आदिवासी समाज और हिन्दू समाज अलग नहीं – डॉ. मोहन भागवत जी

रांची, 24 जनवरी। रांची के डीबडीह में जनजातीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर […] The post आदिवासी समाज और हिन्दू समाज अलग नहीं – डॉ. मोहन भागवत जी appeared first on VSK Bharat.

Jan 25, 2026 - 08:38
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आदिवासी समाज और हिन्दू समाज अलग नहीं – डॉ. मोहन भागवत जी

रांची, 24 जनवरी। रांची के डीबडीह में जनजातीय संवाद कार्यक्रम का आयोजन किया गया। कार्यक्रम में झारखंड के विभिन्न जिलों से आए जनजातीय समाज के प्रतिनिधि, बुद्धिजीवी, सामाजिक कार्यकर्ता एवं गणमान्य नागरिक उपस्थित रहे। कार्यक्रम का शुभारंभ राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने भारत माता के चित्र पर पुष्प अर्पित कर एवं दीप प्रज्ज्वलन कर किया।

कार्यक्रम का औपचारिक परिचय तुका उरांव ने दिया। इस अवसर पर राज्य के 32 जनजातीय समुदायों के प्रतिनिधि एवं समाज से जुड़े लोग उपस्थित रहे। संवाद कार्यक्रम दो सत्रों में रहा।

प्रथम सत्र का संचालन मोहन कच्छप ने किया। इस सत्र में भगवान बिरसा मुंडा की 150वीं जयंती के अवसर पर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सरकार्यवाह दत्तात्रेय होसबाले जी का संदेश पत्र पढ़कर सुनाया गया, जिसमें “अबुआ दिसुम, अबुआ राज” की अवधारणा पर प्रकाश डाला गया। पहले सत्र में जनजातीय समाज से जुड़े विभिन्न मुद्दों पर प्रश्नोत्तर सत्र आयोजित किया गया, जिसमें समाज के प्रबुद्धजनों ने खुलकर अपनी बात रखी।

सत्र के दौरान मुख्य रूप से सीएनटी/एसपीटी कानून का उल्लंघन कर जनजातीय भूमि की खरीद-फरोख्त, ईसाई एवं मुस्लिम समुदाय द्वारा किए जा रहे कथित धर्मांतरण, पेसा कानून के सही तरीके से लागू न होने, ग्रामसभा की शक्तियों को कमजोर किए जाने तथा जनजातीय महिलाओं एवं युवतियों के सामाजिक-सांस्कृतिक शोषण जैसे विषयों पर चर्चा हुई। वक्ताओं ने सुझाव दिया कि धर्मांतरित जनजातियों को मिलने वाले आरक्षण पर पुनर्विचार किया जाए, जनजातीय महिलाओं के जाति प्रमाण पत्र का निर्धारण उनकी मूल पहचान के आधार पर किया जाए तथा संथाल परगना क्षेत्र में जनजातीय जमीन की सुरक्षा हेतु परंपरागत व्यवस्था को सख्ती से लागू किया जाए।

दूसरे सत्र में सरसंघचालक जी ने कहा कि आदिवासी समाज और हिन्दू समाज अलग नहीं हैं। उन्होंने स्पष्ट किया कि हिन्दू किसी पूजा पद्धति का नाम नहीं, बल्कि जीवन जीने की एक पद्धति है, जिसमें विविधताओं के बावजूद एकता का भाव निहित है। हजारों वर्षों से भारत की सभ्यता जंगल, खेती और प्रकृति के साथ सामंजस्य बनाकर आगे बढ़ी है और वेदों एवं उपनिषदों का मूल भी इसी जीवन पद्धति से जुड़ा हुआ है।

उन्होंने कहा कि पृथ्वी माता सभी भाषाओं, संस्कृतियों और समुदायों का पालन करने वाली है, इसलिए विविधता का सम्मान करना हमारी परंपरा है। धर्म का मूल अर्थ सत्य, सेवा, परोपकार और संयम है। समाज जब भोग और स्वार्थ में उलझ गया, तब आपसी मतभेद बढ़े और बाहरी आक्रांताओं ने इसका लाभ उठाया। उन्होंने कहा कि विश्व में एक ही धर्म है, मानव धर्म, और वही हिन्दू धर्म का मूल स्वरूप है।

उन्होंने समाज को चेताते हुए कहा कि यदि समाज बंटेगा तो कमजोर होगा और यदि एकजुट रहेगा तो कोई शक्ति उसे नुकसान नहीं पहुंचा सकती। संघ का कार्य समाज को जोड़ने का है, न कि विभाजित करने का।

सरसंघचालक जी ने जनजातीय समाज की शिक्षा, रोजगार और सांस्कृतिक संरक्षण पर विशेष जोर देते हुए कहा कि बच्चों को प्रारंभिक आयु से ही अपनी संस्कृति, परंपरा और गौरव की शिक्षा दी जानी चाहिए। इससे वे कभी भटकेंगे नहीं और यदि भटके भी तो अपनी जड़ों की ओर वापस लौट आएंगे।

भगवान बिरसा मुंडा जैसे महापुरुष पूरे समाज की धरोहर हैं और उनके विचारों से सभी को परिचित होना चाहिए।

उन्होंने कहा कि जनजातीय भूमि की रक्षा, श्रम करने वालों की प्रतिष्ठा, स्थानीय स्तर पर रोजगार सृजन और सामाजिक समरसता समय की आवश्यकता है। धर्मांतरण, जमीन हड़पने, सामाजिक शोषण और जनसांख्यकीय बदलाव जैसी चुनौतियों का सामना संगठित होकर ही किया जा सकता है। उन्होंने समाज से आह्वान किया कि आत्मनिर्भर बनते हुए अपने स्वाभिमान को जागृत करें और किसी बाहरी शक्ति पर निर्भर रहने की प्रवृत्ति छोड़ें।

कार्यक्रम में राज्य भर से आए आदिवासी बहनों और भाइयों समेत कुल 36 वक्ताओं ने अपने विचार एवं सुझाव प्रस्तुत किए।

 

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