कुछ समय पहले, सोशल मीडिया पर मनुवाद की जमकर विरोध किया जा रहा था। लेकिन आज भी बहुत से ऐसे लोग हैं जिन्हें मनु , मनुवाद एवं मनुस्मृति के बारे में जानकारी भी नहीं है। मैं अपने इस ब्लॉग के माध्यम से मनुवाद के बारे में बताने का प्रयास किया हूं। इतिहासकारों की मानें तो स्मृति का मतलब धर्मशास्त्र (theology )होता है। महाराज मनु के द्वारा लिखा गया धार्मिक लेख को मनुस्मृति कहा जाता है।
सनातन धर्म के अनुसार मनु संसार के प्रथम पुरुष थे। मनु का जन्म को कोई ठोस व वास्तविक प्रमाण नहीं है l सभी अंधेरे मे ही तीर चला रहे हैं l जितनी मुँह उतनी बाते होती हैl लेकिन धर्मशास्त्र के महान विद्वान पी.वी काणे से लेकर भीमराव आंबेडकर तक ने इसे स्वीकार किया है कि मनु-स्मृति के रचनाकार सुमति भार्गव हैं, लेकिन अफसोस कि सारी राजनीति महाराज मनु को गाली देने पर सीमित हो जाती है। आंबेडकरवादी से लेकर तथाकथित दलित चिंतक तक ‘मनुवाद’ कहते हुए महाराज मनु के लिए अपशब्द कहते हैंl
टिप्पणी : कुछ लोग बगैर किसी आधार के मानते हैं कि कोई दो हजार साल पहले ब्राह्मणों ने 'मनुस्मृति' की रचना उस वक्त की जब देश से ब्राह्मणों और ब्राह्मणवादी विचारों का वर्चस्व खत्म हो रहा था। ऐसे में ब्राह्मणों ने अपने वर्चस्व को पुन: स्थापित करने के लिए मनु स्मृति लिखी और इसमें ब्राह्मणों को देवतुल्य घोषित किया गया। लेकिन ऐसा मानने वाले इतिहास को गहराई से शायद ही जानते होंगे। यदि वे गुलामी के काल का अच्छे से अध्ययन कर लेते, तो संभवत: ऐसा नहीं मानते। लेकिन यह भी सच ही है कि दुनिया के कानून का नक्षा मनु स्मृति को आधार मानकर ही बनाया गया है।
यदि वेद कंठस्थ नहीं होते और वे विशेष छंदों में नहीं लिखे गए होते, तो उनका हाल भी मनु स्मृति की तरह होता। तब हिन्दू समाज को विभाजित करने के लिए एक और ग्रंथ मिल जाता। यहां पहली बात यह समझने की है कि मनु स्मृति को कभी भी हिन्दुओं ने अपना धर्मग्रंथ नहीं माना। इसका कभी भी किसी मंदिर में पाठ भी नहीं होता और न ही इसे कोई पढ़ता है। कोई इसे खरीदकर घर में भी नहीं रखता है। कुछ का मत है कि पहले एक 'मानव धर्मशास्त्र' था जो अब उपलब्ध नहीं है। अत: वर्तमान 'मनुस्मृति' को मनु के नाम से प्रचारित करके उसे प्रामाणिकता प्रदान की गई है। परंतु बहुमत इसे स्वीकार नहीं करता।
मनु स्मृति में हेरफेर : ऐसी मान्यता अधिक है कि अंग्रेज काल में इस ग्रंथ में हेरफेर करके इसे जबरन मान्यता दी गई और इस आधार पर हिन्दुओं का कानून बनाया गया। जब अंग्रेज चले गए तो भारत में जो सरकार बैठी उसने यह कभी ध्यान नहीं दिया की अंग्रेजों द्वारा जो गड़बड़ियां की गई थी उसे ठीक किया जाए। उन्होंने भी अंग्रेजों का अनुसरण करते हुए अंग्रेजों की ही परंपरा को आगे बढ़ाया।
