Speech Idea On Ambedkar Jayanti: अंबेडकर जयंती पर आसान और प्रभावशाली भाषण
Ambedkar Jayanti पर भाषण प्रतियोगिता के लिए खोज रहे हैं आसान और प्रभावशाली भाषण? जानिए डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन, विचारों और उनके आदर्शों पर आधारित एक प्रेरणादायक भाषण, जो कार्यक्रम में आपकी प्रस्तुति को खास बना देगा
Ambedkar Jayanti Speech Idea: बाबासाहेब के नाम से लोकप्रिय डॉ. भीमराव अंबेडकर भारतीय समाज के एक ऐसे महान व्यक्तित्व थे, जिन्होंने अपने विचारों और कार्यों से इतिहास में अमिट छाप छोड़ी। वे न केवल संविधान निर्माता थे बल्कि एक दूरदर्शी विचारक, समाज सुधारक, विधिशास्त्र के ज्ञाता, कुशल अर्थशास्त्री, प्रखर वक्ता, पत्रकार और संपादक भी थे। हर साल 14 अप्रैल को देशभर में उनकी जयंती को सम्मानपूर्वक मनाया जाता है। इस दिन अनेक शैक्षणिक संस्थानों और सरकारी कार्यालयों में अवकाश भी घोषित किया जाता है।
इसके अलावा, उनकी जयंती पर कई कार्यक्रमों में भाषण प्रतियोगिताओं का भी आयोजन किया जाता है। अगर आपने भी किसी भाषण प्रतियोगिता में भाग लिया है, तो यहां डॉ. भीमराव अंबेडकर के जीवन पर आधारित एक प्रभावशाली भाषण दिया गया है। आप इसके आधार पर अपना भाषण तैयार कर सकते हैं।
डॉ. भीमराव अंबेडकर के बारे में
Speech Idea On Ambedkar Jayanti: अंबेडकर जयंती पर आसान और प्रभावशाली भाषण
यहां उपस्थित सभी सम्माननीय शिक्षकगण, आदरणीय अतिथियों, मंच पर विराजमान गणमान्य व्यक्तियों और मेरे प्रिय साथियों को मेरा सादर नमस्कार।
आज हम सब एक अत्यंत विशेष अवसर पर एकत्रित हुए हैं— भारत के संविधान निर्माता, सामाजिक क्रांति के अग्रदूत, महान विचारक और प्रेरणास्तंभ डॉ. भीमराव अंबेडकर की जयंती पर उन्हें श्रद्धांजलि देने के लिए।
बाबासाहेब, जैसा कि हम उन्हें स्नेहपूर्वक कहते हैं, सिर्फ एक नाम नहीं, बल्कि एक विचारधारा हैं। वे समाज सुधारक थे, कुशल विधिवेत्ता, अर्थशास्त्री, शिक्षाविद, और पत्रकार भी। उन्होंने अपना सम्पूर्ण जीवन उन लोगों के अधिकारों के लिए समर्पित किया जिन्हें समाज ने लंबे समय तक नजरअंदाज किया।
साथियों, डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू नामक स्थान पर हुआ था। वे एक ऐसे समुदाय से ताल्लुक रखते थे जिसे उस समय समाज में ‘अछूत’ कहा जाता था। लेकिन बाबासाहेब ने इस भेदभाव को चुनौती दी, शिक्षा को अपना हथियार बनाया, और न केवल खुद आगे बढ़े बल्कि पूरे दलित समुदाय को एक नई दिशा दी।
वे कहते थे— "शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो", इसी मंत्र के साथ उन्होंने दलितों, महिलाओं और श्रमिक वर्ग के अधिकारों के लिए आजीवन संघर्ष किया।
साथियों, यह गर्व की बात है कि आज भारत का जो संविधान है, उसकी नींव बाबासाहेब ने रखी थी। उन्होंने स्वतंत्र भारत के पहले कानून मंत्री के रूप में कार्य किया और न्याय, समानता और स्वतंत्रता के सिद्धांतों को कानून के रूप में स्थापित किया। इस योगदान के लिए उन्हें मरणोपरांत भारत रत्न से सम्मानित किया गया।
उन्होंने जातिवाद, छुआछूत और सामाजिक असमानता के विरुद्ध लड़ाई लड़ी। वे ऐसे धर्म में विश्वास करते थे जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा सिखाए। वे कहा करते थे—"मैं ऐसे धर्म को मानता हूं जो स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व की शिक्षा देता है।"
