पहाड़ को पलायन से बचाएं
पहाड़ को पलायन से बचाएं
पहाड़ को पलायन से बचाएं
त्तप, त्याग, धर्म और देश की सुरक्षा का मार्ग दिखाती तपोभूमि उत्तराखंड ने अपनी यात्रा के 24 साल पूरे कर लिए हैं। उत्तराखंड के अलग राज्य की संकल्पना को साकार करने का कार्य अटल बिहारी वाजपेयी जी ने किया था और उसे संवारने का काम प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी कर रहे हैं। इसमें कोई शक नहीं कि इन 24 वर्षों में उत्तराखंड ने उतार-चढ़ाव के बावजूद प्रगति और विकास का एक लंबा सफर तय किया है, लेकिन हमें पहाड़ की राजनीतिक पहचान बनाए रखने के लिए जनभागीदारी के जरिये कुछ ऐसा कर गुजरने की जरूरत है ताकि पहाड़ का पानी और पहाड़ की जवानी, दोनों पहाड़ के काम आ सकें। 'अपना वोट, अपने गांव' अभियान उजाड़ होते पहाड़ और गांवों को बचाने की इसी मुहिम के साथ शुरू हुआ है। हम उस दोराहे पर आज फिर से आकर खड़े हो गए हैं, जहां पलायन के दंश से पहाड़ का राजनीतिक वजूद खतरे में पड़ता नजर आ रहा है। अगर पहाड़ में आबादी ही नहीं बचेगी तो पहाड़ की आवाज कौन उठाएगा? पहाड़ की चिंता कौन करेगा? मैं जब उस स्थिति के बारे में भी सोचता हूं तो सिहर उठता हूं, क्योंकि हमारी पहचान पहाड़ से है। हमारी संस्कृति पहाड़ से है। हमारा गौरव पहाड़ से है। पहाड़ के बिना हम कुछ नहीं। हमें फिर से अपनी जड़ों की ओर लौटने की जरूरत है। मुझे खुशी है कि रिवर्स पलायन पर केंद्रित 'अपना वोट, अपने गांव' अभियान से हजारों लोग जुड़ रहे हैं और वे अपने गांव में अपना वोट दर्ज करा रहे हैं। इस अभियान के तहत 10 लाख प्रवासी उत्तराखंडियों से सीधा संवाद करने जा रहा हूं ताकि वे अपनी जड़ों से जुड़ें, जिससे पहाड़ की अनदेखी न हो। मैंने अपनी लोकसभा सीट गढ़वाल में करीब एक लाख प्रवासियों के वोटों को उनके मूल गांव के बूथ पर स्थानांतरित करने का भी संकल्प लिया है। उत्तराखंड राज्य की मांग का आंदोलन हमें इसलिए करना पड़ा था, क्योंकि पहाड़ का विकास नहीं हो रहा था। विधानसभा में पहाड़ का प्रतिनिधित्व भी काफी कम था। 2002 और 2008 के परिसीमन के बाद उत्तराखंड में पहाड़ की कई सीटें घट गईं। मेरे गृह जिले पौड़ी में ही 2007 तक आठ विधानसभा की सीटें थीं, जो 2012 में घटकर छह रह गईं। पौड़ी गढ़वाल से धूमाकोट और बीरौंखाल, चमोली की नंदप्रयाग, पिथौरागढ़ की कनालीछीना और बागेश्वर की कांडा के साथ-साथ टिहरी और अल्मोड़ा में भी दो-दो विधानसभा सीटें खत्म हो गईं। यदि पलायन की स्थिति ऐसी ही रही तो आने वाले समय में ऐसा भी हो सकता है कि कहीं पहाड़ का राजनीतिक वजूद ही खत्म न हो जाए। जरा सोचिए, ऐसी स्थिति में हम पहाड़ को कैसे जिंदा रख पाएंगे? वैसी स्थिति में तो हम पहाड़ी, अपने निर्वाचित जनप्रतिनिधि से पहुंच के मामले में तकरीबन यूपी