हम अवसर चूक गए…
प्रशांत पोळ अंग्रेज जब देश छोड़कर गए, तब भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, क्योंकि हम गुलाम राष्ट्र थे। स्वाभाविक रूप से अंग्रेजों ने हमारा भरपूर शोषण किया। हमारी व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न किया। हमारा विकास करने में अंग्रेजों की रुचि रहने का प्रश्न ही नहीं था। जिन्हें हमारे तत्कालीन नेता विकास मान रहे […] The post हम अवसर चूक गए… appeared first on VSK Bharat.
प्रशांत पोळ
अंग्रेज जब देश छोड़कर गए, तब भारत की आर्थिक स्थिति बहुत अच्छी नहीं थी, क्योंकि हम गुलाम राष्ट्र थे। स्वाभाविक रूप से अंग्रेजों ने हमारा भरपूर शोषण किया। हमारी व्यवस्थाओं को छिन्न-भिन्न किया। हमारा विकास करने में अंग्रेजों की रुचि रहने का प्रश्न ही नहीं था। जिन्हें हमारे तत्कालीन नेता विकास मान रहे थे, जैसे रेलगाड़ी, टेलीफोन, टेलीग्राम, कुछ सड़के आदि… यह सब उन्होंने अपने शासन को सुचारू रूप से चलाने के लिए बनाया था, भारत के विकास के लिए नहीं! तत्कालीन अंग्रेज अफसरों ने ही ऐसा लिख रखा है। किसी जमाने में वैश्विक व्यापार में सिरमौर रहे हम, विश्व व्यापार में मात्र 2.8 प्रतिशत की हिस्सेदारी तक सिमट गए।
ऊपर से विभाजन का भारी बोझ देश पर आ पड़ा था। लगभग एक करोड़ विस्थापित हिन्दू-सिक्ख, अपने ही देश भारत में, शरणार्थी के रूप में आए थे। उनकी व्यवस्था करनी थी।
संक्षेप में कहें, तो अनेक प्रश्न थे। अनेक समस्याएं थीं और अनेक चुनौतियां थीं। किंतु इन्हीं चुनौतियों में अनेक अवसर भी छिपे थे। उन अवसरों का लाभ लेकर हम आगे बढ़ सकते थे। उन्नत राष्ट्र बनने की दिशा में चल सकते थे।
हमारे आसपास जिन राष्ट्रों को स्वतंत्रता मिली, या जो महायुद्ध की आग में जल गए थे, उनके सामने भी यही समस्याएं थीं, यही चुनौतियां थीं।
जापान और जर्मनी तो विश्व युद्ध की ज्वाला में तथा परमाणु बम के विस्फोट में मानो बर्बाद हो गए थे। उनकी युवा पीढ़ी बड़ी संख्या में युद्ध में मारी जा चुकी थी। उनके सामने तो समस्याओं का अंबार था। इजराइल, सिंगापुर, दक्षिण कोरिया, जैसे देश भी, हमें स्वतंत्रता मिलने के आसपास ही स्वतंत्र हुए थे। इन सभी की अपनी-अपनी समस्याएं थीं।
किंतु यह सभी देश, यह सभी राष्ट्र, हिम्मत के साथ खड़े हुए। इन सब ने अपने स्व को पहचाना। अपनी ‘आइडेंटिटी’ तलाशी। अपनी उस पहचान के अभिमान का, गर्व का भाव, अपने देशवासियों में जगाया। और धीरे-धीरे यह सारे राष्ट्र उठ खड़े हुए।
इजराइल का ही उदाहरण लेते हैं। 14 मई 1948 को इजराइल आधिकारिक रूप से राष्ट्र बन कर सबके सामने आया। यहूदियों की पुरानी मातृभूमि, बाद में पॅलेस्टाईन बन गई थी। इसी पॅलेस्टाईन के एक हिस्से में इजरायल की नींव रखी गई।
किंतु जब इजराइल बना, तो समस्या सामने आई कि, इस देश की भाषा कौन सी होगी? इस प्रश्न का स्वाभाविक उत्तर तो हिब्रू ही था। क्योंकि हिब्रू ही यहूदियों की (ज्यू लोगों की) अधिकृत भाषा और धार्मिक भाषा थी। किंतु इसमें भी एक पेंच था। सैकड़ों वर्षों से हिब्रू में कोई नया साहित्य ना लिखे जाने के कारण हिब्रू मृत भाषा (dead language) बन गई थी। लगभग दो हजार वर्षों से हिब्रू किसी भी देश की राज भाषा तो थी ही नहीं, अपितु लोक भाषा भी नहीं बन सकी थी। विश्व भर में बिखरे यहूदी, कुछ धार्मिक अवसरों पर ही हिब्रू का प्रयोग करते थे। इसलिए आधुनिक हिब्रू तैयार करने में कड़े परिश्रम की आवश्यकता थी।
