कुटुम्ब का साथ नहीं मिलता तो ‘संघ’ खड़ा नहीं होता – डॉ. मोहन भागवत जी

गोरखपुर, 16 फरवरी 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरखपुर विभाग द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में कुटुम्ब स्नेह मिलन का आयोजन किया गया।। स्नेह मिलन में गोरखपुर महानगर के 20 नगरों, चौरी-चौरा, गोरखपुर ग्रामीण के जिला स्तरीय कार्यकर्ता, नगर- जिला- विभाग- प्रांत कार्यकारिणी, प्रवासी कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य सम्मिलित हुए। […] The post कुटुम्ब का साथ नहीं मिलता तो ‘संघ’ खड़ा नहीं होता – डॉ. मोहन भागवत जी appeared first on VSK Bharat.

Feb 17, 2026 - 23:34
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कुटुम्ब का साथ नहीं मिलता तो ‘संघ’ खड़ा नहीं होता – डॉ. मोहन भागवत जी

गोरखपुर, 16 फरवरी 2026। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ गोरखपुर विभाग द्वारा संघ शताब्दी वर्ष के निमित्त बाबा गंभीरनाथ प्रेक्षागृह में कुटुम्ब स्नेह मिलन का आयोजन किया गया।। स्नेह मिलन में गोरखपुर महानगर के 20 नगरों, चौरी-चौरा, गोरखपुर ग्रामीण के जिला स्तरीय कार्यकर्ता, नगर- जिला- विभाग- प्रांत कार्यकारिणी, प्रवासी कार्यकर्ता और उनके परिवार के सदस्य सम्मिलित हुए।

कुटुम्ब स्नेह मिलन में सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि आज हम सब कुटुम्ब स्नेह मिलन कार्यक्रम में आए हैं। एक छत, एक चारदीवारी में एक पुरुष-महिला से कुटुम्ब नहीं बनता। कुटुम्ब में एक रिश्ता होता है, जिसमें अपनापन होता है। शिशु का जन्म के कुछ क्षण बाद अपनेपन से धीरे-धीरे परिवार के सदस्यों से रिश्ता बन जाता है। अगली पीढ़ी सामाजिक बने, इसके लिए कुटुम्ब एक इकाई है। समाज में कैसे रहना है, इसका प्रशिक्षण परिवार में होता है। भारत में अपनेपन से बना कुटुम्ब केवल भारत में ही है, अन्य देशों में यह सौदा होता है। भारत में विशेषता है – अपनेपन से बना सम्बन्ध। विदेशों में सम्बन्ध ऐसा नहीं है, वह सौदे का सम्बंध है। हमारे यहाँ बच्चे को अपना कुटुम्ब मिलता है, जबकि विदेशों में ऐसा नहीं है। वहां बड़े होने पर कुटुम्ब से मुक्त हो जाते हैं। समाज कुटुम्ब के कारण चलता है। पेट भरने का कारण भी कुटुम्ब ही है, व्यवसाय का आधार परिवार होता है। उत्पादन, पैसे की बचत, राष्ट्र की संपत्ति सब परिवार में है। परिवार में राष्ट्र का धन भी संचित है। लाल बहादुर शास्त्री जी का उदाहरण देते हुए बताया कि उन्होंने लोगों से आवाह्न किया था कि वो अपना सोना-चांदी आदि राष्ट्र को दें तो लोगों ने राष्ट्र के लिए दे दिया।

सरसंघचालक जी ने कहा कि मैं अकेला नहीं हूं, बल्कि हम सब हैं, अतः केवल अपनी आवश्यकताओं का विचार नहीं करूंगा, यह कुटुम्ब में सिखाया जाता है। सामाजिक शिक्षा, आर्थिक गतिविधियों का केंद्र, संस्कृति पीढ़ी दर पीढ़ी स्थानांतरण का केंद्र कुटुम्ब ही है। कुटुम्ब का केंद्र माता है। पीढ़ी को तैयार करने वाली महिला होती है। इसी से भारत माता का परिचय होता है, हम भारत माता के पुत्र हैं। हमारे देश में महिलाओं को माता की दृष्टि से देखते हैं, सिवाय उसके जिससे विवाह हुआ है। विदेशों में ऐसा नहीं है। हमारी दृष्टि केवल वैचारिक नहीं है, यह आचार में आए यह हमारी परम्परा है, जो परिवार से आता है। हमारे यहाँ व्यक्ति से बड़ा परिवार है, विदेशों में व्यक्ति परिवार से बड़ा है। हम विवाह को ‘कर्तव्य’ मानते हैं ‘करार’ नहीं। घर में संस्कार नहीं होंगे तो मतान्तरण होगा।

