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    <title>Bharatiya &amp; VIJAY GARG</title>
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    <description>Bharatiya &amp; VIJAY GARG</description>
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    <dc:rights>Copyright 2026 haratiya.News &amp; All Rights Reserved.</dc:rights>
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        <title>एक गणितज्ञ ने साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीता ... विजय गर्ग</title>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">एक गणितज्ञ ने साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीता ... विजय गर्ग<br> स्पेनिश गणितज्ञ, नाटककार और राजनीतिज्ञ, 1904 में सिद्ध कवि फ्रेडेरिक मिस्ट्राल के साथ साहित्य के लिए नोबेल पुरस्कार से सम्मानित किया गया। 1854 से 1868 तक, उन्होंने मैड्रिड स्कूल ऑफ इंजीनियरिंग में गणित और भौतिकी पढ़ाया, जहां वह 20 साल की उम्र में उच्चतम अंकों के साथ स्नातक करने वाले छात्र थे। 32 साल की उम्र में वह साहित्य के प्रति अपने जुनून की खेती करते हुए रियल एकेडेमिया डी लास सिएंसियस एक्सेक्टास का हिस्सा थे। उन्हें स्पेन में 19 वीं शताब्दी का सबसे महत्वपूर्ण गणितज्ञ माना जाता था, जो पहली बार माइकल चेसल्स की ज्यामिति, Évariste Galois के सिद्धांत, अण्डाकार कार्यों, और भौतिकी और गणित में उनके व्यक्तिगत योगदान के लिए पेश किया गया था, जिससे जूलियो रे पादरी कहते हैं कि, स्पेनिश गणित के लिए, 19वीं वीं शताब्दी 1865 में ईचेग्रे के साथ शुरू होती है। उन्होंने 1874 में शुरू होने वाले साहित्य के लिए खुद को समर्पित किया, जब उन्होंने "एल लिब्रो टैलोनारियो" के साथ शुरुआत की (हालांकि कुछ साल पहले, 1865 में उन्होंने लिखा था, बिना प्रकाशन के, "ला हिजा नेचुरल" )। उनके उत्पादन में गद्य और गीत दोनों में साठ से अधिक नाटक शामिल हैं।</p>
<p style="text-align: justify;"></p>
<p style="text-align: justify;">पहले काम रोमांटिक उदासी से भरे होते हैं जबकि बाद वाले हेनरिक इब्सेन के काम के प्रभाव को महसूस करते हैं। उनके कार्यों को जनता द्वारा बहुत अच्छी तरह से प्राप्त किया गया था और 1904 में उन्हें साहित्य का नोबेल पुरस्कार दिया गया था। हालांकि, मैड्रिड के नाटककार को पुरस्कार प्रदान करने के बारे में गंभीर रूप से बात करने वाले मिगुएल डी उनामुनो और रूबेन डारियो सहित '98' की तथाकथित पीढ़ी के आलोचकों और प्रमुख वक्ताओं द्वारा इस तरह की प्रशंसा कभी साझा नहीं की गई। हालांकि, वह अपने समय में बहुत प्रसिद्ध थे और प्रतिष्ठित पदों पर थे: मैड्रिड के एटेनियो के अध्यक्ष (1888), रियल एकेडेमिया एस्पानोला (1896 से) के सदस्य, जीवन के लिए सीनेटर (1900 से) और, दो बार (1894-1896 और 1901-1916) अकादमी के अध्यक्ष सटीक, शारीरिक और प्राकृतिक विज्ञान। वैज्ञानिक काम करता है उन्होंने भौतिकी और गणित पर कई निबंध प्रकाशित किए, जिनमें से कुछ इस चेतावनी के साथ नीचे सूचीबद्ध हैं कि जोस एचेगारे का वैज्ञानिक उत्पादन उनकी मृत्यु तक जारी रहा • भिन्नता की गणना (1858) • फ्लैट ज्यामिति समस्याएं (1865) विश्लेषणात्मक ज्यामिति समस्याएं (1865), गार्सिया डी गैल्डेनो द्वारा एक उत्कृष्ट कृति मानी जाती हैं • भौतिकी के आधुनिक सिद्धांत (1867) • उच्च ज्यामिति का परिचय (1867), जहां चेसल्स ज्यामिति को उजागर करता है। • निर्धारक (1868) के सिद्धांत पर स्मृति, इस विषय पर स्पेन में पहला काम • ट्रेटाडो एलिमेंटल डी टर्मोडिनामिका (1868), विज्ञान पर लघु निबंध जो तब उभर रहा था साहित्यिक ओपेरा • एवेंजर की पत्नी (1874) • तलवार की मुट्ठी में (1875) • पागलपन या पवित्रता (1876) • एल ग्रैन गैलोटो (1881) • मारियाना (1892) • डॉन जुआन का बेटा (1892) • दाग जो साफ करता है (1895) • भगवान का पागल आदमी (1900)</p>
<p style="text-align: justify;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट, पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 22 Apr 2025 05:22:38 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>एक गणितज्ञ ने साहित्य में नोबेल पुरस्कार जीता ... विजय गर्ग, A mathematician won the Nobel Prize in Literature Vijay Garg</media:keywords>
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        <title>एक गर्म लहर बना देती है आगे के लिए भी आधार</title>
