स्वातंत्र्य वीर सावरकर का संघर्षमय जीवन

वीर सावरकर अग्रिम मोर्चे के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। विनायक दामोदर सावरकर स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ समाज सुधारक, इतिहासकार, राजनेता और विचारक भी थे। वीर सावरकर को सदियों पुरानी सनातन परंपरा को कायम रखने और हिन्दू राष्ट्रीयता को राजनीतिक विचारधारा के रूप में विकसित करने का श्रेय भी जाता है। सावरकर एक वकील, कवि […] The post स्वातंत्र्य वीर सावरकर का संघर्षमय जीवन appeared first on VSK Bharat.

Feb 28, 2026 - 09:20
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स्वातंत्र्य वीर सावरकर का संघर्षमय जीवन

वीर सावरकर अग्रिम मोर्चे के स्वतंत्रता संग्राम सेनानी रहे। विनायक दामोदर सावरकर स्वतंत्रता सेनानी होने के साथ-साथ समाज सुधारक, इतिहासकार, राजनेता और विचारक भी थे। वीर सावरकर को सदियों पुरानी सनातन परंपरा को कायम रखने और हिन्दू राष्ट्रीयता को राजनीतिक विचारधारा के रूप में विकसित करने का श्रेय भी जाता है। सावरकर एक वकील, कवि और लेखक थे। उन्होंने देश में जबरन धर्मांतरित हुए हिन्दुओं को हिन्दू परंपरा में वापस लाने हेतु सतत प्रयास किये। उन्होंने सनातन भारत की एक सामूहिक पहचान बनाने के लिए हिन्दुत्व शब्द का प्रयोग किया था।

सावरकर अपने पिता द्वारा महाकाव्य महाभारत, रामायण, गाथागीत और बखरों में महाराणा प्रताप, छत्रपति शिवाजी और पेशवाओं पर पढ़े गए अंशों को सुनकर बड़े हुए। सावरकर में जन्म से कविता लिखने की दुर्लभ प्रतिभा थी और छोटी उम्र में ही उनकी कविताओं को प्रसिद्ध समाचार पत्रों ने प्रकाशित किया था।

माँ दुर्गा के समक्ष संकल्प

समाज के सभी वर्गों में सावरकर जी के मित्र थे। 22 जून, 1897 को पुणे में ब्रिटिश कमिशनर की हत्या कर दी थी। इस मामले में चापेकर बुंधुओं को मिली फांसी की सजा ने युवा सावरकर को विचलित कर दिया। उन्होंने देवी दुर्गा के सामने बलिदानी चापेकर के अधूरे मिशन को पूरा करने का संकल्प लिया। उन्होंने अपनी मातृभूमि से अंग्रेजों को खदेड़ने और एक बार फिर से स्वतंत्र और महान बनाने का संकल्प लिया। तब से सावरकर ने अपने जीवन के मिशन को फैलाने का पुरजोर प्रयास किया।

वर्ष 1906 जून में बैरिस्टर बनने के लिए सावरकर इंग्लैंड चले गए और वहां उन्होंने भारतीय छात्रों को भारत में चल रही अंग्रेजी हुकूमत के विरोध में एकजुट किया। उन्होंने वहीं पर ‘आजाद भारत सोसाइटी’ का गठन किया। सावरकर ने ब्रिटिश हुकूमत के चंगुल से भारत को आजाद कराने के लिए हथियारों का इस्तेमाल करने की वकालत की थी और फिर इंग्लैंड में ही हथियारों से लैस एक दल तैयार किया था। सावरकर के लिखे लेख ‘इंडियन सोशियोलॉजिस्ट’ और ‘तलवार’ नाम की पत्रिका में प्रकाशित होते थे। वे ऐसे क्रांतिकारी लेखक थे, जिनके लेखों पर अंग्रेजों ने प्रकाशन से पहले ही प्रतिबंध लगा दिया था। उनकी पुस्तक ‘इंडियन वार ऑफ इंडिपेंडेंस 1857’ पूरी लिखी जा चुकी थी, परंतु अंग्रेजी हुकूमत ने ब्रिटेन और भारत में उसके प्रकाशित होने पर रोक लगा दी। कुछ समय बाद हॉलैंड में गुपचुप तरीके से प्रकाशित हुई और इसकी प्रतियां फ्रांस पहुंची और फिर भारत भी पहुंचा दी गयीं।

