‘युग प्रवर्तक डॉ. हेडगेवार’ नाटक का प्रभावशाली मंचन – एक युग का अवतरण

विजय मनोहर तिवारी यह किसी नाटक का अत्यंत प्रभावशाली मंचन भर नहीं है। यह एक युग का अवतरण है। यह अपने ही इतिहास से साक्षात्कार है। भोपाल के रंगमंच पर ढाई घंटे की प्रभावशाली प्रस्तुति स्वाधीनता के लिए जूझ रहे भारत की गाथा पर केंद्रित थी। जब विदेशी आक्रमणकारियों के साथ चलता रहा हजार वर्षों […] The post ‘युग प्रवर्तक डॉ. हेडगेवार’ नाटक का प्रभावशाली मंचन – एक युग का अवतरण appeared first on VSK Bharat.

Jul 24, 2026 - 17:18
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‘युग प्रवर्तक डॉ. हेडगेवार’ नाटक का प्रभावशाली मंचन – एक युग का अवतरण

विजय मनोहर तिवारी

यह किसी नाटक का अत्यंत प्रभावशाली मंचन भर नहीं है। यह एक युग का अवतरण है। यह अपने ही इतिहास से साक्षात्कार है।

भोपाल के रंगमंच पर ढाई घंटे की प्रभावशाली प्रस्तुति स्वाधीनता के लिए जूझ रहे भारत की गाथा पर केंद्रित थी। जब विदेशी आक्रमणकारियों के साथ चलता रहा हजार वर्षों का संघर्ष अपने अंतिम छोर तक जा रहा था।

बीती सदी में भारत के इतिहास पर गहरा असर डालने वाली महान विभूतियों को एक साथ मंच पर देखना रोमांचक भी था और प्रेरक भी। महर्षि अरविंदो, नेताजी सुभाषचंद्र बोस, स्वातंत्र्य वीर सावरकर और मोहनदास करमचंद गाँधी। वे सब एक ऐसे पात्र के आसपास दिखाई दिए, जिसने अपनी असहमतियों के साथ भारत के समाज में एक अलग और कठिन राह चुनी। वे थे – डॉ. केशवराव बलिराम हेडगेवार। यह नाटक है – युगप्रवर्तक डॉ. हेडगेवार।

यह संघ शताब्दी वर्ष में नागपुर की संस्था “नादब्रह्म’ द्वारा रचा गया है। भोपाल में इसका 54वां मंचन था। नाटक संघ की पूरी यात्रा पर नहीं, केवल डॉ. हेडगेवार के जीवनवृत्त पर केंद्रित है। सारे ही दृश्य भारत के स्वाधीनता संघर्ष काल में भविष्य के भारत की चिंताओं से भरे हुए हैं।

नागपुर में कांग्रेस अधिवेशन में हेडगेवार के नेतृत्व में हुई व्यवस्थाओं की प्रशंसा स्वयं गाँधी जी ने की, लेकिन हेडगेवार प्रशंसा सुनकर किसी पद के मोह में उनके पास नहीं पहुंचे थे। उनके पास कुछ स्पष्ट प्रश्न थे, जिनके स्पष्ट उत्तर कांग्रेस के सर्वेसर्वा गाँधी जी के पास नहीं थे और वे किसी प्रकार की असहमति को अपने विचार वृत्त में स्थान या सम्मान देने के लिए सहमत नहीं थे, क्योंकि उनकी दैनिक प्रार्थना का समय हो गया था।

हेडगेवार दो बार अपने प्रश्नों को लेकर कांग्रेस के शीर्ष नेतृत्व के पास जाने का साहस करते हैं। नागपुर के बाद कलकत्ता अधिवेशन के समय नेता जी सुभाषचंद्र बोस के सम्मुख। यही कि कांग्रेस पूर्ण स्वराज्य का प्रस्ताव क्यों नहीं लाती और हिन्दू-मुस्लिम एकता की मृगतृष्णा में एक अव्यावहारिक मार्ग पर क्यों बढ़ी जा रही है?

गाँधी जी के समक्ष इन प्रश्नों की पृष्ठभूमि में यह देखना रोचक है कि वे तब उठाए गए जब भारत में इस्लाम के खलीफा के पक्ष में खलीफत आंदोलन की अगुवाई कांग्रेस ने की। कांग्रेस अर्थात् गाँधी जी। केरल में हुए मोपला नरसंहार और व्यापक धर्मांतरण से आहत हेडगेवार खलीफा को लेकर कांग्रेस के विचित्र पक्ष से हैरान भी हैं और चिंतित भी। कांग्रेस अपने मार्ग पर बिना ब्रेक की गाड़ी की तरह आगे अग्रसर है, जहाँ गाँधी जी का सिक्का चलता है।