बाबासाहेब ने बॉम्बे यूनिवर्सिटी से अपनी पढ़ाई की और 22 साल की उम्र में अमेरिका जाकर कोलंबिया यूनिवर्सिटी से एम.ए. और पीएचडी की उपाधि प्राप्त की। उन्होंने न केवल संविधान बनाया बल्कि 'मूकनायक', 'बहिष्कृत भारत' और 'जनता' जैसे अखबारों के माध्यम से लोगों को जागरूक किया।
उन्होंने 1936 में लेबर पार्टी की स्थापना की और श्रमिकों के हित में कई कदम उठाए। श्रम सुधारों में उनकी भूमिका ऐतिहासिक रही है।
साथियों, अंबेडकर जयंती केवल एक जन्मतिथि नहीं है, यह एक संकल्प दिवस है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हम भी समाज में समानता, न्याय और समावेश के लिए काम करें।
आइए आज हम सभी यह प्रण लें कि हम डॉ. अंबेडकर के सिद्धांतों और आदर्शों को अपने जीवन में उतारेंगे। हम किसी भी प्रकार के भेदभाव का विरोध करेंगे और समाज को एक बेहतर दिशा देने में अपना योगदान देंगे।
आज हम सब एक महान व्यक्तित्व की जयंती मनाने के लिए एकत्रित हुए हैं—डॉ. भीमराव अंबेडकर, जिन्हें हम स्नेहपूर्वक बाबासाहेब के नाम से जानते हैं। वे भारत के संविधान निर्माता, समाज सुधारक, प्रखर विचारक और दलितों के अधिकारों की आवाज थे।
डॉ. अंबेडकर का जन्म 14 अप्रैल 1891 को मध्यप्रदेश के महू नगर में हुआ था। वे उस समय के समाज में 'अछूत' कहे जाने वाले समुदाय से थे। लेकिन उन्होंने सामाजिक भेदभाव को चुनौती दी और शिक्षा को अपना सबसे बड़ा हथियार बनाया। उन्होंने कहा था—"शिक्षित बनो, संगठित रहो और संघर्ष करो", और इसी विचार को उन्होंने अपने जीवन में उतारा।
बाबासाहेब ने बॉम्बे विश्वविद्यालय से स्नातक की डिग्री प्राप्त की और फिर उच्च शिक्षा के लिए अमेरिका की कोलंबिया यूनिवर्सिटी और इंग्लैंड की लंदन स्कूल ऑफ इकोनॉमिक्स से एम.ए. और पीएचडी की उपाधियाँ प्राप्त कीं। वे पहले भारतीय थे जिन्होंने विदेश जाकर इतने उच्च स्तर की शिक्षा प्राप्त की।
उन्होंने न केवल संविधान निर्माण में अहम भूमिका निभाई बल्कि अपने विचारों और लेखन के माध्यम से समाज को दिशा दी। उन्होंने 'मूकनायक', 'बहिष्कृत भारत' और 'जनता' जैसे पत्रों का संपादन किया और दलित समाज को जागरूक करने का कार्य किया।
डॉ. अंबेडकर ने महिलाओं, श्रमिकों और पिछड़े वर्गों के लिए कई महत्वपूर्ण कदम उठाए। उन्होंने 1936 में इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की स्थापना की और श्रमिकों के अधिकारों के लिए आवाज़ उठाई। वे भारत के पहले कानून मंत्री बने और देश को एक ऐसा संविधान दिया जिसमें न्याय, स्वतंत्रता, समानता और बंधुत्व के मूल सिद्धांत निहित हैं।
उनका मानना था कि धर्म ऐसा होना चाहिए जो स्वतंत्रता, समानता और भाईचारा की शिक्षा दे। इसी सोच के साथ उन्होंने जीवन के अंतिम समय में बौद्ध धर्म अपनाया।
साथियों, अंबेडकर जयंती सिर्फ उनके जन्मदिन को याद करने का दिन नहीं है, बल्कि यह दिन हमें उनके विचारों को अपनाने और समाज में समानता और न्याय की स्थापना का संकल्प लेने का दिन है।
आइए, आज हम सभी यह प्रतिज्ञा लें कि हम डॉ. अंबेडकर के दिखाए मार्ग पर चलेंगे, भेदभाव से दूर रहेंगे और सबके लिए समान अवसरों वाली समाज की रचना में अपना योगदान देंगे।
जय भीम। जय भारत। धन्यवाद।
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