धोखाधड़ी कर खाते से निकली राशि को वापस लाना बड़ी चुनौती
आरबीआइ के स्तर पर काम चल रहा है। इसमें एआइ जैसी प्रौद्योगिकी का सहारा लेने पर भी विचार चल रहा है।
: चंडीगढ़ की अंजलि चोपड़ा साइबर क्राइम की शिकार हुईं। जैसे ही उनके खाते से 80 हजार रुपये कटे, उन्हें आभास हो गया कि उनके साथ धोखाधड़ी हुई है। बैंक को फोन किया। साइबर अपराध वाले हेल्पलाइन नंबर को जानकारी दी। पुलिस के पास भी गईं और एफआइआर करवाई। करवाई। इस सबके बावजूद उनके खाते में पैसे आने में दो महीने लग गए।
अंजलि चोपड़ा खुशकिस्मत हैं कि उनकी मेहनत की कमाई मिल गई। साइबर जालसाजी के शिकार दूसरे हजारों लोगों की किस्मत वैसी नहीं होती। एफआइआर करवाने और पुलिस जांच में सत्यता प्रमाणित होने के बावजूद फ्राड करने वाले खातों से पैसा वापस लेना अभी भी टेढ़ी खीर है। बैंकों एवं नियामक एजेंसियों के लोग स्वीकार करते हैं कि सब कुछ हो जाने के बावजूद जालसाजी के शिकार व्यक्ति को पैसे लौटाने की
प्रक्रिया अभी दुरूह है और आने वाले दिनों में इसे आसान बनाने की कोशिश हो रही है। आरबीआइ के स्तर पर काम चल रहा है। इसमें एआइ जैसी प्रौद्योगिकी का सहारा लेने पर भी विचार चल रहा है। गृह मंत्रालय के तहत काम करने वाले 10 प्रतिशत से ज्यादा पैसा नहीं लौट पाता बैंकिंग क्षेत्र के जानकार बताते हैं कि वित्तीय फ्राड से जो राशि बैंक खाते से निकल जाती है, उसकी वापसी का औसत 10 प्रतिशत से ज्यादा का नहीं है। फ्राड करने वाले पहले से ही सारी तैयारी किए होते हैं और जैसे ही पैसा उनके अधिकार वाले बैंक खाते में हस्तांतरित होता है, उसे निकाल लेते हैं। फ्राड करने वाले के बैंक खाते से पैसा निकलने के बाद रकम वापसी की उम्मीद बहुत कम हो जाती है, क्योंकि इसके बाद अपराधी को गिरफ्तार करके, उसकी परिसंपत्तियों से या बैंक खाते से राशि को कानूनी तरीके से वापसी की प्रक्रिया पूरी करनी होती है।
सूचना देने में देरी न करें पीड़ित को अपने बैंक और बैंकिंग फ्राड की जानकारी देने के लिए गठित वेबसाइट (नेशनल साइबर क्राइम रिपोर्टिंग पोर्टल) पर सूचना देने में देरी नहीं करनी चाहिए। जितनी जल्दी बैंक को जानकारी मिलेगी, उसका सिस्टम उतनी ही जल्दी सक्रिय हो जाता है। लेकिन यह ग्राहक की रकम वापसी की गारंटी नहीं है। अभी जो प्रक्रिया है, उसके मुताबिक जब घोखाधड़ी का शिकार ग्राहक बैंक को सूचना देता है तो बैंक उस बैंक को मेल करता जिसके बैंक खाते में राशि ट्रांसफर की गई है। मौजूदा नियम यह है कि उक्त बैंक के संबंधित अधिकारी को 24 घंटे में ट्रांसफर किए गए बैंक खाते को जब्त करना पड़ता है और उससे राशि वापसी की प्रक्रिया शुरू करनी पड़ती है। अगर फ्राड की राशि एक लाख रुपये से ज्यादा है तो फिर उसकी जानकारी पुलिस को देनी होती है। जांच शुरू होने के बाद तो प्रक्रिया और लंबी खिंच जाती है।
इंडियन साइबर क्राइम कोआर्डिनेशन सेंटर (आइसी) ने पिछले दिनों एक रिपोर्ट प्रधानमंत्री कार्यालय को सौंपी है जिसमें इस बात पर जोर दिया गया है कि कैसे बैंकिंग सिस्टम के बीच बेहतर सामंजस्य नहीं होना साइबर अपराधियों के लिए मददगार है। देश के बैंकिंग सिस्टम की सबसे बड़ी असफलता यह है कि फर्जी प्रपत्रों के आधार पर खाता खोलने पर रोक नहीं लग पाई है। पिछले वर्ष साइबर अपराध से जुड़े 4.5 लाख बैंक खातों को जब्त किया गया। इन बैंक खातों का साइबर अपराध करने वालों ने लोगों से लूटी गई राशि को ट्रांसफर करने में इस्तेमाल किया। आइसी ने यह भी जानकारी दी कि इन बैंक खातों में 17 हजार करोड़ रुपये की राशि जमा की गई। यह शक भी जताया गया है कि फर्जी कागजों पर खोले गए इन खातों के पीछे बैंकों के कर्मचारी या बैंक प्रबंधकों की भी संलिप्तता हो सकती है।
रिजर्व बैंक के डिप्टी गवर्नर स्वामीनाथन जे. ने जुलाई, 2024 में कहा था कि कुछ बैंकों के लाखों खातों में लंबे समय से कोई लेन-देन नहीं हुआ है। इनमें से कुछ खातों का इस्तेमाल फ्राड के लिए हो रहा है।
एआइ के जरिये समाधान निकालने पर हो रहा काम पिछले वर्ष जब्त हुए 4.5 लाख खाते, जमा हैं 17,000 करोड़ ऐसी होगी नई व्यवस्था नई व्यवस्था ऐसी होगी कि बैंक ग्राहक की तरफ से एक निश्चित पोर्टल या नंबर पर सूचना देने के साथ ही उसके बैंक खाते से जिस खाते में पैसा ट्रांसफर हुआ है, वह जब्त हो जाएगा। उससे संबंधित सूचना दूसरे बैंकों को भी जा सकेगी। इसके साथ ही यूपीआइ ढांचे को भी और ज्यादा सुरक्षित बनाने की तैयारी है। सरकार के लिए यह चिंता की बात है कि यूपीआइ भी फ्राड करने वालों का एक जरिया बन गया है।