        <link>https://bharatiya.news/A-heat-wave-creates-the-basis-for-the-future-as-well</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">एक गर्म लहर बना देती है आगे के लिए भी आधार<br>विजय गर्ग <br>जलवायु परिवर्तन का असर दुनियाभर में लोगों को परेशान कर रहा है। चरम मौसमी घटनाओं के कारण कई तरह की आपदाएं आए दिन सामने आती हैं। इसलिए इसका पैटर्न समझने की कोशिश की जा रही है। इस क्रम में आइआइटी बांबे और जर्मनी के जोहान्स रटेनबर्ग यूनिवर्सिटी के शोधकर्ताओं की एक टीम ने इस बात की पड़ताल की है कि मार्च और अप्रैल 2022 के दौरान दक्षिण एशिया में एक के बाद एक अत्यधिक गर्मी की क्यों पड़ी। भारत और पाकिस्तान सहित पूरे क्षेत्र में उस समय के लिए तापमान असाधारण स्तर पर पहुंच गया, जो लगातार औसत से 3-8 डिग्री सेल्सियस अधिक था। गर्म मौसम की लंबी अवधि मई में भी जारी रही। इस संबंध में हुए इस अध्ययन में बताया गया है कि एक हीटवेव (गर्म लहर या लू की स्थिति) वातावरण में अगले हीटवेव के लिए अनुकूल स्थितियां पैदा कर सकती है, जिससे एक सिलसिला चल पड़ता है। और फिर गर्मी का मौसम लंबा खिंचने की संभावना बन सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>शोधकर्ताओं ने कहा कि : जर्नल आफ जियोफिजिकल रिसर्च एटमास्फियर में प्रकाशित अध्ययन के निष्कर्षो में शोधकर्ताओं ने बताया है कि यह एक "चिंताजनक पैटर्न" दिखाता है, जिसके अनुसार अगली हीटवेव अधिक तीव्र होती है। पहली हीटवेव की अत्यधिक गर्मी मिट्टी से नमी को हटा देती है, जिससे यह सूख जाती है। अत्यधिक सूखापन वायुमंडलीय प्रक्रियाओं के एक चक्र को चालू कर सकता है, जिससे अगली अवधि और भी खराब हो सकती है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>अध्ययन की सह-लेखिका आइआइटी बांबे की एसोसिएट प्रोफेसर अर्पिता मंडल के मुताबिक, जब मिट्टी में नमी होती है तो साफ आसमान की स्थिति में सूर्य की कुछ ऊर्जा हवा को गर्म करने के बजाय उस नमी को वाष्पित करने में चली जाती है। लेकिन जब मिट्टी पहले से ही सूखी होती है तो वह सारी ऊर्जा सीधे हवा को गर्म करने में लगती है। मार्च और अप्रैल की हीटवेव की तुलना करते हुए टीम ने पाया कि प्रत्येक हीटवेव एक अलग वायुमंडलीय प्रक्रिया द्वारा संचालित थी। पहली उच्च ऊंचाई पर हवाओं द्वारा और दूसरी शुष्क मिट्टी की स्थिति द्वारा, जो पूर्व के परिणामस्वरूप बनी थी। अध्ययन के प्रमुख लेखक आइआइटी बांबे के रोशन झा का कहना है कि हमारा विश्लेषण दिखाता है कि मार्च की हीटवेव मुख्य रूप से अल्पकालिक वायुमंडलीय रास्बी तरंगों के आयाम में अचानक वृद्धि से जुड़ी थी, जो उच्च ऊंचाई वाली हवाओं में बड़े पैमाने पर घुमावदार हैं, जो घुमावदार नदी में मोड़ की तरह हैं। आगे लहरें और अधिक शक्तिशाली हो गईं, क्योंकि ध्रुवों के निकट उच्च ऊंचाई वाली पश्चिमी हवाओं (एक्स्ट्राट्रापिकल जेट स्ट्रीम) ने ऊर्जा को भूमध्य रेखा के निकट आने वाली पश्चिमी हवाओं (सबट्रापिकल जेट स्ट्रीम) में स्थानांतरित कर दिया, क्योंकि वे हीटवेव के दौरान करीब आ गई।<br>हालांकि, अप्रैल की गर्मी की लहर अलग तरह से शुरू हुई, जो मुख्य रूप से बहुत शुष्क मिट्टी की स्थिति और पाकिस्तान और अफगानिस्तान के उत्तर- पश्चिमी भूमि क्षेत्रों से भारत में गर्मी के आने के कारण हुई। शोधकर्ताओं का कहना है कि ये शुष्क परिस्थितियां आंशिक रूप से मार्च की पिछली गर्मी की लहर से बनी थीं, जिसने पहले ही उच्च तापमान और साफ आसमान के कारण भूमि को सुखा दिया था।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>"अध्ययन के निष्कर्ष संकेत देते हैं कि भूमध्य रेखा की और एनर्जी ट्रांसफर के साथ वेबगाइड इंटरैक्शन मार्च में शुरुआती गर्मी को बढ़ाता है, जिसके बाद मिट्टी की नमी के स्तर को कम करके अगले हफ्तों में और अधिक गर्मी के लिए आधार तैयार होता है। आइआइटी बांबे के चेयर प्रोफेसर सुबिमल घोष का कहना है कि हाल के दिनों में गर्म भविष्य के अधिक निश्चित होने के साथ हवा के पैटर्न प्रभावित होते रहते हैं और इन परिवर्तनों की पहचान करने से भविष्य की गर्मी की लहरों के प्रभावों का बेहतर अनुमान लगाने और उन्हें कम करने में मदद मिलती है। दक्षिण एशिया में अत्यधिक गर्मी की घटनाओं का पूर्वानुमान लगाने और उनके लिए तैयार रहने की हमारी क्षमता में सुधार के लिए इन तंत्रों को समझना महत्वपूर्ण है। एन्वायर्नमेंटल रिसर्च क्लाइमेट नामक जर्नल में 2023 में प्रकाशित एक अध्ययन के अनुसार, मार्च और अप्रैल 2022 में हुई अत्यधिक गर्मी की घटनाओं के 100 वर्षों में एक बार होने की संभावना है तथा जलवायु परिवर्तन के कारण इन घटनाओं की संभावना 30 गुना अधिक हो गई है।<br>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 22 Apr 2025 05:20:55 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>A heat wave creates the basis for the future as well, एक गर्म लहर बना देती है आगे के लिए भी आधार</media:keywords>
