लोकसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है

विश्व में भारत की साख बढ़ी है। इसके बावजूद 'अच्छे दिनों' और विदेश से काला धन वापस लाने जैसे अधूरे वादों के अलावा विपक्ष के तरकश में महंगाई, बेरोजगारी और लगातार पेपर लीक जैसे मुद्दों के भी तीर हैं।

लोकसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है

लोकसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। आगामी 19 अप्रैल से एक जून के बीच सात चरणों में मतदान

राज कुमार सिंह
चुनावी माहौल मतदान तक बदलता रह सकता है, लेकिन आज के परिदृश्य में भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता हासिल करने की होड़ में आगे नजर आता है

लोकसभा चुनावों का बिगुल बज चुका है। आगामी 19 अप्रैल से एक जून के बीच सात चरणों में मतदान होगा और चार जून को पता चलेगा कि अबकी बार, किसकी सरकार। चुनाव से पहले सत्ता के दावेदार तो दावे करते ही हैं, किंतु लोकतंत्र में जनता ही जनार्दन है। मतदाता अपने विवेक की कसौटी पर दावों को कसते हैं और दावे करने वालों के रिकार्ड को भी। दस साल की सत्ता विरोधी भावना की आशंका के बावजूद भाजपा अपने लिए 370 और अपने गठबंधन राजग के लिए 400 सीटों का लक्ष्य घोषित कर चुकी है, मगर विपक्ष अपना कोई आंकड़ा नहीं बता पा रहा। क्या भाजपाई खेमा आत्मविश्वास की अधिकता और विपक्ष में आत्मविश्वास के अभाव का संकेत दिख रहा है?

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लोकसभा में दो सीटों से 303 सीटों तक का सफर तय करने वाली और कई प्रदेशों पर शासन करने वाली भाजपा के बारे में कहा जाता है कि वह हमेशा चुनावी मोड में रहती है। पिछले साल 28 विपक्षी दलों ने इंडियन नेशनल डेवलपमेंटल इन्क्लूसिव अलायंस यानी 'इंडिया' नाम से भाजपा  विरोधी मोर्चा गठित किया। इसके माध्यम से विपक्षी दल भाजपा को चुनौती देते तो दिखे, लेकिन उस बढ़त को बरकरार नहीं रख पाए। आइएनडीआइए नामकरण के बाद आत्ममुग्ध विपक्ष परस्पर घात- प्रतिघात की राजनीति में उलझ गया, जबकि भाजपा ने राजग को उसके रजत जयंती वर्ष में न सिर्फ सक्रिय किया, बल्कि अपना कुनबा और बढ़ाया। पिछले साल के अंत में हुए पांच राज्यों के विधानसभा चुनावों में आपस में ही लड्ने वाला विपक्ष अभी तक संयोजक और साझा न्यूनतम कार्यक्रम तय नहीं कर पाया है,

जबकि तभी से चुनावी मोड में आई भाजपा चुनावी मुद्दों को धार देते हुए राजग के विस्तार में जुटी है। आइएनडीआइए के सफर की शुरुआत तो 28 दलों से हुई थी, लेकिन उसके दोस्त ही साथ छोड़ते गए। यहां तक उस मोर्चे के सूत्रधार रहे बिहार के मुख्यमंत्री नीतीश कुमार भी कांग्रेस के व्यवहार से खफा होकर वापस उसी राजग में लौट गए, जिसके विरुद्ध विपक्ष को एकजुट कर रहे थे। बार-बार पालाबदल के लिए नीतीश की आलोचना की जा सकती है, लेकिन जयन्त चौधरी के लिए क्या कहेंगे? सपा से दोस्ती में मुखर भाजपा विरोच की राजनीति करने वाले जयन्त चौधरी का रालोद भी राजग में चला गया। चुनाव से पहले ही इस बिखराव की अलग-अलग व्याख्या की जा रही हैं, पर होने वाले नफा-नुकसान को समझाने के लिए किसी राकेट साइंस की जरूरत नहीं।

यह समझने के लिए भी नहीं कि इस बिखराव और दिशाहीनता के लिए सबसे बड़े विपक्षी दल के नाते कांग्रेस ज्यादा जिम्मेदार है। विपक्षी एकता से बने माहौल का राजनीतिक लाभ उठाने में कांग्रेस इतनी आत्मकेंद्रित हो गई कि उसने सहयोगियों के बीच अविश्वास की खाई को और चौड़ा हो जाने दिया। शायद इसका कारण राहुल गांधी की भारत जोड़ो न्याय यात्रा भी रही हो। बेशक इससे कांग्रेस संगठन में सक्रियता आई होगी, पर वरिष्ठ नेताओं का पलायन जारी रहने से उठे सवाल भी जवाब मांग रहे हैं चुनावी माहौल मतदान तक बदलता रह सकता है, लेकिन आज के परिदृश्य में भाजपा के नेतृत्व वाला राजग सत्ता हासिल करने की होड़ में आगे नजर आता है। 370 और 400 सीटों का लक्ष्य घले ही कुछ अतिरंजित लगे, लेकिन 2019 में भाजपा ने 300 पार का नारा सच कर दिखाया था।

