1 अगस्त का इतिहास आज के दिन प्रमुख जानकारी
1 अगस्त - ऐतिहासिक घटनाएँ, जन्मदिन और स्मरणोत्सव: जानिए इतिहास में 1 अगस्त को क्या-क्या हुआ। महत्वपूर्ण घटनाओं, प्रसिद्ध जन्मदिवसों, उल्लेखनीय निधनों और विश्व स्तनपान सप्ताह जैसे विशेष स्मरणोत्सवों के बारे में जानें। मीना कुमारी, बाल गंगाधर तिलक, अमर सिंह आदि जैसे महत्वपूर्ण व्यक्तित्वों के बारे में जानें। History of 1 August Important information on this day, 1 अगस्त का इतिहास आज के दिन प्रमुख जानकारी
1. 1914 - प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत (जर्मनी बनाम रूस)
1 अगस्त 1914 को जर्मनी ने रूस के खिलाफ युद्ध की घोषणा की, जिससे प्रथम विश्व युद्ध की शुरुआत हुई। इससे पहले यूरोप में राजनीतिक तनाव, साम्राज्यवादी प्रतिस्पर्धा, और सैन्य गठबंधनों के कारण माहौल बेहद तनावपूर्ण था। जर्मनी का ऑस्ट्रिया-हंगरी के साथ गठबंधन था, जबकि रूस, फ्रांस और ब्रिटेन एक दूसरे के सहयोगी थे। इस युद्ध ने चार वर्षों तक पूरी दुनिया को हिला दिया और करोड़ों लोगों की जान गई। यह मानव इतिहास के सबसे विनाशकारी युद्धों में से एक था, जिसने विश्व मानचित्र और राजनीति को पूरी तरह बदल दिया।
2. 1995 - हब्बल दूरबीन द्वारा शनि के नए चन्द्रमा की खोज
1 अगस्त 1995 को नासा की हब्बल स्पेस टेलीस्कोप ने शनि ग्रह के एक नए चंद्रमा की खोज की। शनि, सौरमंडल का दूसरा सबसे बड़ा ग्रह, अपने सुंदर वलयों और अनेक चंद्रमाओं के लिए प्रसिद्ध है। हब्बल द्वारा खोजा गया यह नया चंद्रमा शनि के जटिल और रोचक चंद्रमा परिवार में एक और सदस्य जोड़ता है। इस खोज ने खगोल विज्ञानियों को शनि के गुरुत्वाकर्षण क्षेत्र, चंद्रमाओं की उत्पत्ति और उनकी कक्षाओं के बारे में नई जानकारी दी। हब्बल टेलीस्कोप द्वारा की गई यह खोज वैज्ञानिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण मानी जाती है।
3. 2000 - ईरान में महिलाएं भी इमाम बनीं
1 अगस्त 2000 को ईरान में पहली बार महिलाओं को इमाम बनने की अनुमति दी गई। यह कदम देश में महिलाओं के धार्मिक अधिकारों की दिशा में एक महत्वपूर्ण बदलाव था। पारंपरिक रूप से, इमाम की भूमिका पुरुषों तक सीमित रही थी, लेकिन इस फैसले ने महिलाओं को धार्मिक नेतृत्व और मस्जिदों में प्रार्थना कराने का अवसर दिया। हालांकि यह अनुमति मुख्य रूप से महिला सभाओं में सीमित थी, फिर भी यह इस्लामी समाज में महिला सशक्तिकरण की दिशा में एक ऐतिहासिक कदम माना गया। इससे ईरान में लैंगिक समानता के मुद्दे पर चर्चा को भी नया बल मिला।
4. 2004 - श्रीलंका ने एशिया कप जीता
1 अगस्त 2004 को कोलंबो के प्रेमदासा स्टेडियम में खेले गए एशिया कप क्रिकेट टूर्नामेंट के फाइनल में श्रीलंका ने भारत को 25 रनों से हराकर खिताब जीत लिया। श्रीलंका की जीत में सनत जयसूर्या का योगदान शानदार रहा, जिन्हें ‘मैन ऑफ द सीरीज’ घोषित किया गया। मैच में श्रीलंकाई बल्लेबाजों ने सधी हुई पारी खेली और गेंदबाजों ने बेहतरीन प्रदर्शन कर भारतीय टीम को लक्ष्य तक पहुंचने से रोक दिया। इस जीत ने श्रीलंका को एशिया कप क्रिकेट में एक मजबूत टीम के रूप में स्थापित किया और देश के क्रिकेट इतिहास में यह एक यादगार पल बन गया।