वाली स्थिति में पहुंच जाएंगे। लगातार पलायन और उजाड़ होते गांवों को देखकर कहीं ऐसा न हो कि अगले परिसीमन में पहाड़ में विधानसभा सीटें और घट जाएं। अतीत में हम यह देख चुके हैं और यह एक कटु सच्चाई भी है कि जहां वोट नहीं होता, वहां न नेता पहुंचते हैं और न ही अधिकारी। इससे विकास की गति अवरुद्ध हो जाती है। प्रधानमंत्री मोदी देश के आखिरी गांव नीति-माणा को देश का पहला गांव मानते हैं। वह वाइब्रेंट विलेज जैसी योजना से सीमा पर बसे गांवों को गुलजार करने में लगे हैं। जहां वह उत्तराखंड में विकास को नई गति दे रहे हैं, वहीं हम अपने ही गांव से दूर होते जा रहे हैं। आपको अंदाजा नहीं है कि हम-आप अपने गांवों और पहाड़ से दूर होकर कितना बड़ा गुनाह कर रहे हैं। एक अध्ययन में यह सामने आया है कि पिछली जनगणना के बाद से 2018 तक में ही हमारे 734 गांव पूरी तरह निर्जन हो चुके हैं। पलायन का असर देर-सबेर संसाधनों के बंटवारे पर भी पड़ेगा। हमारे मैदानी जिले और शहर भी अतिरिक्त मानवबल के बोझ से दबे जा रहे हैं। साफ है कि पलायन हमारे लिए दोतरफा मार है। इसलिए राज्य गठन के इस रजत जयंती वर्ष में हमें अपने गांवों को फिर से बचाने का संकल्प लेना ही होगा। मैं जब भी गढ़वाल के दूरस्थ गांवों में जाता हूं, तो कई गांवों में मुझे केवल बुजुर्ग नजर आते हैं, जो पलायन की आंधी के बीच भी अपने पुरखों की 'कूड़ी-पुंगड़ि' छोड़ने के लिए तैयार नहीं। वाहन से उतरते अपने प्रियजनों की आस में टकटकी लगाए इन बुजुर्गों का चेहरा हर वक्त मेरे जेहन में रहता है। इसी पीड़ा को महसूस करते हुए मैने रिवर्स पलायन को अपना ध्येय बनाया है। मेरा मानना है कि आजीविका के लिए हमें दुनिया में कहीं भी आने-जाने से पीछे नहीं हटना चाहिए, लेकिन इसके लिए हमें अपनी जड़ों से कटने की भी जरूरत नहीं है। हम कम से कम अपने लोकपर्व, उत्सव, शादी-विवाह, जन्मतिथि समारोह जैसे आयोजनों के बहाने गांव आ सकते हैं। यदि आप अपने बच्चों को भी ऐसे आयोजनों में शामिल करेंगे तो वे भी स्वाभाविक रूप से इसी बहाने अपने पहाड़ से परिचित होंगे। हमने ईगास को फिर से प्रतिस्थापित करने के लिए अभियान चलाया है, ताकि हमारी आने वाली पीढ़ियां अपनी विशिष्ट सांस्कृतिक परंपराओं से परिचित हो सकें। मेरी आप सभी से विनम्र अपील है। कि हम अपने गांवों को कभी न भूलें। 'अपना वोट, अपने गांव' का उद्देश्य ही यही है कि पहाड़ की सूनी होती 'डंड्याली, तिबारी, उबरा' फिर से चहकें और चौक-चौबारे पर एक बार फिर मंडाण, थड्या, चौंफला की गूंज सुनाई दे। पहाड़ को बचाना उत्तराखंड ही नहीं, देश के भविष्य के लिहाज से भी बेहद जरूरी है। आज आपके गांव को आपकी जरूरत है। आइए, हम सब मिल कर इस अभियान से जुड़ें, अपना वोट अपने गांव में दर्ज कराएं और पहाड़ की आवाज बनें।