150 किलो तक वजन सह सकती है प्रोफेसर अंकित की यह 'कुर्सी'
"प्रोफेसर अंकित कुमार चांगावाला कहते हैं मुझे लगता है कि बांस फर्नीचर उद्योग का भविष्य है। बांस की यह किस्म मजबूत है और फर्नीचर बनाने के लिए आदर्श है।
150 किलो तक वजन सह सकती है प्रोफेसर अंकित की यह 'कुर्सी'
बांस के सामान या मेज-कुर्सियों से हम सभी परिचित हैं, लेकिन क्या आपने ऐसी बांस की कुर्सी के बारे में सुना है, जो 150 किलो तक वजन सह सकती है और 20 साल तक चलेगी... गुजरात के सूरत स्थित वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंकित कुमार चांगावाला ने बंबूसा बांस से ऐसी कुर्सी बनाई है और भारत में पहली बार बांस की कुर्सी या फर्नीचर को पेटेंट दिलाया है। उनके इस नवाचार से एक ओर जहां दक्षिण गुजरात में बहुतायात में पाया जाने वाला बंबसा बांस व फर्नीचर निर्माण के क्षेत्र में इसे बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है। खासतौर पर बांस से बने सामान के बाजार को इससे फायदा होगा। आइए, जानते हैं प्रोफेसर व उनके नवाचार के बारे में गुजरात के सूरत में स्थित वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय के प्रोफेसर अंकित कुमार चांगावाला ने फर्नीचर निर्माण में बोस के उपयोग को बढ़ावा देने के लिए हाल ही में दक्षिण गुजरात की स्थानीय रूप से प्रचुर मात्रा में उपलब्ध बांस की किस्म बंबूसा से बनी एक कुसी का पेटेंट कराया है। दक्षिण गुजरात की समृद्ध टेपेस्ट्री में बांस के फर्नीचर या सामानों की परंपरा बहुत पुरानी है। यहां की देशी प्रजाति बंबूसा बांस अपनी ताकत और स्थायित्व के लिए भी जानी जाती है, लेकिन उसे तराशकर देशभर में खास पहचान दिलाने का काम पहली चार हुआ है।
"प्रोफेसर अंकित कुमार चांगावाला कहते हैं मुझे लगता है कि बांस फर्नीचर उद्योग का भविष्य है। बांस की यह किस्म मजबूत है और फर्नीचर बनाने के लिए आदर्श है। हालांकि इसकी क्षमता का अभी तक पूरी तरह से दोहन नहीं किया है। इसकी मजबूती का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि मैंने जिस डिजाइन का पेटेंट करवाया है, यह 20 साल तक चल पता ही नहीं था कि मुझे इस काम में इतना आनंद आता है: सूरत में पले- बढ़े अंकित हमेशा से डिजाइनिंग करना चाहते थे, लेकिन उनके पास दिशा की कमी थी। उन्होंने बताया मैं सिविल इंजीनियरिंग में डिप्लोमा कर रहा था, यह सोचकर कि इससे मुझे चीजों को डिजाइन करने में मदद मिल सकती है। हालांकि, पाठ्यक्रम के दौरान, मुझे एहसास हुआ कि के दौरान, मुझे एहसास हुआ कि कुछ ऐसा नहीं था, जिसे लेकर मैं अपना करियर बनाना चाहता था या आगे बढ़ाना चाहता था। मेरे बड़े भाई इंटीरियर डिजाइनर के रूप में काम करने लगे। उनका काम देखने के बाद मुझे अहसास हुआ कि यही मेरा असली जुनून है। यही चाहता हूँ। का फैसला किया। दो सात लगे डिजाइन वनाने में वर्ष 2021 में प्रोफेसर अंकित ने आधुनिक डिजाइन के फर्नीचर बनाने का काम शुरू किया। उनके साथ थे कुछ छात्र और चार स्थानीय कारीगर। वह कहते हैं
मणिपुर से आया सवालः वह याद करते हैं कि वर्ष 2019 में मणिपुर में विश्व बांस कार्यशाला में भाग लेने का अवसर मिला था। विश्व बांस कार्यशाला ब्रांस और उसके उपयोग पर केंद्रित भारत की पहली
संगोष्ठी थी। इसने मुझे नया कुछ सोचने पर मजबूर किया। वहां मुझे बांस के कारीगरों का एक समुदाय मिला, जिनकी कला लुप्त होती
जा रही थी। यह उनकी कला को बचाने का एक प्रयास भी माना जा सकता है। मैं नहीं चाहता था कि वे अपनी कला को छोड़कर नौकरियों की तलाश में शहरों की और पलायन करें, इसलिए मैंने शहरी उपभोक्ताओं को आकर्षित करने के लिए आधुनिक डिजाइन के साथ
दैनिक उपयोग के फर्नीचर बनाने
चाहता हूँ। अपनी रुचि को दिशा देने के लिए मैंने वीर नर्मद दक्षिण गुजरात विश्वविद्यालय में इंटीरियर डिजाइन पाठ्यक्रम में दाखिला लेने का फैसला किया। फिर उसी विश्वविद्यालय में सहायक प्रोफेसर के रूप में पदस्थ हो गया। पढ़ाई के दौरान पहली बार मैंने यह महसूस किया कि यह काम मुझे कितनी खुशी देता है। हालांकि मुझे अपनी असली पहचान डिजाइनिंग और छात्रों को इसके बारे में शिक्षित
करने कुर्सी का डिजाइन पूरा करने और बनाने में अंकित को लगभग देक साल लग गए। 2023 में मैंने आगे बढ़ने और कुसीं का पेटेंट कराने का फैसला किया।
अपनी जेब से पैसा लगाकर बनाया फर्नीचरः आमतौर पर इसम तरह के प्रोजेक्ट्स के लिए फंडिंगा की व्यवस्था की जाती है, लेकिन प्रोफेसर अंकित कहते हैं कि मी फंडिंग के लिए इंतजार नहीं करना
चाहता था। लिहाजा मैंने खुद के खर्चे पर ही यह प्रोजेक्ट पूरा किया। मैं विश्वविद्यालय में एक कस्यंक्रम
शुरू करने के प्रस्ताव पर काम कर रहा हूं, जहां आम लोग आ सकते हैं और कुर्सियां बनाना सीख सकते हैं और अधिक फर्नीचर बनाने के लिए मेरे साथ सहयोग कर सकते हैं।