5. 2005 - सऊदी अरब के बादशाह फहद का निधन
1 अगस्त 2005 को सऊदी अरब के बादशाह फहद बिन अब्दुल अजीज का निधन हो गया। वे 1982 से सऊदी अरब के शासक थे और उनके शासनकाल में देश ने तेल उद्योग के विकास और आर्थिक प्रगति में बड़ी उपलब्धियां हासिल कीं। बादशाह फहद के निधन के बाद उनके सौतेले भाई शाहजादा अब्दुल्ला बिन अब्दुल अजीज को नया शासक नियुक्त किया गया। फहद ने इस्लामी जगत में सऊदी अरब की राजनीतिक और धार्मिक स्थिति को मजबूत किया और हज यात्रियों के लिए सुविधाओं का विस्तार कराया। उनका निधन सऊदी और अरब जगत के लिए एक बड़ी क्षति था।
6. 2006 - जापान ने भूकंप पूर्व चेतावनी सेवा शुरू की
1 अगस्त 2006 को जापान ने दुनिया की पहली भूकंप पूर्व चेतावनी सेवा की शुरुआत की। यह सेवा भूकंप आने से कुछ सेकंड पहले लोगों को सतर्क कर सकती थी, जिससे वे सुरक्षित स्थान पर पहुंच सकें। जापान में अक्सर भूकंप आते हैं, इसलिए यह तकनीक लोगों की सुरक्षा के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण थी। इस प्रणाली में भूकंपीय सेंसरों का नेटवर्क लगाया गया था जो कंपन को महसूस कर तुरंत अलर्ट भेज देता था। इससे आपदा प्रबंधन और नुकसान को कम करने में मदद मिली। यह कदम प्राकृतिक आपदाओं से निपटने में जापान की तकनीकी प्रगति का प्रमाण था।
7. 2007 - अंतर्राष्ट्रीय गणित ओलम्पियाड में भारत की उपलब्धि
1 अगस्त 2007 को वियतनाम के हनोई में आयोजित अंतर्राष्ट्रीय गणित ओलम्पियाड (IMO) में भारत के छह सदस्यीय दल ने शानदार प्रदर्शन किया। भारतीय टीम ने तीन रजत पदक जीतकर देश का गौरव बढ़ाया। इस प्रतियोगिता में दुनिया भर के होनहार छात्र जटिल गणितीय समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। भारतीय प्रतिभागियों के इस प्रदर्शन ने गणित के क्षेत्र में देश की प्रतिभा और शिक्षा स्तर को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर मान्यता दिलाई। इस उपलब्धि से न केवल प्रतिभागियों को प्रोत्साहन मिला, बल्कि आने वाले वर्षों में भारतीय छात्रों को गणित ओलम्पियाड में बेहतर प्रदर्शन के लिए प्रेरणा भी मिली।
8. 2008 - IAEA ने भारत के विशेष निगरानी समझौते को मंजूरी दी
1 अगस्त 2008 को अंतर्राष्ट्रीय परमाणु ऊर्जा एजेंसी (IAEA) के बोर्ड ने भारत के साथ विशेष निगरानी समझौते को हरी झंडी दी। इस समझौते के तहत भारत के नागरिक परमाणु कार्यक्रम को IAEA की निगरानी में रखा गया, जिससे भारत को अंतरराष्ट्रीय परमाणु व्यापार में भागीदारी का मार्ग मिला। यह समझौता भारत-अमेरिका परमाणु समझौते की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम था। इससे भारत को शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए परमाणु प्रौद्योगिकी और ईंधन तक पहुंच संभव हुई। यह कदम भारत की ऊर्जा सुरक्षा और परमाणु तकनीकी विकास के लिए मील का पत्थर साबित हुआ।
