विभाजन विभीषिका – हिन्दू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ, लेकिन स्वाधीनता के साथ विभाजन की वीभत्स त्रासदी ने राष्ट्र को कभी न भर पाने वाले असह्य घाव दिए। उस समय हुए हिन्दुओं के नरसंहार और उसकी पीड़ा से पूरा देश कांप गया। जिसकी मर्मांतक चीखें अब भी सुनाई देती हैं। अतीत को जानना आवश्यक […] The post विभाजन विभीषिका – हिन्दू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां appeared first on VSK Bharat.

Aug 16, 2026 - 12:58
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विभाजन विभीषिका – हिन्दू नरसंहार की मर्मांतक दास्तां

कृष्णमुरारी त्रिपाठी अटल

भारत 15 अगस्त 1947 को स्वाधीन हुआ, लेकिन स्वाधीनता के साथ विभाजन की वीभत्स त्रासदी ने राष्ट्र को कभी न भर पाने वाले असह्य घाव दिए। उस समय हुए हिन्दुओं के नरसंहार और उसकी पीड़ा से पूरा देश कांप गया। जिसकी मर्मांतक चीखें अब भी सुनाई देती हैं। अतीत को जानना आवश्यक हो जाता है।

ये जानना आवश्यक है कि उस समय किस प्रकार से अंग्रेज अपनी चाल चल रहे थे? मुस्लिम लीग किस प्रकार से दंगों के आतंकी क्रूर चेहरे के रूप में उभर रही थी? कैसे पंडित नेहरू मुस्लिम लीग की ज़िद के आगे घुटने टेक रहे थे? दरअसल, भारत विभाजन को लेकर जब अंग्रेजों ने पटकथा रची तो वो हर वो दांव-पेंच आजमा रहे थे। जो उनके मंसूबों को पूरा कर सके। उस समय पंडित जवाहरलाल नेहरू, भारत विभाजन के लिए आए माउंटबेटन और उसकी पत्नी एडविना के साथ 10 मई 1947 से कई दिनों तक शिमला में पार्टियां कर रहे थे। इतना ही नहीं माउंटबेटन ने एलिजाबेथ द्वारा दी गई महंगी कार ‘रोल्स रॉयल्स’ पंडित नेहरू को दी थी। शिमला में माउंटबेटन -नेहरू और एडविना की छुट्टियों के दौरान ही माउंटबेटन के भारत विभाजन संबधी मसौदे को पंडित नेहरू ने स्वीकार कर लिया था। इससे संबंधित घटनाक्रमों का सविस्तार वर्णन तत्कालीन ब्रिटिश पत्रकार और इतिहासकार लियोनार्ड मोसली ने अपनी पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज’ में किया है। यानी भारत विभाजन के लिए मुस्लिम लीग और जिन्ना तो उतावले थे ही, साथ ही पंडित नेहरू की भी भूमिका संदिग्ध और विभाजन के पक्ष में ही स्पष्ट प्रतीत होती है।

उस समय कांग्रेस कार्यसमिति द्वारा भारत विभाजन की माउंटबेटन योजना को स्वीकार करने की तैयारियों का महात्मा गांधी ने भी विरोध किया था। लेकिन उनकी नहीं चली और 3 जून 1947 को पंडित नेहरू की अगुवाई में कांग्रेस ने अंग्रेजों के विभाजन प्रस्ताव को स्वीकार कर लिया। उन्होंने इस सन्दर्भ में मनु गांधी से 1 जून 1947 को चर्चा की थी। मनु को अपने दिल की बात कहते हुए महात्मा गांधी ने बताया – “आज मैं अपने को अकेला पाता हूँ। लोगों को लगता है कि मैं जो सोच रहा हूँ, वह एक भूल है। भले ही मैं कांग्रेस का चवन्नी का सदस्य नहीं हूँ, लेकिन वे सब लोग मुझे पूछते है, मेरी सलाह लेते हैं। आजादी के कदम उलटे पड़ रहे हैं, ऐसा मुझे लगता है। हो सकता है, आज इसके परिणाम तत्काल दिखाई न दें, लेकिन हिन्दुस्तान का भविष्य मुझे अच्छा नहीं दिखाई देता। हिन्दुस्तान की भावी पीढ़ी की आह मुझे न लगे कि हिंदुस्तान के विभाजन में गांधी ने भी साथ दिया था।”

(गांधी सम्पूर्ण वांग्मय, खंड 88, पृष्ठ 43-44)