कुछ विद्वान मानते हैं कि मनुस्मृति में वेदसम्मत वाणी का खुलासा किया गया है। वेद को कोई अच्छे से समझता या समझाता है तो वह है मनुस्मृति। लेकिन फिर भी राजा मनु ने इसमें कुछ अपने विचार भी प्रक्षेपित किए हैं। अब मनु स्मृति की बात करें तो अब तक 14 मनु हो गए हैं। प्रत्येक मनु ने अलग मनु स्मृति की रचना की है। इसी तरह प्रयेक ऋषियों की अलग अलग स्मृतियां हैं और इस तरह कम से कम 20-25 स्मृतियां मौजूद हैं।
कुछ सनातन धर्म के गुरुओ के अनुसार "यह मनस्मृति पुस्तक महाभारत और रामायण से भी प्राचीन है। गीता प्रेस गोरखपुर या फिर गायत्री परिवार से प्रकाशित मनुस्मृति को ही पढ़ना चाहिए, क्योंकि अन्य प्रकशनों की मनुस्मृति पर भरोसा नहीं किया जा सकता कि वह सही है या नहीं। ऐसे भी मनुस्मृति है जिसमें कुछ सूत्रों श्लोकों के साथ छेड़कानी करके उसे खूब प्रचारित और प्रसारित किया गया है।"
मनुस्मृति में कुल 12 अध्याय हैं जिसमें 2684 और श्लोक हैं इस किताब की रचना ईशा के जन्म के लगभग दो 300 साल पहले हुई थी।
पहले अध्याय में प्रकृति के निर्माण, चार युगों, चार वर्णों, उनके पेशों, ब्राह्मणों की महानता जैसे विषय शामिल हैं।
दूसरा अध्याय ब्रह्मचर्य और अपने मालिक की सेवा पर आधारित है।
"तीसरे अध्याय में शादियों की किस्मों, विवाहों के रीति रिवाजों और श्राद्ध यानी पूर्वज़ों को याद करने का वर्णन है।
चौथे अध्याय में गृहस्थ धर्म के कर्तव्य, खाने या न खाने के नियमों और 21 तरह के नरकों का ज़िक्र है।
पांचवे अध्याय में महिलाओं के कर्तव्यों, शुद्धता और अशुद्धता आदि का ज़िक्र है।
छठे अध्याय में एक संत और सातवें अध्याय में एक राजा के कर्तव्यों का ज़िक्र है।
आठवां अध्याय अपराध, न्याय, वचन और राजनीतिक मामलों आदि पर बात करता है।
नौवें अध्याय में पैतृक संपत्ति, दसवें अध्याय में वर्णों के मिश्रण, ग्यारहवें अध्याय में पापकर्म और बारहवें अध्याय में तीन गुणों व वेदों की प्रशंसा है. मनुस्मृति की यही सामान्य रूपरेखा है।
"मनुस्मृति में अधिकार, अपराध, बयान और न्याय के बारे में बात की गई है. ये वर्तमान समय की आईपीसी (IPC)और सीआरपीसी (CRPC)की तरह लिखी गई है।
विलियम जॉन्स ने मनुस्मृति का अंग्रेजी में अनुवाद किया था lइसकी वजह से लोगों को इस किताब के बारे में पता चला।
जब अंग्रेज भारत आए तो उन्हें लगा कि जिस तरह मुस्लिमों के पास क़ानून की किताब के रूप में शरिया है, उसी तरह हिंदुओं के पास भी मनुस्मृति हैI इसकी वजह से उन्होंने इस किताब के आधार पर मुक़दमों की सुनवाई शुरू कर दीl इसके साथ ही काशी के पंडितों ने भी अंग्रेज़ों से कहा कि वे मनुस्मृति को हिंदुओं का सूत्रग्रंथ बताकर प्रचार करेंl इसकी वजह से ये धारणा बनी की मनुस्मृति हिंदुओं का मानक धर्मग्रंथ है।