1. रोहित टोकस (1993)
रोहित टोकस एक भारतीय मुक्केबाज़ हैं जिन्होंने राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत का नाम रोशन किया है। वे विशेष रूप से वेल्टरवेट श्रेणी में प्रतिस्पर्धा करते हैं। रोहित ने कई राष्ट्रीय चैंपियनशिप में पदक जीते और एशियाई खेलों सहित अंतरराष्ट्रीय प्रतियोगिताओं में भी शानदार प्रदर्शन किया। उनके आक्रामक खेल और बेहतरीन तकनीक के कारण वे भारतीय बॉक्सिंग में एक उभरते सितारे के रूप में जाने जाते हैं। खेल के प्रति उनकी समर्पण भावना और कठिन परिश्रम ने उन्हें भारतीय मुक्केबाज़ी में खास पहचान दिलाई है।
2. रामवीर उपाध्याय (1957)
रामवीर उपाध्याय उत्तर प्रदेश के प्रमुख राजनीतिज्ञों में से एक थे। वे लंबे समय तक राज्य की राजनीति में सक्रिय रहे और बहुजन समाज पार्टी (बसपा) के वरिष्ठ नेता के रूप में जाने जाते थे। उन्होंने यूपी विधानसभा में कई बार विधायक के रूप में सेवा दी और विभिन्न महत्वपूर्ण विभागों के मंत्री भी रहे। अपने राजनीतिक करियर में वे किसानों और आम जनता के मुद्दों को मजबूती से उठाने के लिए प्रसिद्ध थे। उनकी ईमानदारी और बेबाकी ने उन्हें जनता के बीच एक लोकप्रिय नेता बनाया। 2022 में उनका निधन हो गया।
3. अरुण लाल (1955)
अरुण लाल पूर्व भारतीय क्रिकेटर और कमेंटेटर हैं। वे दाएं हाथ के बल्लेबाज और कभी-कभी ऑफ-स्पिन गेंदबाज भी रहे। अरुण लाल ने 1982 से 1989 के बीच भारत के लिए टेस्ट और वनडे मैच खेले। घरेलू क्रिकेट में उन्होंने बंगाल टीम का लंबे समय तक प्रतिनिधित्व किया और कई यादगार पारियां खेलीं। क्रिकेट से संन्यास लेने के बाद उन्होंने कमेंट्री और क्रिकेट विश्लेषण में अपनी पहचान बनाई। उनका खेल के प्रति गहरा ज्ञान और स्पष्ट विश्लेषण उन्हें एक सफल क्रिकेट विशेषज्ञ बनाता है।
4. बची सिंह रावत (1949)
बची सिंह रावत उत्तराखंड के वरिष्ठ राजनीतिज्ञ और भारतीय जनता पार्टी के नेता थे। वे लोकसभा सदस्य और केंद्रीय मंत्री के रूप में कार्य कर चुके हैं। उन्होंने पर्यटन और संसदीय कार्य मंत्रालयों में अहम जिम्मेदारियाँ निभाईं। उत्तराखंड के विकास में उनका विशेष योगदान रहा, विशेषकर बुनियादी ढांचे और पर्यटन के क्षेत्र में। अपनी साफ-सुथरी छवि और जनता से निकटता के कारण वे पहाड़ी क्षेत्रों में अत्यधिक लोकप्रिय थे। 2021 में उनका निधन हो गया, लेकिन उनके कार्य आज भी लोगों को प्रेरित करते हैं।
5. दामोदर माऊज़ो (1944)
दामोदर माऊज़ो गोवा के प्रसिद्ध उपन्यासकार, कथाकार, आलोचक और निबंधकार हैं। वे कोकणी साहित्य के प्रमुख स्तंभ माने जाते हैं। उनके साहित्य में गोवा की संस्कृति, समाज और मानवीय संवेदनाओं का गहरा चित्रण मिलता है। उन्हें 1983 में उनके उपन्यास Karmelin के लिए साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया। दामोदर माऊज़ो न केवल साहित्यकार हैं, बल्कि सामाजिक सरोकारों से जुड़े विचारक भी हैं। वे गोवा की सांस्कृतिक पहचान और भाषा संरक्षण के लिए लगातार सक्रिय रहते हैं।
