चंदन और कोयला की कहानी
सुनसान जंगल में लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुए राजा ने कहा-"हे दयालु! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा।"
चंदन और कोयला
एक बार एक राजा जंगल में शिकार खेलने गए और खेलते-खेलते बहुत आगे निकल गए। उन्हें बहुत प्यास लगी। वह इधर उधर पानी की तलाश कर रहे थे तभी उन्हे वहा एक लकड़हारा मिला, जो लकड़ी के कोयले बना रहा था। राजा उसके पास गए और पानी पूछा। उसके पास एक लोटा पानी था, उसने वह राजा को पिला दिया। राजा वह पानी पीकर बहुत प्रसन्न हो गए।
सुनसान जंगल में लकड़हारे से पानी का लोटा पीकर प्रसन्न हुए राजा ने कहा-"हे दयालु! किसी दिन मेरी राजधानी में अवश्य आना, मैं तुम्हें पुरस्कार दूँगा।"
इस घटना को घटे पर्याप्त समय व्यतीत हो गया, अन्ततः लकड़हारा एक दिन चलता-फिरता राजधानी में जा पहुँचा और राजा के पास जाकर कहने लगा-"मैं वही लकड़हारा हूँ, जिसने आपको पानी पिलाया था।"
राजा ने उसे देखा और अत्यन्त प्रसन्नता से अपने पास बिठाकर सोचने लगा कि इस निर्धन का दुःख कैसे दूर करुँ? अन्ततः उसने सोच-विचार के पश्चात् चन्दन का एक विशाल बाग उसको सौंप दिया।
लकड़हारा मन ही मन बड़ा प्रसन्न हुआ, यह सोचकर कि इस बाग के वृक्षों से पैसे बनाकर मेरा जीवन आराम से कट जाएगा।यह सोचकर लकड़हारा प्रतिदिन अपना पेट पालने लगा।
राजा को एक दिन यूँ ही विचार आया कि चलो, तनिक लकड़हारे का हाल देख आयें! चन्दन के उद्यान का भ्रमण भी हो जाएगा।
यह सोचकर राजा चन्दन के उद्यान की और जा निकले। उन्होंने दूर से उद्यान से धुआँ उठते देखा। निकट आने पर ज्ञात हुआ कि चन्दन जल रहा है और लकड़हारा पास खड़ा है।
दूर से राजा को आते देखकर लकड़हारा उनके स्वागत के लिए आगे बढ़ा। राजा ने आते ही कहा-"भले आदमी! यह तूने क्या किया?"
लकड़हारा बोला-"आपकी कृपा से इतना समय आराम से कट गया। आपने यह उद्यान देकर मेरा बड़ा कल्याण किया। मैं कोयला बना-बनाकर बेचता रहा हूँ। अब तो कुछ ही वृक्ष रह गये हैं। यदि कोई और उद्यान मिल जाए तो शेष जीवन भी व्यतीत हो जाएगा।"
राजा ने देखा कि थोड़े समय में ही चन्दन का सुन्दर बगीचा वीरान हो गया, जिसमें स्थान-स्थान पर कोयले के ढेर लगे थे। इसमें अब केवल कुछ ही वृक्ष रह गये थे, जो लकड़हारे के लिए छाया का काम देते थे।
राजा निराश हुए और सोच मैं पड़ गये। फिर राजा ने लकड़हारे से कहा-"अच्छा, मैं यहाँ खड़ा हूँ। तुम कोयला नहीं, इस पेड़ की लकड़ी को ले जाकर बाज़ार में बेच आओ।" लकड़हारे ने लगभग दो मीटर की लकड़ी उठाई और बाज़ार में ले गया।
लोग लकड़हारे के पास अच्छे चन्दन को देखकर दौड़े और अन्ततः उसे तीन सौ रुपये मिल गये, जो कोयले से हुई कमाई से कई गुना ज्यादा थे।
लकड़हारा पैसे लेकर रोता हुआ राजा के पास आया और जोर-जोर से रोता हुआ, अपनी भाग्यहीनता और अज्ञानता स्वीकार करने लगा। उसे पछतावा हुआ कि कैसे उसने अमूल्य वस्तु को अपनी अज्ञानता के कारण खो दिया। राजा ने उसे सांत्वना दी और अपना कार्य फिर से शुरू करने हेतु प्रोत्साहित किया।
इस कथा में चन्दन का बाग हमारा शरीर और हमारी एक-एक श्वास चन्दन का वृक्ष है। क्या हमारा जीवन चंदन की तरह महक रहा है या हम भी उस लकड़हारे की तरह चंदन रूपी जीवन के एक-एक पल को राग, द्वेष और मोह की अग्नि में जलाकर कोयला बना रहे हैं?