छोटी 2 फिल्मों गहराई से नहीं उठा छोरियों का मुद्दा
The issue of girls was not raised deeply in these two short films , गहराई से नहीं उठा छोरियों का मुद्दा
छोटी 2 फिल्मों गहराई से नहीं उठा छोरियों का मुद्दा
हारर फिल्मों में दृश्यों को देखकर या सिरहन का भाव आ जाता है। अगर उसके साथ अहम मुद्दे को जोड़ा जाए तो रुचि जागना स्वाभाविक है। करीब चार साल पहले अमेजन प्राइम वीडियो पर आई हारर फिल्म 'छोरी' में कन्या भ्रूणहत्या के मुद्दे को रोचक तरीके से उठाया था। यह फिल्म वर्ष 2017 में आई मराठी फिल्म 'लपाछप्पी' का रीमेक थी। छोरी में किसी गांव का नाम नहीं था, लेकिन बोलचाल से अंदाजा लगाया जा सकता था कि कहानी हरियाणा की है। अब विशाल फुरिया उसी कहानी को आगे बढ़ाते हुए छोरियों से जुड़े बाल विवाह के मुरे को 'छोरी 2' में लाए हैं, लेकिन यह उत्सुकता बनाए रखने या डराने में असफल रहती है।
कहानी अब सात साल आगे बढ़ चुकी है। साक्षी (नुसरत भरुचा) अपनी सात साल की बेटी ईशानी (हार्दिका शर्मा) के साथ रहती है। ईशानी के साथ समस्या है कि वह धूप में नहीं जा सकती, क्योंकि सूरज की रोशनी में उसकी त्वचा झुलस जाती है। वह इंस्पेक्टर समर (गशमीर महाजनी के घर पर रहती है। साक्षी को डर सताता है कि कहीं उसका पति राजवीर (सौरभगोयल) वापस न आ जाए। एक दिन अचानक उसकी बेटी का अपहरण हो जाता है। समर भी ईशानी की खोज में जुटता है। फिर पता चलता है कि गांव के प्रधान आदिमानव है। यह बीमार हैं। वह कई सालों से गुफा में रह रहे हैं। उनकी पत्नी, जिन्हें दासी मां (सोहा अली खान) कहा जाता है, ईशानी से शादी करवाने की तैयारी में हैं।
दरअसल, वृद्ध प्रधान को कुंवारी कन्याओं से यौवन मिलता है। अब साक्षी की चुनौती बेटी को बचाना है। विशाल फुरिया और अजित जगताप द्वारा लिखी कहानी और स्क्रीनप्ले में दासी मां, प्रधान, इंस्पेक्टर समर जैसे कई नए पात्रों को जोड़ा गया है। उन्होंने भूल भुलैया सरीखी सुरंगे, पुराने कुएं, आदिमानव और पुरानी कुप्रथा के जरिए परिवेश को डरावना दर्शाने का प्रयास किया है, लेकिन कमजोर पटकथा के कारण कहानी प्रभावी नहीं बन पाई। दासी मां घर बैठे बाहरी दुनिया और प्रेत को देख सकती हैं। सुरंगों में साक्षी के भटकने के दृश्यों में दोहराव है। क्लाइमेक्स जल्दबाजी में निपटाया गया है। हारर फिल्म होने के बावजूद डर का एहसास ही नहीं होता। हालांकि कलाकारों ने उसे अभिनय से साधने का प्रयास किया है। साक्षी की भूमिका में नुसरत भरूचा ने मां की संवेदनाओं व दर्द को संजीदगी से पर्दे पर उतारा है। बाल कलाकार हार्दिक शर्मा का काम उल्लेखनीय है। सोहा अली को नकरात्मक पात्र में देखना दिलचस्प है। सौरभ गोयल का अभिनय भी सराहनीय है। बैकग्राउंड संगीत प्रभावशाली नहीं बन पाया है। उम्दा कलाकारों की मौजूदगी के बावजूद फिल्म छोरियों के मुद्दे को गहराई से नहीं उठा पाती है।