6. गोविन्द मिश्र (1939)
गोविन्द मिश्र हिंदी साहित्य के प्रसिद्ध उपन्यासकार और कहानीकार हैं। उन्होंने अपने साहित्य में मानवीय संबंधों, समाज की जटिलताओं और बदलते समय के प्रभाव को प्रभावशाली ढंग से प्रस्तुत किया है। उनके प्रमुख उपन्यासों में धूप का टुकड़ा, लाल पंख वाली चिड़िया और धुंध से उठती ध्वनि शामिल हैं। उन्हें साहित्य अकादमी पुरस्कार और अन्य कई सम्मान प्राप्त हुए हैं। उनकी रचनाओं में गहन संवेदनशीलता, सशक्त कथानक और भाषा की सहजता देखने को मिलती है, जो उन्हें हिंदी साहित्य की अग्रणी हस्तियों में स्थान देती है।
1. मीना कुमारी (1932)
मीना कुमारी हिंदी सिनेमा की महानतम अभिनेत्रियों में से एक थीं, जिन्हें ‘ट्रेजडी क्वीन’ कहा जाता है। उनका असली नाम महजबीं बानो था। उन्होंने पाकीज़ा, साहिब बीबी और गुलाम, फूल और पत्थर जैसी फिल्मों में अपने बेहतरीन अभिनय से दर्शकों का दिल जीता। मीना कुमारी की अदाकारी में गहरी संवेदनशीलता और भावनाओं की प्रामाणिकता देखने को मिलती थी। उनका जीवन निजी तौर पर संघर्षों से भरा रहा, जिसने उनके अभिनय में गहराई जोड़ दी। 1972 में उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी भारतीय सिनेमा में अमर हैं।
2. फ्रैंक वोरेल (1924)
फ्रैंक वोरेल वेस्ट इंडीज के दिग्गज क्रिकेटर और पहले अश्वेत कप्तान थे। वे एक बेहतरीन बल्लेबाज और टीम को एकजुट करने वाले प्रेरणादायक नेता के रूप में जाने जाते थे। उनकी कप्तानी में वेस्ट इंडीज टीम ने विश्व क्रिकेट में नई ऊंचाइयाँ हासिल कीं। 1960 में ऑस्ट्रेलिया के खिलाफ प्रसिद्ध ‘टाई टेस्ट’ में उनकी नेतृत्व क्षमता की खूब प्रशंसा हुई। क्रिकेट के अलावा वे राजनीति और शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय रहे। उनकी खेल भावना और नेतृत्व क्षमता के कारण उन्हें आज भी वेस्ट इंडीज क्रिकेट का महान प्रतीक माना जाता है।
3. शाह अब्दुल्ला (1924)
शाह अब्दुल्ला, सऊदी अरब के राजा, का जन्म 1 अगस्त 1924 को हुआ। वे 2005 में अपने भाई बादशाह फहद की मृत्यु के बाद गद्दी पर बैठे। उनके शासनकाल में सऊदी अरब ने आर्थिक सुधार, शिक्षा और स्वास्थ्य सेवाओं में प्रगति की। उन्होंने महिलाओं को शिक्षा और रोजगार के अधिक अवसर दिए, हालांकि सामाजिक सुधारों की गति सीमित रही। शाह अब्दुल्ला ने अंतरराष्ट्रीय राजनीति में भी सऊदी अरब की भूमिका को मजबूत किया। उनका कार्यकाल देश की स्थिरता और आर्थिक विकास के लिए महत्वपूर्ण माना जाता है।
4. भगवान दादा (1913)