दूसरी भी एक समस्या थी। इजरायल बनने के बाद, विश्व के सभी देशों से यहूदी वहां बसने के लिए आ रहे थे। वह स्थानीय भाषा, अर्थात उनके देश की भाषा, बोलते थे। हंगरी, पोलैंड, जर्मनी, रूस, चेकोस्लोवाकिया आदि अनेक देशों से यहूदी वहां आ रहे थे। अपने भारत से भी बड़ी संख्या में यहूदी वहां गए। भारत में अधिकांश यहूदी पश्चिमी तट के गांवों में बसे थे। विशेषतया महाराष्ट्र में ज्यादा। इस समूह को ‘बेने इजरायली’ या ‘बेने ज्यू’ समूह कहा जाता था। प्रसिद्ध सिने कलाकार डेविड, सुलोचना (रुबी मायर), राजकपूर के मित्र और पत्रकार बनी रुबेन आदि यहूदी (ज्यू) ही थे। ये सारे लोग मराठी बोलते थे।
भाषा की इतनी विविधता होने के कारण एक विचार यह सामने आया कि अंग्रेजी पूरे विश्व की संपर्क भाषा है, अतः अंग्रेजी को ही कुछ दिनों तक संपर्क भाषा के रूप में चलाएंगे। हिब्रू को बाद में कैसे लागू करना, यह देख लेंगे।
किंतु यहूदी नेतृत्व के सामने अपने लक्ष्य के बारे में स्पष्टता थी। अत्यधिक विरोध के बाद बने नए राष्ट्र में उन्हें सबको जोड़कर रखना था। इसलिए भाषा प्रभावी साधन और माध्यम था। अतः तत्कालीन यहूदी नेतृत्व ने निर्णय लिया, हम हिब्रू को ही अपनाएंगे।
अब हिब्रू का निर्णय तो लिया। इसको लागू कैसे करेंगे…?
इस पर, नई इजरायली सरकार ने सर्वप्रथम आधुनिक हिब्रू का पाठ्यक्रम तैयार किया। यह बनाने में सबसे ज्यादा मेहनत की थी, एलिजर बेन यहूदा ने। इन्हें आधुनिक हिब्रू का पितामह कहा जाता है। वीर सावरकर जी ने जैसे महापौर, नगर पालिका, दूरदर्शन, प्राध्यापक, नेतृत्व, दिनांक, हुतात्मा, दूरभाष, चित्रपट, उपस्थित, स्तंभ, प्राचार्य… आदि नए शब्दों की रचना की थी, वैसे ही एलिजर बेन यहूदा ने हिब्रू में अनेक नए शब्द तैयार किये, और भाषा संपन्न की।
फिर इजराइल ने 1948 के अंत से 1953 तक, पांच वर्षों में, संपूर्ण इजराइल को हिब्रू सिखाने की योजना तैयार की। पूरे विश्व में यह सबसे अनूठी योजना थी।
योजना के अंतर्गत, आधुनिक हिब्रू का मानक पाठ्यक्रम तैयार किया गया। पूरे देश में, जो भी हिब्रू जानता है, ऐसे लोगों की सूची बनाई गई। उन सभी को हिब्रू के पाठ्यक्रम का क्रैश कोर्स जैसा प्रशिक्षण दिया गया। इन प्रशिक्षित लोगों में कोई डॉक्टर था, कोई बढ़ई, कोई बैंक कर्मचारी, कोई प्राध्यापक, कोई इंजीनियर तो कोई गृहिणी थे।
इन सभी को कहा गया – ‘आप को अपने निकट की शाला में जाकर बच्चों को हिब्रू सीखाना है’।
समय भी नियत किया गया – प्रात 11:00 से 1:00 बजे। रविवार से गुरुवार। (शुक्रवार, शनिवार को इजराइल में सार्वजनिक छुट्टी होती है) इन सभी प्रशिक्षित हिब्रू शिक्षकों को, उनके कार्यस्थल के निकट के स्कूल, (पाठशाला) से जोड़ा गया। इनमें से जो नौकरी करते थे, उनके मालिकों को बताया गया कि सप्ताह में पांच दिन, इन्हें प्रातः 11:00 से दोपहर 1:00 तक छुट्टी देना अनिवार्य है।
अब ये प्रशिक्षित हिब्रू के अध्यापक, अपने निकट की शालाओं में जाकर बच्चों को हिब्रू पढ़ाने लगे!
