चीन का झूठा दावा और इतिहास बनाम विस्तारवाद की जंग

अपनी विस्तारवादी नीति के लिए कुख्यात ‘चीन’ एक बार फिर लद्दाख के शक्सगाम घाटी इलाके पर अपना झूठा दावा दोहरा रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत पाकिस्तान को जोड़ने वाली सड़क इसी क्षेत्र से गुजर रही है। चीन के दावे पर भारत ने कड़ी और स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराई है। भारत शुरू से […] The post चीन का झूठा दावा और इतिहास बनाम विस्तारवाद की जंग appeared first on VSK Bharat.

Jan 16, 2026 - 06:42
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अपनी विस्तारवादी नीति के लिए कुख्यात ‘चीन’ एक बार फिर लद्दाख के शक्सगाम घाटी इलाके पर अपना झूठा दावा दोहरा रहा है। चीन-पाकिस्तान आर्थिक गलियारे (CPEC) के तहत पाकिस्तान को जोड़ने वाली सड़क इसी क्षेत्र से गुजर रही है। चीन के दावे पर भारत ने कड़ी और स्पष्ट आपत्ति दर्ज कराई है। भारत शुरू से ही यह साफ करता आया है कि शक्सगाम घाटी भारत का अभिन्न हिस्सा है और यहां किसी भी विदेशी ताकत द्वारा किया जा रहा निर्माण अवैध और अस्वीकार्य है। इसी क्रम में भारत ने 9 जनवरी को भी चीन के तथाकथित नियंत्रण को अवैध कब्जा बताते हुए कड़ा विरोध जताया था।

इस बीच, चीन के सरकारी अख़बार ग्लोबल टाइम्स ने, चीन के विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता का बयान प्रकाशित किया है। प्रवक्ता माओ निंग ने सोमवार को दावा किया कि जिस इलाके पर सवाल उठाए जा रहे हैं, वह चीन का हिस्सा है और वहां बुनियादी ढांचा बनाना चीन का “अधिकार” है, जिस पर कोई प्रश्न नहीं किया जा सकता।

हालांकि, इतिहास और सच्चाई चीन के दावे को पूरी तरह खारिज करती है। पाकिस्तान ने 1948 में शक्सगाम घाटी पर अवैध कब्जा किया था और बाद में 1963 में भारत की जमीन अवैध रूप से चीन को सौंप दी थी। भारत ने इस समझौते को तब भी मान्यता नहीं दी थी और आज भी इसे अवैध और शून्य मानता है। शक्सगाम घाटी को लेकर चीन-पाकिस्तान की यह मिलीभगत न केवल भारत की संप्रभुता को चुनौती है, बल्कि अंतरराष्ट्रीय कानून और सीमा समझौतों का भी खुला उल्लंघन है, जिसका भारत लगातार और मजबूती से विरोध करता रहा है।

शक्सगाम घाटी पर चीन का यह दावा न केवल भारत के लिए अस्वीकार्य है, बल्कि यह इतिहास, अंतरराष्ट्रीय कानून और स्वयं चीन के पुराने दस्तावेज़ों के भी खिलाफ है। सवाल यह नहीं है कि चीन शक्सगाम घाटी में सड़क क्यों बना रहा है, सवाल यह है कि चीन को उस भूमि पर अधिकार किसने दिया, जिसे वह आज “अपना इलाका” बताने की कोशिश कर रहा है।

इतिहास और वास्तविकता

26 अक्तूबर 1947 में जम्मू-कश्मीर के महाराजा हरिसिंह ने भारत के साथ अधिमिलन पत्र पर हस्ताक्षर किए। इसके साथ ही जम्मू-कश्मीर की पूरी रियासत चाहे वह कश्मीर हो, जम्मू हो या लद्दाख, कानूनी रूप से भारत का हिस्सा बन गई। इस अधिमिलन में आज के POJK, POTL और शक्सगाम घाटी सहित पूरा क्षेत्र शामिल था। यह तथ्य अपने आप में चीन के दावे की नींव को ढहा देता है। क्योंकि किसी भी अंतरराष्ट्रीय मानक के अनुसार, जिस भूमि का अधिमिलन भारत के साथ हो चुका हो, उस पर किसी तीसरे देश का दावा शून्य और अमान्य होता है।

सर्विदित है कि पाकिस्तान जब से विश्व मानचित्र पर अस्तित्व में आया तब से उसकी नापाक निगाहें जम्मू कश्मीर पर टिकी रहीं। अपनी इसी नापाक हरकतों को अंजाम देते हुए आजादी के तुरंत बाद 22 अक्तूबर 1947 को पाकिस्तानी सेना ने जम्मू कश्मीर के बड़े हिस्से पर हमला कर दिया। हालाँकि, जब महाराजा हरि सिंह ने भारत के साथ जम्मू कश्मीर का अधिमिलन किया, तब भारतीय सेना जम्मू कश्मीर पहुंची और जम्मू कश्मीर को पाकिस्तानी सेना से मुक्त कराने लगी। लेकिन अभी पूरा इलाका सही ढंग से खाली भी नहीं हुआ था कि नेहरु इस मामले को UN में ले गए और सीज़फायर का ऐलान कर दिया। परिणाम यह हुआ कि जम्मू कश्मीर का एक बड़ा हिस्सा पाकिस्तान के हाथ लग गया, जिस पर उसने अवैध कब्ज़ा कर लिया।