भगवान दादा हिंदी फिल्मों के जाने-माने अभिनेता, निर्माता और निर्देशक थे। वे खासकर अपने नृत्य शैली के लिए प्रसिद्ध थे, जिसने बाद में कई अभिनेताओं को प्रभावित किया, जिनमें अमिताभ बच्चन भी शामिल हैं। उनकी फिल्म अलबेला (1951) बेहद सफल रही और इसके गीत आज भी लोकप्रिय हैं। भगवान दादा ने अपने करियर में कई सामाजिक और मनोरंजक फिल्में बनाईं। हालांकि बाद के वर्षों में उन्हें आर्थिक कठिनाइयों का सामना करना पड़ा, लेकिन हिंदी सिनेमा में उनका योगदान अमूल्य है।
5. मुहम्मद निसार (1910)
मुहम्मद निसार भारतीय क्रिकेट के पहले महान तेज गेंदबाज माने जाते हैं। उन्होंने 1932 में इंग्लैंड के खिलाफ भारत के पहले टेस्ट मैच में खेला और शानदार गेंदबाजी की। निसार की गति और स्विंग से बल्लेबाज अक्सर परेशान रहते थे। भारत के स्वतंत्रता से पहले के क्रिकेट दौर में उन्होंने अपनी तेज गेंदबाजी से अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भारत की पहचान बनाई। वे भारत के क्रिकेट इतिहास के शुरुआती महान खिलाड़ियों में गिने जाते हैं और तेज गेंदबाजी के क्षेत्र में अग्रणी माने जाते हैं।
6. कमला नेहरू (1899)
कमला नेहरू भारत के प्रथम प्रधानमंत्री पंडित जवाहरलाल नेहरू की पत्नी और स्वतंत्रता संग्राम की सक्रिय कार्यकर्ता थीं। उन्होंने महात्मा गांधी के नेतृत्व में ब्रिटिश शासन के खिलाफ आंदोलनों में भाग लिया और महिलाओं को स्वतंत्रता आंदोलन में शामिल होने के लिए प्रेरित किया। कमला नेहरू ने महिलाओं के अधिकार और शिक्षा के क्षेत्र में भी काम किया। वे अपने सादगीपूर्ण जीवन और देशभक्ति के लिए जानी जाती थीं। 1936 में उनकी असमय मृत्यु हो गई, लेकिन वे भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन में एक प्रेरणादायक व्यक्तित्व के रूप में याद की जाती हैं।
7. पुरुषोत्तम दास टंडन (1882)
पुरुषोत्तम दास टंडन भारतीय स्वतंत्रता सेनानी, राजनीतिज्ञ और हिंदी भाषा के प्रबल समर्थक थे। उन्हें ‘राजर्षि’ की उपाधि से सम्मानित किया गया। वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता रहे और 1950 में कांग्रेस अध्यक्ष भी बने। उन्होंने हिंदी को राष्ट्रभाषा का दर्जा दिलाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। टंडन जी का जीवन सादगी, सत्य और अहिंसा के आदर्शों पर आधारित था। वे सामाजिक सुधार और शिक्षा के क्षेत्र में भी सक्रिय थे। 1961 में उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
8. हरकोर्ट बटलर (1869)
सर हरकोर्ट बटलर ब्रिटिश भारत के एक वरिष्ठ प्रशासक और उत्तर प्रदेश (तत्कालीन संयुक्त प्रांत) के पहले राज्यपाल थे। उन्होंने शिक्षा और प्रशासनिक सुधारों में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उनके नाम पर कानपुर में हरकोर्ट बटलर तकनीकी विश्वविद्यालय (HBTU) की स्थापना हुई। वे भारतीय शिक्षा व्यवस्था के विस्तार और औद्योगिक विकास के समर्थक थे। हालांकि वे ब्रिटिश शासन के प्रतिनिधि थे, फिर भी उन्होंने भारतीय प्रशासनिक ढांचे को आधुनिक बनाने में भूमिका निभाई। उनका कार्यकाल उत्तर प्रदेश के प्रशासनिक इतिहास में महत्वपूर्ण माना जाता है।
1. अमर सिंह (2020)
