जातिविहीन समाज की राह या नया विभाजन? सुप्रीम कोर्ट की वाजिब चिंताएं
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सुप्रीम कोर्ट की वाजिब चिंताएं
लेखक- कुणाल प्रताप सिंह
भारत का संविधान अपने गठन से ही अनेक मूलभूत सूत्रों से अंतर्बद्ध है जो समाज की विविधता को सम्मान देने का कार्य भी करता है। परंतु क्या यह सूत्र आज भी उसी दृढ़ता और सुदृढ़ता के साथ अंतर्बद्ध बना हुआ है? इस प्रश्न का कोई एक उत्तर नहीं है लेकिन इसके अनेक बहुआयामी अर्थ हैं, जिन पर विस्तृत टिप्पणी की जा सकती है जैसे आज न्यायपालिका ने शासनतंत्र को एक दर्पण दिखाया है।
भारत के मुख्य न्यायाधीश जस्टिस सूर्यकांत ने न्यायपालिका में एक अहम सवाल उठाया और पूछा कि क्या हम जातिविहीन समाज हासिल करने की जो उपलब्धियां थीं, उनसे पीछे की ओर जा रहे हैं? उन्होंने साफ तौर पर सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता से कहा कि हम इस पर आपकी प्रतिक्रिया चाहते हैं। आज हम कोई आदेश नहीं देना चाहते। इसके लिए एक समिति बनाई जानी चाहिए, जिसमें जाने-माने विधिवेत्ता हों तो दो या तीन ऐसे लोग जो समाज के मूल्यों और आज समाज जिन समस्याओं से गुजर रहा है, उन्हें समझते हों। यह भी सोचना जरूरी है कि पूरा समाज कैसे आगे बढ़ेगा और अगर हम ऐसा कोई ढांचा बनाते हैं, तो लोग शैक्षणिक परिसरों के बाहर कैसे व्यवहार करेंगे। इस पर गंभीरता से विचार होना चाहिए। इस पर याचिकाकर्ता, अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने न्यायपालिका के सामने जाति-आधारित भेदभाव की परिभाषा रखी, जो नियम 3(1)(c) में दी गई है।
इस नियम के अनुसार भेदभाव केवल अनुसूचित जाति, अनुसूचित जनजाति और अन्य पिछड़ा वर्ग के सदस्यों के खिलाफ जाति या जनजाति के आधार पर किया गया भेदभाव माना गया है। अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने यह सवाल उठाया कि सामान्य वर्ग के खिलाफ भेदभाव की कोई भी परिभाषा नियम 3(1)(c) में कहीं भी नहीं दी गई है। इस पर जस्टिस सूर्यकांत जी ने अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन के सवाल का संदर्भ लेते हुए पूछा कि क्या नियम 3(e) में सभी तरह के भेदभाव को शामिल कर लिया गया है, और क्या यह नियम हर तरह के भेदभावपूर्ण आचरण से निपटने के लिए एक उपयोगी साधन है? इस संदर्भ में मुख्य न्यायाधीश ने उदाहरण देते हुए कहा कि ‘मान लीजिए दक्षिण भारत का कोई छात्र उत्तर भारत के किसी संस्थान में दाख़िला लेता है, या इसका उलटा होता है, और उस छात्र के खिलाफ तंज कसने वाले, अपमानजनक या नीचा दिखाने वाले बयान दिए जाते हैं। यदि ऐसे मामले में न तो पीड़ित की जाति पता हो और न ही आरोप लगाने वालों की, तो क्या यह प्रावधान (नियम 3(e)) ऐसे मामले को कवर करेगा?’ सीजेआई द्वारा पूछे जाने पर अधिवक्ता विष्णु शंकर जैन ने सहमति जताई। इसके बाद दूसरे अधिवक्ता ने ज़मीनी स्तर पर सामने आए परिणामों का ज़िक्र किया। उन्होंने एक उदाहरण दिया कि एक सामान्य वर्ग का प्रथम वर्ष का छात्र अनुसूचित जाति के एक वरिष्ठ छात्र द्वारा रैगिंग का शिकार हुआ। अधिवक्ता ने इस स्थिति पर दुख जताया और कहा कि ऐसे मामलों से निपटने के लिए मौजूदा नियमों में क़ानून-व्यवस्था के पास कोई प्रभावी उपाय नहीं दिया गया है।
उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि दिए गए नियमों के तहत सामान्य वर्ग के छात्रों को भी उलटे भेदभाव का सामना करना पड़ सकता है। तभी मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत जी ने पूछा कि क्या रैगिंग यूजीसी नियमों के तहत शामिल है। इस पर काउंसल ने नकारात्मक उत्तर दिया। उन्होंने यह भी कहा कि इन नियमों में रैगिंग को क्यों नहीं शामिल किया गया है और यह क्यों मान लिया गया है कि केवल जाति आधारित भेदभाव ही मौजूद है। हर जगह जूनियर-सीनियर के आधार पर भी विभाजन होता है और अधिकतर उत्पीड़न इसी आधार पर होता है। इस पर सीजेआई ने भी टिप्पणी की और कहा कि जो व्यक्ति कभी मध्यम वर्ग की श्रेणी में आता था, वही आगे चलकर आर्थिक रूप से समृद्ध हो जाता है। कहीं न कहीं, उन्होंने सीधे या परोक्ष रूप से यह सवाल उठाया कि ‘जातिविहीन समाज की दिशा में हमने जो कुछ हासिल किया है, क्या हम अब उससे पीछे की ओर तो नहीं जा रहे हैं?’
