अब नहीं पनपेंगे माओवादी

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का मॉड्यूल अभी भी सक्रिय है। नक्सलवाद-माओवाद के ख़ूनी पंजों ने चारों ओर कैसे दहशत फैला रखी थी? उसकी गवाह हर वो तारीख है, जब-जब हमारे वीर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में, बस्तर में सुख-शांति के […] The post अब नहीं पनपेंगे माओवादी appeared first on VSK Bharat.

Apr 10, 2026 - 08:41
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अब नहीं पनपेंगे माओवादी

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

सशस्त्र माओवादी आतंक का खात्मा हो गया है। लेकिन अर्बन नक्सलियों का मॉड्यूल अभी भी सक्रिय है। नक्सलवाद-माओवाद के ख़ूनी पंजों ने चारों ओर कैसे दहशत फैला रखी थी? उसकी गवाह हर वो तारीख है, जब-जब हमारे वीर जवानों ने माओवादियों से लोहा लिया। छत्तीसगढ़ के कोने-कोने में, बस्तर में सुख-शांति के लिए अपना बलिदान दिया।

ऐसी ही इतिहास की एक तारीख़ है 6 अप्रैल, 2010…जब दंतेवाड़ा में माओवादी आतंकियों ने सीआरपीएफ की 62वीं बटालियन पर घात लगाकर हमला किया था। सुकमा (तत्कालीन दंतेवाड़ा) के चिंतागुफा, ताड़मेटला के पास माओवादियों ने क्रूरता की अति कर दी थी। लेकिन जवानों का हौसला कम नहीं था। माओवादियों के साथ हुए संघर्ष में 76 जवानों ने अपना बलिदान दिया था। CRPF ने वीर बलिदानियों को याद करते हुए लिखा – “हमारे 75 श्रेष्ठ जवानों ने 6 घंटे तक चले भीषण संघर्ष में 7 माओवादियों को ढेर किया और 8 को घायल किया, इसके बाद उन्होंने अपने प्राणों का सर्वोच्च बलिदान दिया। 500 से अधिक भारी हथियारों से लैस माओवादियों और सैकड़ों IEDs से घिरे होने के बावजूद – जो लगभग हर उस स्थान पर लगाए गए थे, जहाँ हमारे जवान शरण लेकर जवाबी कार्रवाई कर सकते थे। उनका साहस अद्वितीय और अविस्मरणीय था। हमारे कुछ वीरों ने अपने साथियों की रक्षा करने और दुश्मन को निष्क्रिय करने के लिए ग्रेनेड पर लेटकर सर्वोच्च बलिदान दिया। अंतिम क्षणों में भी वीर सैनिकों ने अपने हथियार अपने नीचे छिपा लिए।”

इस क्रूर हमले का मास्टरमाइंड माडवी हिड़मा था। इस घटना के बाद जेएनयू में अर्बन नक्सलियों ने जश्न मनाया था। दंतेवाड़ा क्षेत्र में हमले के समय डीआईजी रहे आईपीएस कल्लूरी ने जेनएयू में जश्न की चर्चा करते हुए कहा था – “मुझे काफी दुःख पहुँचा था, जब मुझे यह पता चला कि जेनएयू में (कुछ विद्यार्थियों द्वारा) ताड़मेटला में 76 बलिदानी जवानों के बलिदान का जश्न मनाया गया।”

कांकेर सहित अलग-अलग इलाकों में अर्बन नक्सलियों ने जश्न मनाया था।‌ घटना वाले दिन से अगले 19 दिन तक अरुंधति राय दंतेवाड़ा में रुकीं। उन्होंने एक रिपोर्ट बनाई थी,  जो सेना, प्रशासन और छत्तीसगढ़ सरकार के विरोध में थी। अब आप सोचिए कि जहां एक ओर हमारे 76 जवानों का बलिदान हो गया। वहीं दूसरी ओर अर्बन नक्सली इसे जीत के तौर पर देख रहे थे। भारत के ख़िलाफ़ छेड़े गए सशस्त्र युद्ध के घटनाक्रम पर जश्न मना रहे थे। सेना, पुलिस और सरकार के ख़िलाफ़ प्रोपेगैंडा वाली रिपोर्टिंग की जा रही थी। उन्हें खलनायक बताया जा रहा था। जबकि माओवादी आतंकियों की रहनुमाई की जा रही थी।‌ क्योंकि अर्बन नक्सलियों के लिए माओवादियों द्वारा जवानों की हत्या – जीत थी।‌

