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और सुनाओ कि हर मनुष्य के जीवन में लक्ष्य का होना बहुत आवश्यक है लक्ष्य के बिना उसका जीवन व्यर्थ होता है जिस व्यक्ति के जीवन में कोई लक्ष्य नहीं होता वह अपना जीवन तो जीता है परंतु यहां-वहां भटकता रहता है दूसरी ओर जीवन में लक्ष्य होने से मनुष्य को पता होता है कि उसे किस दिशा की ओर जाना है इन सभी तथ्यों को हम आपके समक्ष संक्षिप्त में रखेंगे तथा बताएंगे कि वास्तव में जीवन का लक्ष्य क्या है यह सिर्फ बाद में कहा गया है कि हम धर्म पर चलते हुए सौ वर्ष तक जीने की कामना करें इसका सदाचार ही एक मात्र उपाय है
मनुष्य का जन्म और उसके कर्म दोनों कर्मफल पर आधारित हैं अ का जन्म से मृत्यु तक अर्थात जब तक यह जीवन है तब तक वह कुछ न कुछ शारीरिक या मानसिक कर्म करता रहता है कर्म किए बिना एक क्षण भी रह पाना असंभव है सत्य तो यह है कि मनुष्य को जीवन कर्म करने के लिए ही मिला है यह बात अलग है कि वह कर्म सतकर्म हो या दुष्कर्म विज्ञान का यह सिद्धांत सर्वप्रसिद्ध है
कि प्रत्येक क्रिया की प्रतिक्रिया होती है और प्रत्येक कार्य का एक परिणाम होता है उसी प्रकार हर कर्म का भी कर्मफल आवश्यक
होता है
यह सारा संसार अनेक निश्चित नियमों और सिद्धांतों पर चल रहा है परमपुरुष परमात्मा ने मनुष्य को इस संसार में लोकहित के कर्म करते हुए इस वर्ष तक जीवित रहने का आदेश दिया है परंतु वह लोकहित को भूलकर अपने स्वार्थ एवं अ और पूर्ति की दिशा में अपने कर्मों को नियोजित कर देता है इसी के परिणाम स्वरूप मनुष्य इस विकारग्रस्त कर्म का फल भोगते हुए दारुण दुख प्राप्त करता है अब मन में यह विचार उठ सकता है कि हम किस प्रकार के कर्म करें संसार के प्रति उपकार करने का क्या अर्थ है और इस संसार का भला आखिर क्यों करें वस्तुतः दूसरों की भलाई में ही हम सबकी भलाई है यदि हम सदैव यह ध्यान रखें कि दूसरों की सहायता करना सौभाग्य है तो परोपकार करने की इच्छा प्रेरणा शक्ति के रूप में समस्त जगत पर छाई रहेगी कि इस प्रकार किए गए कर्म स्वार्थ रहित होने से निष्काम कर्म कहलाते हैं कि उसकी सफलता या असफलता मनुष्य को न तो अहंकारी बनाती है और ना ही कोई दुख देती है कि श्रीमद भगवत गीता में भी भगवान श्री कृष्ण ने कहा हैकर्मण्येवाधिकारस्ते मा फलेषु कदाचन मा कर्मफलहेतुर्भूर्मा ते संगोष्ठी वकर्मणि इसका भावार्थ है कर्म पर ही तुम्हारा अधिकार है कर्मों के फलों में नहीं है इसलिए कर्म को फल के लिए मत करो फोनकर्तव्य कर्म करने में ही तेरा अधिकार है
फलों में कभी नहीं है इसलिए निष्काम होकर कार्य करना चाहिए और ईश्वर की भक्ति में भी कोई त्रुटि नहीं होनी चाहिए कि अगर मनुष्य को कर्म में सफलता न मिले तो वह समझता है कि सफलता के लिए पूरे मन से प्रयास नहीं हुआ ऐसे में वह पुणे दुगने मनोयोग से कर्म करता है कि इस प्रकार वह कर मनुष्य के लिए नहीं होता और न कर्म के प्रति उसे आसक्ति होती है ह केवल अपना कर्तव्य समझकर उसे पूर्ण करता है जब अपना कोई स्वार्थ नहीं होता तो आत्मवत् सर्वभूतेषु की भावना प्रकट होती है सब के लाभ में ही उसे अपना लाभ दिखाई देता है जबकि ऐसा सोचना गलत है कि जब मनुष्य ईश्वर भक्ति व कर्म को सही तालमेल बनाकर जीवन व्यतीत करता है तो वह पुरुषार्थ को प्राप्त कर सकता है
युवा पत्रकार- विचार और कार्य से आने वाले समय में अपनी मेहनत के प्रति लगन से समाज को बेहतर बना सकते हैं। जरूरत है कि वे अपनी ऊर्जा, साहस और ईमानदारी से र्काय के प्रति सही दिशा में उपयोग करें ,
Bachelor of Journalism And Mass Communication - Tilak School of Journalism and Mass Communication CCSU meerut
/ Master of Journalism and Mass Communication - Uttar Pradesh Rajarshi Tandon Open University
पत्रकारिता- प्रेरणा मीडिया संस्थान नोएडा 2018 से केशव संवाद पत्रिका, प्रेरणा मीडिया, प्रेरणा विचार पत्रिका,