रोजगार के नाम पर बचपन बेचती प्लेसमेंट एजेंसियां - राम जी तिवारी
Placement agencies sell childhood in the name of employment रोजगार के नाम पर बचपन बेचती प्लेसमेंट एजेंसियां
रोजगार के नाम पर बचपन बेचती प्लेसमेंट एजेंसियां
लेखक- राम जी तिवारी - वरिष्ठ पत्रकार
हर साल 30 जुलाई को ह्यूमन ट्रैफिकिंग यानी मानव दुर्व्यापार के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय दिवस मनाया जाता है, जिसका उद्देश्य इस गंभीर अपराध के बारे में जागरूकता फैलाना और इसके प्रभाव को कम करना है। यह दिन दुनिया भर में इस मुद्दे की गंभीरता को समझने और पीड़ितों के लिए न्याय की ओर एक कदम बढ़ाने का प्रयास करता है। यह दिन हमें याद दिलाता है कि भारत जैसे विकासशील देश में ह्यूमन ट्रैफिकिंग एक बड़ी समस्या बन चुकी है। खासकर बच्चों की ट्रैफिकिंग एक भयावह अपराध है। हर साल हजारों बच्चे अपने घरों से गायब होते हैं, और इन बच्चों में अधिकतर कभी वापस नहीं आते। ऐसे बच्चों को न केवल शारीरिक रूप से प्रताड़ित किया जाता है, बल्कि मानसिक और भावनात्मक शोषण भी सहना पड़ता है।
ह्यूमन ट्रैफिकिंग दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा संगठित अपराध है और भारत इस अपराध के एक प्रमुख केंद्रों में से एक है। खासकर हाशिए और गरीब परिवारों के बच्चों को, मजदूरी, बाल विवाह, वेश्यावृत्ति और वेश्यालयों में शोषण के लिए नियमित रूप से ट्रैफिकिंग के जरिए एक राज्य से दूसरे राज्य लाया जाता है। ट्रैफिकिंग गिरोह परिवारों की कमजोर स्थिति का लाभ उठाकर उनके बच्चों को निशाना बनाते हैं।
ह्यूमन ट्रैफिकिंग का एक और स्वरूप है जिसकी ज्यादा चर्चा नहीं होती और वह है नाबालिग लड़कियों और लड़कों को शहरी घरों में घरेलू कामगारों के रूप में रखना। इसके पीछे प्लेसमेंट एजेंसियों का एक फलता-फूलता नेटवर्क है, जिनमें से कुछ पंजीकृत हैं लेकिन ज्यादातर अवैध हैं, जो एक रैकेट की तरह बिचौलियों का काम करते हैं। वे बच्चों को बड़े शहरों में एक बेहतर जीवन देने का वादा कर जाल में फंसाते हैं। लेकिन बच्चों को मिलता है वह है शोषण, दुर्व्यवहार और नारकीय जीवन।
असम, झारखंड, छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल और ओड़ीशा के आदिवासी इलाके लंबे समय से ट्रैफिकिंग के केंद्र रहे हैं। ये ऐसे क्षेत्र हैं जहां गरीबी, शिक्षा का अभाव और जागरूकता की कमी परिवारों को विशेष रूप से असुरक्षित बनाती है। ऐसी जगहों पर, ट्रैफिकर को आसान शिकार मिल जाता है। बेहतर ज़िंदगी का वादा और अच्छी सैलरी के रूप में नियमित आमदनी का लालच अक्सर माता-पिता को अपने बच्चों को जाने देने के लिए राजी करने के लिए काफी होता है। कई लोगों को बताया जाता है कि उनके बेटे-बेटियां बड़े शहरों में साफ़-सुथरे, सुरक्षित घरों में काम करेंगे, उनकी देखभाल की जाएगी, वे पैसे कमाएंगे और स्कूल भी जाएंगे। लेकिन यह भ्रम जल्दी ही टूट जाता है। इसके बाद कठोर श्रम, दुर्व्यवहार और एक खोया हुआ बचपन होता है।