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        <title>चिकित्सा विज्ञान का वरदान बन रहा अभिशाप</title>
        <link>https://bharatiya.news/The-boon-of-medical-science-is-becoming-a-curse</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">चिकित्सा विज्ञान का वरदान बन रहा अभिशाप<br>विजय गर्ग <br>बीसवीं सदी में प्लेग, हैजा, तपेदिक, डिप्थीरिया और निमोनिया जैसे असंख्य रोगों के आगे लाचार मानव जाति को एंटीबायोटिक्स ने नई आशा दी। यह विज्ञान का वह वरदान था, जिसने जीवन प्रत्याशा को बढ़ाया, नवजात शिशुओं की मृत्यु दर को घटाया और सर्जरी को सुरक्षित बनाया। परंतु आज, जब हम एंटीबायोटिक प्रतिरोध की वैश्विक महामारी के मुहाने पर खड़े हैं, तो हमें यह सोचने को विवश होना पड़ रहा है कि कहीं यह वरदान हमारे अपने ही हाथों एक अभिशाप में तो नहीं बदल गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>हाल ही में मर्डोक चिल्ड्रन रिसर्च इंस्टीट्यूट और क्लिंटन हेल्थ एक्सेस इनिशिएटिव द्वारा प्रकाशित एक अध्ययन में यह चौंकाने वाला राजफाश सामने आया है कि वर्ष 2022 में 30 लाख से अधिक बच्चों की मृत्यु ऐसे संक्रमणों के कारण हुई जो अब एंटीबायोटिक्स के प्रति प्रतिरोधी हो चुके हैं। यह आंकड़ा केवल मृत्यु का नहीं, बल्कि हमारी वैज्ञानिक मानसिकता के पतन का भी संकेत है।<br>रोगाणुरोधी प्रतिरोध का यह संकट दर्शाता है कि हमने विज्ञान को केवल त्वरित समाधान के रूप में अपनाया, न कि उसके दीर्घकालिक संदर्भों को समझा।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>एएमआर तब पैदा होता है जब सूक्ष्मजीव जैसे बैक्टीरिया, वायरस, और फफूंद इस तरह से विकसित हो जाते हैं कि दवाएं उन पर असर नहीं करतीं। इसका प्रमुख कारण एंटीबायोटिक्स का अत्यधिक और अनुचित प्रयोग है - बिना चिकित्सकीय परामर्श के दवाइयां लेना, अधूरा इलाज छोड़ देना या मामूली लक्षणों पर भी इन दवाओं का उपयोग करना । कोविड महामारी ने इस प्रवृत्ति को और गहरा कर दिया। डर और अनिश्चितता के माहौल में एंटीबायोटिक्स का अंधाधुंध उपयोग हुआ, विशेषकर अस्पतालों में, जहां इन दवाओं को वायरस के संक्रमण पर भी दिया जाने लगा, जबकि वे वायरल बीमारियों पर असर नहीं करतीं ।<br>इसका सबसे भयानक प्रभाव बच्चों पर पड़ा है, खासकर उन क्षेत्रों में जहां स्वास्थ्य सुविधाएं पहले से ही कमजोर हैं। अफ्रीका और दक्षिण-पूर्व एशिया में बच्चों की मृत्यु दर में असामान्य वृद्धि देखी गई है। इन क्षेत्रों में एक और दवाओं की गुणवत्ता और उपलब्धता की समस्या है, तो दूसरी और जागरूकता की कमी और अनियंत्रित औषधि वितरण ने समस्या को और विकराल बना दिया है। भारत में बिना चिकित्सक की सलाह के फार्मेसी से दवाइयां लेना आम बात है, जिससे गलत अधूरा इलाज होता है और बैक्टीरिया को प्रतिरोधी बनने का अवसर मिलता है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>इस संकट से निकलने का मार्ग भी विज्ञान के पास है, बशर्ते हम उसे विवेक और सामाजिक उत्तरदायित्व के साथ अपनाएं। पहली आवश्यकता है नीतिगत स्तर पर एंटीबायोटिक्स के उपयोग पर कड़े नियंत्रण की । यदि हमने नीतियों में बदलाव नहीं किया, तो वह समय दूर नहीं जब साधारण संक्रमण भी जानलेवा बन जाएंगे और हम उसी अंधकार में लौट जाएंगे जहां से विज्ञान ने हमें निकाला था।<br>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 22 Apr 2025 05:19:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>चिकित्सा विज्ञान का वरदान बन रहा अभिशाप, The boon of medical science is becoming a curse</media:keywords>
    </item>
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        <title>संवेदनशीलता से प्रकृति के पुनर्जीवन की राह</title>
        <link>https://bharatiya.news/The-path-to-rejuvenation-of-nature-through-sensitivity</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">संवेदनशीलता से प्रकृति के पुनर्जीवन की राह</p>
