परिस्थितियां अपने साथ अनुकूलता और प्रतिकूलता के संगम मौन का कवच
Circumstances bring with them the shield of silence confluence favorable and unfavorable circumstances, परिस्थितियां अपने साथ अनुकूलता और प्रतिकूलता के संगम मौन का कवच
जीवन सम-विषम परिस्थितियों की एक सततवाहिनी सरिता है । परिस्थितियां अपने साथ अनुकूलता और प्रतिकूलता के संगम को सदा समाहित किए रहती हैं। अक्सर जीवन में ऐसे क्षण आते हैं, जब हमें परिस्थितियों के कठोर आघात का सामना करना पड़ता है। इन आघातों से स्वयं को सुरक्षित रखने के लिए हमारे पास एक प्रकृति प्रदत्त और उत्कृष्टतम सुरक्षा कवच सदैव विद्यमान रहता है । इस अमूल्य और अभेद्य कवच का नाम है- मौन । मौन हमारे और बाह्य प्रतिकूल दशाओं के मध्य एक ढाल बनकर जमा रहता है । लेकिन मौन आखिरकार है क्या ? मौन का अर्थ समझने के लिए हमें इसकी गूढ़ता पर दृष्टिपात करने का प्रयास करना होगा । मौन का सीधा-सा अर्थ है- शब्दों, गतिविधियों, क्रियाओं और विचारों का संतुलन। जब हम इन सभी की मापनी पर खुद को शून्य की स्थिति में स्थिर कर पाने में सक्षम और समर्थ हो जाते हैं, तभी यह कहा जा सकता है कि हम मौन को साथ लिया है। चुप रहने या न बोलने को ही मौन की संज्ञा दे देना एक सतही बात होगी ।
हम कल्पना करें कि कोई विकट परिस्थिति हमसे टकरा रही है और ऐसी दशा में अगर हम प्रतिक्रिया के पैमाने पर खुद को शून्य की स्थिति पर दृढ़तापूर्वक जमाए रखने में सफल हो जाते हैं, तो निस्संदेह हम मौन के सच्चे साधक हैं। लेकिन अगर परिस्थितियों का यही झोंका हमें प्रतिक्रियाओं के लिए विवश कर देता है, तब फिर इसका सीधा सा अर्थ है कि हम अभी मौन से अपरिचित हैं। परिस्थितियों का तो कहना ही क्या, उनके इतने प्रकार और भेद हैं कि गणना करना मुश्किल होगा। ये बाह्य वातावरण से भी उत्पन्न होती हैं और हमारे अंतर्मन के भीतर भी इनके सृजन की घटना संपन्न होती है। इस बात से लेशमात्र भी फर्क नहीं पड़ता कि परिस्थिति आंतरिक है या बाह्य, हमारे अनुकूल है या प्रतिकूल । सीधा-सा मापदंड यही है कि अगर परिस्थिति के जन्म लेने और हमारे साथ संघट्ट करने पर हमारी ओर से प्रतिक्रिया व्यक्त हुई, तो फिर हम मौन से पूर्णतया अनभिज्ञ हैं और अगर नहीं हुई तो कहीं न कहीं हमारे द्वारा मौन की ओर उन्मुख होने का प्रयास किया गया है।
मौन किसी भी प्रकार की परिस्थिति से सुरक्षा के लिए एक सर्वोत्तम कवच की भूमिका अदा करता है । मौन के माध्यम से हम अपने अंतस में व्याप्त कोलाहल को नियंत्रित करके उसे आत्मिक शांति में रूपांतरित कर सकते हैं। आंतरिक और बाह्य विक्षोभों से अपने अंतर्मन को बचाने का एकमात्र साधन मौन है। इसके माध्यम से हम अपने हृदय में प्रवाहित होने वाली भावनाओं के उस महासागर को नियंत्रित कर सकते हैं, जिसके अनियंत्रित होने की दशा में हमारा संपूर्ण संतुलन ही प्रभावित हो सकता है। अंतर्मन की स्थिरता को प्राप्त करने के लिए यह परम आवश्यक है कि परिस्थितियों का आवेग उस पर आक्रमण न करने पाए। मगर यह भी एक कटु सत्य है कि आक्रांता को आक्रमण करने से रोकना एक दुस्साध्य कार्य है। ऐसी दशा में एक बेहतर विकल्प के रूप में स्वयं को एक सुरक्षा कवच अवश्य पहनाया जा सकता । परिस्थितियों के आक्रमण से सुरक्षा के लिए मौन ही सर्वोत्तम कवच है। हमारा प्रयास यह होना चाहिए कि हम बुरी और अच्छी, दोनों तरह की दशाओं में स्वयं को मौन के माध्यम से संतुलित रखें, क्योंकि आवश्यकता से अधिक अनुकूलता भी हमारे लिए नुकसानदेह है और आवश्यकता से अधिक प्रतिकूलता भी ।
एक अन्य लाभ यह है कि मौन का कवच पहनकर हम परिस्थितियों से अपना ध्यान हटा सकते हैं। अब वही ध्यान हम आत्मपरिष्करण, आत्मपरिमार्जन और आत्मशुद्धि की ओर केंद्रित कर सकते हैं। अहंकार जैसे दुर्गुणों से मुक्ति मौन के माध्यम से ही संभव है। इसके आगोश में जाकर हम अपने अंदर सद्गुणों और आत्मज्ञान के अंकुर को प्रस्फुटित होने के लिए प्रेरित कर सकते हैं। अनेक रहस्यपूर्ण प्रश्नों का उत्तर भी मौन का कवच धारण करने के उपरांत ही खोजा जा सकता है। किसी युद्ध को उस स्थिति में भी जीता जा सकता है, जबकि आक्रमणकर्ता का कोई वार हम पर कोई असर न कर सके। ऐसा तभी संभव है, जब हम कोई सुरक्षा कवच धारण करके ही रणक्षेत्र में उतरे हों । परिस्थितियों के विरुद्ध युद्ध में मौन ही हमारा सुरक्षा कवच होता है। इसके माध्यम से हम अपने मन मस्तिष्क को नकारात्मकता की चपेट में आने से बचा सकते हैं। यह ध्यान के लिए एक अनिवार्य शर्त है और ध्यान स्वयं को अनंत ऊर्जा से जोड़ने के लिए। आत्मसाक्षात्कार मौन के माध्यम से ही संभव है, लेकिन मौन की अवस्था को प्राप्त करना भी कोई सहज कार्य नहीं है।
हम कल्पना कर सकते हैं कि हमें कोई गहरा जख्म देने के उपरांत हमारा मुंह कसकर दबा दिया जाए, ताकि हमारी चीख बाहर न आ सके, तो क्या यह कहा जाएगा कि हमने मौन धारण कर लिया ? चुप किए जाने के और भी तरीके हो सकते हैं। मौन तब होगा, जब हमारा ध्यान उस कष्ट की ओर से हट जाए। परिस्थितियों की ओर से अपना ध्यान ऐसे हटाना कि वे हमसे किसी भी कीमत पर कोई प्रतिक्रिया कराने में सफल न हो सकें, यही मौन की वास्तविक संकल्पना है । मौन का अभ्यास करके ही हम स्वयं को प्रकृति के अनूठे सौंदर्य और शक्तियों से जोड़ सकते हैं। दूसरे शब्दों में कहा जाए तो मौन ही वह साधन है, जिसके द्वारा आत्मा का परमात्मा से मिलन कराया जा सकता है। मौन के कवच को धारण करके ही जीवन को शांति के मार्ग की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित कर पाना संभव है
विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार मलोट पंजाब