संघ का उद्देश्य समाज में एक और संगठन बनना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है
शिलॉंग – शताब्दी वर्ष के निमित्त सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन को संबोधित किया शिलॉंग, 21 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर शिलॉंग में प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के विशिष्ट नागरिकों के बीच संवाद एवं विचार-विमर्श को प्रोत्साहित […] The post संघ का उद्देश्य समाज में एक और संगठन बनना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है appeared first on VSK Bharat.
शिलॉंग – शताब्दी वर्ष के निमित्त सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी ने प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन को संबोधित किया
शिलॉंग, 21 मार्च। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (आरएसएस) के शताब्दी वर्ष के अवसर पर शिलॉंग में प्रबुद्ध नागरिक सम्मेलन का आयोजन किया गया, जिसका उद्देश्य समाज के विभिन्न वर्गों के विशिष्ट नागरिकों के बीच संवाद एवं विचार-विमर्श को प्रोत्साहित करना था। कार्यक्रम का आयोजन कोर्टयार्ड बाय मैरियट, शिलॉंग में किया गया, जिसमें राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी मुख्य वक्ता के रूप में उपस्थित रहे।
उन्होंने शिलॉंग की ऐतिहासिक महत्ता का उल्लेख करते हुए कहा कि स्वामी विवेकानंद, रवीन्द्रनाथ ठाकुर तथा नेताजी सुभाष चंद्र बोस जैसे महान राष्ट्रीय व्यक्तित्व इस नगर से जुड़े रहे हैं। उन्होंने 1925 में नागपुर में डॉ. केशव बलिराम हेडगेवार द्वारा स्थापित राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ की यात्रा का उल्लेख करते हुए कहा कि एक शाखा से प्रारंभ हुआ यह संगठन आज देशभर में लगभग 85,000 दैनिक शाखाओं तक विकसित हो चुका है।
उन्होंने कहा कि डॉ. हेडगेवार भारत के स्वतंत्रता आंदोलन की विभिन्न धाराओं से गहराई से जुड़े हुए थे और उनके मन में यह मूल प्रश्न था कि इतनी समृद्ध सांस्कृतिक सभ्यता होने के बावजूद भारत अपनी स्वतंत्रता क्यों खो बैठा। उन्होंने देखा कि संगठित विदेशी शक्तियों ने सामाजिक रूप से विखंडित समाज पर शासन किया। इसी अनुभव ने सामाजिक संगठन और राष्ट्रीय जागरण की आवश्यकता को स्पष्ट किया, जिसके परिणामस्वरूप 1925 में संघ की स्थापना हुई। उन्होंने कहा, “संघ का उद्देश्य समाज में एक और संगठन बनना नहीं, बल्कि सम्पूर्ण समाज का संगठन करना है।”
भारत की सभ्यतागत चेतना पर सरकार्यवाह जी ने कहा कि देश की सांस्कृतिक पहचान साझा विरासत पर आधारित है, जो व्यक्तिगत चरित्र और राष्ट्रीय उत्तरदायित्व दोनों को महत्व देती है। उन्होंने भारत की समावेशी परंपरा का उल्लेख करते हुए कहा कि पारसी और यहूदी जैसे उत्पीड़ित समुदायों को भी भारत में शरण मिली। भारत की भाषाई और सांस्कृतिक विविधता राष्ट्रीय एकता को कमजोर नहीं करती; खेलों में विजय या चंद्रयान-2 के प्रक्षेपण जैसे अवसरों पर यह एकता स्पष्ट रूप से दिखाई देती है। संघ का प्रयास इस क्षणिक एकता को चरित्र निर्माण और संगठित सामाजिक कार्य के माध्यम से स्थायी बनाना है।
उन्होंने बताया कि संघ विभिन्न क्षेत्रों और पेशों में कार्यरत स्वयंसेवकों के माध्यम से समाज को सशक्त बनाने का कार्य करता है तथा सामाजिक परिवर्तन की शुरुआत व्यक्ति, परिवार और नैतिक आचरण से होती है। उन्होंने स्पष्ट किया कि धर्म का अर्थ केवल कर्मकांड नहीं, बल्कि नैतिक उत्तरदायित्व है।
उन्होंने कहा कि शताब्दी वर्ष में समाज के साथ व्यापक संवाद का अभियान चलाया जा रहा है, जिसका संदेश है – “देश हमें देता है सब कुछ, हम भी तो कुछ देना सीखें।”
उन्होंने राष्ट्रीय प्रगति के लिए “प्रणालीगत सुधार” तथा निरंतर “सामाजिक सुधार” दोनों की आवश्यकता पर बल दिया। इसी संदर्भ में उन्होंने पंच परिवर्तन की अवधारणा प्रस्तुत की, जिसमें सामाजिक समरसता, राष्ट्रीय स्वत्व एवं स्वदेशी चेतना का सुदृढ़ीकरण, परिवार व्यवस्था का संरक्षण, दैनिक जीवन में पर्यावरण संरक्षण तथा नागरिक कर्तव्यों के प्रति जागरूकता शामिल है।
उन्होंने नशाखोरी की बढ़ती समस्या को जीवनशैली तथा सुरक्षा दोनों से जुड़ी चुनौती बताते हुए मजबूत पारिवारिक मूल्यों और सीमा क्षेत्रों में कड़ी निगरानी की आवश्यकता बताई। महिला सशक्तिकरण के विषय में कहा कि भारतीय परंपरा में महिलाओं के नेतृत्व की समृद्ध परंपरा रही है, साथ ही समाज में विद्यमान कुप्रथाओं और अंधविश्वासों को समाप्त करने की आवश्यकता पर बल दिया। उन्होंने युवाओं के सशक्तिकरण के लिए परिवारों में संवाद और पीढ़ियों के बीच सामंजस्य को भी आवश्यक बताया।
पूर्वोत्तर भारत के संदर्भ में पूछे गए प्रश्नों के उत्तर में उन्होंने कहा कि संवाद एवं संपर्क कार्यक्रमों के माध्यम से संघ के प्रति अनेक भ्रांतियाँ दूर हुई हैं, यद्यपि कुछ भ्रामक प्रचार अभी भी जारी है। उन्होंने स्पष्ट किया कि संघ पंथ के आधार पर किसी प्रकार के भेदभाव का समर्थन नहीं करता तथा प्रत्येक नागरिक को अपनी उपासना पद्धति के पालन का संवैधानिक अधिकार प्राप्त है। उन्होंने भारत की साझा सभ्यतागत संस्कृति पर बल दिया, जो पांथिक विविधता के बावजूद एक है।
सरकार्यवाह जी कहा कि राष्ट्रीय प्रगति सामूहिक सामाजिक उत्तरदायित्व और नैतिक मूल्यों पर आधारित होती है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को समझने का सर्वोत्तम तरीका प्रत्यक्ष अनुभव और सहभागिता है।
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