<p style="text-align: justify;"><br>विजय गर्ग <br>पिछले पांच दशकों में वैश्विक आर्थिक प्रगति पांच गुना बढ़ी है, किंतु यहां तक पहुंचने के लिए 70 प्रतिशत से अधिक पृथ्वी के प्राकृतिक संसाधनों का उनकी क्षमता से अधिक दोहन किया गया । इसका परिणाम यह कि पृथ्वी का अस्तित्व ही संकट में आ गया है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>बार-बार चेताने की आवश्यकता होती है कि इस ब्रह्मांड में अनेक गैलेक्सियां हैं, और हमारी गैलेक्सी में भी अरबों ग्रह हैं, किंतु उनमें केवल पृथ्वी ही ऐसी है, जहां जीवन संभव है। सौरमंडल में पृथ्वी ही एकमात्र ऐसा ग्रह है, जहां सतह पर जल उपलब्ध है और जो जीवन के अस्तित्व में सहायक है। निकट भविष्य में पृथ्वी के अलावा हमारी कोई और शरणस्थली नहीं बनने वाली।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>संभवत: इसी कारण साल 2022 के विश्व पर्यावरण दिवस के लिए, 5 जून 1974 के पहले पर्यावरण दिवस की थीम ‘ओनली वन अर्थ -केवल एक ही पृथ्वी’ को दोहराना जरूरी लगा। जहां 1974 में शायद ही यह कहा गया हो कि प्रकृति आपात स्थिति में है, वहीं 2022 तक ये चेतावनियां सर्वत्र सुनाई देने लगीं। मानवीय जरूरतों और लालच ने पृथ्वी को तीन मुख्य संकटों में जकड़ लिया है- जलवायु संकट, प्रकृति और जैव विविधता की हानि तथा प्रदूषण और अपशिष्ट का बढ़ता ढेर।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>पिछले सौ वर्षों में आधे वेटलैंड और समुद्रों में आधे से अधिक मूंगे की चट्टानें नष्ट हो चुकी हैं। सागरों में इतना प्लास्टिक पहुंच रहा है कि 2050 तक वहां मछलियों से अधिक प्लास्टिक हो सकता है। पृथ्वी के प्रति संवेदना जगाने और इस बिगड़ते संतुलन को सुधारने के लिए ही 2021 के अर्थ डे की थीम थी- ‘अपनी पृथ्वी को फिर से ठीक करें’। अप्रैल 2022 की थीम ‘अपने ग्रह में निवेश करें’, अर्थ डे 2020 की ‘जलवायु पर सक्रियता’ और 2019 की थीम थी ‘अपनी प्रजातियों की रक्षा करें’।<br>साल 2021-2030 की अवधि को संयुक्त राष्ट्र ने ‘डिकेड ऑफ इकोसिस्टम रिस्टोरेशन’ यानी पारिस्थितिकी तंत्र पुनर्स्थापन दशक घोषित किया है। इसमें ताजे पानी, समुद्री पारिस्थितिकी तंत्र और भूमि आधारित इकोसिस्टम को फिर से पहले जैसी स्थिति में लाने के प्रयास जारी हैं। इसमें भूमि उपयोग परिवर्तन की भी महत्वपूर्ण भूमिका होती है। इन सभी प्रयासों का निष्कर्ष था कि 5 जून, 2022 को एक बार फिर ‘केवल एक पृथ्वी’ के थीम पर लौटा जाए।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>पृथ्वी और मानवता के लिए संकट का मुख्य कारण है- सतत उपभोग और सतत उत्पादन प्रणाली न होना। जनसंख्या वृद्धि के साथ यह समस्या बढ़ रही है। दूसरी ओर, जैव विविधता तेजी से घट रही है। अब तक 65 फीसदी वन्य जीव समाप्त हो चुके हैं। इसी कारण 2022 के विश्व पर्यावरण दिवस पर यह भी आह्वान किया गया था कि हम सतत और पर्यावरण-अनुकूल जीवनशैली अपनाएं और पृथ्वी के साथ समरसता में जिएं। इस समरसता का भाव जगाने के लिए आवश्यक है कि हम स्वयं को पृथ्वी के स्थान पर रखें और सोचें कि जो कुछ पृथ्वी और प्रकृति के साथ हो रहा है, यदि वही हमारे साथ हो रहा होता, तो हमें कैसा लगता?</p>
<p style="text-align: justify;"><br>संवेदनशील न्यायालय और न्यायिक संस्थाएं अब प्रकृति या उसके किसी हिस्से को वैधानिक रूप से जीवित मानव घोषित कर रही हैं और उनके अधिकारों की रक्षा के आदेश भी दे रही हैं। हालांकि सरकारें ऐसे आदेशों को समय के साथ निरस्त कराने में सफल हो जाती हैं। कई बार, पर्यावरण और पृथ्वी के हित में उठी आवाज़ों को विकास विरोधी कहकर कमजोर करने का प्रयास करती हैं। यह भी निर्विवाद है कि पृथ्वी की हानि कम करने के प्रयास भी हो रहे हैं। मसलन, यूरोप में बांध हटाए जा रहे हैं। साल 2021 में यूरोप के 17 देशों में 239 बांध हटाए गए।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>22 मई, 2021 को अंतर्राष्ट्रीय जैव विविधता दिवस पर संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा था-‘हमने प्रकृति के विरुद्ध युद्ध छेड़ रखा है, जबकि हमें तो उसका रक्षक होना चाहिए था।’ प्रकृति हमें जीवन, अवसर, सेवाएं और समाधान देती है, किंतु हमने उसकी जैव विविधता को नष्ट किया और जलवायु संतुलन में बाधाएं डालीं। स्वस्थ पृथ्वी, संयुक्त राष्ट्र के सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए अत्यावश्यक है। अन्यथा, स्थिति यह है कि 90 प्रतिशत जनसंख्या प्रदूषित हवा में सांस लेने को मजबूर है।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>मानव के पृथ्वी पर पड़ते प्रभावों को लेकर चिंता पिछले पचास वर्षों से व्यक्त की जा रही है। वर्ष 1972 में स्टॉकहोम में आयोजित संयुक्त राष्ट्र का पहला पर्यावरण सम्मेलन ‘प्राकृतिक पर्यावरण’ पर नहीं, बल्कि ‘मानव पर्यावरण’ पर केंद्रित था। इसी सम्मेलन में तय किया गया कि हर वर्ष 5 जून को विश्व पर्यावरण दिवस मनाया जाएगा। दो वर्षों बाद ‘केवल एक पृथ्वी है’ के नारे के साथ पहला पर्यावरण दिवस मनाया गया था।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>आज जरूरत है कि सरकारें, समाज और प्रत्येक व्यक्ति आत्ममंथन करें कि पृथ्वी के हित और अहित में उन्होंने क्या किया है। यदि हम प्रकृति को खुद ही पुनर्जीवित होने में मदद करें, तो वह भी पृथ्वी की सेवा ही होगी। कोरोना काल के प्रारंभिक दिनों में मानवीय गतिविधियां ठप होने के कारण नदियां, आकाश और वन्यजीवन स्वत: ही स्वच्छ-सजीव हो उठे थे। विशेष परियोजनाएं नहीं चलाई गई थीं, बस मानवीय हस्तक्षेप कम हो गया था। पशु-पक्षी, मछलियां और अन्य जीव-जंतु उन मार्गों पर लौट आए थे जो हमने उनसे छीन लिए थे।</p>
