भूमि पुत्रों एं पथव इसका आशय है कि पृथ्वी हमारी माता है और हम उसके पुत्र है यह अथर्ववेद का पृथ्वी सूक्त है जो हमें अपने कर्तव्यों की याद दिलाता है बताता है कि किस तरीके से जो पृथ्वी हमारी मातृभूमि है और मातृभूमि का पुत्र होने के नाते हमारा कुछ दायित्व है लेकिन यह बहुत ही दुर्भाग्यपूर्ण है कि आज जिसे हम अपनी माता कहते हैं उसकी जो जमीन है भूमि है उसकी जो गुणवत्ता घट गई है और भारत की लगभग 30 प्र जो भूमि है उसकी उत्पादकता गिर गई है यानी उसमें जो पोषक तत्त्वों का अभाव हो गया है पिछले 50 वर्षों में अगर देखा जाए तो जिस तरीके से पोषक तत्व होने चाहिए जैसे आयरन मैंगनीज सल्फर कॉपर जिंक इन सब पोषक तत्त्वों की कमी हो गई है जो अत्यंत चिंताजनक है
और यही कारण है कि जिस तरीके से हमारे देश में किसान लगातार आत्महत्या कर रही हैं तोआत्महत्याओं में जो कई कारण है उनमें से एक प्रमुख कारण जो है भूमि की घटती गुणवत्ता भी है अगर मैं आपसे प्रश्न पूछूं कि यदि हमारे देश की जमीन की उत्पादकता या गुणवत्ता घट रही है तो इसके लिए जिम्मेदार कौन है और इसकी उत्पादकता बढ़ाने के लिए की गुणवत्ता को ठीक करने के लिए किसको प्रयास करना चाहिए तो हो सकता है कि आप आप जवाब दें कि इसमें जो है सरकार का जो है दोष है या सरकार को ही इसके लिए प्रयास करना चाहिए निसंदेह सरकार का काम है कि वह मिट्टी की गुणवत्ता को बनाए रखे या उसकी गुणवत्ता को ठीक करने में अपना योगदान दे लेकिन मेरा प्रश्न आपसे यह है कि क्या हमें अपनी मातृभूमि की सुरक्षा क्या सिर्फ सरकार पर छोड़ देना चाहिए या हमारा भी इसमें कोई दायित्व बनता है चलिए इस परे मैं बात करूंगा लेकिन मैं एक आंकड़ा आपके सामने रखना चाहूंगा कि जो नेशनल क्राइम ब्यूरो है उसने 2000 दिसंबर 2023 में एक
रिपोर्ट दी जिसमें उसने बताया कि 2022 में
जो हमारे देश में किसानों ने आत्महत्या की
उसकी संख्या थी
11290 और उसके एक साल पहले 2021 में
10281 किसानों ने आत्महत्या की
थी इस तरीके से एक साल में जो किसानों की
आत्महत्याओं में वृद्धि हुई वह रही 3.7
प्र और इसको दूसरे तरीके से आंकड़ों में
देखा जाए तो जो हमारे देश में जो किसान
मजदूर हैं वह हर दिन 154 लोग हैं जो
आत्महत्या कर रहे हैं लाक मैं यह बिल्कुल
नहीं कहता कि सिर्फ जो जमीन है जमीन की जो
गुणवत्ता है घटने की वजह से सारे किसान
आत्महत्या कर रहे हैं कारण और भी है अनेक
हैं लेकिन इसमें एक प्रमुख कारण जमीन की
घटती गुणवत्ता भी है जो हम सबके लिए हमारे
भविष्य के लिए बहुत ही चिंताजनक बात
है देखि भारत में आज जो स्थिति है किसानों
की तो जो मैक्सिमम किसान है वह ऐसा है
बहुत छोटा किसान है उनके पास जमीन के छोटे
छोटे टुकड़े हैं और उसमें जो वो किसानी
करता है या खेती करता है उस खेती से उसे
अपने परिवार का भरण पोषण करना भी जो है
मुश्किल हो जाता है यानी जो आज यह
एग्रीकल्चर है वो कोई आकर्षक पेशा नहीं
रहा यही कारण है कि लोग गांव से निकल कर
के शहरों की ओर आए और वो जो म जो किसान था
व किसान आज मजदूर बन गया और वह शहरों में
आकर के मजदूरी कर रहा है ये बहुत चिंताजनक
बात है देखिए जैसा कि मैंने बताया कि भारत
में जो 30 प्र जमीन है भूमि है उसकी
गुणवत्ता गिरी है लेकिन यदि वैश्विक स्तर
पर इसे देखा जाए तो और भी चिंताजनक स्थिति
है विश्व की लगभग 40 प्र जमीन है जिसके
पोषक तत्व जो है कम हो गए हैं या उसकी
गुणवत्ता जमीन की गिर गई है और यह वैश्विक
स्तर पर देखा जाए तो यदि जीडीपी पर मैं
बात करूं तो लगभग 50 प्र जीडीपी का इस परे
असर पड़ा है अब 1947 में जब हमारा देश
आजाद हुआ तो उस दौरान भी हम खाद्यान के