इस पद्धति से बच्चे तो भाषा सीख जाएंगे। पर बड़ों का क्या?
इसके बारे में भी इजराइल सरकार ने सोच रखा था। प्रतिदिन रात को 7 से 8, बच्चे अपने घर पर, अपने माता-पिता को हिब्रू पढ़ाएंगे। परंतु यदि बच्चे पढ़ाने में गलती करते हैं, या फिर जिनके घर में बच्चे ही नहीं है, उनका क्या?
इसके बारे में भी योजना तैयार थी।
सभी बड़े, बुजुर्गों के लिए, शाम को 7 से 8 बजे, रेडियो इजराइल से हिब्रू का पाठ्यक्रम, जो उस दिन शाला में बच्चों को सिखाया गया है, ब्रॉडकास्ट किया जाता था। उन दिनों इजराइल की सड़कों पर, सप्ताह के पांच दिन, रात को 7:00 बजे से 8:00 बजे तक मानो कर्फ्यू लगा होता था। पूरा सन्नाटा, सारा इजराइल अपने-अपने घरों में बैठकर हिब्रू पढ़ रहा होता था।
1953 में जब यह अभियान बंद हुआ, तब तक सारा इजराइल हिब्रू पढ़ रहा था / लिख रहा था / हिब्रू सुन रहा था / हिब्रू में बोल रहा था..!
आज यदि विश्व में कोई भी, ऑप्टिक्स, इरीगेशन और साइबर सिक्योरिटी पर नया, कुछ लेटेस्ट पढ़ना चाहता है, या शोध करना चाहता है, तो उसे हिब्रू आना अनिवार्य है!
इजराइल का तत्कालीन नेतृत्व जानता था कि देश को अगर एकजुट रखना है, तो सारे व्यवहार स्वभाषा में ही होने चाहिए। इसलिए उन्होंने एक मृत भाषा को विश्व की, न केवल आधुनिक भाषा बनाया, वरन् ज्ञान भाषा और व्यापार की भाषा भी बनाया।
किसी मृत भाषा को इस प्रकार से जीवित करने का, विश्व का यह अनूठा उदाहरण है।
जैसा इजराइल ने किया, वैसे ही भारत के साथ स्वतंत्र हुए दक्षिण कोरिया जैसे देश ने भी किया। इन्हीं के साथ, विनाश की गर्त से उठकर खड़े होने वाले जापान और जर्मनी ने भी किया। इन देशों ने अपनी पहचान, अपने ‘स्व’ का अभिमान, देश के नागरिकों के सामने रखा और उन्हें राष्ट्र का पुनर्निर्माण करने के लिए प्रेरित किया।
भारत में भी अंग्रेजों द्वारा बर्बाद की गई सभी व्यवस्थाएं फिर से खड़ी करनी थी। उन्होंने 150 से ज्यादा वर्षों से भारतीय मानसिकता पर जो औपनिवेशिकता का आवरण चढ़ाया था, उसे कुरेदकर निकालना आवश्यक था।
भारत के सामने यह एक जबरदस्त अवसर था, नया भारत बनाने का। बलशाली, वैभव संपन्न और तेजस्वी भारत के पुनर्निर्माण का।
किंतु, हम यह अवसर चूक गए…!
(‘इंडिया से भारत: एक प्रवास’ पुस्तक के अंश। यह पुस्तक हिन्दी के साथ ही मराठी, तेलुगु, गुजराती और अंग्रेजी में भी प्रकाशित हो रही है।)
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