पुस्तक समीक्षा – ‘स्त्री’ एक, दृष्टियां अनेक….

वत्सला चौहान आज यदि हम रिलीजियस और राजनीतिक विचारों को कुछ देर के लिए किनारे रख दें और फिर पूरे विश्व की महिलाओं के बारे में सोचें, तो प्राकृतिक और जैविक रूप से सभी समान हैं, वैसे ही जैसे सारे पुरुष। लेकिन जब हम उन्हें रिलिजन और वैचारिक दृष्टियों से देखना शुरू करते हैं, तस्वीर […] The post पुस्तक समीक्षा – ‘स्त्री’ एक, दृष्टियां अनेक…. appeared first on VSK Bharat.

Sep 9, 2026 - 17:00
 0
पुस्तक समीक्षा – ‘स्त्री’ एक, दृष्टियां अनेक….

वत्सला चौहान

आज यदि हम रिलीजियस और राजनीतिक विचारों को कुछ देर के लिए किनारे रख दें और फिर पूरे विश्व की महिलाओं के बारे में सोचें, तो प्राकृतिक और जैविक रूप से सभी समान हैं, वैसे ही जैसे सारे पुरुष। लेकिन जब हम उन्हें रिलिजन और वैचारिक दृष्टियों से देखना शुरू करते हैं, तस्वीर बदल जाती है। अब कहीं वह ‘औरत’ है, कहीं ‘ईव’ और ‘वुमन’। कम्युनिज्म की दृष्टि में वह ‘शोषित और पीड़ित वर्ग’ है तो बाजारवादी व्यवस्था में ‘ऑब्जेक्टिफाइड ऑब्जेक्ट’। भारत में उसके लिए ‘स्त्री’, ‘महिला’ जैसे शब्द प्रचलित हैं।

डॉ. शुचि चौहान की पुस्तक ‘स्त्री’ इन्हीं अलग-अलग दृष्टियों में स्त्री के प्रति सोच को पाठकों के सामने रखती है। लेखिका का कहना है कि उपर्युक्त सम्बोधन महज शब्द नहीं हैं, बल्कि उस दृष्टि को भी व्यक्त करते हैं, जिसके अंतर्गत किसी समाज और विचार ने स्त्री को देखा और परिभाषित किया है।

पुस्तक ‘स्त्री’, स्त्री को किसी एक विचार या सामाजिक व्यवस्था के दायरे में सीमित नहीं करती। इसकी यात्रा भारतीय दृष्टि से शुरू होकर इस्लामी और ईसाई दृष्टियों से होते हुए साम्यवादी विचार और बाजारवाद तक जाती है। इसके बाद पश्चिमी समाज में उभरे पितृसत्ता, व्यक्तिवाद, लिव-इन रिलेशनशिप, ‘माय बॉडी, माय चॉइस’ और वोकिज्म जैसे विचारों के माध्यम से आज के स्त्री-विमर्श को समझने का प्रयास करती है।

पुस्तक की शुरुआत भारतीय स्त्री-दृष्टि से होती है। ‘स्त्री ब्रह्म स्वरूपा’, ‘स्त्री-पुरुष परस्पर पूरक’, ‘विवाह एक पवित्र बंधन’, ‘मातृत्व स्त्री जीवन की पूर्णता’ और ‘परिवार की धुरी स्त्री’ जैसे विषय भारतीय सामाजिक और सांस्कृतिक दृष्टि में स्त्री की भूमिका को सामने रखते हैं। वैदिक काल से आधुनिक भारत तक की यात्रा में लेखिका यह बताने का प्रयास करती है कि भारतीय परंपरा में स्त्री को किसी एक भूमिका में बांधकर नहीं देखा गया। वह शक्ति भी है, सृजन का आधार भी, परिवार की केंद्र बिंदु भी और सामाजिक जीवन की सक्रिय सहभागी भी।

इसके बाद पाठक एक बिल्कुल अलग सामाजिक और मजहबी संदर्भ में प्रवेश करता है – इस्लामी स्त्री-दृष्टि। स्त्री की उत्पत्ति, पुरुष-स्त्री संबंध, पर्दा, निकाह, हलाला और युद्ध में बंदी बनाई गई स्त्रियों जैसे विषयों के माध्यम से पुस्तक उन प्रश्नों को सामने लाती है, जिन पर आज भी समाज में बहस जारी है।

इसके बाद पुस्तक ईसाई स्त्री-दृष्टि की ओर बढ़ती है। पुस्तक के इस अध्याय में ‘ईव’, ‘ओरिजिनल सिन’ और ‘विच हंट’ जैसे प्रसंगों के माध्यम से यूरोप के रिलीजियस और सामाजिक इतिहास की उन परतों को सामने लाया गया है, जिन्होंने स्त्री की सामाजिक छवि को गहराई से प्रभावित किया। ‘विच हंट’ का प्रसंग विशेष रूप से ध्यान खींचता है। यह याद दिलाता है कि आज विकसित, आधुनिक और उदार कहे जाने वाले यूरोप और अमेरिका का स्त्री-इतिहास इतना उजला नहीं रहा, जितना वर्तमान की चमक उसे दिखाती है।

पुस्तक का अगला पड़ाव है कम्युनिस्ट स्त्री-दृष्टि। यहां स्त्री-शोषण, आर्थिक निर्भरता, सामाजिक संरचना और सशक्तिकरण जैसे प्रश्न सामने आते हैं। साम्यवादी विचार में स्त्री की मुक्ति को आर्थिक स्वतंत्रता से जोड़कर देखने की प्रवृत्ति पर चर्चा करते हुए पुस्तक एक महत्वपूर्ण प्रश्न उठाती है – क्या आर्थिक स्वतंत्रता ही स्त्री के लिए सब कुछ है? या फिर उसके जीवन में परिवार, भावनात्मक संबंध, मातृत्व और सामाजिक जुड़ाव की भी महत्वपूर्ण भूमिका है?