मामले में आत्मनिर्भर नहीं थे हमें अपने
खाने के लिए भी देश के लोगों को खिलाने के
लिए भी जो अनाज है आयात करना पड़ता था
दूसरे देशों से मंगाना पड़ता था लेकिन
सरकार ने प्रयास किए किसानों ने प्रयास
किए हरित क्रांति जैसी जो है हमारे देश
में एक मतलब क्रांति आई जिसमें जो है
उन्नत बीच का इस्तेमाल किया गया प्रयोग
किया गया और सिंचाई के साधनों का प्रयोग
किया गया उर्वरक का किया गया रस जो है और
रसायनिक खाद का प्रयोग किया गया तो उसके
नतीजे दिखे और हमारे यहां जो है खाद्यान
की स् स्थिति अच्छी हरित क्रांति है तो
हरित क्रांति में उन्नत बीजों का प्रयोग
करके खाद्यान का उत्पादन बढ़ाया गया और
1971 तक भारत खाद्यान के मामले में
आत्मनिर्भर हो गया
देखिए यहां समझने की आवश्यकता है कि
आखिरकार ऐसे कौन से कारण हैं जिसके चलते
जो मिट्टी के पोषक तत्व है घट रहे हैं या
मिट्टी की गुणवत्ता घट रही है और हम
लगातार बंजर होने की ओर बढ़ रहे हैं हम
मतलब हमारी जो जमीन है भारत की जमीन है वह
बंजर अगर यही स्थिति बनी रही तो आने वाले
कुछ सालों में जमीन बंजर होना शुरू हो
जाएगी बंजर यानी कुछ नहीं उत्पादन ही बंद
हो जाएगा तो वो हमारे लिए बहुत ही खतरनाक
स्थिति पैदा हो सकती है देखिए इसके कई
कारण है एक तो जो जमीन है जमीन का जिस
तेजी के साथ कटा होता है जैसे अब
पूर्वोत्तर के राज्यों में देखा जाए देखा
जाए या पहाड़ी क्षेत्रों में देखा जाए
सबसे ज्यादा असम में ब्रह्मपुत्र जो नदी
है वहां पर जो है जमीन का कटा होता है
इसके अलावा जो है जो पहाड़ी क्षेत्र है
हमारे चाहे वो उत्तराखंड के हो या जो है
पूर्वोत्तर राज्यों के हो वहां पर भी जमीन
का बहुत तेजी से कटा होता है और कटा होने
के चलते जो है जो उसके पोषक तत्व होते हैं
जो मिनरल्स होते हैं जमीन के वो पानी के
साथ बह जाते हैं और वो नदी में समुद्र में
जाकर के मिल जाते हैं तो ये एक बहुत
चिंताजनक बात है दूसरी बात जो
महत्त्वपूर्ण है वो यह है कि जिस तरीके से
औद्योगीकरण हुआ है और और जमीन में जो है
जो औद्योगिक जो इस तरीके के एलिमेंट्स है
वह छोड़े गए हैं जो भूमि को दूषित करते
हैं प्रदूषित करते हैं यह भूमि की
गुणवत्ता को जमीन की गुणवत्ता को घटा हैं
ये एक कारण है दूसरा कारण है पौधों का या
वनों का जो काटना लगातार जो पेड़ों की
कटाई हो रही है उसके चलते भी जो है जमीन
की गुणवत्ता घटी है देखिए एक जो मिट्टी के
विज्ञानी है मृदा विज्ञानी एे विश्वास
उनका कहना है कि किसी भी पौधे को विकसित
होने के लिए 17 गुणों की आवश्यकता होती है
और 17 में से जो 14 जो है मिनरल्स हैं वो
मिट्टी से ही पौधे को मिलते हैं सिर्फ तीन
मिनरल्स ऐसे हैं जो हवा धूप और जो है पानी
से मिलते हैं कहने का मतलब कि मिट्टी में
खुद पोषक तत्व विद्यमान होते हैं जो जो है
उसकी किसी भी फसल की उत्पादकता पौधों की
उत्पादकता को बढ़ाते हैं जो हमारे लिए
बहुत ही आवश्यक है देखिए यह फैक्ट है कि
जमीन की ढाई इंच जो लेयर तैयार होती है
उसको बनने में सैकड़ों वर्ष लग जाते
हैं ऐसी स्थिति में जिस तरीके से क्लाइमेट
चेंज हो रहा है क्लाइमेट चेंज लगातार जो
है जमीन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रहा
है अत्यधिक वर्षा हो रही है जलवायु जो
परिवर्तन हो रहा है उसके चलते अत्यधिक
गर्मी होना अत्यधिक सर्दी होना इनकी जो
अवधि है उसमें भी परिवर्तन हो चुका है
अत्यधिक बारिश होने से जमीन का कटाव अधिक
होता है और कहीं सूखा की स्थिति पैदा हो
जाती है तो ये जो जलवायु परिवर्तन है
जलवायु
परिवर्तन की वजह से जो है जो मिट्टी में
आर्गेनिक कार्बन है उसकी मात्रा जो कम हो
रही है और पराली एक बहुत बड़ा कारण है जिस