महात्मा ज्योतिबा फुले मनुस्मृति को चुनौती देने वाले पहले व्यक्ति थे। भीमराव अंबेडकर ने 25 जुलाई 1927 ईस्वी को महाराष्ट्र के कोलाबा जिले {वर्तमान के रायगढ़} में सार्वजनिक रूप से मनु स्मृति को जलाया |इन्होंने अपनी किताब Philosophy Of Hinduism मैं जमकर मनुस्मृति की आलोचना की है|उन्होंने अपने इस किताब में शूद्र के बारे मे बताएं हैं और और उन्होंने शूद्रों की गंभीर हालत की व्याख्या की !किस प्रकार शूद्रों के साथ ऊंची जातियों ने बर्ताव किया और जातिवाद के अंत के लिए अपने विचार को इस किताब में दर्शाएं|बी आर अंबेडकर मानते हैं कि जाति व्यवस्था एक कई मंजिला इमारत जैसी है जिसमें एक मंजिल से दूसरी मंजिल में जाने का कोई सीढ़ी नहीं है|
बीआर अंबेडकर की विचारधारा से प्रभावित होकर काशीराम ने 1970 में बामसेफ का गठन किया जो वर्तमान में बहुजन समाजवादी पार्टी के नाम से जाना जाता हैl कांशीराम ने समाज को दो हिस्सों में बांट दिया जिस में हिस्सा मनुवादी और दूसरा हिस्सा मूलनिवासी कहलाया। सम्भवतः करणी सेना और भीम सेना का निर्माण इसी विभाजन का प्रमुख उदाहरण है।
विज्ञानवादी और आधुनिक दृष्टिकोण से देखा जाए तो महाराज मनु के द्वारा लिखा गया मनुस्मृति एक विवादित किताब है।जिस प्रकार से शरिया क़ानून देश मे पालन नहीं किया जा सकता है उसी प्रकार आधुनिक विचारधारा वाले लोग मनुस्मृति के खिलाफ है। जो छुआछूत को बढ़ावा देता है, सामाजिक विविधता को स्वीकार करता है एवं ऊंच-नीच की दृष्टि से देखता है। जिस में समानता की कहीं जगह ना हो। ऊंची जाति के लिए कम और नीची जाति के लिए ज्यादा और कठोर सजा की बात करता हो। वह मनुस्मृति हिंदू का ग्रंथ कैसे हो सकता है?
मनुस्मृति ही वैसी किताब है जो हिंदुओं को दो वर्गो में बांट दिया जो राजनीतिक विचारधारा के रूप में उभर कर सामने आ रही है। आर एस एस (RSS)और विश्व हिंदू परिषद (VHP)हिंदू राष्ट्र की बात करते हैं जबकि हिंदुत्व की विचारधारा दो श्रेणियों में बांटा हुआ है। जब एक धर्म के लोगों में एकता नहीं हो सकता है तो वहां विभिन्न धर्मों के बीच एकता और समानता की उपेक्षा कैसे कर सकते हैं। संप्रदायिक एकता और धर्मनिरपेक्षता की उम्मीद कैसे की जा सकती है। आज दलित और निम्न वर्ग के लोगों के द्वारा भगवान के अस्तित्व पर सवाल खड़े किए जाने लगा है। वे खुद को हिंदू नहीं मानते हैं। भगवान की पूजा की जगह अंबेडकर की पूजा करना शुरू कर दी हैं और हिंदूवादी की जगह खुद को अंबेडकरवादी कहना ज्यादा पसंद करते हैं। निम्न वर्ग के शिक्षित लोग पेरियार, अंबेडकर और ज्योतिबा फुले जैसे समाज सुधारक नेताओं के विचारधारा से काफी हद तक प्रभावित हुए हैं। इसका मुख्य कारण मनुवाद ही है।
अवधेश कुमार