<p style="text-align: justify;"><br>पृथ्वी तो हमारा साझा घर है। मानव को स्वयं से पूछना चाहिए कि उस पृथ्वी का क्या होगा जिसमें जैव विविधता ही नहीं बचेगी? <br>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 22 Apr 2025 05:17:24 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>The path to rejuvenation of nature through sensitivity, संवेदनशीलता से प्रकृति के पुनर्जीवन की राह</media:keywords>
    </item>
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        <title>दौलत नहीं परिश्रम से मिलती है सुख की राह</title>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">दौलत नहीं परिश्रम से मिलती है सुख की राह</p>
<p style="text-align: justify;"><br>विजय गर्ग <br>बचपन में किताबों में पढ़ा था— ‘इफ़ वेल्थ इस लॉस्ट, नथिंग इज़ लॉस्ट; हेल्थ इज़ लॉस्ट, समथिंग इज लॉस्ट, करैक्टर इज़ लॉस्ट, एवेरीथिंग इज़ लॉस्ट’, लेकिन विडंबना देखिए कि आज तो समाज में बिल्कुल उल्टा ही देखने को मिल रहा है। चरित्र को तो जैसे हमने अंतिम मानकर भुला ही दिया है और पैसा सर्वोपरि हो गया है। इसका परिणाम धीरे-धीरे हमारे सामने आ रहा है। जिसके चलते समाज में जीवन मूल्यों का लगातार पराभव देखने में आ रहा है।<br>यही वजह है कि समृद्धि व संपन्नता के बावजूद हमारी सोच सकारात्मक नहीं रही। जिसके चलते हम तमाम तरह के मनोकायिक रोगों के शिकार हो रहे हैं। तरह-तरह के रोग हमारे शारीरिक श्रम करने से बढ़ने लगे हैं। जिसकी वजह से आज महानगर से लेकर नगरों और कस्बों से लेकर गांवों तक आज हमें ‘डाक्टर्स ही डाक्टर्स’ बड़े-बड़े हॉस्पिटल और नर्सिंग होम मिलेंगे। कैंसर, लीवर, गुर्दे, टीबी, हार्ट और मूत्र संबंधी रोगों के इलाज के बड़े-बड़े होर्डिंग्ज़ दिखाई देंगे। जाहिर है रोग बढ़ेंगे तो रोग उपचार के कारोबार भी बढ़ेंगे।<br>दरअसल, यहां डॉक्टरों की बढ़ती भीड़ चेता भी रही है और डरा भी रही है। आज से बीस-तीस साल पहले जहां ढूंढ़े से कोई डॉक्टर मिलता था, आज वहां भीड़ है। मेरा अंतर्मन कहता है कि हम सुख की तलाश ‘दौलत’ में करते-करते सबसे बड़े जीवन-मूल्य ‘परिश्रम’ को भूल बैठे हैं। जबकि यह एक हकीकत है कि पसीने से महकते किसान, जवान और श्रमिक कोई व्यायाम करने को नहीं कहता। उनका श्रमयुक्त जीवन अपने आप में व्यायाम है। वे स्वस्थ भी रहते हैं। यहां तक कि फिट सैनिक को जवान की संज्ञा दी जाती है। जवान यानी हमेशा फिट रहने वाला। आज बेचैन अंतर्मन को एक बेहद सार्थक और मार्मिक बोधकथा पढ़ने को मिली है, जो हमारे कई प्रश्नों के उत्तर दे देती है। आप भी इस प्यारी सी कथा को पढ़िए :-<br>‘पुराने समय में एक राजा था। राजा के पास सभी सुख-सुविधाएं और असंख्य सेवक-सेविकाएं थे, जो हर समय उसकी सेवा को उपलब्ध रहते थे। लेकिन उसके जीवन में श्रम की कोई जगह न थी। राजा को किसी चीज की कमी नहीं थी। फिर भी राजा अपने जीवन से सुखी नहीं था, क्योंकि वह अपने स्वास्थ्य को लेकर काफी परेशान रहता था। राजा सदा बीमारियों से घिरा रहता था। राजा का उपचार सभी बड़े-बड़े वैद्यों द्वारा किया गया, परंतु इसके बावजूद राजा को स्वस्थ नहीं किया जा सका। अपने राजा की बढ़ती बीमारी से राज दरबार चिंतित हो गया। वे राजा को स्वस्थ बनाने के तमाम उपायों पर विचार करने लगे।<br>राजा की बीमारी दूर करने के लिए दरबारियों द्वारा राज्य में ऐलान करवा दिया गया कि जो भी राजा का स्वास्थ्य ठीक करेगा, उसे असंख्य स्वर्ण मुहरें दी जाएंगी। यह घोषणा सुनकर एक वृद्ध भी राजा का इलाज करने राजा के महल में गया। वृद्ध ने राजा के पास आकर कहा, ‘महाराज, आप आज्ञा दें तो आपकी बीमारी का इलाज मैं कर सकता हूं।’<br>राजा की आज्ञा पाकर वह बोला, ‘आप किसी पूर्ण सुखी मनुष्य के वस्त्र पहनिए, आप अवश्य स्वस्थ और सुखी हो जाएंगे।’ वृद्ध की बात सुनकर राजा के सभी मंत्री और सेवक जोर-जोर से हंसने लगे। इस पर वृद्ध ने कहा, ‘महाराज! आपने सारे उपचार करके देख लिए हैं, यह भी करके देखिए! मेरा दावा है कि आप अवश्य ही स्वस्थ हो जाएंगे।’ राजा ने उसकी बात से सहमत होकर सेवकों को पूर्ण सुखी मनुष्य की खोज में राज्य की चारों दिशाओं में भेज दिया, परंतु उन्हें कोई पूर्ण सुखी मनुष्य कहीं भी नहीं मिला। यह सुनकर राजा भी गहरी सोच में डूब गया। अब राजा स्वयं किसी सुखी मनुष्य की खोज में निकल पड़ा। अत्यंत गर्मी के दिन होने से राजा का बुरा हाल हो गया और वह एक पेड़ की छाया में विश्राम हेतु रुका। तभी राजा को एक मजदूर इतनी गर्मी में भी मजदूरी करता दिखाई दिया। राजा ने उससे पूछा, ‘क्या, आप पूर्ण सुखी हो?’<br>मजदूर खुशी-खुशी और सहज भाव से बोला, ‘जी, भगवान की कृपा से मैं पूर्ण सुखी हूं!’ उसने मजदूर को ऊपर से नीचे तक देखा तो मजदूर ने सिर्फ धोती पहनी हुई थी और वह गाढ़ी मेहनत से पूरा का पूरा पसीने से तरबतर था। राजा यह देखकर समझ गया कि परिश्रम करने से ही एक आम मजदूर भी पूर्ण सुखी है। इस तरह राजा को सुखी रहने का मंत्र मिल गया था। राजा ने राजमहल लौटकर उस वृद्ध का उपकार मानते हुए उसे असंख्य स्वर्ण मुद्राएं दीं। अब राजा स्वयं आराम और आलस्य छोड़कर खूब परिश्रम करने लगे। कुछ ही दिनों में राजा पूर्ण स्वस्थ और सुखी हो गया।<br>मित्रो! इस बोधकथा का सार यही है कि आज हम भौतिक सुख-सुविधाओं के इतने आदी हो गए हैं कि हमारे शरीर की रोगों से लड़ने की शक्ति क्षीण होती जा रही है। दरअसल, श्रम करने से जहां हमारी जीवनी शक्ति बढ़ती है। लगातार श्रम करते रहने से हमारी पाचन शक्ति भी दुरुस्त रहती है। हमें नकारात्मक बातें सोचने का वक्त भी नहीं मिलता है। विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 14:58:40 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
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        <title>संपूर्ण स्वास्थ्य की उम्मीद में दुनिया</title>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">संपूर्ण स्वास्थ्य की उम्मीद में दुनिया</p>
<p style="text-align: justify;"><br>विजय गर्ग <br>आम लोगों का स्वास्थ्य कभी भी राजनीति का मुख्य एजेंडा रहा ही नहीं, जबकि आज भारत ही नहीं पूरी दुनिया में स्वास्थ्य एक बेहद ज़रूरी विषय के रूप में खड़ा हो गया है। विश्व स्वास्थ्य दिवस 2025 का थीम या लक्ष्य की यदि हम बात करें तो इस वर्ष यह मिलेनियम स्वास्थ्य लक्ष्य को हासिल करने के उद्देश्य से ‘आशापूर्ण भविष्य के लिए स्वस्थ शुरुआत’ पर ज़ोर दे रहा है। विश्व स्वास्थ्य संगठन ने लक्ष्य की घोषणा करते हुए कहा है कि प्रत्येक स्वास्थ्य संगठन और समुदाय यह सुनिश्चित करें कि मां और नवजात शिशु का स्वास्थ्य सुरक्षित रहे तथा इनकी असमय मृत्यु को रोका जा सके। उल्लेखनीय है कि विगत वर्ष 2024 में विश्व स्वास्थ्य संगठन ने अपना लक्ष्य ‘मेरा स्वास्थ्य मेरा अधिकार’ रखा था। यह अलग बात है कि दुनिया भर की सरकारों ने स्वास्थ्य के नागरिक अधिकारों पर स्पष्ट रूप से कुछ भी ठोस नहीं किया। हां, भारत में एकमात्र राज्य राजस्थान की पूर्व कांग्रेस की सरकार ने नागरिकों के स्वास्थ्य को उनके मौलिक अधिकार के रूप में क़ानून बनाकर लागू कर दिया।<br>‘स्वस्थ शुरुआत आशापूर्ण भविष्य’ के विभिन्न पहलुओं पर यदि ध्यान दें तो निश्चित ही नवजात शिशु एवं माताओं के स्वास्थ्य को प्राथमिकता देनी होगी। इसके लिए प्रत्येक प्रखंड एवं गांवों में स्वास्थ्य के बुनियादी ढांचों को और मज़बूत करना होगा तथा सामुदायिक स्वास्थ्य कर्मियों जैसे आशा कार्यकर्ता, आंगनबाड़ी सेविका एवं प्रत्येक प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों को सक्रिय बनाना होगा। चिकित्सकों एवं स्वास्थ्य कर्मियों को और जवाबदेह बनाना होगा। सभी सरकारों को अपना स्वास्थ्य बजट सम्मानजनक तरीके से जीडीपी के अनुसार बढ़ाना होगा। यह सुनिश्चित करना होगा कि समुचित पोषण और दवा के अभाव में कोई भी शिशु या गर्भवती मां अथवा व्यक्ति की असमय मृत्यु न हो। स्वास्थ्य और उपचार की सर्वसुलभता सुनिश्चित करनी होगी। सरकार और समुदाय को मिलकर काम करना होगा।<br>आज़ादी के सात दशक बीत जाने के बाद भी देश में जनस्वास्थ्य की स्थिति बहुत अच्छी नहीं है। केंद्र सरकार एवं राज्य सरकारों द्वारा चलाए जा रहे अनेक स्वास्थ्य कार्यक्रमों एवं अभियानों के बाद भी हम अपेक्षित लक्ष्यों को प्राप्त नहीं कर सके हैं। महज़ आंकड़ों की बाजीगीरी और झूठे प्रचार से जन-स्वास्थ्य के लक्ष्य को प्राप्त नहीं किया जा सकता। भारत सरकार ने एक राष्ट्रीय स्वास्थ्य नीति बनायी थी जिसके अंतर्गत विभिन्न रोगों से बचाव एवं उपचार के लिए राष्ट्रीय कार्यक्रमों का संचालन लंबे समय से किया जा रहा है। ग्रामीण क्षेत्रों में स्वास्थ्य सेवाएं उपलब्ध कराने के लिए भारत सरकार की महत्वाकांक्षी योजना ‘राष्ट्रीय ग्रामीण स्वास्थ्य मिशन’ का संचालन भी किया जा रहा है, इन सबके बावजूद जनस्वास्थ्य को हम सही दिशा नहीं दे पा रहे हैं। इसका अनुमान इसी से लगाया जा सकता है कि महिलाओं में प्रसव के दौरान होने वाली जटिलताओं तथा नवजात शिशुओं और बच्चों की रुग्णता व मृत्यु दर को कम करने में अपेक्षित सफलता नहीं मिल पायी है।