सर्वोच्च न्यायालय ने पादरियों व धर्मांतरितों के प्रवेश पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ याचिका खारिज की
कांकेर होर्डिंग प्रकरण और मतातंरण नेक्सस की पड़ताल सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 16 फरवरी को पादरियों व धर्मांतरितों के प्रवेश पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ दायर याचिका खारिज़ कर दी। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने के लिए याचिका दायर की गई थी, जिसमें ग्राम सभा ने गांव के प्रवेश सीमा पर […] The post सर्वोच्च न्यायालय ने पादरियों व धर्मांतरितों के प्रवेश पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ याचिका खारिज की appeared first on VSK Bharat.
कांकेर होर्डिंग प्रकरण और मतातंरण नेक्सस की पड़ताल
सर्वोच्च न्यायालय ने सोमवार, 16 फरवरी को पादरियों व धर्मांतरितों के प्रवेश पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ दायर याचिका खारिज़ कर दी। छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के निर्णय को चुनौती देने के लिए याचिका दायर की गई थी, जिसमें ग्राम सभा ने गांव के प्रवेश सीमा पर लगाए गए होर्डिंग/सूचना बोर्ड को सही ठहराया गया था, जिनमें ईसाई पादरियों और धर्मांतरण कर चुके लोगों के प्रवेश पर रोक लगाई गई थी। जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने याचिकाकर्ताओं की ओर से अधिवक्ता कॉलिन गोंसाल्वेस और सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की दलीलें सुनने के बाद यह आदेश पारित किया।
बस्तर स्थित कांकेर जिले के गांवों में ग्राम सभा ने यह कदम गांववासियों के जबरन या लालच देकर धर्म परिवर्तन को रोकने के उद्देश्य से उठाया था। इस पर सर्वोच्च न्यायालय ने टिप्पणी की कि छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय के फैसले के पैरा 34 का उल्लेख किया गया है, जिसमें याचिकाकर्ता को सक्षम प्राधिकारी (ग्राम सभा) के समक्ष उपाय अपनाने की स्वतंत्रता दी गई थी। सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि उच्च न्यायालय में याचिका सीमित मुद्दों पर दायर की गई थी, जबकि सर्वोच्च न्यायालय में कई नए तथ्य और आयाम जोड़े गए हैं। इसलिए याचिकाकर्ता पुनः उच्च न्यायालय का रुख कर सकता है।
याचिकाकर्ता का पक्ष रखते हुए सीनियर एडवोकेट कॉलिन गोंसाल्वेस ने कहा कि उच्च न्यायालय ने गांव में ईसाई पादरियों और धर्मांतरित ईसाइयों के प्रवेश पर रोक को असंवैधानिक नहीं माना, जबकि मिशनरी गतिविधियों पर बिना पर्याप्त सामग्री के टिप्पणी की गई। उन्होंने दावा किया कि पिछले दस वर्षों में छत्तीसगढ़ में धर्मांतरण से जुड़े मामलों में एक भी दोषसिद्धि नहीं हुई है।
पीठ गोंसाल्वेस के तर्कों से संतुष्ट नहीं हुई और याचिका खारिज कर दी। जस्टिस विक्रम नाथ ने कहा कि “आपको नियमों के तहत उचित प्राधिकारी के पास जाना चाहिए था। वे हलफनामों, सामग्री और साक्ष्यों के आधार पर मामले की जांच करते।” सर्वोच्च न्यायालय ने स्पष्ट किया कि पहले उपलब्ध वैधानिक उपायों का उपयोग किया जाना चाहिए और सीधे सर्वोच्च न्यायालय में चुनौती देने से पहले संबंधित प्राधिकरण से संपर्क करना आवश्यक है।
