हमारे किसी भी ग्रन्थ में विषमता का कोई उल्लेख नहीं है – रामदत्त चक्रधर जी
रायपुर, 17 जनवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़ के ‘समरस छत्तीसगढ़’ विशेषांक का विमोचन किया। विमोचन कार्यक्रम शनिवार को प्रान्त कार्यालय जागृति मंडल में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रान्त संघचालक डॉ. टोपलाल वर्मा जी ने की। इस अवसर पर रामदत्त चक्रधर जी ने कहा, भारत […] The post हमारे किसी भी ग्रन्थ में विषमता का कोई उल्लेख नहीं है – रामदत्त चक्रधर जी appeared first on VSK Bharat.
रायपुर, 17 जनवरी। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के सह सरकार्यवाह रामदत्त चक्रधर जी ने विश्व संवाद केंद्र छत्तीसगढ़ के ‘समरस छत्तीसगढ़’ विशेषांक का विमोचन किया। विमोचन कार्यक्रम शनिवार को प्रान्त कार्यालय जागृति मंडल में सम्पन्न हुआ। कार्यक्रम की अध्यक्षता प्रान्त संघचालक डॉ. टोपलाल वर्मा जी ने की। इस अवसर पर रामदत्त चक्रधर जी ने कहा, भारत वर्ष का इतिहास एवं समाज जीवन की रचना अत्यंत प्राचीन है। जो समाज जितना प्राचीन होता है, उतना ही उतार-चढ़ाव देखता है। समाज जब एक रस होता है तो उत्थान की ओर अग्रसर होता है।
उन्होंने कहा कि शरीर के अंगों के काम अलग-अलग हैं, लेकिन सबके अंदर एक रस है। किसी अंग को चोट लगती है तो हर अंग अपनी प्रतिक्रिया देता है। हमारे किसी भी ग्रन्थ में विषमता का कोई उल्लेख नहीं है। आदरणीय डॉ. बाबा साहब भीमराव आंबेडकर भी यह बात कहते हैं। भारतीय साहित्य में कहीं विषमता और शोषण का उल्लेख नहीं है, लेकिन फिर भी समाज में विकृति आई, उसके पीछे सबसे बड़ी वजह अपना स्वत्व और मूल राष्ट्रीय चरित्र को भूलना था। इस्लामिक एवं अंग्रेजों के शासन के समय समाज को तोड़ने का कार्य हुआ। समाज में लोगों ने कठिन से कठिन कार्य स्वीकार्य कर लिया, लेकिन धर्म और अपनी संस्कृति को नहीं छोड़ा।
पूज्य बाबा साहब के आदर्श, उनका चिंतन हमें स्मरण करना होगा। समाज में समरसता के विषय में बहुत अच्छे कार्य हुए, संतों व महापुरुषों के योगदान से विषमता कम हुई है। लेकिन फिर भी समाज में समरसता हेतु प्रबोधन की आवश्यकता है। संत पूज्य रैदास, वीर सावरकर, पं. मदन मोहन मालवीय जी सहित अनेक समाज सुधारकों व माँ भारती के सपूतों ने समरसता के लिए प्रयास किया। पूज्य बाबा गुरु घासीदास जी ने मनखे-मनखे एक समान का मंत्र दिया। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के वर्धा शिविर में महात्मा गांधी आए तो स्वयंसेवकों से परिचय किया। किसी ने जाति का परिचय नहीं दिया तो वह आश्चर्यचकित रह गए, उन्होंने शाखा कार्य पद्धति की प्रशंसा की। इसी तरह पूज्य बाबा साहेब डॉ. आंबेडकर ने संघ की शाखा में सामाजिक समरसता का जो भाव देखा, उसकी प्रशंसा की।
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