<br>वर्ष 2025 के स्वास्थ्य लक्ष्य की घोषणा करते हुए विश्व स्वास्थ्य संगठन की दृष्टि महिलाओं और नवजात शिशुओं के स्वास्थ्य पर ही गई। विश्व स्वास्थ्य संगठन चाहता है कि दुनिया भर में नवजात शिशुओं और माताओं का स्वास्थ्य बेहतर हो ताकि भविष्य की आबादी में स्वस्थ लोगों की अच्छी संख्या हो। हम जानते हैं कि दुनिया भर में महिलाओं के स्वास्थ्य के प्रति समाज और सरकारें सदैव दोयम दर्जे की दृष्टि रखते हैं। हालांकि, पश्चिमी देशों में महिलाओं की स्थिति काफ़ी बेहतर है लेकिन भारत एवं एशियाई देशों में महिलाओं को स्वास्थ्य प्राप्त करने के लिए पुरुषों की अपेक्षा ज़्यादा जद्दोजहद करनी पड़ती है। आज़ादी के बाद से अब तक भारत में दो बार राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण हुए। इसमें केंद्र सरकार के साथ-साथ अंतर्राष्ट्रीय जनसंख्या अध्ययन संस्थान ने भी हिस्सा लिया। सार्वजनिक रूप से अप्रकाशित इन सर्वेक्षण रिपोर्टों के अनुसार प्रत्येक एक लाख जीवित शिशु के जन्म पर लगभग 540 माताओं की मृत्यु हो जाती है।<br>भारत में औरतों की नाज़ुक सेहत की वजह जानने के लिए उनकी ज़िंदगी पर जन्म के बाद से ही नज़र दौड़ानी होगी। जानी मानी फ्रेंच लेखिका शिमोन द बौवार कहती हैं कि ‘औरत की सेहत इसलिए ख़राब है क्योंकि वह स्त्री है।’ हमें यह भी ध्यान रखना होगा कि आधुनिकीकरण एवं अन्य कई कारणों से भी कई पुराने रोग पुनः नए रूप में उभर कर सामने आ रहे हैं। अनेक प्रयासों के बावजूद हम वर्षों पुराने मच्छर जनित रोग मलेरिया, डेंगू आदि से उबर नहीं पाए हैं। तथाकथित आधुनिक जीवनशैली के कई रोग जैसे डायबिटीज़ हृदय रोग, उच्च रक्तचाप, कैंसर, एड्स आदि बढ़ते ही जा रहे हैं। खान-पान की गड़बड़ी की वजह से पेट के कई घातक रोग बढ़ गए हैं। मानसिक रोगों की भी यही स्थिति है। बहुत ही कम उम्र के युवा और नौजवान अवसाद और अनिद्रा, तनाव आदि के शिकार हैं। युवाओं में घातक नशे का बढ़ता प्रचलन भी स्वास्थ्य की चुनौती के रूप में खड़ा है। सरकार और समुदाय यदि इस पर ध्यान नहीं देते तो स्थिति भयावह होगी। बहरहाल, उम्मीद की जानी चाहिए कि मानव स्वास्थ्य जैसे महत्वपूर्ण मुद्दे पर हमारी सरकारें क्षुद्र राजनीति से ऊपर उठ कर व्यापक जनहित में कार्य करेंगी।<br>विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 14:58:13 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>संपूर्ण स्वास्थ्य की उम्मीद में दुनिया</media:keywords>
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        <title>विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान : विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Contribution-of-women-in-the-field-of-science--Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;"><strong>विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान : विजय गर्ग </strong></p>
<p style="text-align: justify;"><br>हम से अधिकांश लोगों से जब क्रिकेट के किसी खिलाड़ी का नाम पूछा जाता है तो हम तुरंत बिना कुछ सोचे सचिन तेंदुलकर, विराट कोहली या अन्य किसी पुरुष खिलाड़ी का नाम बता देते हैं; शायद बहुत कम या दशमलव मात्र लोग ही होंगे जो इस प्रश्न के जवाब में मिताली राज, झूलन गोस्वामी या अन्य किसी महिला खिलाड़ी का नाम लेंगे। इसी तरह, जब हम वैज्ञानिकों की बात करते हैं तो हमारे दिमाग में स्टीफन हॉकिंग, आईजैक न्यूटन, ए.पी.जे. अब्दुल कलाम, सी.वी. रमन जैसे पुरुष वैज्ञानिकों की ही छवि उभर कर सामने आती है, न कि जानकी अम्माल, असीमा चटर्जी, अन्ना मणि जैसी महिला वैज्ञानिकों की। जी हां, भले ही आधुनिक युग में महिलाएँ धरती से आसमान तक हर जगह पुरुषों के साथ कदम से कदम मिलाकर चल रही हैं, लेकिन आज भी उच्च शिक्षा से लेकर शोध संस्थानों व कार्यक्षेत्र तक, हर जगह पर उनके योगदान को उतना महत्व नहीं दिया जाता जितना कि एक पुरुष के योगदान को दिया जाता है। तमाम तरह की चुनौतियों के बावजूद इसरो में चंद्रयान मिशन हो या फिर मंगल मिशन की सफलता, नासा से लेकर नोबेल पुरस्कार तक हर क्षेत्र में हमारी महिला वैज्ञानिकों ने अपना लोहा मनवाया है। तो चलिये जानते हैं विज्ञान की जादुई दुनिया में अपना परचम लहराने वाली कुछ महिला वैज्ञानिकों के बारे में और इस क्षेत्र में महिलाओं के सामने आने वाली चुनौतियों के बारे में-</p>
