रावण वध से सीख: कल्याण के लिए कठोरता भी आवश्यक- मोहन भागवत
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धर्म का संतुलन ही मानवता का आधार : विचारमंथन में निकला निष्कर्ष
धर्म और अहिंसा का संतुलन ही समाज का वास्तविक आधार,
अहिंसा का अर्थ केवल सहनशीलता नहीं, धर्म की रक्षा भी है,
रावण वध से सीख: कल्याण के लिए कठोरता भी आवश्यक,
भारतीय दृष्टि: शत्रु में भी अच्छाई खोजने की परंपरा,
धर्म का मर्म: अत्याचार का प्रतिकार भी अहिंसा का रूप,
समाज में भले ही आज कई मतभेद और भेदभाव दिखाई देते हों, लेकिन विचारों का मंथन आवश्यक है, क्योंकि इसी से नवनीत अर्थात् सार निकलेगा और निष्कर्ष प्राप्त होंगे। यह बात स्पष्ट रूप से सामने आई कि आज हमारा जीवन जिन उच्च आदर्शों पर आधारित होना चाहिए, वह व्यवहार में नहीं झलकता। जबकि दुनिया को सिखाने के लिए हमारे पास ज्ञान और मूल्य प्रचुर मात्रा में हैं।
भारत के मूल स्वभाव में 'अहिंसा' को सर्वोच्च स्थान प्राप्त है। हमारी अहिंसा केवल स्वयं के संयम तक सीमित नहीं, बल्कि दूसरों को भी अहिंसक बनाने की दिशा में है। कुछ लोग हमारे उदाहरण से प्रेरित होकर सुधार सकते हैं, लेकिन कुछ ऐसे भी होंगे जो चाहे जितना प्रयास कर लें, फिर भी नहीं बदलेंगे और समाज में उपद्रव फैलाएंगे। ऐसे में समाज की रक्षा के लिए उचित कदम उठाना भी आवश्यक हो जाता है।
उदाहरण के लिए, रावण का वध केवल उसे समाप्त करने के लिए नहीं, बल्कि उसके कल्याण के लिए किया गया था। रावण शिव भक्त था, वेदों का ज्ञाता था, उत्तम शासक था — उसके पास एक आदर्श व्यक्ति बनने के सारे गुण थे। फिर भी, उसके मन, बुद्धि और शरीर की ऐसी प्रवृत्ति थी कि वह अच्छाई को ग्रहण नहीं कर सकता था। ऐसे में, उसका संहार कर उसे नए स्वरूप में जन्म लेने का अवसर देना ही उसका कल्याण था। इस संहार को हिंसा नहीं, बल्कि गहरी अहिंसा कहा गया है।
भारत की विचारधारा में विशेषता यह है कि यहां शत्रु को भी मात्र उसकी शत्रुता से नहीं, बल्कि उसके आचरण के आधार पर परखा जाता है। यदि कोई सुधर सकता है तो उसे सुधारने का प्रयास किया जाता है। यदि नहीं सुधर सकता तो उसके कल्याण के लिए कठोर उपाय किए जाते हैं।
पश्चिमी विचारधारा में शत्रुता और मित्रता के बीच संतुलन नहीं है — या तो पूर्ण मित्रता या पूर्ण विनाश। जबकि भारतीय दृष्टिकोण में संतुलन है। यहां चार पुरुषार्थ (धर्म, अर्थ, काम, मोक्ष) के सिद्धांत के अनुसार जीवन को संतुलित ढंग से जीने की शिक्षा दी गई है। यही दृष्टि गीता में भी दिखाई देती है, जहां अर्जुन को युद्ध में हिंसा के माध्यम से भी धर्म की रक्षा करने का उपदेश दिया गया।
आज हमें फिर से उसी संतुलन को समझने और अपने जीवन में उतारने की आवश्यकता है — जहां न केवल अपने कर्तव्यों का पालन हो, बल्कि समाज में अन्याय, अत्याचार और अनाचार का भी उचित उपचार किया जाए। राजा का धर्म है प्रजा की रक्षा करना और धर्म का मूल उद्देश्य है मानवता का कल्याण करना।