संस्कृति पर आक्रमण; पश्चिमी विचारधारा की बिसात

साहित्य अकादमी का एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर साहित्य अकादमी ने […] The post संस्कृति पर आक्रमण; पश्चिमी विचारधारा की बिसात appeared first on VSK Bharat.

Apr 5, 2026 - 19:48
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संस्कृति पर आक्रमण; पश्चिमी विचारधारा की बिसात

साहित्य अकादमी का एलजीबीटीक्यू लेखक सम्मेलन

साहित्य अकादमी द्वारा LGBTQ लेखक सम्मेलन का आयोजन एक गहरे वैचारिक विमर्श और टकराव का संकेत है। दुखद है कि यह सम्मेलन संस्कृति मंत्रालय, भारत सरकार के तत्वाधान में हो रहा है। संस्कृति मंत्रालय को देखना चाहिए कि क्या हमारी संस्कृति के सभी सिरमौर विषयों पर साहित्य अकादमी ने चर्चा सम्पन्न करा ली है? केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय को साहित्य आकादमी से पूछना होगा कि “भारतीय ज्ञान परंपरा की कितनी चर्चा और कितने लेखक सम्मेलन ‘साहित्य अकादमी’ ने करा लिए हैं? क्या हमारे सभी ज्वलंत और आवश्यक सांस्कृतिक प्रश्न उत्तर पा चुके हैं जो इस प्रकार के विषय को चर्चा केंद्र में रखने का निर्णय लिया गया? प्रश्न यह नहीं है कि किसी विषय पर चर्चा क्यों हो रही है, बल्कि यह है कि किन विषयों को प्राथमिकता दी जा रही है और उसके पीछे कौन-सी वैचारिक शक्तियाँ सक्रिय हैं?

हम एलजीबीटीक्यू के मौलिक अधिकारों के विरोध में नहीं हैं, किंतु इनके कंधों पर रखकर भारतीय मूल्यों, देशज अधिष्ठानों, हमारी सांस्कृतिक मान्यताओं पर जिस प्रकार बंदूक चलाई जा रही है, उसके विरोध में हैं। भारत में LGBTQ के माध्यम से वैचारिक नक्सलाइट्स बहुधा ही गंद फैलाते रहते हैं। यह उनके प्रति संवेदना के लिए नहीं, अपितु देश में अनावश्यक वितंडा खड़ा करने के लिए किया जाता है।

हमें यह देखना चाहिए कि वे कौन सी छिपी हुई शक्तियाँ हैं जो भारत में बालक, बालिकाओं के लिए एक से बाथरूम चाहती हैं? इस लेखक सम्मेलन का लक्ष्य केवल भारतीय परंपराओं पर तोप दागना ही तो होगा। गे और लेस्बियन सेक्स के ऊपर लेखक सम्मेलन में किस प्रकार की चर्चा आएगी, इसकी कल्पना से हृदय सिहर उठता है।

लेस्बियन, गे, बाइसेक्सुअल, ट्रांसजेंडर और क्वीर की चर्चा केंद्रीय संस्कृति मंत्रालय के तत्वाधान वाले, साहित्य अकादमी के आयोजन में आना एक खतरनाक वैचारिक विस्फोट है। यह वैचारिक बारूदी सुरंग है जो हमारे वैचारिक अधिष्ठान के नीचे लगातार बिछाई जा रही है।

ट्रांसजेंडर या किन्नर समाज के प्रति सदैव ही हमारे भारतीय समाज का, शास्त्रों का, ऋषि परंपरा का संवेदनशील मंतव्य रहा है। ये हमारी परंपराओं में स्थायी रूप से सम्मानपूर्वक बसे हैं। समय के साथ-साथ इनके विषय में आवश्यक निर्णय लिए जाने चाहिए, जो शासन से लेकर समाज तक लिए भी गए हैं। किंतु ट्रांसजेंडर के अतिरिक्त जो लोग हैं, इनका स्थान हमारे समाज में कहाँ होना चाहिए?

आज भारत में एक बड़ा वर्ग यह मानता है कि यह पूरा विमर्श तथाकथित “कल्चरल मार्क्सिज़्म” की रणनीति का हिस्सा है। इस विचारधारा का मूल उद्देश्य हमारे समाज की पारंपरिक संरचनाओं, परिवार, धर्म, संस्कृति और नैतिकता, को दुर्बल करना ही है। हमारी ऋषि परंपरा और सनातनी संस्कृति को हटाकर उनकी जगह एक नए प्रकार की वैचारिक संरचना स्थापित करना ही ऐसे आयोजनों का लक्ष्य होता है।

