ऋषिकेश: स्कूल में 'तिलक' हटाने की घटना से विवाद, स्कूल प्रशासन ने मांगी माफी
ऋषिकेश के एक निजी धर्मार्थ ट्रस्ट द्वारा संचालित स्कूल में कक्षा आठवीं की छात्रा से 'तिलक' हटाने की मांग ने विवाद खड़ा कर दिया है। बुधवार को घटी इस घटना के बाद छात्रा के माता-पिता और स्थानीय संगठनों ने स्कूल प्रशासन के खिलाफ कड़ा विरोध जताया, जिसके परिणामस्वरूप प्रशासन को माफी मांगनी पड़ी।
सूत्रों के अनुसार, स्कूल के एक शिक्षक ने छात्रा को उसके माथे पर लगे 'तिलक' को हटाने का निर्देश दिया। शिक्षक का दावा था कि स्कूल के नियमों के तहत 'तिलक' लगाने की अनुमति नहीं है। शिक्षक के निर्देश पर छात्रा ने तिलक तो हटा दिया, लेकिन इस घटना ने उसे मानसिक रूप से आहत कर दिया।
जब छात्रा ने घर लौटकर अपने माता-पिता को घटना के बारे में बताया, तो उन्होंने स्कूल प्रशासन से इसका स्पष्टीकरण मांगा। स्थानीय संगठनों ने भी इस मुद्दे को धार्मिक भावनाओं से जोड़ते हुए विरोध प्रदर्शन किया।
बढ़ते दबाव के बाद, स्कूल प्रशासन ने अपने कदम को गलती मानते हुए सार्वजनिक रूप से माफी मांगी। प्रशासन ने यह भी स्पष्ट किया कि भविष्य में इस तरह की घटनाएं नहीं दोहराई जाएंगी।
इस घटना ने स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों के प्रति सहिष्णुता और उनके महत्व पर एक बार फिर बहस छेड़ दी है। स्थानीय लोगों का कहना है कि इस तरह की घटनाएं छात्रों पर नकारात्मक प्रभाव डालती हैं और सांस्कृतिक मूल्यों को ठेस पहुंचाती हैं।
सोशल मीडिया पर लोगों की प्रतिक्रिया: 'तिलक' विवाद पर आक्रोश और बहस
ऋषिकेश के एक स्कूल में छात्रा से 'तिलक' हटाने की घटना ने लोगों की भावनाओं को झकझोर दिया है। सोशल मीडिया से लेकर स्थानीय स्तर पर, इस मुद्दे पर लोगों की तीखी प्रतिक्रियाएं सामने आई हैं।
देवभूमि में साजिश बर्दाश्त के बाहर
स्थानीय निवासियों का कहना है कि देवभूमि उत्तराखंड में ऐसी घटनाएं किसी साजिश का हिस्सा लगती हैं। एक व्यक्ति ने कहा,
"देवभूमि उत्तराखंड में ऐसी साज़िश बर्दाश्त के बाहर हैं। सरकार को इस स्कूल पर कड़ी कार्रवाई करनी चाहिए।"
धार्मिक भेदभाव और दोहरे रवैये का आरोप
कुछ लोगों ने सवाल उठाया कि अगर मुस्लिम महिलाओं को हिजाब पहनकर स्कूल में प्रवेश दिया जा सकता है, तो हिंदू छात्राओं के लिए तिलक लगाने पर रोक क्यों? एक यूजर ने गुस्से में लिखा,
"मुस्लिम महिलाओं को हिजाब में एंट्री दी जाती है, आखिर दोहरा रवैया क्यों? हर किसी को अधिकार है कि वो क्या पहनना चाहता है।"
स्कूल प्रशासन की निंदा
कई लोगों ने स्कूल प्रशासन की आलोचना करते हुए कहा कि तिलक हटाना धार्मिक स्वतंत्रता का उल्लंघन है। एक अन्य व्यक्ति ने सोशल मीडिया पर लिखा,
"किस-किस को लगता है कि स्कूल प्रशासन ने गलत किया? ✅✅"
हिंदू पहचान और तिलक का महत्व
कुछ लोगों ने इसे हिंदू धर्म और भारतीय संस्कृति पर सीधा हमला बताया। एक यूजर ने आक्रोश व्यक्त करते हुए लिखा,
"किसी की ताकत नहीं जो हम हिंदुओं के माथे से तिलक हटवा दे। ????????????????"
वहीं, एक अन्य ने तिलक के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा,
"तिलक भारत की पहचान है। इसे हर जगह अनुमति मिलनी चाहिए। ????????"
