संघ की शाखा में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर

अपनत्व का भाव – डॉ. आंबेडकर ने कहा है – “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”। डॉ. लोकेन्द्र सिंह सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आशान्वित थे। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता […] The post संघ की शाखा में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर appeared first on VSK Bharat.

Apr 14, 2026 - 22:00
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संघ की शाखा में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर

अपनत्व का भाव – डॉ. आंबेडकर ने कहा है – “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”।

डॉ. लोकेन्द्र सिंह

सामाजिक समरसता के अग्रदूत बाबा साहब डॉ. भीमराव आंबेडकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को लेकर आशान्वित थे। उन्हें विश्वास था कि संघ हिन्दू समाज में एकजुटता और सामाजिक समरसता लाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकता है। डॉ. आंबेडकर का संघ के साथ पहला महत्वपूर्ण संपर्क 1935 में हुआ, जब वे पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग के सायंकालीन बौद्धिक सत्र में आए थे। इसी दौरान उनकी मुलाकात आद्य सरसंघचालक डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार से हुई। वर्ग में उन्हें जो अनुभूति हुई, उससे संघ के प्रति अपनत्व का भाव बन गया, जो उनके मन में जीवनपर्यंत बना रहा है। संघ के साथ संपर्क-संवाद भी बना रहा।

पुणे में आयोजित संघ शिक्षा वर्ग में 525 स्वयंसेवक संघ कार्य का प्रशिक्षण ले रहे थे। स्वाभाविक ही डॉ. आंबेडकर ने जानना चाहा कि हिन्दू समाज के संगठन के लिए कार्य कर रहे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के 525 कार्यकर्ताओं में अस्पृश्य समुदाय के कितने लोग हैं। कतारबद्ध स्वयंसेवकों के बीच से गुजरने के बाद भी जब बाबा साहब यह पहचान नहीं कर सके कि अस्पृश्य वर्ग के बंधु कौन और कितने हैं? इसके बाद, जब डॉ. आंबेडकर ने कहा कि “जो अस्पृश्य हों, वे एक कदम आगे आएं”, तो एक भी स्वयंसेवक आगे नहीं आया। इस पर बाबा साहब ने कहा, “वे तो पहले ही ऐसा कहते थे कि आरएसएस में अस्पृश्य समाज के बंधु नहीं हैं”। तब डॉ. हेडगेवार ने स्पष्ट किया कि संघ में किसी को भी अस्पृश्य होने का अनुभव ही नहीं कराया जाता। उन्होंने डॉ. आंबेडकर को सुझाव दिया कि यदि वे चाहें तो उपजातियों का नाम लेकर पूछ सकते हैं। इसके बाद डॉ. आंबेडकर ने कहा, “इस शिविर में जो चमार, महार, मेहतर हों, वे एक-एक कदम आगे आएं”। यह सुनते ही लगभग सौ स्वयंसेवक तुरंत एक साथ आगे आ गए। यह सब देखकर बाबा साहब को स्पष्ट हो गया कि सामाजिक समरसता के लिए संघ के प्रयास बहुत प्रभावी हैं।

बाबा साहब डॉ. आंबेडकर से जुड़े रहे पूर्व लोकसभा सांसद बालासाहेब साळुंके ने भी बाबा साहब डॉ. आंबेडकर और संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मुलाकात का उल्लेख किया है। उनके पुत्र काश्यप साळुंके ने भानुदास गायकवाड़ के साथ मिलकर बालासाहेब साळुंके के संस्मरणों एवं विचारों का संकलन किया है – ‘आमचं सायेब : दिवंगत खासदार बालासाहेब साळुंके’। पुस्तक के पृष्ठ 25 और 53 पर डॉ. आंबेडकर और आएसएस के संदर्भ में उपरोक्त उल्लेख आते हैं। याद रहे कि बाला साहेब साळुंके और उनके पुत्र काश्यप साळुंके का संघ से कोई संबंध नहीं है। पुस्तक में बाला साहेब साळुंके के हवाले से लिखा गया है – “पुणे में भाऊसाहेब गडकरी के बंगले पर डॉ. बाबा साहेब आंबेडकर और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार की मुलाकात हुई। फिर भाऊसाहेब अभ्यंकर, श्री बाळासाहेब साळुंके के साथ बाबा साहब डॉ. आंबेडकर को भावे स्कूल में लगे स्वयंसेवकों के ग्रीष्मकालीन शिविर में भेंट के लिए ले गए। बाबा साहब ने यहाँ सैन्य अनुशासन और संगठन पर भाषण दिया”।

9 जनवरी 1940 को प्रसिद्ध मराठी दैनिक समाचारपत्र ‘केसरी’ में प्रकाशित समाचार के अनुसार, बाबा साहब डॉ. आंबेडकर 2 जनवरी, 1940 को सतारा जिले के करहाड गाँव स्थित भवानी शाखा में गए। जहाँ स्वयंसेवकों से संवाद करते हुए उन्होंने कहा – “कुछ बातों पर मतभेद हो सकते हैं। लेकिन संघ की तरफ अपनत्व की भावना से देखता हूँ”।

इस ऐतिहासिक घटना की स्मृति में 2 जनवरी, 2025 को लोक कल्याण मंडल न्यास की ओर से श्री भवानी संघ स्थान पर बंधुता परिषद नाम से एक वैचारिक कार्यक्रम किया गया।

शाखा और वर्ग के बाहर भी डॉ. आंबेडकर का संपर्क संघ के कार्यकर्ताओं के साथ रहा। महात्मा गांधी की हत्या के झूठे आरोप लगाकर जब संघ को कुचलने का प्रयास किया गया, जब द्वितीय सरसंघचालक माधव सदाशिवराव गोलवलकर उपाख्य ‘श्रीगुरुजी’ संघ से प्रतिबंध हटाने के लिए प्रयास कर रहे थे। इस क्रम में सितंबर-1949 में दिल्ली में डॉ. आंबेडकर की मुलाकात श्री गुरुजी से हुई। दत्तोपंत ठेंगड़ी की पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर और सामाजिक क्रांति की यात्रा’ में इस मुलाकात का उल्लेख मिलता है। साथ ही, धनञ्जय कीर ने अपनी पुस्तक ‘डॉ. अम्बेडकर : लाइफ एंड मिशन’ में भी इस मुलाकात का उल्लेख किया है। हालांकि, दोनों ने इस बात का कोई संकेत नहीं दिया कि उनमें क्या बातचीत हुई थी। लेकिन यह स्पष्ट किया है कि यह मुलाकात संघ पर लगे प्रतिबंध को हटाने के प्रयासों के संदर्भ में थी।

बाबा साहब डॉ. आंबेडकर के प्रति संघ में सदैव सम्मान का भाव रहा है। संघ ने अपने एकात्मता स्रोत (पूर्व में जिसे प्रात: स्मरण कहते थे) में भी बाबा साहब को भी शामिल किया है। एकात्मता स्रोत का पाठ करते समय स्वयंसेवक बाबा साहब के व्यक्तित्व का स्मरण कर उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन करते हैं। सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भी अपने उद्बोधन में बाबा साहब डॉ. आंबेडकर का स्मरण करते हुए कहा है कि “हमारी इस एकता के आधार को डॉ. आंबेडकर साहब ने अन्तर्निहित सांस्कृतिक एकता कहा है”।

(लेखक माखनलाल चतुर्वेदी राष्ट्रीय पत्रकारिता एवं संचार विश्वविद्यालय में सहायक प्राध्यापक हैं।)

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