भारतीय संस्कृति की जड़ें अत्यंत गहरी और संतुलित हैं। यहाँ मनुष्य को केवल उसकी इच्छाओं या प्रवृत्तियों के आधार पर नहीं, बल्कि उसके धर्म, कर्तव्य और सामाजिक उत्तरदायित्व के आधार पर देखा गया है। ऋषि परंपरा ने जीवन को चार पुरुषार्थ – धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष – में संतुलित किया है। इस व्यवस्था में ‘काम’ मर्यादा और संतुलन के भीतर है, न कि उच्छृंखल अभिव्यक्ति के रूप में। ‘काम आनंद’ की एक परिपूर्ण परिभाषा, परिधि, प्रतीति, अभिव्यक्ति हमारे पास युगों से है। हमारी ‘विवाह संस्था’ को चोटिल करने का दुष्प्रयास है यह लेखक सम्मेलन। हमारी चिति पर यह नई विध्वंसक मान्यताएँ लादकर वैचारिक बलात्कार किया जा रहा है?

LGBTQ जैसे विषयों को जिस प्रकार से आज शो-ऑफ किया जा रहा है, वह भारतीय दृष्टिकोण से अधिक पश्चिमी अवधारणाओं से प्रेरित है। यह केवल व्यक्तिगत स्वतंत्रता का प्रश्न नहीं है, सामाजिक संरचना और सांस्कृतिक मूल्यों पर भी इसका प्रत्यक्ष दुष्प्रभाव पड़ता है। इस दुष्प्रभाव की चिंता करनी चाहिए।

यह एक महत्वपूर्ण तथ्य है कि देश में राजनीतिक स्तर पर परिवर्तन हुआ है और राष्ट्रीय विचारधारा को समर्थन मिला है। लेकिन क्या वास्तव में व्यवस्था बदली है? हमारी शासन व्यवस्था राष्ट्रीयता की उपेक्षा क्यों करती है? अनजाने में हमारी सत्ता क्यों पश्चिमी मूल्यों की पक्षधर बनकर खड़ी हो जाती है? यह एक गंभीर प्रश्न है।

कई उदाहरण संकेत देते हैं कि शैक्षणिक, सांस्कृतिक और साहित्यिक संस्थानों में अब भी वामपंथी विचारधारा का गहरा प्रभाव बना हुआ है। चाहे विश्वविद्यालयों के पाठ्यक्रम हों, इतिहास लेखन हो या साहित्यिक संस्थाओं के कार्यक्रम, बहुधा वही दृष्टिकोण प्रमुख होता है जो भारत की परंपरागत मान्यताओं से भिन्न है और उसके विरोध में है।

साहित्य अकादमी का निर्णय भी इसी व्यापक परिप्रेक्ष्य में देखा जा सकता है। प्रश्न स्वाभाविक है कि जब देश में ग्रामीण साहित्य, वेद-उपनिषद, भारतीय भाषाओं के संरक्षण, या राष्ट्रीय साहित्य को बढ़ावा देने की आवश्यकता है, तब LGBTQ जैसे विषय को प्राथमिकता क्यों दी जा रही है?

भारत का “कथित बुद्धिजीवी” वर्ग सदैव ही स्वयं को प्रगतिशील और उदारवादी बताता है, लेकिन इसके विचारों में एक स्पष्ट झुकाव वामपंथी सोच की ओर होता है। यह वर्ग भारतीय परंपराओं को पिछड़ा बताने में संकोच नहीं करता, जबकि पश्चिमी विचारों को आधुनिकता का प्रतीक मानता है। यह वही वर्ग है जो रामायण और महाभारत पर प्रश्न उठाता है। यह वर्ग परंपरागत परिवार व्यवस्था को चुनौती देता है। यह वर्ग भारतीय संस्कृति को “पितृसत्तात्मक” या “रूढ़िवादी” कहकर खारिज करने का प्रयास करता है।

LGBTQ लेखक सम्मेलन जैसे आयोजन इनके लिए केवल साहित्यिक मंच नहीं, बल्कि एक वैचारिक विध्वंस और बारूदी सुरंग फैला देने का माध्यम है। कल्चरल मार्क्सिज्म की अवधारणा कहती है कि यदि किसी समाज को बदलना है, तो उसकी संस्कृति को बदलें। भारत में यह प्रक्रिया धीरे-धीरे विभिन्न माध्यमों से चल रही है, फिल्मों, वेब सीरीज, शिक्षा और अब साहित्यिक मंचों के माध्यम से। इनका सीधा सा उद्देश्य है — हमारे पारंपरिक मूल्यों को “पुराना” और “अप्रासंगिक” साबित करना, नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से दूर करना, और जड़विहीन पहचान निर्मित करना।

डॉ. प्रवीण दाताराम गुगनानी,

क्षेत्र महामंत्री अखिल भारतीय साहित्य परिषद्

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