उन्होंने कहा कि कुटुम्ब का साथ नहीं मिलता तो ‘संघ’ खड़ा नहीं होता। कुटुम्ब का साथ मिलता है तो कोई भी समाज बड़ा होता है। संघ को जानना है तो संघ की शाखा देखिए, संघ का स्वयंसेवक देखिए, संघ के स्वयंसेवक का कुटुम्ब देखिए। हम जो करते हैं, उसे आचरण में लाते हैं। ‘संघ’ का वर्णन शब्दों में बहुत कठिन है। सौदे के आधार पर संसार चल रहा है, यह सोच जब आई, तबसे समस्याएँ आनी शुरू हुई हैं। समाज को बदलना है तो कुटुम्ब में परिवर्तन लाना होगा। हमारा परिवार व्रतस्थ होना चाहिए। रोटी, कपड़ा, मकान, स्वास्थ्य, शिक्षा और अतिथि-सत्कार, ये कुटुम्ब की आवश्यकताएँ हैं। यह होना चाहिए। उन्होंने कहा कि वर्ष में 2-3 बार छोटे स्तर पर ‘कुटुम्ब मिलन’ कार्यक्रम करें। छोटे गटों में मिलना, उसमें विचार-विमर्श करना। जिससे पश्चिमीकरण से आए भ्रम दूर हो जाएँगे। समाज अपना आचरण तब बदलता है, जब गृहस्थ के कार्य को देखता है। संघ के स्वयंसेवक को समाज से पांच कदम आगे होना चाहिए। ‘पंच परिवर्तन’ भाषण में नहीं रहना है, उसे स्वयं के आचरण में लाना है। सभी विषमताओं से ऊपर उठना होगा।। हमारी पहुँच जहाँ तक है, समाज में जितने प्रकार हैं, उन सबमें हमारा एक मित्र होना चाहिए।

‘पर्यावरण’ की चिन्ता हमें अपने घर से करनी है, जो हम कर सकते हैं। अलग से कुछ नहीं करना। पानी बचाओ, प्लास्टिक हटाओ, पेड़ लगाओ। भाषा, भूषा, भवन, भोजन और भजन हमारा अपना होना चाहिए। भाषा भाव को लेकर आती है। घर में अपनी मातृभाषा में बोलना, जिस प्रान्त में रहते हैं, उसकी भाषा को जानना। धोती पहनना हमें आना चाहिए। परम्परागत भोजन हमारे अनुकूल होता है, घर का भोजन, अपना भोजन। घर में चित्र कैसा होना चाहिए, विचार करें। हमारे आदर्शों के चित्र जरूर हमारे घरों में होना चाहिए।। जहाँ तक सम्भव है, स्वदेशी का प्रयोग करना। नियमों का पालन करना। ये सब बोध हो, इसके लिए सप्ताह में एक दिन सबको साथ बैठना दूध पीते बच्चे से लेकर बड़ों तक, इसकी चर्चा करना, जो सहमति बनती है उसे व्यवहार में लाना। समाज के लिए रोज हम एक अच्छा कार्य करें, क्या कर सकते हैं, उसे सोचना और करना। इसलिए कुटुम्बों का मिलन साल में 2-3 बार होना चाहिए, जिससे समाज में परिवर्तन दिखेगा।

स्नेह मिलन में मंच पर प्रांत संघचालक डॉ. महेंद्र अग्रवाल जी, विभाग संघचालक शेषनाथ जी उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ दीप प्रज्ज्वलन और समापन भारत माता की आरती के साथ हुआ। विभाग कार्यवाह संजय जी ने अतिथि परिचय करवाया।

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