आजादी के बाद भारत पीडीएफ बुक
आजादी के बाद भारत ने एक लंबा सफर तय किया है, जिसमें उसे कई आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक चुनौतियों का सामना करना पड़ा। आजादी के बाद की स्थिति, क्षेत्रीय असमानता, युद्ध, और शीत युद्ध जैसे विषयों ने भारत की राजनीति और विकास को आकार दिया। यहां हम आजादी के बाद के कुछ प्रमुख घटनाक्रमों और चुनौतियों पर नजर डालेंगे।
1. क्षेत्रीय असमानता
स्वतंत्रता प्राप्ति के समय भारत में विभिन्न क्षेत्रों और राज्यों में आर्थिक असमानता एक बड़ी चुनौती थी। औद्योगिक विकास का केंद्र मुख्य रूप से कुछ ही क्षेत्रों तक सीमित था, जैसे कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास। 1948 तक, बॉम्बे और पश्चिम बंगाल में देश की कुल औद्योगिक पूंजी का 59% और राष्ट्रीय औद्योगिक उत्पादन का 64% से अधिक हिस्सा था। 1949 में, जब पश्चिम बंगाल, पंजाब और बॉम्बे की प्रति व्यक्ति आय क्रमशः 353, 331 और 272 रुपये थी, वहीं बिहार, उड़ीसा और राजस्थान की प्रति व्यक्ति आय क्रमशः 200, 188 और 173 रुपये थी।
इस असमानता को दूर करने के लिए योजना आयोग और वित्त आयोग का गठन किया गया। पिछड़े क्षेत्रों में निवेश को प्रोत्साहित करने के लिए सरकार ने कर में छूट और सब्सिडी के माध्यम से आर्थिक सहायता प्रदान की। 1956 से 1991 तक निजी उद्योगों के लिए लाइसेंस प्रणाली का भी उपयोग किया गया, ताकि वे पिछड़े क्षेत्रों में औद्योगिक इकाइयां स्थापित करें।
दलबदल का अभ्युदय 1967 के आम चुनाव के बाद, कांग्रेस से अलग हुए विधायकों ने तीन राज्यों हरियाणा, मध्य प्रदेश और उत्तर प्रदेश में गैर-कांग्रेसी सरकारें स्थापित करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई थी।
• इस अवधि में निरंतर परिवर्तन और राजनीतिक वफादारी में बदलाव ने 'आया राम, गया राम' की अभिव्यक्ति को जन्म दिया।
2. शीत युद्ध के दौरान संतुलन साधना
भारत को आजादी के बाद बाहरी चुनौतियों का भी सामना करना पड़ा, जिसमें शीत युद्ध का दौर प्रमुख था। वैश्विक स्तर पर सोवियत संघ और अमेरिका के बीच तनाव का असर भारत पर भी पड़ा। भारत ने इस दौरान गुटनिरपेक्षता की नीति अपनाई, ताकि किसी भी देश का पक्ष न लेकर अपनी स्वतंत्र नीति बनाए रख सके।
कश्मीर युद्ध (1947-48)
1947-48 में भारत और पाकिस्तान के बीच कश्मीर को लेकर पहली बार युद्ध हुआ। महाराजा हरि सिंह ने विलय पत्र पर हस्ताक्षर करने में देरी की, जिससे पाकिस्तान ने कश्मीर पर हमला कर दिया। भारतीय सेना ने कश्मीर को बचाने के लिए जवाबी कार्रवाई की और अंततः 1948 में युद्धविराम हो गया।
1967 के चुनाव स्थितियाँ : निरंतर मानसून विफलता, व्यापक सूखा पड़ना, कृषि उत्पादन में गिरावट होना, खाद्यान्नों की भारी कमी ; विदेशी मुद्रा भंडार में कमी होना, औद्योगिक उत्पादन और निर्यात में गिरावट होने के साथ-साथ सैन्य खर्चों में तेजी से वृद्धि होना और योजना और आर्थिक विकास से संसाधनों के विचलन के परिणामस्वरूप आर्थिक संकट उत्पन्न हो गए थे।
भारत-चीन युद्ध (1962)
भारत और चीन के बीच 1962 में सीमा विवाद के कारण युद्ध हुआ। तिब्बत पर चीन के कब्जे और दलाई लामा को भारत में शरण देने से दोनों देशों के बीच तनाव बढ़ गया। चीन ने अक्साई-चिन क्षेत्र पर कब्जा कर लिया और मैकमैहन लाइन के मुद्दे पर दोनों देशों में विवाद हो गया। अक्टूबर 1962 में, चीन ने बड़े पैमाने पर हमला किया और अरुणाचल प्रदेश के कुछ हिस्सों पर कब्जा कर लिया। हालांकि, चीन ने अंततः एकतरफा युद्धविराम की घोषणा की और अपनी सेना को वापस बुला लिया।