शिक्षकों की भूमिका पर सवाल
घटना के बाद शिक्षकों की भूमिका पर भी सवाल उठाए जा रहे हैं। एक व्यक्ति ने लिखा,
"एक शिक्षक होकर दूसरे धर्म के प्रति ऐसी भावना रखना गलत है। शिक्षकों को सभी धर्मों का आदर करना चाहिए और छात्रों में सहिष्णुता का संदेश देना चाहिए।"
सरकार और समाज से अपील
लोगों ने राज्य सरकार और शिक्षा विभाग से इस घटना पर सख्त कदम उठाने की मांग की है। साथ ही, भारतीय संस्कृति और धर्मनिरपेक्षता को बनाए रखने की अपील की है।
इस घटना ने एक बार फिर यह सवाल खड़ा कर दिया है कि क्या शिक्षा के नाम पर धार्मिक भावनाओं को अनदेखा किया जा सकता है? समाज में सभी धर्मों और परंपराओं के प्रति समान दृष्टिकोण अपनाने की आवश्यकता पर जोर दिया जा रहा है।
इस तरह के देश भर से जुड़े कैसे उनके बारे में
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देश में स्कूलों में धार्मिक प्रतीकों या परंपराओं को लेकर विवाद कोई नया मामला नहीं है। ऋषिकेश की 'तिलक' घटना से पहले भी देश के विभिन्न हिस्सों में इस तरह के विवाद सामने आए हैं। यहां कुछ प्रमुख घटनाओं का उल्लेख किया गया है:
1. कर्नाटक: हिजाब विवाद (2022)
कर्नाटक के कई सरकारी स्कूलों और कॉलेजों में छात्राओं के हिजाब पहनने पर रोक लगाने का विवाद राष्ट्रीय स्तर पर चर्चा का विषय बना। स्कूल प्रशासन ने दावा किया कि ड्रेस कोड का पालन करना अनिवार्य है, जिसके बाद हिजाब पहनने वाली कई छात्राओं को कक्षाओं में प्रवेश करने से रोका गया। इस मुद्दे ने धार्मिक और राजनीतिक माहौल को गर्मा दिया था और मामला अंततः उच्च न्यायालय तक पहुंचा।
2. मध्य प्रदेश: बिंदी और राखी विवाद (2021)
भोपाल के एक निजी स्कूल में छात्राओं को बिंदी लगाने और राखी पहनने पर रोक लगाने की घटना सामने आई। स्कूल प्रशासन ने इसे अनुशासनात्मक कदम बताया, लेकिन माता-पिता और स्थानीय संगठनों ने इसे धार्मिक भावनाओं का अपमान करार दिया। विरोध बढ़ने पर स्कूल को अपने नियम बदलने पड़े।
3. उत्तर प्रदेश: गीता पाठ पर विवाद (2023)
उत्तर प्रदेश के एक स्कूल में गीता पाठ को अनिवार्य बनाए जाने पर मुस्लिम समुदाय ने आपत्ति जताई। उनका कहना था कि यह कदम धार्मिक स्वतंत्रता के खिलाफ है। हालांकि स्कूल ने इसे नैतिक शिक्षा का हिस्सा बताया, लेकिन यह मामला धार्मिक असहिष्णुता का मुद्दा बन गया।
4. केरल: क्रॉस और धार्मिक प्रतीक (2020)
केरल में एक ईसाई मिशनरी स्कूल में हिंदू छात्रों द्वारा पूजा के दौरान रखे धार्मिक प्रतीकों को पहनने पर आपत्ति जताई गई। इस घटना ने छात्रों और अभिभावकों के बीच गहरा तनाव पैदा कर दिया। प्रशासन ने सभी धार्मिक प्रतीकों पर प्रतिबंध लगाने की घोषणा की, जिससे विवाद और बढ़ गया।
5. महाराष्ट्र: मंगलसूत्र और धार्मिक आभूषण (2019)
महाराष्ट्र के पुणे में एक स्कूल ने छात्राओं को मंगलसूत्र और अन्य धार्मिक आभूषण पहनने पर रोक लगाई। प्रशासन का तर्क था कि यह ड्रेस कोड के खिलाफ है। इस कदम पर व्यापक विरोध हुआ और बाद में प्रशासन को अपना फैसला वापस लेना पड़ा।
6. तमिलनाडु: पवित्र भस्म और तिलक (2018)
तमिलनाडु के एक स्कूल में छात्रों को तिलक और भस्म लगाने पर स्कूल परिसर में प्रवेश से रोका गया। स्कूल ने इसे सेक्युलर शिक्षा नीति का हिस्सा बताया, लेकिन अभिभावकों और संगठनों ने इसे धार्मिक भेदभाव के रूप में देखा।
आम सवाल और चिंताएं:
- ड्रेस कोड बनाम धार्मिक स्वतंत्रता: स्कूलों का तर्क है कि वे छात्रों के लिए समानता सुनिश्चित करने के लिए ड्रेस कोड लागू करते हैं, लेकिन यह अक्सर धार्मिक स्वतंत्रता के साथ टकराता है।
- मनोवैज्ञानिक प्रभाव: इस तरह की घटनाओं से छात्रों के मानसिक स्वास्थ्य पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है।
- समाज में विभाजन: धार्मिक प्रतीकों को लेकर विवाद न केवल स्कूल परिसर तक सीमित रहते हैं, बल्कि समाज में भी दरार पैदा करते हैं।
भारत जैसे विविधतापूर्ण देश में, जहां हर धर्म और संस्कृति को सम्मान देने की परंपरा है, इस तरह के विवाद चिंता का विषय बन जाते हैं। विशेषज्ञों का मानना है कि स्कूलों को ड्रेस कोड के साथ-साथ धार्मिक सहिष्णुता पर भी ध्यान देना चाहिए ताकि छात्रों की धार्मिक स्वतंत्रता और मानसिक विकास दोनों को सुरक्षित रखा जा सके।