मातृभाषा के सहारे भारत का सांस्कृतिक विकास
21 फरवरी / अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस सत्येंद्र सिंह मानव जीवन शैली में शिक्षा हो या व्यवस्था, दोनों ही स्थितियों में मातृभाषा का महत्व कितना है यह सर्वविदित है। व्यवहारिक जीवन और अध्ययनशीलता के लिए ककहरा सीखना हो तो मातृभाषा के बिना सब व्यर्थ है। निज भाषा के बिना किसी भी चीज को सीखना, समझना और […] The post मातृभाषा के सहारे भारत का सांस्कृतिक विकास appeared first on VSK Bharat.
21 फरवरी / अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस
सत्येंद्र सिंह
मानव जीवन शैली में शिक्षा हो या व्यवस्था, दोनों ही स्थितियों में मातृभाषा का महत्व कितना है यह सर्वविदित है। व्यवहारिक जीवन और अध्ययनशीलता के लिए ककहरा सीखना हो तो मातृभाषा के बिना सब व्यर्थ है। निज भाषा के बिना किसी भी चीज को सीखना, समझना और जानना असंभव है।
कवि भारतेन्दु हरिश्चन्द्र ने निज भाषा का महत्व बताते हुए लिखा है कि –
‘निज भाषा उन्नति अहै, सब उन्नति को मूल।
बिन निज भाषा ज्ञान के, मिटन न हिय के सूल।।
निज भाषा से तात्पर्य, हिंदी सहित सभी स्थानीय भारतीय भाषाओं से रहा है। फिर आगे लिखते हैं –
अंग्रेजी पढ़के जदपि, सब गुण होत प्रवीण।
पै निज भाषा ज्ञान के, रहत हीन के हीन।।
अर्थात अंग्रेजी जैसी विदेशी भाषाओं में प्राप्त शिक्षा से आप प्रवीण तो हो जाओगे, किंतु सांस्कृतिक एवं व्यवहारिक दृष्टिकोण से हीन ही रहोगे।
मातृभाषा से बच्चों का परिचय घर और परिवेश से ही शुरू हो जाता है। अपनी मातृभाषा में बातचीत करने और चीजों को समझने-समझाने की क्षमता के साथ बच्चे विद्यालय में जाना शुरू करते हैं। इस तरह से अगर मातृभाषा से विद्यालयों में पढ़ाया जाए तो इसके सकारात्मक परिणाम देखने को मिलते हैं।
मातृभाषा को संरक्षित एवं सुरक्षित रखने के लिए प्रत्येक वर्ष अंतरराष्ट्रीय मातृभाषा दिवस मनाने की शुरूआत की गई। इसमें 30 देशों के 122 प्रतिनिधियों ने भाग लिया था। कार्यक्रम की अध्यक्षता करते हुए मॉरिशस के तत्कालीन प्रधानमंत्री सर शिवसागर रामगुलाम ने कहा कि हिंदी अंतरराष्ट्रीय भाषा है।
इस अवसर पर बहुत सी बातें हिंदी, अवधी, भोजपुरी, ब्रजभाषा, मगही, मराठी, कोंकणी, बागड़ी, मारवाड़ी, मालकी, निमाड़ी, बांग्ला, असमिया, मलयालम, तमिल, तेलगु, कन्नड़, जनजातीय भाषाओं आदि में कही जाती हैं तो इसका व्यापक प्रभाव होता है।
विदेशों में बसे भारतवंशियों ने अपनी भाषा, संस्कृति, आचार-विचार को साहित्यिक रूप में लिखकर और भी समृद्ध बनाया। दुनिया में 40 देशों के 600 विश्वविद्यालयों में हिंदी की पढ़ाई होती है। ग्लोबल होती दुनिया में हिंदी पारम्परिक ज्ञान और कृत्रिम बुद्धिमत्ता की मिसाल बन रही है। हिंदी साल दर साल इंग्लिश कंटेंट के 19 प्रतिशत के मुकाबले में 94 प्रतिशत की तेज गति से बढ़ रही है। हिंदी भाषा का प्रकाशपुंज सहिष्णुता, विश्व शांति और सद्भाव का संदेश पूरे विश्व के मानव जगत को दे रहा है।
इसलिए अगर भारत में स्थानीय भाषा के विपरीत अगर विदेशी अंग्रेजी भाषा में हम बच्चों को गीत, संवाद के लिए प्रोत्साहित कर रहे हैं तो हम उन्हें अपने परिवेश, संस्कृति और जड़ों से काट देना चाहते हैं। इससे बचने का एक ही तरीका है कि हम अपनी मातृभाषा में संवाद, चिंतन और विचार-विमर्श को दैनिक जीवन की शैली में शामिल करें।
इन्हीं सब बातों को ध्यान में रखकर भारत सरकार ने भी 2020 में नई शिक्षा नीति जारी कर भारत में निज भाषा में शिक्षा के महत्व को प्रतिपादित किया है, विलुप्त होती भाषाएं अपने अस्तित्व को पुनः प्राप्त कर सकती हैं, यह सराहनीय कदम है। नई शिक्षा नीति के माध्यम से हिंदी के साथ-साथ भारतीय एवं जनजातीय भाषाओं का महत्व बढ़े, इस ओर ध्यान देना आवश्यक है।
भाषा को जब-तक बाजार अपनाता नहीं है, तब-तक भाषा का विकास होता नहीं है। भारतीय बाजार को हिंदी के साथ स्थानीय भाषाओं, जनजातीय भाषाओं को स्वीकारना होगा।
लोकतांत्रिक देश भारत में हिंदी एवं स्थानीय भाषाओं का पर्याप्त प्रचार-प्रसार एवं बाजार आधारित शिक्षा व्यवस्था का अनुपालन अनिवार्यतः होना चाहिए। मातृभाषा के सहारे भारत की लोकतांत्रिक, सांस्कृतिक, धार्मिक, आर्थिक, सामाजिक विकास संभव है।
(लेखक अखिल भारतीय वनवासी कल्याण आश्रम के राष्ट्रीय अध्यक्ष हैं।)
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