिम कोई न कोई अच्छा, प्रमाणिक एवं निस्वार्थ भाव से देश के लिए कार्य करते रहें। फिर आप स्वयंसेवक हों या न हों, इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता। हम मानते हैं कि आप स्वयंसेवक हैं।
जिज्ञासा समाधान के सत्र में लगभग 90 खिलाड़ियों ने प्रश्न पूछे। पारम्परिक खेलों को पहचान दिलाने, ग्रामीण खिलाड़ियों को सहयोग, प्रतिभा खोज एवं सुविधाओं के विकास के लिए संघ के रोडमैप से संबंधित प्रश्न पर सरसंघचालक जी ने कहा कि मैं पूर्व में ही कह चुका हूं कि संघ कुछ नहीं करता, संघ के स्वयंसेवक सब कुछ करते हैं। इसलिए इससे संबंधित लोग स्थानीय स्तर पर बैठें, खेल जगत के लोगों के साथ चिन्तन करें और स्थानीय स्तर पर क्या सम्भव है, उसके अनुसार एक रोडमैप तैयार करें। क्रीड़ा भारती इसकी चिन्ता करे, संघ उस योजना के क्रियान्वयन के लिए प्रयास एवं सहयोग करेगा।
भारत को एक खेल महाशक्ति के रूप में स्थापित करने, आधारभूत सुविधाएं एवं संसाधनों के विकास से जुड़े प्रश्न पर कहा कि संघ का कार्य व्यक्ति निर्माण का है। क्रीड़ा भारती के सहयोग से यह योजना बने। चयन प्रक्रिया में शुचिता, निष्पक्षता रहे तथा विकेन्दीकृत व्यवस्था रहे जो स्थानीय परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए तैयार हो।
पंच परिवर्तन और युवाओं को नशे से दूर रखने में संघ की भूमिका को उन्होंने कहा कि नशा संस्कार की कमी के कारण, विवेकहीनता के कारण तथा कई बार अवसाद के कारण भी होता है। ऐसे में घर में संस्कार, शिक्षा में संस्कार तथा समाज में संस्कार लाना होगा, विवेक को जागृत करना होगा, नैतिक शिक्षा पर बल देना होगा। साथ ही बच्चों एवं माता-पिता में संवादहीनता न आए, इस पर भी ध्यान देना होगा। इसीलिए संघ ने पंच परिवर्तन में कुटुम्ब प्रबोधन रखा है। जीवन मीनिंगफुलनेस होना चाहिए।
हिन्दू राष्ट्र पर संघ के विचार को लेकर पूछे गए प्रश्न के उत्तर में सरसंघचालक जी ने कहा कि भारत हिन्दू राष्ट्र की संकल्पना नहीं है। यह हिन्दू राष्ट्र है क्योंकि हम सांस्कृतिक राष्ट्र हैं। उन्होंने संघ के तीसरे सरसंघचालक बालासाहब देवरस जी को उद्घृत करते हुए कहा कि बालासाहब ने एक बार कहा था – सोशलज्मि, सेकुलरिज्म और कम्युनिज्म की विश्व के अन्य देशों में क्या स्थिति है, यह सब भली भांति जानते हैं और वहीं भारत में सब परिवार भावना के साथ रहते हैं, इसलिए यह हिन्दू राष्ट्र है। संघ समरसता के विषय में केवल बोलता नहीं है, उसे जीता है। संघ के स्वयंसेवक का व्यवहार इसका जीवंत उदाहरण है। भारत पुनः विश्वगुरू बनने की ओर तेजी से बढ़ रहा है। बहुत सारी विदेशी ताकतें रोकने और डराने का प्रयास कर रहीं हैं, लेकिन भारत अब डरने वाला नहीं है।
कार्यक्रम अध्यक्ष मेजर ध्यानचंद खेल विश्वविद्यालय के कुलपति मेजर दीपचन्द्र अहलावत ने कहा कि संघ खेल को केवल व्यक्ति की शारीरिक क्षमता का उपक्रम नहीं मानता है, संघ खेल को भी संस्कार के रूप में देखता है। खेल के माध्यम से निर्णय क्षमता, टीम भावना, सामाजिक सौहार्द, अनुशासन एवं साहस जैसे गुणों का विकास होता है। यह युद्ध एवं आपात स्थिति में भी सहायक होता है। आज देश में 14 खेल विश्वविद्यालय हैं, जिसमें से 9 विश्वविद्यालय पिछले कुछ वर्षो में ही बने हैं। उन्होंने कहा कि खेल को जन आन्दोलन में परिवर्तन करना होगा। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ खेल सहित समाज जीवन के विविध आयामों मे अतुलनीय कार्य कर रहा है। इसलिए हम सभी खिलाड़ियों को इस विचार के साथ जुड़ना चाहिए।
कार्यक्रम की प्रस्तावना में क्षेत्र कार्यवाह डॉ. प्रमोद कुमार ने कहा कि संघ के सौ वर्षो की यात्रा व्यक्ति निर्माण, समाज निर्माण एवं व्यवस्था परिवर्तन आधारित रही है। संघ शताब्दी वर्ष में 8 प्रकार के कार्यक्रम आयोजित कर रहा है, उन्हीं कार्यक्रमों की कड़ी का यह हिस्सा है। अन्त में संघ के क्षेत्र के सह संघचालक प्रो नरेन्द्र कुमार तनेजा जी ने सभी का आभार व्यक्त किया। कार्यक्रम में लगभग साढ़े नौ सौ खिलाड़ी उपस्थित रहे।
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