काला पानी की सजा

वर्ष 1909 में नासिक के तत्कालीन ब्रिटिश कलेक्टर ए.एम.टी जैक्सन की गोली मारकर हत्या कर दी गयी थी। इस हत्या के बाद वीर सावरकर को 13 मार्च, 1910 को लंदन में अंग्रेजों ने कैद कर लिया और उन्हें भारत लाया गया। अदालत में उन पर गंभीर आरोप लगाए गए, 23 दिसंबर 1910 को, बॉम्बे उच्च न्यायालय ने राजद्रोह के आरोप में आजीवन कारावास की सजा सुनाई और उनकी संपत्ति जब्त कर ली। जैक्सन हत्याकांड में दूसरी बार दोषी पाए जाने पर 30 जनवरी, 1911 को इसी तरह की सजा दी गई। हालांकि, दोनों सजाएं एक साथ नहीं, बल्कि एक के बाद एक चलनी थीं। इसका मतलब यह था कि उन्हें 23 दिसंबर, 1960 को ही जेल से रिहा किया जा सकता था। 04 जुलाई 1911 को सावरकर को अंडमान द्वीप समूह की सेलुलर जेल में भेज दिया गया। वहां पर उन्होंने कील और कोयले से दीवारों पर कविताएं लिखीं और उनको याद कर लिया था। दस हजार पंक्तियों की कविता को जेल से छूटने के बाद दोबारा लिखा।

रिहाई के बाद 5 साल का बैन

1921 में अंडमान से रिहाई के पश्चात उन्हें रत्नागिरी जेल और फिर यरवदा जेल में रखा गया। वर्ष 1924 में उनको रिहाई तो मिली, मगर रिहाई की शर्तों के अनुसार उनको न तो रत्नागिरी से बाहर जाने की अनुमति थी और न ही वह 5 वर्ष तक राजनीति गतिविधियों में भाग ले सकते थे। रिहा होने के बाद उन्होंने 23 जनवरी, 1924 को ‘रत्नागिरी हिन्दू सभा’ का गठन किया। जिसके माध्यम से उन्होंने भारतीय संस्कृति और समाज कल्याण के लिए कार्य करना शुरू किया।

हिन्दू धर्म के प्रति उनका समर्पण रत्नागिरी से बाहर आने के बाद पूर्ण रूप से दिखा। उन्होंने राजनीति से अलग होकर 17 अप्रैल, 1924 को रणनीतिक रूप से सामाजिक सुधार के साथ अपने प्रयोगों को शुरू करने के लिए परशुराम गांव में विठ्ठल मंदिर को चुना। ये मंदिर कई कारणों से महत्वपूर्ण था। चितपावन, ब्राह्मणों के लिए यह सबसे पवित्र स्थान माना जाता था। रिहा होने के बाद सावरकर का पहला प्रमुख भाषण इस आध्यात्मिक और राजनीतिक रूप से प्रमुख स्थान पर था। उन्होंने ‘शुद्धिकरण आणि अस्पृश्योद्धार’ (शुद्धि आंदोलन और अछूतों का उत्थान) इन दोनों विषयों पर अपनी बात खुलकर सबके सामने रखी।

ऊंच नीच को खत्म करने का लक्ष्य

सावरकर हिन्दू जाति के मध्य ऊंच-नीच की द्वेष भवना के खिलाफ थे। 1925 के गणेशोत्सव के दौरान उन्होंने यहां व्याख्यान और सार्वजनिक चर्चाओं का आयोजन किया और अस्पृश्यता कैसे हिन्दू समाज के लिए अन्यायपूर्ण और खतरनाक थी, इस पर लेख लिखे। उन्होंने स्वीकार किया कि यद्यपि लोग सैद्धांतिक रूप से उनके कुछ तर्कों से आश्वस्त हो सकते हैं, उन्हें व्यावहारिक रूप से लागू करना चुनौतीपूर्ण था।

स्थिति इतनी खराब थी कि यह माना जाता था कि एक महार की छाया भी एक उच्च जाति के हिन्दू को अपवित्र करने के लिए पर्याप्त थी। यहाँ तक कि शब्द का उच्चारण भी अभिशाप समझा जाता था और इससे जाति दूषित होती थी। इस तरह के जटिल पूर्वाग्रहों से ग्रस्त समाज में, जो सदियों से चले आ रहे थे, कोई भी इस बात की कल्पना कर सकता है कि सावरकर को इस इमारत को गिराने की कोशिश करते समय किन कठिनाइयों का सामना करना पड़ा होगा।

ऊंची जाति के हिन्दुओं ने उन्हें और उनके सहयोगियों को सामाजिक बहिष्कार की धमकी दी। फिर भी रत्नागिरी हिन्दू सभा के सदस्य विचलित नहीं हुए। वे अछूत समुदायों के बस्तियों में जाते रहे। उनके घरों के बाहर की सफाई की। वहां पवित्र तुलसी के पौधे लगाए। उनके साथ भक्ति गीत गाए।