तथ्यों का विश्लेषण
अब सर्वोच्च न्यायालय में याचिकाकर्ताओं के वकील द्वारा रखी गई दलीलों को ही रेखांकित करते हुए पूरे विमर्श को तथ्यों के साथ समझते हैं। पृष्ठभूमि में वर्ष 2025 के अगस्त महीने में कांकेर जिले की कुछ ग्राम सभाओं ने प्रस्ताव पारित कर स्थानीय जनजातीय ग्रामीणों ने सूचना बोर्ड/होर्डिंग लगाया। इनमें यह कहा गया कि ग्राम-सीमा के भीतर जबरन, प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से धर्मांतरण गतिविधियाँ स्वीकार्य नहीं होंगी। इसमें पाँचवीं अनुसूची और पेसा का उल्लेख किया गया। इसके बाद ग्राम-सीमा पर होर्डिंग लगाए गए, जिनमें इसी आशय का संदेश अंकित था।
यहाँ दो बातों पर ध्यान देना आवश्यक है। पहली यह कि, प्रस्ताव ग्राम सभा के माध्यम से पारित हुए। दूसरी यह कि, प्रस्ताव में “जबरन” और “प्रलोभन” जैसे शब्दों का उल्लेख था, जो छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968 की भाषा से मेल खाते हैं। जानबूझकर कुछ मीडिया प्लेटफॉर्म और ईसाई संगठनों ने इसे “धार्मिक स्वतंत्रता पर रोक” या “आवागमन अधिकार का उल्लंघन” कहा। यह आरोप भी लगाया कि यह ईसाई समुदाय के विरुद्ध भेदभाव है।
जबकि कांकेर जिला छत्तीसगढ़ के उन क्षेत्रों में आता है, जिन्हें भारत के संविधान की पाँचवीं अनुसूची के अंतर्गत अनुसूचित क्षेत्र घोषित किया गया है। अनुसूचित क्षेत्र होने का अर्थ केवल यह नहीं कि यहां पंचायत व्यवस्था लागू है, बल्कि इसका अर्थ यह भी है कि यहां ग्राम सभा को सामान्य क्षेत्रों की तुलना में अधिक संवैधानिक संरक्षण एवं विशेष अधिकार प्राप्त हैं। पेसा अधिनियम, 1996 इसी संवैधानिक पहलू का विधायी विस्तार है। इस अधिनियम के माध्यम से ग्राम सभा को केवल विकास योजनाओं पर सहमति देने वाली संस्था नहीं, बल्कि परंपरा और सांस्कृतिक पहचान की संरक्षक के रूप में मान्यता दी गई। धारा 4(d) विशेष रूप से ग्राम सभा को यह अधिकार देती है कि वह अपनी परंपराओं, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा करे।
पेसा नियमों में ग्रामसभा के निर्णय को चुनौती देने की प्रक्रिया उपलब्ध है। न्यायालय ने भी यह कहा कि यदि किसी को ग्राम सभा के प्रस्ताव से आपत्ति है, तो पहले उसी प्रक्रिया का उपयोग किया जाए। यह तकनीकी आपत्ति नहीं थी; यह न्यायिक संरचना का सिद्धांत है। संवैधानिक न्यायालय अंतिम उपाय होते हैं, प्रथम नहीं।
यदि प्रत्येक ग्राम सभा प्रस्ताव को सीधे उच्च न्यायालय में चुनौती दी जाए, तो विकेंद्रीकरण का सिद्धांत कमजोर हो जाएगा। उच्च न्यायालय का यह दृष्टिकोण प्रशासनिक कानून के उस सिद्धांत के अनुरूप है, जिसमें कहा जाता है कि जब तक वैधानिक उपाय उपलब्ध है, तब तक रिट क्षेत्राधिकार का उपयोग सीमित होना चाहिए। यदि ग्राम सभा यह कहती है कि जबरन या प्रलोभन आधारित धर्मांतरण स्वीकार्य नहीं है, तो वह छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम के अनुरूप कथन कर रही है।
