उत्तर से दक्षिण तक, कृष्ण के विभिन्न अवतार

उत्तर से लेकर दक्षिण और पूर्व से लेकर पश्चिम तक लोगों ने भावुक भाषा में परमात्मा के विभिन्न रूपों के प्रति अपनी भक्ति व्यक्त की। कृष्ण परमात्मा के ही एक रूप माने गए हैं। कृष्ण परमात्मा के ही एक रूप माने गए हैं। भक्ति काव्य भी उसी समय भारतभर में पनपा।

उत्तर से दक्षिण तक, कृष्ण के विभिन्न अवतार

कृष्ण हिंदू धर्म में भगवान विष्णु के आठवें अवतार हैं। वे अपनी लीलाओं और प्रेम के लिए जाने जाते हैं। कृष्ण के विभिन्न अवतारों में कई प्रकार की कहानियाँ हैं, जो विभिन्न युगों में पाई जाती हैं। उनके प्रमुख अवतारों में बाल कृष्ण, जिन्होंने अपने बचपन में कई चमत्कार किए, और गोवर्धनधारी कृष्ण, जिन्होंने इंद्र के क्रोध से गोकुलवासियों की रक्षा की। मथुरा के राजा कंस का वध करने वाले वीर कृष्ण और गीता उपदेशक योगेश्वर कृष्ण भी उनके रूप हैं। महाभारत में अर्जुन के सारथी के रूप में उन्होंने धर्म और कर्म का उपदेश दिया। श्रीमद्भगवद गीता में उनके ज्ञान को आज भी अनुकरणीय माना जाता है। इन सभी रूपों में कृष्ण ने धर्म की स्थापना और अधर्म के विनाश का कार्य किया।

श्रीकृष्ण का प्रागट्य श्रीमद् भगवदगीता के चौथे अध्याय के सातवें एवं आठवें श्लोक में भगवान श्रीकृष्ण स्वयं अपने श्रीमुख से कहते हैं- यदा यदा ही धर्मस्य ग्लानिर्भवति भारत। अभ्युत्थानधर्मस्य तदात्मानं सृजाम्यहम्।। परित्राणाय साधूनां विनाशाय च दुष्कृताम्। धर्मसंस्थापनार्थाय संभवामि युगे युगे ।। 'हे भरतवंशी अर्जुन ! जब-जब धर्म की हानि और अधर्म की वृद्धि होती है, तब-तब ही मैं अपने साकार रूप से लोगों के सम्मुख प्रकट होता हूँ। साधुजनों (भक्तों) की रक्षा करने के लिए, पापकर्म करने वालों का विनाश करने के लिए और धर्म की भली भाँति स्थापना करने के लिए मैं युग-युग में प्रकट हुआ करता हूँ।'