14/15 अगस्त 1947 को भारत के विभाजन के साथ ही पूर्वी और पश्चिमी पाकिस्तान में हिंसा और नरसंहार खुलेआम शुरू हो गया। पाकिस्तान के हिस्से में गैर मुस्लिमों की संपत्तियां, महिलाओं की इज्ज़त लूटी जा रही थी। मासूमों तक को मौत के घाट उतारा जा रहा था। हिन्दुओं को काफ़िर कहकर खुलेआम उनकी हत्या के लिए खूंखार मुस्लिम आतंकियों की भीड़ चौतरफ़ा आतंक मचा रही थी। वर्षों से अपनी संपत्ति और अपनी जमीन के मालिक बेघर किए जा रहे थे। उनकी दौलत-शोहरत और इज्जत सब कुछ लूटी जा रही थी। विस्थापन के लिए सैकड़ों किलोमीटर की लाइनें आम बात हो चुकीं थी। उस समय विभाजन के एक निर्णय ने लाखों-करोड़ों लोगों की ज़िन्दगी को मौत और आतंक के साये में बदल दिया था। पाकिस्तान से हिन्दुस्तान के लिए भागते लोग अपनी जमीं और आसमां नाप रहे थे, लेकिन किस पल क्या हो जाए, इसका कोई भरोसा नहीं था। किन्तु हिन्दुस्तान के हिस्से में मुस्लिम पूरी तरह सुरक्षित थे। जो पाकिस्तान जा रहे थे। उन्हें भी कोई समस्या नहीं थी और जो भारत में रुके उन्हें भी नहीं हुई। विभाजन की त्रासदी के शिकार हिन्दू/सिक्ख हुए।

तत्कालीन परिदृश्य में जो वीभत्स दृश्य दिख रहे थे, उसका अनुमान डॉ. भीमराव अम्बेडकर ने बहुत पहले लगा लिया था। डॉ. आंबेडकर ने ‘पाकिस्तान ऑर द पार्टीशन ऑफ इंडिया’ किताब (1945) में लिखा था कि – “अगर भारत का विभाजन होता है तो पाकिस्तान में हिन्दुओं और सिक्खों का भविष्य सुरक्षित नहीं रहेगा।”

इसी संबंध में लियोनार्ड मोसेली अपनी पुस्तक ‘द लास्ट डेज ऑफ द ब्रिटिश राज’ के पृष्ठ 279 पर लिखते हैं – “अगस्त 1947 से अगले नौ महीनों में 1 करोड़ 40 लाख लोगों का विस्थापन हुआ। इस दौरान करीब 6 लाख लोगों की हत्या कर दी गई। बच्चों को पैरों से उठाकर उनके सिर दीवार से फोड़ दिये। बच्चियों का ,’बलात्कार’ किया गया, ‘बला-त्कार’ कर लड़कियों के स्तन काटे गये। गर्भवती महिलाओं के आतंरिक अंगों को बाहर निकाल दिया गया।”

इन तमाम तथ्यों के बीच प्रश्न उठता है कि विभाजन को स्वीकार करने वाले पंडित नेहरू उस समय क्या कर रहे थे? क्या वे पाकिस्तान के हिस्से में जीवन और मौत के बीच जूझने वाले हिन्दू/ सिक्खों के लिए कोई प्रबंध कर रहे थे? पंडित नेहरू जब जान रहे थे और स्वीकार कर रहे थे कि हिन्दुओं का नरसंहार पाकिस्तान सरकार के संरक्षण में ही किया जा रहा। तब वे पाकिस्तान को सिर्फ़ पत्र ही क्यों लिख रहे थे? क्यों वे कोई ठोस कदम नहीं उठा रहे थे? पंडित नेहरू ने स्वयं देश की प्रोविजनल संसद में 23 फरवरी 1950 को अपने वक्तव्य में कहा था – “पिछले कुछ समय से, पूर्वी पाकिस्तान में लगातार भारत विरोधी और हिन्दू विरोधी प्रचार हो रहा है। वहां प्रेस, मंच और रेडियो के माध्यम से जनता को हिन्दुओं के खिलाफ उकसाया जा रहा है। उन्हें काफिर, राज्य के दुश्मन और न जाने क्या-क्या कहा गया है। हिन्दुओं के साथ घृणा और हिंसा का ऐसा ही व्यवहार पश्चिमी पाकिस्तान में भी हो रहा है।”