तरीके से खेतों में पराली को जला दिया
जाता है उसके चलते भी ऑर्गेनिक कार्बन जो
तत्व है जो मिट्टी की उत्पादकता को या
उसके पोषक तत्त्वों को बरकरार रखता है
जिसके लिए बहुत आवश्यक है उसकी कमी हो
जाती है तो ये जो क्लाइमेट चेंज है वो और
इसके अलावा जिस तरीके से अंधाधुन तरीके से
किसान उत्पादकता बढ़ाने के लिए रासायनिक
जो है उर्वर का इस्तेमाल करते हैं उस वो
भी जो है उसको प्रभावित कर रहा है तो कई
ऐसे कारण है जिस पर बहुत गंभीरता से विचार
करने की आवश्यकता है देखिए किसान को
उत्पादन अधिक चाहिए मतलब चकि मैं जैसा कि
मैंने बता है कि बहुत छोटे-छोटे जमीन के
टुकड़े हैं किसानों के पास तो उनके लिए
उनके समक्ष भी बहुत बड़ा एक चैलेंज होता
है कि किस तरीके से ज्यादा से ज्यादा उपज
लेकर के वो अपने परिवार का भरण पोषण कर
पाएं तो चुनौती तो तो है लेकिन उस चुनौती
के बीच में ही हमें ऐसा रास्ता निकालना
होगा कि जमीन की जो उत्पादकता है जमीन की
जो गुणवत्ता है वो भी ना प्रभावित हो और
हमारा जो है उत्पादन भी ठीक रहे तो उसके
लिए क्या करना होगा छोटे-छोटे प्रयास हैं
जो खाली सरकार को नहीं सरकार को तो प्रयास
करना ही चाहिए कि चेक डैम बनाए और पानी को
रोकने के लिए मतलब इस तरीके के उपाय किए
जाने चाहिए कि डैम बनाना चाहिए और जहां
पहाड़ी इलाका है वहां पर जो है सीढ़ीनुमा
खेती की जानी चाहिए और इसके अलावा जो
रासायनिक खाद है जिनका हम अंधाधुन तरीके
से इस्तेमाल करते हैं वो हमें उस पर विचार
करना चाहिए और जो नेचुरल खाद है जो मतलब
नेचुरल तरीके से तैयार की जा सकती है जैसे
गोबर से जो है पत्तियों से पराली से कचरे
से उससे हमें खाद बनानी चाहिए और उस खाद
को मिट्टी में मिलाना चाहिए ताकि जो है हम
एकदम तात्कालिक तौर पर जो है तो उत्पादन
प्राप्त कर लेते हैं जब रासायनिक खादों का
इस्तेमाल करते हैं तो हमें अ तुरंत तो
हमें अच्छी फसल मिल जाती है लेकिन हमें ये
भी देखना है कि कहीं ऐसा ना हो कि हम
लगातार जो है पराली जलाते रहे लगातार
अंधाधुन तरीके से हम रासायनिक उर्वरक का
प्रयोग करते रहे तो हमारी कहीं ऐसा ना हो
कि ये जो जमीन है बंजर हो जाए और फिर आने
वाली पीढ़ी को हम कुछ दे ना पाएं तो इसके
लिए आवश्यक है कि हम यह करें और एक काम और
किया जा सकता है कि आज यह समय जो है
आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का है तो एआई
तकनीक का भी इस्तेमाल हम जमीन की जो पोषक
तत्व है उनको बरकरार रखने के लिए कर सकते
हैं मैं यहां पर एक उदाहरण देना
चाहूंगा कि वेलर इंस्टिट्यूट ऑफ
टेक्नोलॉजी है चेन्नई में जहां के
विद्यार्थियों ने एक एआई एनेबल टेक्नीक
तैयार की है जिसके माध्यम से व कीट पतंगों
का पता लगा सकते हैं और इसी तरीके से
थोड़ा और यदि रिसर्च किया जाए अनुसंधान
किया जाए तो हम किस तरीके से जमीन में और
जो है पोषक तत्त्वों को ऐड कर सकते हैं और
जो पोषक तत्व पहले से विद्यमान है उनको
कैसे बचाए रख सकते हैं उस पर हम काम कर
सकते हैं मेरा मानना है कि सरकार जो
एफर्ट्स कर रही है प्रयास कर रही है वो तो
ठीक है लेकिन
हम अपनी मातृभूमि के प्रति जो जवाबदेही है
उससे हम बच नहीं सकते ना हमें बचना चाहिए
और उसकी सुरक्षा के लिए हमें अपने
छोटे-छोटे योगदान करना चाहिए कहीं ऐसा ना
हो कि आज यह जो हमारी मातृभूमि है जो
पृथ्वी है हमें हमारा जो भरण पोषण कर रही
है हमें जो खाने के लिए अनाज दे रही है
हमारा जो संरक्षण कर रही हो कर रही है
कहीं ऐसा ना हो कि हम हमें वो सब मिलना
बंद हो जाए और हम हमारा ही मानव का ही ही
अस्तित्व संकट में पड़ जाए आज के लिए बस
इतना ही फिर मिलते हैं एक नए मुद्दे के
साथ