कृण्वन्तो विश्वमार्यम्
विशेष जाति वर्ग की कल्पना की जिससे उत्तर-भारत और दक्षिण भारत में वैमनस्यता के कारण परस्पर युद्ध चलता रहे।
ऋग्वेद का यह मन्त्र प्रेरित करता है कि सम्पूर्ण विश्व को श्रेष्ठ बनाओ। श्रेष्ठ की परिभाषा आचार-विचार,
व्यवहार जिसका उत्तम हो, ऐसे ही आचरण वालों को बनाने के लिए वेद कहता है।
ऋग्वेद में इन्द्रं वर्धन्तो अप्तुरः
कृण्वन्तो विश्वमार्यम्।
अपघ्नन्तोऽराव्णः।।
इसका भावार्थ यह है कि सम्पूर्ण प्रजा मिलकर राजा (इन्द्र) को समृद्ध शक्ति सम्पन्न बनाए, जो जनता के शोषक हैं, उनको शक्तिहीन बनाते हुए आर्य बढ़ें। आर्य का अर्थ यहाँ श्रेष्ठ है। वहीं निरुक्त में भी कहा है- आर्य ईश्वरपुत्रः । (निरु. 6.5.26) यह शब्द अत्यन्त प्रचलित हुआ और संस्कृत नाटकादिकों में में भी पुरुष को आर्य और स्त्री को आर्या सम्बोधन किया जाने लगा, उनके मुख्य निवास स्थान को आर्यावर्त्त कहा गया और वे वेदज्ञान एवं सारे विश्व में मानवता का प्रसार हो इसके लिए गए,
किन्तु पाश्चात्य विद्वानों को आर्यावर्त पर शासन करने में यह उपदेश साक्षात् बाधित प्रतीत हुआ, इसलिए उन्होंने आर्यों का मूल स्थान ईरान आदि कल्पित किया और अपने को बचाने के लिए यह सिद्ध किया कि आर्य लोग पहले गोमांस खाते थे, पश्चात् जब भारतभूमि पर आये तो उन्होंने गौ को पूज्य मान लिया। क्यों? इसका उत्तर वे देते हैं कि जब भारत में गौएँ आईं तो उनकी दूध देने की शक्ति बढ़ गई और आर्य लोगों की स्त्रियों की दूध देने की क्षमता कम हो गई, तो बच्चों के पालन-पोषण के लिए दूध की आवश्यकता हुई, उसी समय से उनके लिए गौ पूज्य हो गई।
यह कितना मूर्खतापूर्ण, अवैज्ञानिक, निराधार चिन्तन है कि जब आर्य लोग बाहर से आए, तब वे जहाँ से आए वहाँ गौओं का दूध कम मात्रा में होता था, जब भारत में आए तो दूध बढ़ गया और आर्यों की स्त्रियों का दूध कम हो गया। इसी का ताना-बाना वो बुनते रहे और जब किसी तरह छल-बल से यहाँ अपना राज्य स्थापित करने में सफल हुए तो इसी प्रकार के ऊटपटांग विचारों को पाठ्य-पुस्तकों में पढ़ने- पढ़ाने के लिए निर्धारित कर दिया,
जिसका परिणाम वनवासियों को आदिवासी कहकर तथा उनमें विद्वेष उत्पन्न कर उनको पृथक् करना और जब इससे भी उनको सन्तोष न हुआ तो आर्य और द्रविड़ नाम की विशेष जाति वर्ग की कल्पना की जिससे उत्तर-भारत और दक्षिण भारत में वैमनस्यता के कारण परस्पर युद्ध चलता रहे। इसका परिणाम भी अब दृष्टिगोचर हो रहा है। तमिल, कन्नड़, मलयालम आदि भाषाएँ जो संस्कृत के ही अपभ्रंश के रूप में प्रचलित हुईं, जिनका मूल स्रोत संस्कृत ही है। उन भाषा-भाषियों को संस्कृत एवं संस्कृत-भाषियों का घोर