अंतत: हेडगेवार अपने प्रश्नों के साथ अकेले खड़े हैं। उनकी दृष्टि भारत के भविष्य में कहीं स्थिर है। वे हिन्दू समाज की एकता और संगठन को सर्वोपरि रखते हैं, क्योंकि एक हजार वर्षों के दमन का वह सामूहिक शिकार भी है और बिखरा हुआ होकर संघर्षरत् भी। यह तो नेताजी सुभाष भी मानते हैं कि इतने लंबे कालखंड की दासता और संघर्ष ने हिन्दू समाज को एक ऐसी जगह ला पटका है, जिसे जगाना, एकजुट करना और राष्ट्रबोध से भरना एक कठिन चुनौती है। महर्षि अरविंदो अवश्य अपनी दिव्य दृष्टि से भारत के उज्ज्वल भविष्य को लेकर आश्वस्त हैं और हेडगेवार की चिंताओं से सहमत भी।

इतिहास यहाँ से दो धाराओं में बहता है। कांग्रेस के नेतृत्व में स्वाधीनता के आंदोलन की एक धारा जिसके लगभग सारे आंदोलन बिना किसी निर्णय और निष्कर्ष के अधबीच में दम तोड़ते हैं, मगर इस मार्ग पर उसकी अपनी ब्रांडिंग एकाधिकार वाली है। दूसरी धारा, हिन्दू समाज के संगठन की है, जो नागपुर के अपने घर में गिने-चुने साथियों के साथ एक प्रकार से इतिहास के जंगल में अज्ञात सी अपनी यात्रा आरंभ करती है। यह एक ऐसा आरंभ है, जिसका नामकरण दूसरी बार कहीं 25 में से 20 मतों के आधार पर होता है – राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ और तीसरी बार कहीं सब मिलकर डॉ. हेडगेवार को अपना पहला सरसंघचालक स्वीकार करते हैं।

एक अकेली विभूति इतिहास के इस मोड़ पर अपनी दृष्टि और अपने विचार के साथ अज्ञात दिशा में कदम आगे बढ़ाती है। देखते ही देखते समर्पित स्वयंसेवकों की कतार पथ संचलन में जुड़ती जाती है। हेडगेवार यह सुनिश्चित करते हैं कि संघ में कोई व्यक्ति सर्वोपरि नहीं होगा, भगवा ध्वज ही हमारा गुरु होगा, हम सब उसके प्रति ही समर्पित होंगे। “व्यक्ति कितना भी महान हो, विकारों से मुक्त नहीं हो सकता।’

सदियों का आहत समाज एक निहत्थे आदमी के चरित्र में ऐसा कुछ देखता है कि कांग्रेस के चरचराटे के समय में उसके पीछे हो लेता है। उनकी दृष्टि स्पष्ट है कि हम राजनीतिक सत्ता के लिए आगे नहीं जाएंगे। हम सांस्कृतिक धरातल की धूल साफ करेंगे। विनाशकारी विभाजन के बाद मिली भारत की रक्तरंजित सत्ता, स्वाधीन भारत की यात्रा, संघ का संघर्ष और एक सदी के इस पार आज का भारत हमारे आसपास तक बहते हुए आए इतिहास का साक्षी है।

इस एक सदी में भारत ने सत्ता के कई शिखरों को चमकते और ढहते देखा। राष्ट्रों के निर्माण और विकास में कोई अध्याय अंतिम नहीं है। हर अध्याय अपने नायकों की रचना स्वयं करता है। यह नाटक एक ऐसे ही महानायक के कृतित्व और व्यक्तित्व पर है, जिनका मूल्यांकन इतिहास ने थोड़ा ठहरकर किया।

“नादब्रह्म’ के बैनर तले निर्माता पद्माकर धानोरकर, लेखक डॉ. अजय प्रधान, निर्देशक सुबोध सुर्जिकर, संगीत निर्देशक शैलेष दाणी के साथ 40 कुशल कलाकारों के दल ने एक सदी को जैसे जीवंत कर दिया है। मंचीय प्रस्तुति की पृष्ठभूमि में तकनीक के उत्कृष्ट उपयोग से रची गई दृश्य श्रृंखला ने नाटक में प्राण डाल दिए। प्रभावी स्वरों में कसे हुए संवाद और संगीत दर्शकों को पूरे समय बाँधे रखते हैं।

यह नाटक समाज के प्रत्येक वर्ग को देखना चाहिए। इसके विशेष मंचन इस देश को चलाने वाले नौकरशाहों को सपरिवार देखने चाहिए, सभी राजनीतिक-सामाजिक संस्थाओं के कार्यकर्ता भी देखें और समाज के विविध क्षेत्रों में सक्रिय संगठनों में भी इसकी प्रस्तुति हो।

इतिहास जैसा भी है, हम सबका है। इससे रूबरू होना ही चाहिए। खासकर तब जब इसके कुछ जरूरी पन्ने पलटे ही न गए हों…

(लेखक के सोशळ मीडिया प्लेटफॉर्म से साभार)

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