बाल अधिकारों की सुरक्षा व संरक्षण के लिए काम करने वाले संगठनों के देश के सबसे बड़े नेटवर्क जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन अपने सहयोगी एसोसिएशन फॉर वालंटरी एक्शन (एवीए), ऐसे बच्चों को बचाने के लिए कानून प्रवर्तन एजेंसियों के साथ काम कर रहा है। एवीए ने पिछले तीन वर्षों से रेलवे सुरक्षा बल (आरपीएफ) के साथ एक समझौता (एमओयू) किया है, ताकि रेल के जरिए से ट्रैफिकिंग के इरादे से लाए जा रहे बच्चों को समय रहते बचाया जा सके। इसका बहुत ही उत्साहवर्धक परिणाम हासिल हो रहा है। अब तक सैकड़ों बच्चों को आरपीएफ ने ट्रैफिकिंग से मुक्त कराया है। उल्लेखनीय है कि जस्ट राइट्स फॉर चिल्ड्रेन बाल अधिकारों और बाल संरक्षण के लिए देश भर के 418 जिलों में 250 से अधिक सहयोगी संगठनों के साथ काम करता है।
दिल्ली-एनसीआर और दूसरे महानगर ट्रैखिकिंग करके लाए गए बच्चों को खपाने के लिए प्रमुख ठिकाने बन गए हैं। इसकी वजह है सस्ते और बिना किसी शिकायत के काम करने वालों की बढ़ती मांग। नियोक्ता अक्सर छोटी लड़कियों को काम पर रखना पसंद करते हैं, क्योंकि उनका मानना है कि बच्चे आसानी से काबू में रखे जा सकते हैं, वे शिकायत नहीं करेंगे, और वे कम कीमत पर उपलब्ध होते हैं, जैसा कि बाल सुरक्षा क्षेत्र के विशेषज्ञ बताते हैं। यह मांग ही ट्रैफिकिंग गिरोहों, प्लेसमेंट एजेंसियों और नियोक्ताओं के बीच एक गहरे शोषणकारी गठजोड़ को बनाए रखती है जो जवाबदेही और कानूनों पर अमल के अभाव में अनियंत्रित बना हुआ है।
दिल्ली-एनसीआर में कितनी प्लेसमेंट एजेंसियां काम करती हैं, इसका सटीक आंकड़ा अभी भी उपलब्ध नहीं है। लेकिन मीडिया रिपोर्ट्स बताती हैं कि यहां 10,000 से ज़्यादा अवैध और अपंजीकृत प्लेसमेंट एजेंसियां बेखौफ फल-फूल रही हैं। 2017 तक केवल लगभग 1,650 प्लेसमेंट एजेंसियां ही पंजीकृत थीं। यह सब दिल्ली उच्च न्यायालय द्वारा 2014 में पारित कार्यकारी आदेश के बावजूद है, जिसमें राजधानी में घरेलू नौकरियां प्रदान करने वाली निजी प्लेसमेंट एजेंसियों के पंजीकरण को अनिवार्य किया गया था।
हालांकि भारत में ह्यूमन ट्रैफिकिंग के खिलाफ कानून हैं, फिर भी देश को एक मजबूत और समग्र एंटी-ट्रैफिकिंग कानून की जरूरत है। भारत में अभी तक कोई व्यापक एंटी-ट्रैफिकिंग कानून नहीं है। इसके बिना, ट्रैफिकर बचते रहते हैं और पीड़ितों का उस तरह पुनर्वास नहीं हो पाता, जैसे होना चाहिए। बच्चों को ट्रैफिकिंग से बचा लेना ही पर्याप्त नहीं है। बचाव तो पहला कदम है, लेकिन जब तक हमारे कानून ऐसे नहीं होंगे कि दोषियों को सजा मिलना एक सामान्य बात बन जाए, तब तक बच्चों के खिलाफ यह घिनौना अपराध जारी रहेगा। बच्चों की ट्रैफिकिंग एक जघन्य अपराध है। इसे रोकने के लिए सरकार, समाज और नागरिक संगठनों को मिलकर सख्त कानूनों, जागरूकता अभियानों और त्वरित हस्तक्षेप के जरिए एकजुट कार्रवाई करनी होगी। केवल सामूहिक प्रयासों से ही हम इस गंभीर समस्या का समाधान निकाल सकते हैं और बच्चों को सुरक्षित भविष्य दे सकते हैं।