ये ध्यान रखना बहुत ज़रूरी है कि अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों में कोई विशेष अंतर नहीं है। दोनों न तो देश के संविधान को मानते हैं, न ही इनमें राष्ट्र के प्रति कोई निष्ठा है। इनका हमेशा से एक ही उद्देश्य रहा है कि – कैसे भारत में रक्तपात किया जाए। ‘जल-जंगल-जमीन’ के नाम पर हिंसा की जाए। ये दोनों जनजातीय समाज, वनवासियों के घोर शत्रु हैं। अर्बन नक्सलियों और सशस्त्र माओवादियों के रक्तपात के चलते ही – सुदूर वनांचल क्षेत्र विकास से बहुत पीछे रह गए। अर्बन नक्सल खुद हाथ में हथियार नहीं लेना चाहते, लेकिन गरीबों के हाथ में हथियार देकर अपनी विचारधारा फैलाना चाहते हैं।

हमारे वीर जवानों ने सुरक्षा के लिए जिस अदम्य साहस का परिचय दिया है। वर्षों तक माओवादियों की मांद में घुसकर उन्हें नेस्तनाबूद किया है। आज उन वीर बलिदानियों के कारण ही छत्तीसगढ़ ख़ूनी आतंक से बाहर आया है। सशस्त्र माओवादी आतंक का सफाया हो चुका है। अर्बन नक्सली हमेशा से हथियारबंद माओवादियों की ढाल बनकर खड़े रहते थे। अभी भी ये सिलसिला रुका नहीं है।

अर्बन नक्सली – नक्सलवाद के समर्थन में साहित्य लिखते, इंटरव्यू करते, एडिटोरियल लिखते, नाट्य मंचन करते, ढफली बजाते, रैली करते नज़र आते थे।‌ ये मानवाधिकार के नाम पर माओवादी हिंसा को जायज़ ठहराते थे। लेकिन माओवादी आतंकी जिन निर्दोषों की हत्या करते थे, उनके मानवाधिकार पर चुप्पी ओढ़ लेते थे। वो माओवादी जो बस्तर के जनजातीय समाज का दमन करते थे। स्थानीय लोगों के जवान बच्चों और महिलाओं को अर्बन नक्सलियों के कॉन्सेप्ट पर उठा ले जाते थे। फिर उनके हाथों में हथियार थमा देते थे, रक्तपात कराते थे। बस्तर के वो बच्चे जिनके हाथों में किताबें होनी चाहिए थीं, अर्बन नक्सलियों, माओवादियों ने – उन्हें बंदूक पकड़ने के लिए मजबूर किया। उनका बचपन, घर-परिवार और समाज सब कुछ छीन लिया। बारूदी गंध की ज़िंदगी जीने को विवश किया। भोले-भाले, सरल हृदय जनजातीय समाज को अपने ही समाज का दुश्मन बना दिया। माओवादियों ने उन्हें रक्तपात करने का हथियार बनाने का जघन्य अपराध किया। क्या इनसे किसी भी प्रकार की सहानुभूति दिखाई जा सकती है ?

आज अर्बन नक्सली माडवी हिड़मा को हीरो बनाने का प्रयास कर रहे हैं, उसके लिए नारे लगा रहे हैं। मत भूलिए कि वो नक्सली 76 जवानों की हत्या का असल मास्टरमाइंड था। उसने न जाने कितने घर-परिवार उजाड़ दिए, न जाने कितने निर्दोषों को गोली से भून दिया।‌ अब, उस खूनी हिड़मा को महान बलिदानी भगवान बिरसा मुंडा से जोड़ने का अपराध अर्बन नक्सली कर रहे हैं। अगर कोई भगवान बिरसा मुंडा से हिड़मा जैसे माओवादी आतंकी को जोड़ता है तो ये सबसे बड़ा अपराध है। यह हमारे आदर्शों, हमारी संस्कृति, जनजातीय समाज का घोर अपमान है।

समाज की बेहतरी की चिंता हो तो कोई भी लक्ष्य कठिन नहीं हो सकता। हमारे सुरक्षाबल, हमारा गौरव हैं। उनके असंख्य बलिदानों के प्रति राष्ट्र और समाज अपनी कृतज्ञता प्रकट करता है। हमारा छत्तीसगढ़, हमारे बस्तर की माटी और उसकी संतानें अब सृजन का नया विहान रच रही हैं। अब बस्तर में बारूद की गंध कभी नहीं लौटेगी। बस्तर के युवाओं के कंधों पर अब वहां की शिक्षा, रक्षा, स्वास्थ्य-रोजगार, विकास की कमान है। जो अभावग्रस्त हैं, उन तक अब सारे संसाधन तेजी से पहुंचेंगे। वीर गुंडाधुर, भगवान बिरसा मुंडा, दंतेश्वरी माई की संतानें अब मूल को पहचानकर सृजन के गीत गा रही हैं। प्रकृति की लय ताल के साथ एकाकार होकर शांत और सुरम्य तस्वीरें रच रही हैं।

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