भगवान श्री राम जी श्री चरणों में श्रद्धामय नमन

क्या ये सब सेवा के बदले मिला राम के मन को  आदर्शों पर चल कर ही तो पाया इस पीड़ा को।

भगवान श्री राम जी श्री चरणों में श्रद्धामय नमन

 किस ने देखा राम हृदय की घनी भूत पीड़ा को

कह भी जो न सके किसी से उस गहरी पीड़ा को

 क्या ये सब सेवा के बदले मिला राम के मन को

 आदर्शों पर चल कर ही तो पाया इस पीड़ा को।

 

किस से कहते व्यथा राम मन में जो उन के उपजी

जीवन लीला कैसे कैसे आदर्शों में उलझी

इस से ही तो राम राम हैं  राम नहीं कोई दूजा

बाद  उन्हों के धर्म आत्मा और कोई नहीं उतरी। 

 

मन करता है राम तुम्हारे दुःख का अंश चुरा लूँ

 पहले ही क्या कम दुःख झेले कैसे तुम्हे पुकारूँ

फिरभी तुम करुणा निधान ही बने हुए हो अब भी

 पर उस करुणा में कैसे मैं अपने कष्ट मिला दूँ। 

 

राम तुम्हारा हृदय लौह धातु से अधिक कठिन है 

द्रवित नहीं हो सका अग्नि से कैसी मणि कठिन है

आई होगी बाढ़ हृदय में आंसू ढरके होंगे

शायद आँख रुकी न होगी बेशक हृदय कठिन है।

डॉ वेद व्यथित ,मेलबॉर्न ,ऑस्ट्रेलिया