स्थानीय स्तर पर लंबे समय से यह अनुभव किया जा रहा था कि कुछ गांवों में बाहरी पास्टर/पादरी अथवा संदिग्ध कन्वर्टेड समूह नियमित रूप से प्रवेश कर रहे थे और उनके द्वारा व्यक्तिगत परिवारों तथा विशेषकर महिलाओं और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों को प्रभावित करने की गतिविधियां बढ़ रही थीं। इसके परिणामस्वरूप कई गांवों में सामुदायिक जीवन में विभाजन, परंपराओं से कटाव और ग्राम सभा व्यवस्था में अव्यवस्था जैसे संकेत सामने आने लगे थे।
इसी कारण ग्राम सभा ने यह महसूस किया कि यदि समय रहते एक स्पष्ट सामुदायिक दिशा-निर्देश जारी नहीं किया गया, तो स्थिति अगले स्तर के विवाद में बदल सकती है। यह दिशा-निर्देश अंततः बोर्ड/होर्डिंग के रूप में सामने आया। सबसे पहले 05/08/2025 को बाँसला पंचायत के जुनवानी गाँव से बोर्ड लगाने की तस्वीर आई, जिसमें पास्टर/पादरियों को गाँव में आने पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश लिखा था। इसके बाद आस-पास के सात अन्य गाँवों में यह बोर्ड लगे।
बोर्ड स्थापना का मुख्य उद्देश्य यह बताना था कि गांव की सामुदायिक इच्छा बाहरी पास्टर/पादरी के माध्यम से कन्वर्जन गतिविधियों को स्वीकार नहीं करती। इसे “विचार/आस्था” पर हमला नहीं, बल्कि “प्रलोभन/सामाजिक विघटन” पर रोक के रूप में रखा गया। बोर्ड की भाषा में पाँचवीं अनुसूची और पेसा जैसे वैधानिक संदर्भों का उल्लेख यह संकेत देता है कि इसे ग्राम सभा ने अपने क्षेत्र के विशेष संवैधानिक ढांचे के भीतर रखने का प्रयास किया।
जब मामला छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय में रिट याचिका के रूप में पहुँचा। याचिकाकर्ताओं ने अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 19 (1) (d) का हवाला दिया। उच्च न्यायालय ने मामले की सुनवाई की। उसने होर्डिंग की भाषा, पेसा के प्रावधान और उपलब्ध वैकल्पिक उपाय का परीक्षण किया। उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज कर दी और कहा कि प्रस्तुत सामग्री के आधार पर होर्डिंग स्वतः असंवैधानिक सिद्ध नहीं होते तथा पेसा नियमों के अंतर्गत वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।
इसके बाद मामला सर्वोच्च न्यायालय में विशेष अनुमति याचिका के माध्यम से पहुँचा। अपील में होर्डिंग के अतिरिक्त कुछ अन्य मुद्दे भी उठाए गए, जिनमें कथित हमले और दफ़न विवाद शामिल थे। सर्वोच्च न्यायालय ने उच्च न्यायालय के निर्णय में हस्तक्षेप से इनकार किया और कहा कि अपील में दायरे का विस्तार उचित नहीं है तथा वैकल्पिक उपाय उपलब्ध है।
ईसाई याचिकाकर्ता ने कहा कि ग्राम सभा द्वारा लगाए गए होर्डिंग अनुच्छेद 25 और अनुच्छेद 19 (1) (d) का उल्लंघन करते हैं। इसका अर्थ था कि न्यायालय को यह देखना था कि क्या इन होर्डिंग के कारण धार्मिक स्वतंत्रता या आवागमन की स्वतंत्रता का प्रत्यक्ष और वास्तविक हनन हो रहा है।
छत्तीसगढ़ उच्च न्यायालय ने होर्डिंग में लिखे वाक्यों का विश्लेषण किया। यह विश्लेषण शब्दों पर आधारित था, न कि भावनात्मक व्याख्या पर। होर्डिंग में जिस भाषा का उपयोग किया गया था, उसमें कहा गया कि ग्राम में जबरन, प्रलोभन या भ्रम के माध्यम से धर्मांतरण गतिविधियाँ स्वीकार्य नहीं हैं। यहाँ न्यायालय ने दो स्तरों पर विचार किया। पहला, क्या यह किसी समुदाय के सभी व्यक्तियों को निषिद्ध घोषित करता है? दूसरा, क्या यह गतिविधि-आधारित चेतावनी है?