भारत-पाकिस्तान युद्ध (1965)
1965 में कच्छ के रण में विवाद के कारण भारत और पाकिस्तान के बीच दूसरा युद्ध हुआ। पाकिस्तान ने सोचा कि भारत की सेना कमजोर है और कश्मीर पर कब्जा करने का प्रयास किया। इस युद्ध में भारतीय सेना ने पाकिस्तान को कड़ी टक्कर दी और अंततः युद्धविराम पर सहमति बनी।
1971 का भारत-पाकिस्तान युद्ध
3 दिसंबर से 16 दिसंबर 1971 तक
• यह बांग्लादेश मुक्ति संग्राम का परिणाम था, जिसमें बांग्लादेश (तत्कालीन पूर्वी पाकिस्तान) पाकिस्तान (पश्चिम) से स्वतंत्रता प्राप्त करने के लिए संघर्ष कर रहा था।
• युद्ध तब शुरू हुआ जब पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय हवाई अड्डों पर हवाई हमले शुरू कर दिए। इस प्रकार भारत को पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा करनी पड़ी।
3. ताशकंद समझौता
1965 के युद्ध के बाद भारत और पाकिस्तान के बीच ताशकंद समझौता हुआ। सोवियत संघ की मध्यस्थता से यह समझौता हुआ, जिसमें दोनों देशों ने युद्ध के दौरान कब्जाए गए क्षेत्रों से हटने का निर्णय लिया। इस समझौते के बाद, भारत के तत्कालीन प्रधानमंत्री लाल बहादुर शास्त्री का ताशकंद में निधन हो गया।
4. भारत-पाक युद्ध और बांग्लादेश का निर्माण (1971)
1971 का भारत-पाक युद्ध भारत के इतिहास में एक महत्वपूर्ण अध्याय है। पूर्वी पाकिस्तान (अब बांग्लादेश) में उत्पीड़न और अत्याचार के कारण वहां के लोगों ने स्वतंत्रता संग्राम शुरू किया। पाकिस्तान ने 3 दिसंबर 1971 को भारतीय हवाई अड्डों पर हमला किया, जिसके जवाब में भारत ने पाकिस्तान के खिलाफ युद्ध की घोषणा की। इस युद्ध में भारतीय सेना ने विजय प्राप्त की और 16 दिसंबर 1971 को पाकिस्तान ने आत्मसमर्पण कर दिया। इसके परिणामस्वरूप बांग्लादेश एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में उभरा।
5. भारत की आंतरिक नीतियां और आर्थिक विकास
इन युद्धों के अलावा भारत को अपनी आंतरिक नीतियों पर भी ध्यान देना पड़ा। आर्थिक विकास के लिए पंचवर्षीय योजनाएं शुरू की गईं, जिनका उद्देश्य था कृषि, उद्योग, शिक्षा और बुनियादी ढांचे में सुधार करना। 1991 में भारत ने उदारीकरण, निजीकरण और वैश्वीकरण की नीति अपनाई, जिससे देश में आर्थिक विकास को बढ़ावा मिला और भारत वैश्विक मंच पर अपनी जगह बनाने में सफल हुआ।
आजादी के बाद के भारत ने कई चुनौतियों का सामना किया और उनके समाधान की दिशा में प्रयास किए। क्षेत्रीय असमानता, युद्ध, शीत युद्ध, और आंतरिक नीतियों के माध्यम से भारत ने अपने विकास की राह बनाई। विभिन्न राजनीतिक और आर्थिक सुधारों ने भारत को एक मजबूत राष्ट्र बनाने में मदद की। आज भारत विश्व के प्रमुख देशों में गिना जाता है और अपने आर्थिक, सामाजिक और राजनीतिक क्षेत्र में निरंतर प्रगति कर रहा है।
उत्तर की संरचनाः हिंदी 62 भूमिका: पाकिस्तान में राजनीतिक संकट भारत में इंदिरा गांधी का उदय मुख्य भागः सैनिक तानाशाह + याह्या खान मुजीबुर्रहमान (आवामी लीग) शरणार्थी संकट + भारत द्वारा अमेरिका से सहायता लेनें का प्रयास मुक्तिवाहिनी को समर्थन + पाकिस्तान के कई क्षेत्रों पर अधिकार निष्कर्ष: पाकिस्तान का आत्म समर्पण + बांग्लादेश का निर्माण + भारत की भूमिका 64 63 64