24 सितम्बर का इतिहास पंडित बच्छराज व्यास: जनसेवक, संघ और जनसंघ के समर्पित कार्यकर्ता का जीवन

बालासाहब के माध्यम से उनकी भेंट संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से हुई, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को पहचान कर उनके संघ में योगदान की महत्ता को समझा।

24 सितम्बर का इतिहास पंडित बच्छराज व्यास: जनसेवक, संघ और जनसंघ के समर्पित कार्यकर्ता का जीवन

पंडित बच्छराज व्यास: जनसेवक, संघ और जनसंघ के समर्पित कार्यकर्ता का जीवन

नागपुर में 24 सितम्बर, 1916 को जन्मे पंडित बच्छराज व्यास, भारतीय जनसंघ और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ (RSS) के प्रमुख स्तंभों में से एक थे। उनके पिता श्री श्यामलाल मूलतः राजस्थान के डीडवाना के निवासी थे, जो नागपुर में एक व्यापारिक फर्म में मुनीम के रूप में काम करने आये थे।

बच्छराज व्यास एक मेधावी छात्र थे, जिन्होंने बी.ए. (ऑनर्स) और एल.एल-बी. की डिग्री प्राप्त कर वकालत शुरू की। पढ़ाई के दौरान वे अपने समवयस्क और संघ के प्रमुख नेता श्री बालासाहब देवरस के संपर्क में आए। बालासाहब के माध्यम से उनकी भेंट संघ के संस्थापक डॉ. हेडगेवार से हुई, जिन्होंने उनके व्यक्तित्व को पहचान कर उनके संघ में योगदान की महत्ता को समझा।

शुरुआती दिनों में, बच्छराज जी के घर छुआछूत का विचार बहुत प्रभावी था, लेकिन संघ में आकर उन्होंने अपने खानपान और जीवन के दृष्टिकोण में परिवर्तन किया। संघ के संस्कारों में ढलने के बाद, वे सामूहिक भोजन का हिस्सा बने और उनके माध्यम से कई अन्य मारवाड़ी युवक भी संघ से जुड़ गए।

वकालत में सफलता पाने के बावजूद, बच्छराज जी ने संघ के कार्यों को प्राथमिकता दी। उनके प्रयासों से नागपुर की शाखाओं में मारवाड़ी, गुजराती, सिन्धी, उत्तर भारतीय और महाराष्ट्र के बाहर के युवक बड़ी संख्या में आने लगे। संघ विचार से प्रेरित संगठनों के लिए धनसंग्रह की जिम्मेदारी भी उन्होंने कुशलता से निभाई।

उनका विवाह छात्र जीवन में ही हो गया था, लेकिन फिर भी संघ का कार्य उनकी प्राथमिकता बनी रही। राजस्थान में संघ कार्य की नींव मजबूत करने के लिए उन्होंने 1944 से 1947 तक सतत प्रवास किया, जहां उन्हें ‘भैयाजी’ के नाम से पहचाना गया।

संघ के प्रतिबंध के समय 1948 में उन्होंने नागपुर में संगठन को संभाला और सत्याग्रह को गति दी। जब कुछ वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने संघ की दिशा बदलने का प्रस्ताव रखा, तो बच्छराज जी ने इसका विरोध किया। 1965 में उन्हें भारतीय जनसंघ का राष्ट्रीय अध्यक्ष नियुक्त किया गया, जहाँ उन्होंने 14 वर्षों तक महाराष्ट्र विधान परिषद के सदस्य के रूप में भी कार्य किया।

15 मार्च, 1972 को उनका निधन हो गया, लेकिन उनका जीवन संघ और जनसंघ के लिए किए गए समर्पण और जनसेवा के अद्वितीय उदाहरण के रूप में सदैव याद किया जाएगा।