अमर सिंह एक प्रमुख भारतीय राजनीतिज्ञ थे, जिनका संबंध समाजवादी पार्टी से लंबे समय तक रहा। वे अपनी बेबाक और प्रभावशाली राजनीतिक शैली के लिए जाने जाते थे। उत्तर प्रदेश की राजनीति में उनका खास स्थान था और वे उद्योगपतियों तथा फिल्म जगत की हस्तियों से भी अच्छे संबंध रखते थे। संसद में उन्होंने ऊर्जा, उद्योग और समाजवादी नीतियों से जुड़े मुद्दों को प्रमुखता से उठाया। वे समाजवादी पार्टी के महासचिव भी रहे। स्वास्थ्य समस्याओं के चलते 1 अगस्त 2020 को उनका निधन हो गया।
2. भीष्म नारायण सिंह (2018)
भीष्म नारायण सिंह एक भारतीय राजनीतिज्ञ थे जिन्होंने केंद्रीय मंत्री और राज्यपाल के रूप में सेवा दी। वे असम, मेघालय, तमिलनाडु और पुडुचेरी के राज्यपाल रहे। इसके अलावा वे भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस के वरिष्ठ नेता थे और उत्तर प्रदेश से सांसद चुने गए। उन्होंने शिक्षा, स्वास्थ्य और ग्रामीण विकास के क्षेत्रों में काम किया। राजनीति में उनका आचरण सादगी और ईमानदारी के लिए जाना जाता था। 1 अगस्त 2018 को उनका निधन हुआ, जिससे भारतीय राजनीति ने एक सच्चे जनसेवक को खो दिया।
3. हरकिशन सिंह सुरजीत (2008)
हरकिशन सिंह सुरजीत भारतीय कम्युनिस्ट पार्टी (मार्क्सवादी) के वरिष्ठ नेता और महासचिव रहे। वे लंबे समय तक भारतीय वामपंथी राजनीति के प्रमुख स्तंभ रहे। किसान आंदोलन, मजदूर अधिकार और सामाजिक न्याय के मुद्दों पर उनकी भूमिका बेहद सक्रिय रही। उन्होंने विपक्षी दलों को एकजुट करने में भी अहम योगदान दिया। अपने स्पष्ट विचारों और सिद्धांतों के प्रति अडिग रहने के कारण वे वामपंथी राजनीति में आदर्श माने जाते थे। 1 अगस्त 2008 को उनका निधन हुआ।
4. बेगम ऐज़ाज़ रसूल (2001)
बेगम ऐज़ाज़ रसूल भारतीय संविधान सभा की एकमात्र मुस्लिम महिला सदस्य थीं। वे उत्तर प्रदेश की राजनीति में सक्रिय थीं और शिक्षा व सामाजिक सुधार के क्षेत्र में महत्वपूर्ण योगदान दिया। उन्होंने महिलाओं के अधिकार, शिक्षा और सामुदायिक सद्भाव के मुद्दों को संविधान सभा में प्रभावी रूप से उठाया। वे उत्तर प्रदेश विधान परिषद की सदस्य भी रहीं और राज्य के राजनीतिक इतिहास में उनकी भूमिका ऐतिहासिक मानी जाती है। 1 अगस्त 2001 को उनका निधन हुआ।
5. अली सरदार जाफ़री (2000)
अली सरदार जाफ़री उर्दू के महान शायर, लेखक और आलोचक थे। वे प्रगतिशील लेखक संघ के सक्रिय सदस्य रहे और उनकी रचनाओं में सामाजिक न्याय, प्रेम और क्रांति की झलक मिलती है। उनकी शायरी में मानवीय संवेदनाओं और समाज के प्रति प्रतिबद्धता का गहरा प्रभाव था। उन्हें 1997 में ज्ञानपीठ पुरस्कार से सम्मानित किया गया। उन्होंने कई मशहूर नज़्में और ग़ज़लें लिखीं जो आज भी साहित्य प्रेमियों के बीच लोकप्रिय हैं। 1 अगस्त 2000 को उनका निधन हुआ।
6. नीरद चन्द्र चौधरी (1999)
