राम मंदिर का मुद्दा: अब राजनीति में 'राम-राम'
अयोध्या, जहां राम मंदिर का निर्माण हुआ, वहीं भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह को सपा के अवधेश प्रसाद से हार का सामना करना पड़ा।
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2024 के लोकसभा चुनावों में अयोध्या, एटा और मेरठ के नतीजे स्पष्ट संकेत देते हैं कि राम मंदिर का राजनीतिक प्रभाव अब समाप्त हो गया है। दशकों तक भाजपा की उम्मीदों का आधार रहा राम मंदिर मुद्दा, मंदिर के निर्माण के साथ ही धूमिल हो गया है।
अयोध्या, जहां राम मंदिर का निर्माण हुआ, वहीं भाजपा प्रत्याशी लल्लू सिंह को सपा के अवधेश प्रसाद से हार का सामना करना पड़ा। यह हार इस बात का संकेत है कि आस्था और विकास का मॉडल जातीय समीकरणों के आगे टिक नहीं पाया।
एटा में तीसरी बार चुनाव मैदान में उतरे राजवीर सिंह, जो कल्याण सिंह के पुत्र हैं, सपा के देवेश शाक्य से हार गए। राम मंदिर निर्माण का राजनीतिक लाभ भी उन्हें नहीं मिल सका। यह शाक्य-मौर्य बहुल क्षेत्र में सपा के जातीय गणित का परिणाम था।
रामायण धारावाहिक में राम की भूमिका निभाने वाले अरुण गोविल को भाजपा ने मेरठ से उतारा, पर वे भी मुश्किल से जीत सके। सपा ने दलित उम्मीदवार सुनीता वर्मा को उतारकर चुनावी समीकरण को उलझा दिया, जिससे गोविल की जीत आसान नहीं रही।
इन परिणामों ने स्पष्ट किया कि अब राजनीति मंडल-कमंडल के इर्द-गिर्द सिमट रही है। भाजपा ने राम मंदिर को राजनीति से अलग रखने की कोशिश की, परंतु चुनावी परिणामों ने इसे सिरे से खारिज कर दिया।
1990 से शुरू हुए राम मंदिर आंदोलन ने भाजपा को राजनीतिक ऊंचाइयों तक पहुंचाया। परंतु 2024 के चुनावी नतीजों ने इस मुद्दे को अंतिम अध्याय मान लिया। अब राजनीतिक विश्लेषक मानते हैं कि राम मंदिर की राजनीति को 'राम-राम' कहना ही उचित होगा।
राम मंदिर मुद्दे ने भाजपा को दशकों तक राजनीतिक ऊर्जा दी, लेकिन मंदिर बनने के बाद यह मुद्दा राजनीतिक फलक से ओझल हो गया है। अयोध्या, एटा और मेरठ के चुनाव परिणाम इस बात की पुष्टि करते हैं कि अब जातीय समीकरण और विकास की राजनीति का युग है। राम मंदिर का राजनीतिक लाभ अब समाप्त हो चुका है और भाजपा को नई रणनीतियों पर विचार करना होगा।
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