रथयात्रा का आद्य पर्व – देव स्नान पूर्णिमा
आज पवित्र देव स्नान पूर्णिमा के साथ ही पुरी में भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा पर्व का शुभारंभ हो गया। इसे भगवान का जन्म उत्सव भी कहा जाता है। रथयात्रा के अतिरिक्त यही एक दिन होता है, जब भक्तगण भगवान जगन्नाथ को खुले में दर्शन कर पाते हैं। हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन […] The post रथयात्रा का आद्य पर्व – देव स्नान पूर्णिमा appeared first on VSK Bharat.
आज पवित्र देव स्नान पूर्णिमा के साथ ही पुरी में भगवान जगन्नाथ के रथयात्रा पर्व का शुभारंभ हो गया। इसे भगवान का जन्म उत्सव भी कहा जाता है। रथयात्रा के अतिरिक्त यही एक दिन होता है, जब भक्तगण भगवान जगन्नाथ को खुले में दर्शन कर पाते हैं। हर साल ज्येष्ठ मास की पूर्णिमा के दिन भगवान अपने रत्न सिंहासन छोड़कर मंदिर परिसर में खुले में निर्मित स्नान वेदी पर आते हैं और वहां उन्हें 108 घड़ों के जल से स्नान कराया जाता है। इसे देव स्नान पूर्णिमा कहते हैं। शीतल जल से स्नान करने के बाद भगवान बीमार पड़ जाते हैं, जिसके बाद 15 दिन तक उनका उपचार चलता है। इसे स्थानीय भाषा में अणसर कहा जाता है। इस दौरान पुरी में मंदिर खाली रहता है, रत्न सिंहासन पर भगवान जगन्नाथ के दर्शन नहीं होते। भक्तों के लिए पुरी के निकट ब्रह्मगिरी में अलारनाथ भगवान दर्शन देते हैं।
भगवान जगन्नाथ को हर दिन दर्पण स्नान कराया जाता है, जो अप्रत्यक्ष स्नान होता है और प्रत्यक्ष रूप में साल में केवल एक दिन स्नान पूर्णिमा को ही भगवान जल से स्नान करते हैं। पुरी के श्री मंदिर परिसर में स्थित उत्तर द्वार के निकट शीतला मंदिर के पास स्वर्णकूप से एक सौ आठ घड़ों में शीतल जल संग्रह किया जाता है। यह स्वर्ण कूप साल भर बंद रहता है, केवल स्नान पूर्णिमा के पूर्व दिन इसे खोला जाता है और जल संग्रह के बाद इसे पुनः बंद कर दिया जाता है।
स्नान पूर्णिमा को लेकर अनेक कथाएँ प्रचलित हैं। इसी दिन भगवान प्रत्यक्ष स्नान के उपरांत गजानन वेश में भक्तों को दर्शन देते हैं। एक कथा के अनुसार महाराष्ट्र से आए गणपति भट्ट नामक भक्त की मनोकामना पूर्ण करने के लिए भगवान जगन्नाथ, गणेश अर्थात गजानन वेश में भक्तों को दर्शन देते हैं। यह भगवान जगन्नाथ का अन्यतम दुर्लभ वेश है।
The post रथयात्रा का आद्य पर्व – देव स्नान पूर्णिमा appeared first on VSK Bharat.