गौर कीजिए, ये पंडित नेहरू कब कह रहे हैं वर्ष 1950 में….तब तो 1947 से शुरू हुई विभाजन की त्रासदी का सहज अनुमान लगाया जा सकता है। वो दौर कितना क्रूर और भयावह रहा होगा। फिर बंटवारे के समय से लेकर वर्तमान तक पाकिस्तान में गैर मुस्लिमों के साथ क्या हुआ और क्या हो रहा है? क्या यह किसी से छिपा है? वहां हिन्दुओं पर अत्याचार करने वाले कौन लोग थे? आखिर! वे कौन लोग हैं जो 1947 से लेकर आज तक पाकिस्तान के अल्पसंख्यकों पर अत्याचार कर रहे हैं। इस पर चर्चा करना क्या हिन्दू-मुस्लिम करना होता है?

पाकिस्तान और बांग्लादेश में हिन्दुओं (अल्पसंख्यकों) का नृशंस नरसंहार करने वाले, कन्वर्जन कराने वाले, गैर मुस्लिम स्त्रियों का अपहरण करने वाले, बलात्कार करने वाले कौन हैं? फिर जिन्हें लगता हो विभाजन विभीषिका के क्रूर पन्नों को पलटना हिन्दू-मुस्लिम करना है तो उन्हें उन लोगों से मिलना चाहिए। जो कई पीढ़ियों से बना अपना घर-बार, दौलत-शोहरत छोड़ने के लिए मजबूर हो गए। जिनके कत्लेआम की सामूहिक घोषणा कर दी गई। फिर दर-दर भटकते, जीवन और मौत के बीच जूझते हुए भारत आए। वर्षों तक विस्थापितों की तरह कैंपों में रहे। कोई असल दर्द उनसे पूछो। बंटवारे के समय कहीं रास्ते में ही जिनके परिवारजनों की हत्या कर दी गई। स्त्रियों की इज्जत लूट ली गई। बच्चों- महिलाओं-बुजुर्गों के साथ अत्याचारों की पराकाष्ठा पार कर दी गई।

जरा! याद करो कुर्बानी की तर्ज़ पर, जरा! याद करो हिन्दू नरसंहार की कहानी, भी सुनना और सुनाना आवश्यक है। आखिर! वह कैसी मानसिकता थी? जो हर हाल में हिन्दुओं का कत्लेआम कर रही थी। जमीन-जायदाद से लेकर स्त्रियों की आबरु लूट रही थी। ट्रेनों में भर-भरकर हिन्दुओं की लाशें आ रही थी। जबकि बंटवारे के समय भारत के हिस्से में मुस्लिम पूरी तरह सुरक्षित थे। क्योंकि ये भारत का-हिन्दू समाज का स्वभाव है।

उस निर्मम-भयावह दौर की स्मृतियां भारत के अतीत में दर्ज़ हैं, जिनको याद किया जाना आवश्यक है। फिर चाहे वो चीजें किसी के चश्मे के हिसाब से फिट हों या अनफिट। लेकिन राष्ट्र की एकता के लिए सत्य को देखना ही पड़ेगा और उसका मुखर वाचन करना पड़ेगा। भारत सरकार ने इस दिशा में महत्वपूर्ण कदम उठाया है। प्रधानमंत्री ने 14 अगस्त 2021 को विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस मनाने की घोषणा की थी। उस वक्त उन्होंने कहा था कि – “देश के बंटवारे के दर्द को कभी भुलाया नहीं जा सकता। नफरत और हिंसा की वजह से हमारे लाखों बहनों और भाइयों को विस्थापित होना पड़ा और अपनी जान तक गंवानी पड़ी। उन लोगों के संघर्ष और बलिदान की याद में 14 अगस्त को ‘विभाजन विभीषिका स्मृति दिवस’ के तौर पर मनाने का निर्णय लिया गया है।”

लेकिन क्या इतिहास के वे पन्ने सही ढंग से जन-जन तक पहुंचे हैं? क्या हम उस त्रासदी की पीड़ा को समाज तक ले जा रहे हैं। उन्हें इतिहास के क्रूर और वीभत्स सच से परिचय करा पा रहे हैं? ये प्रश्न प्रत्येक देशवासी को ख़ुद से पूछना पड़ेगा। क्योंकि जो अपने इतिहास से सबक नहीं लेते, वे अक्सर मिट जाया करते हैं।

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