राजनीतिक दल एजेंडे में शामिल करें प्रदूषण का मुद्दा
राज्य व केंद्र सरकार प्रदूषण की रोकथाम के लिए आज गंभीर हैं। इसी के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों पर फोकस किया जा रहा है और पराली प्रबंधन पर भी काम चल रहा है।
राजनीतिक दल एजेंडे में शामिल करें प्रदूषण का मुद्दा
सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक और ईपीसीए की पूर्व सदस्य ने कहा, शब्दों एवं चिट्ठियों से नहीं बल्कि सख्त उपायों से ही कसी जा सकती लगाम
सेंटर फार साइंस एंड एन्वायरमेंट (सीएसई) की महानिदेशक और पर्यावरण प्रदूषण नियंत्रण प्राधिकरण (ईपीसीए) की पूर्व सदस्य पद्मश्री सुनीता नारायण का कहना है कि वायु प्रदूषण का मुद्दा राजनीतिक दलों को अपने एजेंडे में शामिल करना चाहिए। साथ ही इस पर लगातार काम करना चाहिए। मामूली सुधार आने पर शिथिल पड़ जाने से फिर वही हालात बन जाते हैं। उन्होंने कहा कि पराली की समस्या भी तभी दूर हो सकती है जब आरोप-प्रत्यारोप की राजनीति के बजाए इस मुददे पर गंभीरता से काम किया जाए।
विशेष बातचीत में सुनीता ने कहा, प्रदूषण की रोकथाम शब्दों और चिट्ठियों से नहीं बल्कि सख्त उपायों से संभव है। इसकी रोकथाम के लिए कार्ययोजना व्यावहारिक व दीर्घकालिक होनी चाहिए। जो कारक प्रदूषण की जड़ हैं, उन्हीं पर फोकस करना चाहिए। मसलन, ई बसें लाना तथा इनकी संख्या बढ़ाना ही पर्याप्त नहीं है। ये भी सुनिश्चित करना होगा कि लोग निजी वाहन छोड़कर इनमें सफर करें।
उन्होंने माना, राज्य व केंद्र सरकार प्रदूषण की रोकथाम के लिए आज गंभीर हैं। इसी के तहत इलेक्ट्रिक वाहनों पर फोकस किया जा रहा है और पराली प्रबंधन पर भी काम चल रहा है। लेकिन कड़वा सच यह भी है कि प्रदूषण अब सरकारों के नियंत्रण से बाहर निकल चुका है। आज सभी के पास मोबाइल है, हर किसी को पता है कि जहां भी वह रहता है, वहां का एक्यूआइ क्या है। मतलब सरकारें आम जनता को अब गुमराह नहीं कर सकतीं। इसलिए वे इस दिशा में काम करने के लिए जन आक्रोश के चलते मजबूर हो गई हैं। राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र के संदर्भ में सुनीता ने कहा कि ग्रेडेड रिस्पांस एक्शन प्लान (ग्रेप) एक अस्थायी व्यवस्था है।
स्माग टावर और रियल टाइम सोस अपार्शन्मेंट स्टडी या सुपरसाइट भी बिल्कुल बेमानी हैं। यह दोनों प्रदूषण की रोकथाम में नाकाम है। इन पर काम करना या इनके भरोसे रहना समय की बर्बादी ही है। कृत्रिम वर्षा का भी यहां के संदर्भ में कोई फायदा नहीं होगा। सुनीता नारायण ने कहा कि परियोजनाओं के लिए एन्वायरमेंट क्लीयरेंस (पर्यावरण अनापत्ति) लेने की बाध्यता खत्म कर देनी चाहिए। इसमें न तो पारदर्शिता है, न ही इसके मानक स्पष्ट हैं। कई लेवल बने हुए हैं। इसे ब्लाकेज नहीं, पर्यावरण की बेहतरी का माध्यम बनाना चाहिए। सिस्टम में बदलाव की जरूरत है।