न्यायालय को ऐसा कोई स्पष्ट आधार नहीं मिला, जिससे यह सिद्ध हो सके कि गाँव के स्थायी ईसाई निवासियों का प्रवेश पूर्णतः प्रतिबंधित है। अब अनुच्छेद 25 का प्रश्न आता है। भारतीय संवैधानिक कानून में धार्मिक स्वतंत्रता पूर्णतः निरपेक्ष अधिकार नहीं है। अनुच्छेद 25 (1) स्पष्ट रूप से कहता है कि यह स्वतंत्रता “public order, morality and health” के अधीन है। सर्वोच्च न्यायालय ने स्टेनिस्लॉस बनाम मध्यप्रदेश राज्य (1977) में यह स्पष्ट किया था कि “propagate” का अर्थ किसी अन्य व्यक्ति को उसकी इच्छा के विरुद्ध या प्रलोभन देकर धर्म परिवर्तन कराना नहीं है। न्यायालय ने यह भी कहा था कि किसी अन्य व्यक्ति की धार्मिक स्वतंत्रता को प्रभावित करने वाला परिवर्तन संरक्षित अधिकार नहीं हो सकता। छत्तीसगढ़ धर्म स्वातंत्र्य अधिनियम, 1968 इसी सिद्धांत पर आधारित है। इसकी धारा 3 बल, प्रलोभन या कपट से धर्म परिवर्तन को प्रतिबंधित करती है।
उच्च न्यायालय ने इस व्यापक विधिक पृष्ठभूमि को ध्यान में रखा। उसने यह नहीं कहा कि ग्राम सभा किसी भी प्रकार की धार्मिक गतिविधि पर रोक लगा सकती है। उसने केवल इतना कहा कि प्रस्तुत रिकॉर्ड के आधार पर होर्डिंग स्वतः असंवैधानिक नहीं सिद्ध होते।
दूसरा महत्वपूर्ण आयाम पेसा अधिनियम और पाँचवीं अनुसूची का था। कांकेर अनुसूचित क्षेत्र है। पाँचवीं अनुसूची का उद्देश्य यह सुनिश्चित करना है कि जनजातीय समाज की सांस्कृतिक और सामाजिक संरचना बाहरी हस्तक्षेप से सुरक्षित रहे। पेसा अधिनियम की धारा 4(d) ग्रामसभा को परंपरा, सांस्कृतिक पहचान और सामुदायिक संसाधनों की रक्षा का अधिकार देती है।
कांकेर ग्राम सभा होर्डिंग प्रकरण में जब उच्च न्यायालय ने याचिका खारिज की, तो मामला एसएलपी (आर्टिकल 136) के माध्यम से सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा। सर्वोच्च न्यायालय बार-बार अपने निर्णयों में कह चुका है कि आर्टिकल 136 का प्रयोग अत्यंत सावधानी से किया जाएगा। यह “another round of appeal” नहीं है। यह केवल तब सक्रिय होता है, जब गंभीर विधिक त्रुटि, प्राकृतिक न्याय का उल्लंघन, या संवैधानिक असंगति स्पष्ट हो। इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय ने सबसे पहले यह देखा कि उच्च न्यायालय के समक्ष मूल प्रश्न क्या था। उच्च न्यायालय ने होर्डिंग की संवैधानिक वैधता पर विचार किया था और वैकल्पिक उपाय की उपलब्धता को प्रमुख आधार बनाया था।
दूसरा महत्वपूर्ण बिंदु अपील में दायरे का विस्तार था। जब मामला सर्वोच्च न्यायालय पहुँचा, तो वहाँ एक अलग प्रवृत्ति दिखाई दी। ईसाई पक्ष ने अपने अपील में ऐसे मुद्दे जोड़े जो मूल याचिका का हिस्सा नहीं थे। तथाकथित हमलों के आरोप, शव दफन विवाद, राज्यव्यापी उत्पीड़न का नैरेटिव, ये सब उच्चतम न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किए गए। सर्वोच्च न्यायालय ने इस विस्तार को सिरे से अस्वीकार कर दिया। उच्चतम न्यायालय ने संकेत दिया कि अपीलीय मंच पर नए तथ्यात्मक विवादों को जोड़कर मूल प्रश्न का स्वरूप नहीं बदला जा सकता।
