हनुमान अंश – जैसा मैंने देखा
एक बार सिनेमाघरों से लौट जाने के बाद फिर से बड़े पर्दे में अपने बलबूते आने वाली फ़िल्म हनुमान अंश….. आज के दौर में जब फिल्में अक्सर बड़े नामों, बड़े बजट व बड़े नेटवर्क के सहारे चलती हैं, उसी दौर में ‘हनुमान अंश’ एक बेहद पवित्र हवा का झोंका लेकर आती है। यह फिल्म केवल […] The post हनुमान अंश – जैसा मैंने देखा appeared first on VSK Bharat.
एक बार सिनेमाघरों से लौट जाने के बाद फिर से बड़े पर्दे में अपने बलबूते आने वाली फ़िल्म हनुमान अंश…..
आज के दौर में जब फिल्में अक्सर बड़े नामों, बड़े बजट व बड़े नेटवर्क के सहारे चलती हैं, उसी दौर में ‘हनुमान अंश’ एक बेहद पवित्र हवा का झोंका लेकर आती है। यह फिल्म केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि एक आध्यात्मिक वृत्ति की अनुभूति है जो दर्शकों को हँसाने-रुलाने की सांसारिक चेष्टा के बजाय उसके भीतर के मनुष्य को जगाने का प्रयास करती है। फ़िल्म के सूत्रधार विशाल चतुर्वेदी की सिनेमाई समझ और दूरदर्शिता फ़िल्म को एक अलग आयाम देती है।
फिल्म की शुरुआत डॉ. राम नंदन भोसले (चंदन आनंद) द्वारा अपने पोते को नीम करोली बाबा की कहानी सुनाने से होती है। कहानी एक बालक लक्ष्मी नारायण से शुरू होती है, जो माँ के देहांत के बाद ईश्वर की खोज में निकल पड़ता है। यहां पर पृष्ठभूमि संगीत (बैकग्राउंड म्यूजिक) में भावुकता और सहजता का बेहद सधा मिश्रण है जो इस फ़िल्म की गहराई को अंतरतम में उतार देता है। यह यात्रा धीरे-धीरे लक्ष्मी को नीम करोली बाबा के रूप में स्थापित करती है। वह एक ऐसे संत हैं जो चमत्कारों से नहीं, अपितु निःस्वार्थ सेवा, प्रेम और करुणा से भक्ति को जीवन का प्रकाश स्तम्भ बनाते हैं।
शोभिनव सत्या का अभिनय फिल्म की अन्तरात्मा है। उनके फ़िल्म के प्रमुख अभिनेता बनने की पृष्ठभूमि भी अत्यंत आश्चर्यजनक ही है, यह रोल जिसे करना था उसकी तबियत खराब होने के कारण इस कम बजट वाली फिल्म को बीच में रोकना या पुनः शूट करना बहुत मुश्किल था। उसी समय निर्देशक विशाल ने फर्स्ट एडी शोभिनव के चेहरे पर बाबा को देख लिया, बस यहीं से शोभिनव को मुख्य अभिनय हेतु कास्ट कर लिया गया। उनकी आँखों में वह शांति, आत्मविश्वास और करुणा है, जो दर्शक को बाबा के करीब ले जाती है। वे बाबा को न तो अति-नाटकीय बनाते हैं, न ही अति-सरल,
उनका प्रदर्शन संतुलित, प्रभावशाली और हृदयस्पर्शी है। बाबा की शारीरिक भाषा पर फ़िल्म की टीम ने अच्छा काम किया है। विहान शेजगे ने 13 वर्षीय लक्ष्मी (बाबा) के किरदार को बहुत अच्छे से निभाया है। विहान का अभिनय भावनात्मक गहराई से भरपूर है। उनकी मासूमियत, जिज्ञासा और आध्यात्मिक खोज को पर्दे पर उतारने का तरीका प्रशंसनीय है। चंदन आनंद ने डॉ. राम नंदन भोसले के किरदार को निभाया है, जो फिल्म की कहानी कहते हैं। अतः मूल फ़िल्म व कहानी एक साथ चलती है। पूर्णिमा तिवारी ने बाबा की पत्नी रामबेटी (कुछ स्रोतों में राम दुलारी) के किरदार को निभाया है। उनका किरदार एक ऐसी महिला का है, जो बाबा के आध्यात्मिक मार्ग का सम्मान करती है। संवाद कुछ प्रेम के अस्तित्व में होते हुए भी मर्यादित हैं और कहने की शैली भी अत्यंत सहज है। भगवान दास पटेल ने गोपाल दास बहेलिया के किरदार को निभाया है। पद्मश्री प्राप्त लखनऊ के ही अनिल रस्तोगी (महंत जी) के किरदार ने फिल्म में आध्यात्मिक मार्गदर्शक की भूमिका निभाई। अंतिम में कहानी बाबा के नीम करोली छोड़ने पर समाप्त होती है, किंतु कथा यह विशेष है…पंक्ति हमें सीक्वल के प्रतीक्षा की श्रेणी में खड़ा कर देती है।
अब बात आती है फ़िल्म के संगीत की, फिल्म का संगीत पारंपरिक भजनों, कीर्तनों और लोक संगीत को आधुनिक संगीत व्यवस्था के साथ जोड़ता है। साधु तिवारी, ऋषि पाठक, श्रेयस धर्माधिकारी और अन्य संगीतकारों ने फिल्म को एक भक्तिमय, आध्यात्मिक माहौल दिया है। “हृदय में जिनके सीताराम”, “जय हनुमान” जैसे गीत केवल मनोरंजन नहीं, बल्कि प्रार्थना बनकर उभरते हैं। संगीत फिल्म की आत्मा बन जाता है और दर्शक को आध्यात्मिक अनुभव की ओर ले जाता है।
विशाल बावा का छायांकन और शंख राज्याध्यक्ष का संपादन फिल्म की सादगी को बनाए रखते हुए कहानी की गति को संभालता है। दृश्य एकदम उस कालखंड के वातावरण व पहचान को उकेरते हुए अति-रंगीन या अति-नाटकीय नहीं, बल्कि वास्तविक और अच्छे लगने वाले हैं।
विशाल चतुर्वेदी, फिल्म के निर्देशक तो हैं ही साथ ही लेखक, पटकथाकार, संवाद लेखक, निर्माता और गायक भी हैं। उनकी यह बहुआयामी भूमिका फिल्म की हर परत में उनके व्यक्तिगत लगाव और दृष्टि को स्पष्ट रूप से दर्शाती है। विशाल चतुर्वेदी का निर्देशन शांत, संयमित और भावनात्मक गहराई से भरपूर है। एकक साक्षात्कार में उन्होंने बताया कि फिल्म बनाते समय कई संकट आए, लेकिन 43 दिनों तक हनुमान चालीसा का पाठ और नीम करोली बाबा की आराधना करने के बाद फिल्म पूरी हुई।
लगभग ₹2 करोड़ के बजट में बनी यह फिल्म 60 करोड़ से अधिक कमा चुकी है जो साबित करता है कि आज के दौर में सच्ची कहानी और भावनाएं बड़े स्टारकास्ट से ज्यादा देखी और समझी जाती हैं।
आज के तनावग्रस्त, स्क्रीन टाइम के भौतिकवादी दौर में यह फिल्म एक शांत, प्रेरणादायक और भावनात्मक संदेश देती है। इसलिए फ़िल्म की समाप्ति पर पूरे सिनेमाहाल में एक अलग ही आध्यात्मिक और हृदय को गदगद करने वाला माहौल बनना स्वाभाविक रहता है।
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