देश के पहले चुनाव में 60 पैसे प्रति वोटर हुए थे खर्च
2014 के आम चुनाव में यह खर्च बढ़कर 3870.3 करोड़ तक पहुंच गया। इस दौरान मतदाताओं की संख्या भी बढ़कर 17.5 करोड़ से
देश के पहले चुनाव में 60 पैसे प्रति वोटर हुए थे खर्च
अब तक हुए चुनावों में सबसे कम खर्चीला था 1957 का लोकसभा चुनाव, प्रति मतदाता 30 पैसे हुए थे खर्च
भागलपुरः पहले लोकसभा चुनाव में निर्वाचन आयोग ने प्रति वोटर 60 पैसे खर्च किए थे। 2004 में यह बढ़कर 12 रुपये और 2009 में 17 रुपये प्रति वोटर जा पहुंचा। 2014 के चुनाव में भी खर्च में वृद्धि देखी गई। इस चुनाव में प्रति मतदाता चुनावी खर्च बढ़कर 46 रुपये हो गया। हैरानी की बात तो यह है कि 2019 के चुनाव में 72 रुपये प्रति मतदाता खर्च आया। सबसे कम खर्चीला चुनाव वर्ष 1957 का है। उस समय प्रति मतदाता 30 पैसे खर्च किए गए थे।
हालांकि, 2024 में होनेवाले लोकसभा चुनाव में यह खर्च और बढ़ सकता है। लोकतंत्र के महापर्व में जैसे-जैसे मतदाताओं की आस्था बढ़ती गई, वैसे वैसे लोकसभा सीटों की संख्या भी बढ़ती गई। इस कारण चुनावी खर्च में भी इजाफा हुआ है। सबसे अधिक चुनावी खर्च 2019 के आमसभा चुनाव में हुआ था। यह चुनाव कुल 75 दिनों तक चला था। इस चुनाव में 60 हजार करोड़ रुपये खर्च होने का अनुमान है।
प्रत्याशियों की भी खर्च की सीमा 70 से बढ़ाकर 95 लाख कर दी गई है। 2024 का प्रत्याशी और प्रशासनिक तंत्र का चुनावी खर्च शुरू हो गया है। उपलब्ध जानकारी के अनुसार देश का पहला चुनाव 1951-52 में हुआ था। तब के चुनाव में मात्र 10.5 करोड़ रुपये खर्च किए गए थे। 2014 के आम चुनाव में यह खर्च बढ़कर 3870.3 करोड़ तक पहुंच गया। इस दौरान मतदाताओं की संख्या भी बढ़कर 17.5 करोड़ से 91.2 करोड़ हो गई। 1957 के चुनाव को यदि अपवाद माना जाए तो हर चुनाव में खर्च का आंकड़ा बढ़ता चला गया।
पूर्व में चुनाव बैलेट पेपर पर हुआ करता था। उम्मीदवार चुनाव प्रचार के लिए टमटम, बैलगाड़ी, साइकिल या रिक्शे का इस्तेमाल करते थे। 2004 के चुनाव में ईवीएम का आगमन हुआ। चुनाव प्रचार के तौर-तरीके भी बदल गए। अब सड़कों पर चुनाव प्रचार में जीप या मोटरकार दौड़ने लगी। परिणामस्वरूप, प्रत्याशियों के साथ-साथ चुनाव का खर्च भी बढ़ने लगा। एक आंकड़े के अनुसार 2019-20 में बजट में ईवीएम खरीद और मेंटेनेंस के लिए 25 करोड़ रुपये आवंटित किए गए थे।
2023-24 के बजट में इसे बढ़ाकर 1891.8 करोड़ कर दिया गया। जानकारों का कहना है कि चुनावी खर्च बढ़ने की दो वजहें हैं। लोकतंत्र के महापर्व को लेकर लोगों में जागरूकता आई है। प्रशासनिक स्तर पर भी मतदाताओं को जागरूक करने के लिए कई तरह के अभियान चलाए गए हैं। इससे मतदाताओं की संख्या में तेजी से उछाल आई।