उस समय लद्दाख भी जम्मू-कश्मीर का हिस्सा था, इसलिए गिलगित-बल्तिस्तान और शक्सगाम घाटी भी पाकिस्तान के अवैध कब्ज़े में चले गए। लेकिन कब्ज़ा कभी संप्रभुता नहीं बनता। इसके बावजूद, 1963 में पाकिस्तान ने एक ऐसा कदम उठाया, जिसने उसकी नीयत को पूरी तरह बेनकाब कर दिया। उसने शक्सगाम घाटी के लगभग 5,180 वर्ग किलोमीटर क्षेत्र को चीन के हाथों सौंप दिया। यह सौदा इसलिए भी चौंकाने वाला था क्योंकि पाकिस्तान के पास उस भूमि को देने का कोई कानूनी अधिकार ही नहीं था।

भारत ने उसी समय स्पष्ट कर दिया था कि यह तथाकथित चीन-पाक सीमा समझौता अंतरराष्ट्रीय कानून के तहत मान्य नहीं है। यह स्थिति आज भी वैसी ही है।

आज चीन शक्सगाम घाटी में लगभग 16,000 फीट की ऊंचाई पर सड़क का निर्माण कर रहा है। इसे “विकास” बताना एक भ्रम पैदा करने वाली भाषा है। असल में यह निर्माण चीन की उस रणनीति का हिस्सा है, जिसमें वह सीमावर्ती क्षेत्रों में इंफ्रास्ट्रक्चर खड़ा कर यथास्थिति बदलने की कोशिश करता है।

सड़क का महत्व अधिक इसलिए है कि –

कराकोरम हाईवे से जुड़ सकती है

CPEC के ज़रिये चीन को अरब सागर तक वैकल्पिक मार्ग दे सकती है

और सियाचिन ग्लेशियर के बेहद करीब पहुंचती है

यह केवल आर्थिक परियोजना नहीं, बल्कि भविष्य की सैन्य लॉजिस्टिक तैयारी है।

सियाचिन की सुरक्षा और दोतरफा दबाव की आशंका

शक्सगाम घाटी, सियाचिन ग्लेशियर और साल्टोरो रिज के ठीक उत्तर में स्थित है। यह क्षेत्र भारत के लिए इसलिए अत्यंत संवेदनशील है क्योंकि यहां से किसी भी प्रकार की सैन्य गतिविधि सियाचिन की सुरक्षा पर सीधा असर डाल सकती है। हालांकि कराकोरम पर्वतमाला की दुर्गम चोटियां किसी बड़े पैमाने पर सैनिकों की आवाजाही को बेहद कठिन बनाती हैं, फिर भी चीन लंबी दूरी की आर्टिलरी, मल्टी-रॉकेट लॉन्च सिस्टम के ज़रिये उत्तरी सियाचिन क्षेत्र पर दबाव बना सकता है। यही कारण है कि भारतीय सुरक्षा एजेंसियां सड़क को केवल निर्माण परियोजना नहीं, बल्कि रणनीतिक चेतावनी के रूप में देख रही हैं।

चीन का दावा, उसी के दस्तावेज़ों से झूठा

यहां सबसे बड़ा विरोधाभास सामने आता है। 1963 के चीन-पाकिस्तान समझौते में चीन ने खुद यह स्वीकार किया था कि शक्सगाम घाटी पर पाकिस्तान का कोई वैध अधिकार नहीं है। अगर पाकिस्तान का अधिकार नहीं था, तो फिर चीन को यह भूमि कैसे “अपनी” लगने लगी? यही चीन की विस्तारवादी नीति का मूल है ताकत से कब्ज़ा करो, फिर समय के साथ उसे इतिहास बताने लगो।

भारत का स्पष्ट रुख

09 जनवरी को भारत ने शक्सगाम घाटी में CPEC के तहत हो रहे निर्माण को “अवैध और अमान्य” बताते हुए कहा कि यह क्षेत्र भारत का अभिन्न और अविभाज्य हिस्सा है। भारत ने यह भी साफ किया कि पाकिस्तान द्वारा चीन को दी गई किसी भी तरह की वैधता को वह स्वीकार नहीं करता।

शक्सगाम घाटी केवल एक भूभाग नहीं, बल्कि भारत की संप्रभुता, सियाचिन की सुरक्षा और एशिया की सामरिक स्थिरता से जुड़ा मुद्दा है। चीन इसे इंफ्रास्ट्रक्चर और CPEC के नाम पर सामान्यीकृत करना चाहता है, लेकिन सच्चाई यही है कि यह पूरी परियोजना अवैध कब्ज़े और विस्तारवादी सोच पर आधारित है।

भारत ने साफ कर दिया है, न तो शक्सगाम घाटी पर चीन का दावा स्वीकार्य है, न ही पाकिस्तान द्वारा दी गई कोई “कानूनी मान्यता”। यह संघर्ष केवल सीमाओं का नहीं, बल्कि नियम आधारित अंतरराष्ट्रीय व्यवस्था बनाम बल आधारित विस्तारवाद का है और भारत इस लड़ाई में अपने ऐतिहासिक अधिकारों और राष्ट्रीय हितों पर कोई समझौता नहीं करेगा।

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