नीरद चन्द्र चौधरी एक प्रसिद्ध लेखक, विद्वान और आलोचक थे, जिन्होंने बंगाली और अंग्रेजी दोनों भाषाओं में लिखा। उनकी कृतियाँ भारतीय संस्कृति, राजनीति और इतिहास के गहरे विश्लेषण के लिए जानी जाती हैं। उनकी प्रसिद्ध पुस्तक The Autobiography of an Unknown Indian ने उन्हें अंतरराष्ट्रीय ख्याति दिलाई। वे अपने स्पष्ट और कभी-कभी विवादास्पद विचारों के लिए मशहूर थे। 1 अगस्त 1999 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी भारतीय साहित्य में एक अनूठे स्थान पर हैं।
7. कांठे महाराज (1969)
कांठे महाराज भारत के प्रसिद्ध तबला वादकों में से एक थे। वे बनारस घराने से जुड़े हुए थे और अपनी उत्कृष्ट ताल साधना के लिए जाने जाते थे। उनकी तबला वादन शैली में लय और गति का अद्भुत संतुलन देखने को मिलता था। उन्होंने कई बड़े शास्त्रीय संगीत समारोहों में अपनी प्रस्तुति दी और संगीत प्रेमियों के दिलों में अमिट छाप छोड़ी। 1 अगस्त 1969 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे आज भी भारतीय शास्त्रीय संगीत में सम्मानित नाम हैं।
8. बाल गंगाधर तिलक (1920)
बाल गंगाधर तिलक भारतीय स्वतंत्रता आंदोलन के महान नेता, विद्वान, गणितज्ञ और दार्शनिक थे। उन्हें ‘लोकमान्य’ की उपाधि मिली। उन्होंने स्वदेशी आंदोलन, बहिष्कार आंदोलन और शिक्षा के प्रसार में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उनका नारा "स्वराज मेरा जन्मसिद्ध अधिकार है और मैं इसे लेकर रहूंगा" आज भी लोगों को प्रेरित करता है। उन्होंने केसरी और मराठा नामक पत्रों का संपादन किया और राष्ट्रीय चेतना जगाई। 1 अगस्त 1920 को उनका निधन हुआ।
9. देवकीनन्दन खत्री (1913)
देवकीनन्दन खत्री हिंदी साहित्य के प्रथम तिलिस्मी लेखक माने जाते हैं। उनकी रचना चंद्रकांता हिंदी के सबसे लोकप्रिय उपन्यासों में से एक है। उन्होंने हिंदी भाषा में मनोरंजन और रोमांच का नया आयाम जोड़ा। उनकी कहानियों में रहस्य, रोमांच और प्रेम का अद्भुत मिश्रण मिलता है, जिसने पाठकों को लंबे समय तक बांधे रखा। 1 अगस्त 1913 को उनका निधन हुआ, लेकिन वे हिंदी साहित्य के इतिहास में अमर हैं।
10. ज़िन्दाँ रानी (1863)
ज़िन्दाँ रानी, सरदार मन्ना सिंह औलख जाट की पुत्री थीं और पंजाब के महाराज रणजीत सिंह की पाँचवीं रानी थीं। वे महाराज रणजीत सिंह के सबसे छोटे बेटे दलीप सिंह की माँ थीं। अपने जीवन में उन्होंने पंजाब के इतिहास में कई महत्वपूर्ण घटनाओं को देखा। उनका नाम ‘ज़िन्दाँ रानी’ इसलिए पड़ा क्योंकि जीवन के अंतिम समय में उन्हें नजरबंद रखा गया था। 1 अगस्त 1863 को उनका निधन हुआ।
11. उर्फ़ी शीराजी (1591)
उर्फ़ी शीराजी मुग़ल दरबार के प्रसिद्ध कवि थे, जो बादशाह अकबर के समय में सक्रिय थे। वे अपनी शायरी और साहित्यिक प्रतिभा के लिए जाने जाते थे। उनकी कविताओं में फ़ारसी भाषा की मिठास और गहराई देखने को मिलती थी। उन्होंने दरबार में अपनी रचनाओं से विशेष सम्मान अर्जित किया। 1 अगस्त 1591 को उनका निधन हुआ, लेकिन उनका साहित्यिक योगदान मुग़ल कालीन कविता के इतिहास में महत्वपूर्ण स्थान रखता है।