यही प्रश्न आगे बाजारवादी स्त्री-दृष्टि के संदर्भ में और गहरा हो जाता है। सौंदर्य प्रतियोगिताएं, विज्ञापन, सोशल मीडिया, ‘वायरल होना ही सफलता’, स्त्री-देह का वस्तुकरण और उत्पादों की पैकेजिंग में मातृत्व आदि सभी ऐसे विषय हैं जो आज की दुनिया से सीधे जुड़े हैं। इस हिस्से से गुजरते हुए पाठक अपने आसपास की विज्ञापन और डिजिटल दुनिया को एक अलग नजर से देखने लगता है। जिस स्त्री को एक ओर स्वतंत्र उपभोक्ता बताया जाता है, वहीं दूसरी ओर वह बाजार के लिए एक बिकाऊ वस्तु में बदल दी जाती है।

‘माय बॉडी, माय चॉइस’, पुस्तक के सबसे समकालीन हिस्सों में से एक है। सहमति, निजी स्वतंत्रता, विवाह, मातृत्व और अपनी देह पर अधिकार जैसे प्रश्नों को पश्चिमी समाज में हुए आंदोलनों के संदर्भ में रखा गया है। #MeToo से लेकर ‘चाइल्ड फ्री’ जैसे विचारों तक लेखिका यह बताने का प्रयास करती है कि आधुनिक स्त्री-विमर्श में स्वतंत्रता की परिभाषा किस तरह बदल गई है।

पुस्तक सशक्तिकरण की प्रचलित अवधारणा पर भी प्रश्न खड़ा करती है। क्या स्त्री को सशक्त बनाने का अर्थ केवल पुरुष से बराबरी है? या उसके अपने अनुभवों, आवश्यकताओं, क्षमताओं और चॉइस को समझना भी इसका हिस्सा है? क्या स्वतंत्रता का अर्थ सिर्फ अपने बारे में सोचना ही है या परिवार व समाज का हित भी इसमें समाहित होना चाहिए?

पुस्तक के अंतिम भाग में जब प्रश्न आता है – ‘भारत पश्चिम के निशाने पर क्यों?’ – तो पूरी चर्चा एक बार फिर भारतीय संदर्भ में लौटती है। पुस्तक कहती है कि यहां प्रश्न किसी विचार को स्वीकार या अस्वीकार करने का नहीं, बल्कि उसे भारतीय समाज की अपनी परिस्थितियों, परिवार व्यवस्था और सांस्कृतिक अनुभवों की कसौटी पर समझने का है।

पुस्तक की विषय-वस्तु समसामयिक और गंभीर है। यह जीवन से जुड़े – विवाह, प्रेम, परिवार, मातृत्व, देह, करियर, सोशल मीडिया, स्वतंत्रता और पहचान जैसे विषयों को बेबाकी से उठाती है। वास्तव में केवल स्त्री पर लिखी गई पुस्तक नहीं है। यह स्त्री को देखने वाली दृष्टियों पर एक संवाद है, जो पाठक को अपने आसपास की दुनिया को नए सिरे से देखने के लिए विवश करता है। पुस्तक पाठकों को झकझोर देती है। यह किसी भी विषय पर अपना मत देने के बजाय स्त्री विचारों से जुड़ी शोधपरक पृष्ठभूमि पाठकों के सामने रखती है और उन्हें स्वयं विचार करने के लिए छोड़ देती है।

स्त्री इतिहास और भारत में चल रहे स्त्री विमर्श को जानने और समझने की इच्छा रखने वाले लोगों को यह पुस्तक अवश्य पढ़नी चाहिए। पुस्तक एमेजॉन और सुरुचि प्रकाशन पर भी उपलब्ध है।

 

पुस्तक – स्त्री

लेखिका – डॉ. शुचि चौहान

प्रकाशक – ज्ञान गंगा प्रकाशन

मूल्य – ₹180

पृष्ठ – 136

The post पुस्तक समीक्षा – ‘स्त्री’ एक, दृष्टियां अनेक…. appeared first on VSK Bharat.

UP HAED सामचार हम भारतीय न्यूज़ के साथ स्टोरी लिखते हैं ताकि हर नई और सटीक जानकारी समय पर लोगों तक पहुँचे। हमारा उद्देश्य है कि पाठकों को सरल भाषा में ताज़ा, विश्वसनीय और महत्वपूर्ण समाचार मिलें, जिससे वे जागरूक रहें और समाज में हो रहे बदलावों को समझ सकें।