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अब भी उसके प्रयास बता रहे हैं कि वह लक्ष्य हासिल करने में जी-जान से जुटी है। 10 साल से सत्तारूद दल तीसरे कार्यकाल के लिए दूर हो गए दोस्तों को भी मनाने में कसर नहीं छोड़ रहा, जबकि इतने ही समय से सत्ता से बेदखल देश का सबसे पुराना दल दीवार पर लिखी चुनावी राजनीतिक जरूरत की इबारत को भी पढ़ने को तैयार नहीं। राहुल गांधी संभावित सहयोगियों को भी भाजपा को 'बी टीम' घोषित कर दूर करते रहे, जबकि नरेन्द्र मोदी-अमित शाह की जोड़ी मुखर विरोधियों में भी दोस्ती की संभावना तलाशती रही। बिहार में नीतीश कुमार और आंध्र प्रदेश में चंद्रबाबू नायडू की राजग में वापसी तथा उत्तर प्रदेश में जयन्त का पाला बदल इसी सोच का नतीजा है। ओडिशा में बीजद और पंजाब में शिरोमणि अकाली दल से भी पुनः दोस्ती की कवायद जारी है। जबकि नीतीश और जयन्त के पाला बदल के बावजूद कांग्रेस बंगाल में ममता बनर्जी से गठजोड़ को लेकर लचीलापन नहीं दिखा पाई। आम आदमी पार्टी यानी आप से भी कांग्रेस का गठबंधन दिल्ली और कुछ अन्य राज्यों में तो हुआ, जबकि पंजाब में दोनों एक-दूसरे के विरुद्ध चुनाव लड़ेंगे।

अब जरा दलों और गठबंधनों की मोर्चेबंदी से इतर चुनावी मुद्दों पर भी नजर डालें। निःसंदेह नरेन्द्र मोदी का नाम और चेहरा भाजपा का सबसे बड़ा ट्रंप कार्ड रहा है। संप्रग शासन में घोटाले के आरोपों से उपनी निराशा के बीच हुए 2014 के चुनाव में खुद को उम्मीद की किरण के रूप में पेश कर तीन दशक बाद किसी एक दल के रूप में भाजपा को स्पष्ट बहुमत दिलाने वाले मोदी अगले चुनाव में भी जनता का विश्वास कायम रखने में सफल रहे। भाजपा की 21 सीटें भी बढ़ गई। दूसरे कार्यकाल में वह राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और भाजपा के राम मंदिर निर्माण, अनुच्छेद 370 की समाप्ति और तीन तलाक पर रोक जैसे परंपरागत वादे पूरे कर बड़ा संदेश देने में सफल रहे हैं। समान नागरिक संहिता पर भी उत्तराखंड से पहल हो चुकी है। भारतीय अर्थव्यवस्था विश्व में पांचवें नंबर पर पहुंच चुकी है और जल्द ही तीसरे पायदान पर पहुंच सकती है।

विश्व में भारत की साख बढ़ी है। इसके बावजूद 'अच्छे दिनों' और विदेश से काला धन वापस लाने जैसे अधूरे वादों के अलावा विपक्ष के तरकश में महंगाई, बेरोजगारी और लगातार पेपर लीक जैसे मुद्दों के भी तीर हैं। देखना होगा कि अपनी संदिग्ध विश्वसनीयता के बावजूद विपक्ष इन मुद्दों को कितनी दूर तक ले जा पाता है। यह भी कि फिर मतदाता किस पर भरोसा करेंगे, विपक्ष के मुद्दों पर या मोदी की गारंटी पर। कुछ औद्योगिक घरानों से निकटत्ता के आरोप लगाते हुए विपक्ष ने मोदी की साख पर प्रहार भी शुरू किए। हाल तक तो उसका चुनावी असर नहीं दिखा, पर चुनावी बांड्स पर सुप्रीम कोर्ट के फैसले के बाद बाद सामने आ रही सच्चाई का लोकसभा चुनाव पर कोई असर होगा वा नहीं, यह अभी नहीं कहा जा सकता। (लेखक वरिष्ठ पत्रकार एवं