रत्नागिरी में अछूतगणपति की मूर्ति स्थापित

धीरे-धीरे समाज में बदलाव भी दिखा। अस्पृश्य समुदाय ने अपने विश्वास को दोहराना शुरू कर दिया और अपने संकोच को त्याग दिया। 1925 में रत्नागिरी में गणेशोत्सव के दौरान, ‘अछूत’ गणपति नाम की एक विशेष मूर्ति स्थापित की गई थी और कई ब्राह्मण उनका आशीर्वाद लेने आए। भंगी समुदाय के एक व्यक्ति शिवू ने गणेश प्रतिमा की पूजा की। उत्सव में 5000 से अधिक लोगों ने भाग लिया। यह वास्तव में एक क्रांतिकारी कार्य था। 1925 में सावरकर के नेतृत्व में रत्नागिरी हिन्दू सभा ने अन्य बच्चों के साथ-साथ अछूतों के बच्चों को स्कूलों में प्रवेश देने का सबसे चुनौतीपूर्ण कार्य किया। यह बचपन से व्यवहार परिवर्तन को प्रोत्साहित करके व्यवस्था की जड़ पर प्रहार करना था। इसलिए1925 से सावरकर जी ने इस समस्या से सीधे निपटने का फैसला किया।

दापोली, खेड़, चिपलुन, देवरुख, संगमेश्वर, खारेपाटन और अन्य स्थानों पर उन्होंने सभी जातियों के बच्चों को एक साथ पढ़ने देने के लिए लोगों को समझाने और आग्रह करने के लिए व्याख्यान, सार्वजनिक बहस और पर्यटन की एक श्रृंखला आयोजित की। उन्होंने उन स्कूलों का पर्दाफाश किया, जिन्होंने जाति-आधारित अलगाव की नीति को जारी रखा, लेकिन उच्च अधिकारियों को झूठी रिपोर्ट भेजी। यह सुनिश्चित करने के लिए कि न केवल स्कूलों से, बल्कि घरों से भी अस्पृश्यता समाप्त हो, सावरकर जी ने विभिन्न जातियों के लोगों के साथ पारंपरिक मिठाइयाँ बांटने के लिए दशहरा और मकर संक्रांति जैसे हिन्दू त्योहारों के अवसर पर कई घरों का दौरा किया।

हल्दी-कुमकुम सभाओं का आयोजन

उनका मानना था कि हिन्दू राष्ट्र की प्रगति के लिए सामाजिक और राजनीतिक दोनों सुधार आवश्यक थे, राजनीति तलवार थी और समाज सुधार ढाल, ये एक दूसरे के बिना अप्रभावी हैं, वे ऐसा मानते थे। यह याद रखना चाहिए कि रत्नागिरी रूढ़िवादिता का गढ़ था। जैसा कि सावरकर ने स्वयं कहा है, सामाजिक सुधार कमजोर दिल वालों के लिए नहीं है। हर समय कड़ी लड़ाई के लिए तैयार रहना चाहिए। उन्होंने हिन्दू महिलाओं की सामूहिक हल्दी-कुमकुम सभाओं का आयोजन किया और यह सुनिश्चित किया कि तथाकथित अछूत जातियों की महिलाएं तथाकथित उच्च जाति की महिलाओं को कुमकुम लगाएं।

थोड़े समय बाद सावरकर स्वराज पार्टी में शामिल हुए और बाद में उन्होंने देश व्यापी अखिल भारतीय हिन्दू महासभा नाम से एक अलग संगठन बनाया। सावरकर वर्ष 1937 में हिन्दू महासभा के अध्यक्ष बने और बाद में ‘भारत छोड़ो आंदोलन’ का हिस्सा भी बने। उन्होंने भारत विभाजन और पाकिस्तान को अलग देश बनाने का विरोध किया और गांधी जी को भी ऐसा करने के लिए निवेदन किया था। अपने जीवनकाल में सावरकर एक मात्र ऐसे व्यक्ति थे, जिनको दो बार आजीवन कारावास की सजा हुई थी। आजादी के बाद 08 अक्तूबर, 1951 में पुणे यूनिवर्सिटी ने डी.लिट की उपाधि दी।

वीर सावरकर ने अपने निधन से दो वर्ष पूर्व 1964 में ‘आत्महत्या या आत्म त्याग’ नाम का एक लेख लिखा था। इस लेख के माध्यम से उन्होंने अपनी इच्छा मृत्यु के समर्थन को स्पष्ट किया था। उनका कहना था कि आत्महत्या और आत्म-त्याग के बीच एक महत्वपूर्ण अंतर होता है। सावरकर ने तर्क दिया था कि ‘एक निराश इंसान आत्महत्या से अपना जीवन समाप्त करता है, लेकिन जब किसी के जीवन का मिशन पूरा हो चुका हो और शरीर इतना कमजोर हो चुका हो कि जीना असंभव हो तो जीवन का अंत करने को स्व बलिदान कहा जाना चाहिए।

वीर सावरकर की आत्मकथा ‘मेरा आजीवन कारावास’ की अनुसूची में उनके द्वारा आखिरी दिनों में लिखे गए कई पत्र प्रकाशित हैं। कहा जाता है – 01 फरवरी, 1966 से उपवास करने लगे थे। इस उपवास में न तो दवाइयां खा रहे थे और न ही खाना-पानी। 26 फरवरी, 1966 तक वे ऐसे ही उपवास करते रहे। इसी दिन उन्होंने अपने शरीर को त्याग दिया। जब उनका निधन हुआ, तब वे 82 वर्ष के थे।

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