याचिकाकर्ताओं की पहचान
सबसे महत्वपूर्ण तथ्य याचिकाकर्ताओं की संदिग्धता से जुड़ा हुआ है। इस मामले में उच्च न्यायालय में दो याचिकाकर्ता थे। एक दिग्बल तांडी और दूसरा नरेंद्र भवानी। दोनों एक-दूसरे से सम्पर्क में थे, यह जानकारी भी उन्होंने न्यायालय से छिपाई थी। बात करते हैं नरेंद्र भवानी की, तो यह आम आदमी पार्टी से चुनाव लड़ चुका है, जिस पर छह क्रिमिनल केस चल रहे हैं। वहीं, दिग्बल तांडी स्वयं एक ईसाई पास्टर है, जिसने यह जानकारी भी न्यायालय से छिपाई है।
भ्रमित करने वाला नैरेटिव
पूरे मामले में भ्रमित करने वाला नरैटिव बनाया गया। मीडिया के एक हिस्से ने इस प्रकरण को “ईसाइयों के प्रवेश पर प्रतिबंध” या “पादरियों और धर्मातरितों के लिए ब्लैंकेट बैन” के रूप में प्रस्तुत किया। जबकि उच्च न्यायालय ने होर्डिंग की भाषा का विश्लेषण करते हुए यह पाया कि घोषित उद्देश्य जबरन, प्रलोभन या भ्रम आधारित धर्मांतरण गतिविधियों को रोकना है। न्यायालय को ऐसा स्पष्ट साक्ष्य नहीं मिला, जिससे यह सिद्ध हो सके कि स्थायी निवासियों के रूप में किसी समुदाय के सभी व्यक्तियों का प्रवेश पूर्णतः निषिद्ध है।
केवल कन्वर्जन नहीं, बल्कि डेमोग्राफी बदलने का षडयंत्र
जब किसी क्षेत्र में धार्मिक-सांस्कृतिक बदलाव संगठित संरचना और नेटवर्क के माध्यम से तेज़ी से होता है, तब वह केवल “कन्वर्ज़न” नहीं रहता, वह समाज-व्यवस्था, लोकशांति और पहचान पर गहरा प्रभाव डालने वाली गतिविधि बन जाता है। बस्तर की स्थिति को लेकर यह दिखाई देता है कि जनजातीय बहुल जिलों में चर्च नेटवर्क, ईसाई प्रार्थना केंद्रों और स्थानीय एजेंट प्रणाली के माध्यम से मिशनरियों की गतिविधियां संचालित हो रही है। यह वो गतीविधियाँ हैं, जिन्हें स्थानीय समाज ने प्रलोभन, दबाव, भ्रम, या सामाजिक-विघटनकारी रणनीति के रूप में अनुभव किया है। क्योंकि अनुसूचित क्षेत्र में समाज की संरचना सामूहिक होती है, इसलिए किसी भी प्रकार का संगठित मजहबी हस्तक्षेप स्वाभाविक रूप से सामाजिक ध्रुवीकरण की संभावना को बढ़ा देता है।
हालांकि, जनगणना आधारित आंकड़ों में ईसाइयों की संख्या कोई ख़ास बढ़ी हुई नहीं दिखती, लेकिन अघोषित रूप से ईसाई रिलीजन को मनाने वालों की संख्या बस्तर के कई गाँवों में आबादी के आधे से अधिक हो चुकी है। अभी हाल ही में रायपुर में एक पत्रकार वार्ता में खुद ईसाई नेता ने स्वीकारा था कि 25-25 वर्षों से जनजातीय लोग अपने गांवों में चर्च बनाकर बाइबिल पढ़ रहे हैं। लेकिन वह ईसाई नहीं है, क्योंकि उनके धर्मपरिवर्तन की प्रक्रिया पूरी नहीं हुई है। इस वाक्य से समझा जा सकता है कि भोलेभाले जनजातीय लोगों को किस तरह से अपने धर्म से चुपचाप विमुख किया जा रहा है।
The post सर्वोच्च न्यायालय ने पादरियों व धर्मांतरितों के प्रवेश पर रोक वाले होर्डिंग्स के खिलाफ याचिका खारिज की appeared first on VSK Bharat.