समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना ही संघ का उद्देश्य – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर महानगर के घोष पथक के इतिहास पर आधारित हस्तलिखित ग्रंथ ‘राष्ट्र स्वराधना’ का लोकार्पण नागपुर। रेशीमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृतिमंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में नागपुर महानगर के घोष पथक के इतिहास पर आधारित ‘राष्ट्र स्वराधना’ नामक हस्तलिखित ग्रंथ के लोकार्पण अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ […] The post समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना ही संघ का उद्देश्य – डॉ. मोहन भागवत जी appeared first on VSK Bharat.

Apr 10, 2026 - 08:41
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समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना ही संघ का उद्देश्य – डॉ. मोहन भागवत जी

नागपुर महानगर के घोष पथक के इतिहास पर आधारित हस्तलिखित ग्रंथ ‘राष्ट्र स्वराधना’ का लोकार्पण

नागपुर। रेशीमबाग स्थित डॉ. हेडगेवार स्मृतिमंदिर परिसर में आयोजित कार्यक्रम में नागपुर महानगर के घोष पथक के इतिहास पर आधारित ‘राष्ट्र स्वराधना’ नामक हस्तलिखित ग्रंथ के लोकार्पण अवसर पर सरसंघचालक डॉ. मोहन भागवत जी ने कहा कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के घोषदल में विभिन्न वाद्य यंत्र होते हैं, जिनके स्वर और ध्वनि अलग-अलग होते हुए भी स्वयंसेवक एक ही ताल पर चलते हैं। इससे समन्वय और एकता की भावना विकसित होती है। जब कोई कार्य मन से और पूरी निष्ठा के साथ किया जाता है, तो उसका परिणाम इसी रूप में प्रकट होता है और सत्यम-शिवम-सुंदरम का अनुभव होता है। समाज और राष्ट्र में सत्यम, शिवम और सुंदरम की स्थापना करना ही संघ का उद्देश्य है।

इस अवसर पर विदर्भ प्रांत संघचालक दीपक जी तामशेट्टीवार, सह संघचालक श्रीधरजी गाडगे, महानगर संघचालक राजेश जी लोया उपस्थित रहे। कार्यक्रम के दौरान नागपुर महानगर घोष वादकोंने विभिन्न रचनाएँ एवम प्रात्यक्षिक प्रस्तुत किए ।

सरसंघचालक जी ने कहा कि संघ के सभी कार्यक्रमों का उद्देश्य संस्कारों का निर्माण करना है। सुदृढ़ शरीर और संस्कारित मन के समन्वय से गुणवत्तापूर्ण जीवन की दिशा में आगे बढ़ना ही लक्ष्य है। इस दृष्टि से ‘राष्ट्र स्वराधना’ का हस्तलिखित इतिहास अत्यंत महत्वपूर्ण है। समय बीत जाता है, कार्य खड़ा हो जाता है, परंतु जो मौलिक गुणवत्ता शुरुआत में थी, उसे अंत तक बनाए रखना यह महत्वपूर्ण बात है। हमने कार्य विकट परिस्थिति में कैसे खड़ा किया और किस उद्देश्य से किया, इसका सदैव स्मरण यह हस्तलिखित ग्रंथ देने वाला है । स्वयंसेवक पेशेवर गायक या वादक न होते हुए भी, अपने दैनिक कार्यों को संभालते हुए, बिना सामने कागज रखे इतनी सारी रचनाएँ कैसे प्रस्तुत कर लेते हैं – इस पर लोगों को आश्चर्य होता है। परंतु चमत्कार करना संघ का उद्देश्य नहीं होता, वह तो स्वयं घटित हो जाता है। पूर्व स्वयंसेवकों के सद्गुण इन रचनाओं में मिलते हैं और दिखाई देते हैं। भाव तभी उत्पन्न होता है, जब वादक मनःपूर्वक वादन करता है। इसे केवल एक कर्तव्य नहीं, बल्कि अंतरात्मा से जुड़ी बात समझकर करना चाहिए। संघ का उद्देश्य अपना नाम स्वर्ण अक्षरों में दर्ज कराना नहीं है, क्योंकि इस सौ वर्षों की यात्रा का श्रेय जनता, समाज और देश को जाता है। समाज को संगठित करने के लक्ष्य की प्राप्ति के लिए उन्होंने अधिक संगठित और व्यापक प्रयासों की आवश्यकता है।

संघ देश को दिशा दिखाने वाली शक्ति रूप में खड़ा

उन्होंने कहा कि संघ का कार्य किसी की कृपा से आगे नहीं बढ़ा और न ही किसी की अवकृपा से रुका है। यह स्वयंसेवकों के परिश्रम से साकार हुआ है। संघ को अपना मानकर संघ के विचार के अनुसार राष्ट्र का स्वरूप खड़ा करने में सभी स्वयंसेवकों ने अपनी पूरी शक्ति लगा दी, इसीलिए संघ आज देश को दिशा दर्शन करने वाली शक्ति का रूप लेकर खड़ा है। राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ का इस वर्ष शताब्दी वर्ष है। संगठन के निरंतर कार्य को सौ वर्ष पूर्ण होने के उपलक्ष्य में यह कोई उत्सव (सेलिब्रेशन) नहीं है, बल्कि यह आत्मावलोकन का अवसर है – पूर्वजों का स्मरण करते हुए और अधिक उन्नत स्थिति की ओर बढ़ने का प्रयास है। आज के स्वयंसेवकों की भी जिम्मेदारी है कि वे अपने पूर्वजों के कार्यों का मूल्यांकन करें और स्वयं को उनके साथ तुलना कर आगे बढ़ें। पूर्वजों द्वारा किए गए कार्य को केवल सुरक्षित रखना ही नहीं, बल्कि उसे और अधिक उन्नत रूप में आगे ले जाना वर्तमान पीढ़ी का कर्तव्य है।

शरीर के अभ्यास से मन बनता है

हिन्दू समाज को संगठित करने वाले का, स्वर में स्वर मिलाकर, कदम से कदम मिलने का अभ्यास होना चाहिए। घोषदल शारीरिक विभाग के साथ कार्य करता है। शरीर की कृति मन पर परिणाम करती है, मन के विचार शरीर को बनाते हैं और दिग्दर्शित करते हैं। लेकिन उल्टा भी होता है, शरीर के अभ्यास से मन बनता है, यह सर्वविदित सत्य है, वैज्ञानिक सत्य है।

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