सीजेआई ने नए नियम पर सवाल उठाया और कहा कि संस्थानों के छात्रावास अगर जाति के आधार पर अलग-अलग छात्रों को दिए जाएंगे तो यह ठीक नहीं है। उन्होंने कहा, ‘भगवान के लिए ऐसा मत कीजिए। हम सब पहले साथ-साथ रहते थे। आज अंतरजातीय शादियां भी हो रही हैं। जस्टिस बागची ने सीजेआई की बातों का समर्थन करते हुए साफ कहा कि भारत की एकता विश्वविद्यालयों और शिक्षण संस्थानों में भी दिखाई देनी चाहिए। उन्होंने यह भी साफ किया कि अनुच्छेद 15(4) राज्य को अनुसूचित जाति और जनजाति के लिए विशेष कानून बनाने की शक्ति देता है, लेकिन अगर 2012 के नियम एक ज़्यादा व्यापक और सभी को साथ लेने वाली नीति की बात करते थे, तो फिर सुरक्षा और सुधार से जुड़े इस ढांचे में पीछे क्यों जाया जा रहा है। उन्होंने यह भी कहा कि ‘पीछे न हटने का सिद्धांत’ भी यहां लागू होता है। वरिष्ठ अधिवक्ता इंदिरा जयसिंह इस मामले में पेश हुईं। उन्होंने 2019 में दायर उस जनहित याचिका का जिक्र किया, जो रोहित वेमुला और पायल की माताओं द्वारा दाख़िल की गई थी, और जो आज एक क़ानूनी रूप ले चुकी है।
इस पर पीठ ने चिंता जताई और अपनी राय साफ़ तौर पर रखते हुए कहा कि प्रथम दृष्टया इन नियमों की भाषा पूरी तरह अस्पष्ट है, इसका दुरुपयोग संभव है और इसे दोबारा ढालने (री-मॉड्यूलेशन) के लिए किसी विशेषज्ञ की सलाह ली जानी चाहिए। और जस्टिस बागची ने यह सवाल उठाया कि जब संविधान में पहले से ही नियम 3(1)(e) जैसे व्यापक प्रावधान मौजूद हैं, तो फिर नियम 3(1)(c) की ज़रूरत क्यों महसूस की गई? और हम विश्वविद्यालयों में एक स्वतंत्र और समान माहौल बनाना चाहते हैं। जब नियम 3(e) पहले से ही मौजूद है, तो फिर नियम 3(c) की क्या ज़रूरत है? यह कैसे प्रासंगिक हो जाता है? क्या यह सिर्फ एक दोहराव नहीं है? खंडपीठ ने साफ तौर पर कहा कि यह कानून कहीं न कहीं समाज को दो हिस्सों में बांटने की अपनी छाप छोड़ सकता है। सीजेआई ने कहा कि इसमें कई बड़े सवाल हैं। अगर इन पर ध्यान नहीं दिया गया, तो इसके दूरगामी नतीजे हो सकते हैं। यह समाज को बांट सकता है और इसके बेहद ख़तरनाक प्रभाव पड़ सकते हैं। और जब पीठ ने नियमों पर रोक लगाने का प्रस्ताव रखा, तो इंदिरा जयसिंह ने इसका विरोध किया। उन्होंने कहा कि ऐसा करने से छात्रों के पास कोई उपाय नहीं बचेगा, क्योंकि 2012 के नियम पहले ही समाप्त कर दिए गए हैं।
इस पर पीठ ने कहा कि वह 2012 के नियमों को फिर से लागू करने का आदेश देगी। पीठ ने आदेश दिया कि 2026 के नियमों को फिलहाल स्थगित रखा जाए और संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत निर्देश दिया गया कि आगे के आदेश तक 2012 के नियम ही लागू रहेंगे। और अंत में पीठ इस नतीजे पर पहुँची कि 2026 के नियमों को फिलहाल स्थगित रखा जाएगा। संविधान के अनुच्छेद 142 का उपयोग करते हुए यह निर्देश दिया गया कि अगले आदेश तक 2012 के नियम ही लागू रहेंगे।
न्यायपालिका के इस कठोर वक्तव्य से यह स्पष्ट होता है कि कानून किसी एक धारा की ओर झुका हुआ नहीं है। यह साफ तौर पर दिखाता है कि कानून न तो किसी एक व्यक्ति, न किसी समूह और न ही किसी एक विचार का पक्षधर है, बल्कि वह अपनी दिशा स्वयं निर्धारित करता है। इस प्रक्रिया न्यायपालिका एक बांध की तरह कार्य करती है, जो किसी कानून पर आवश्यक होने पर रोक लगाकर उसकी धाराओं को सही रूप देती है। और यदि इस धारा को नियंत्रित न किया जाए और इसे निरंतर मनमानेपन के हवाले छोड़ दिया जाए, तो यह भेदभाव की प्रलय में न जाने कितने समूहों और समाज के हिस्सों को उजाड़ सकती है।