<p style="text-align: justify;">जिस सदी में महिलाओं को घर की चारदीवारी में कैद करके रखा जाता था, उसी समय में सामाजिक बेड़ियों को तोड़कर विज्ञान की दुनिया में कीर्तिमान स्थापित करने वाली कुछ महिला वैज्ञानिकों के नाम इस प्रकार हैं-</p>
<p style="text-align: justify;">जानकी अम्माल : 4 नवंबर 1897 को केरल में जन्मी जानकी अम्माल वनस्पतिशास्त्र की वैज्ञानिक थीं। इन्होंने गन्नों की हाइब्रिड प्रजाति की खोज और क्रॉस ब्रीडिंग पर शोध किया था जिसे पूरी दुनिया में मान्यता मिली। वनस्पति शास्त्र में योगदान को देखते हुए साल 1957 में इन्हें पद्म श्री से सम्मानित किया गया था। 7 फरवरी, 1984 को इनका निधन हो गया।<br>आनंदीबाई जोशी: इनका जन्म 31 मार्च 1865 को पुणे शहर में हुआ था। ये भारत की पहली महिला थीं जिन्होंने विदेश में डॉक्टर की डिग्री हासिल की। भारत लौटने के बाद इन्होंने चिकित्सा विज्ञान और स्वास्थ्य के क्षेत्र में काफी काम किया। 26 फरवरी 1887 में महज 22 साल की उम्र में बीमारी के चलते इनका निधन हो गया।<br>असीमा चटर्जी: कैंसर चिकित्सा, मिर्गी और मलेरिया रोधी दवाओं के विकास के लिये प्रसिद्ध असीमा चटर्जी का जन्म 23 सितंबर 1917 को बंगाल में हुआ था। ये पहली भारतीय महिला थीं जिन्हें किसी भारतीय विश्वविद्यालय द्वारा डॉक्टरेट ऑफ साइंस की उपाधि दी गई थी। 2006 में 90 साल की उम्र में इन्होंने दुनिया को अलविदा कह दिया।<br>अन्ना मणि: मौसम वैज्ञानिक के तौर पर मशहूर अन्ना मणि का जन्म 23 अगस्त 1918 को केरल के त्रावणकोर में हुआ था। इन्होंने सौर विकिरण, ओजोन परत और वायु ऊर्जा के क्षेत्र में उल्लेखनीय कार्य किया। 16 अगस्त 2001 को इनकी जीवनलीला समाप्त हो गई।<br>किरण मजूमदार शा: किरण विज्ञान की दुनिया में किसी पहचान की मोहताज नहीं हैं। जैव प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में अहम योगदान देने वाली किरण मजूमदार ने मधुमेह, कैंसर और आत्म प्रतिरोधी बीमारियों पर शोध के साथ ही एंजाइमों के निर्माण के लिये एकीकृत जैविक दवा कंपनी ‘बायोकॉन लिमिटेड’ की स्थापना की।<br>हमारी महिला वैज्ञानिकों ने केवल विज्ञान और चिकित्सा के क्षेत्र में अतुलनीय कार्य किए हैं, बल्कि गणित, अंतरिक्ष और खगोल शास्त्र के क्षेत्र में भी शानदार उपलब्धियाँ हासिल की हैं। अंतरिक्ष की दुनिया में दमदार प्रदर्शन करने वाली इन महिलाओं के बारे में आपको ज़रूर जानना चाहिए-</p>
<p style="text-align: justify;">मुथैया वनिता: ये भारत में दूसरे चंद्रयान मिशन की प्रोजेक्ट डायरेक्टर थीं। मुथैया इसरो में इस स्तर का काम करने वाली पहली महिला वैज्ञानिक हैं। इन्होंने मैपिंग के लिये इस्तेमाल होने वाले पहले भारतीय रिमोट सेंसिंग उपग्रह कार्टोसैट-1 और दूसरे महासागर अनुप्रयोग उपग्रह ओशनसैट-2 मिशन में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। साल 2006 में इन्हें सर्वश्रेष्ठ महिला वैज्ञानिक के पुरस्कार से सम्मानित किया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">रितु करिधल: चंद्रयान-1 मिशन में डिप्टी ऑपरेशंस डायरेक्टर रह चुकी रितु करिधल भारत के सबसे महत्वाकांक्षी मिशन चंद्रयान-2 की मिशन डायरेक्टर थीं। साल 2007 में इन्हें इसरो के यंग साइंटिस्ट ऑवार्ड से सम्मानित किया गया।</p>
<p style="text-align: justify;">टेसी थॉमस: भारत की मिसाइल महिला और अग्निपुत्री के नाम से मशहूर टेसी थॉमस ने डीआरडीओ में अपने काम से सबका ध्यान आकर्षित किया। इन्होंने भारत की रक्षा प्रणाली को मजबूत करने में काफी योगदान दिया है।</p>
<p style="text-align: justify;">कल्पना चावला: भारतीय मूल की अमेरिकी अंतरिक्ष यात्री कल्पना चावला के बारे में छोटे बच्चे से लेकर बुजुर्ग तक हर कोई जानता है। कल्पना अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की पहली महिला थीं। वह 376 घंटे 34 मिनट तक अंतरिक्ष में रहीं। इस दौरान उन्होंने धरती के 252 चक्कर लगाए थे। 1 फरवरी 2003 को हुई अंतरिक्ष इतिहास की एक मनहूस दुर्घटना में कल्पना चावला सहित सातों अंतरिक्ष यात्रियों की मौत हो गई।</p>
<p style="text-align: justify;">सुनीता विलियम्स: सुनीता विलियम्स अमेरिकी अंतरिक्ष एजेंसी नासा के जरिये अंतरिक्ष में जाने वाली भारतीय मूल की दूसरी महिला हैं। सुनीता विलियम्स ने एक अंतरिक्ष यात्री के रूप में 195 दिनों तक अंतरिक्ष में रहने का विश्व कीर्तिमान स्थापित किया।</p>
<p style="text-align: justify;">क्या कहते हैं आँकड़े?</p>
<p style="text-align: justify;">भारतीय परिप्रेक्ष्य में आँकड़ों पर नज़र डालें तो, वर्ष 2020 में किये गए एक सर्वेक्षण से पता चला कि भारतीय राष्ट्रीय विज्ञान अकादमी  के 1,044 सदस्यों में से केवल 89 महिलाएँ हैं जो कुल संख्या का 9 फीसदी हैं। वहीं, साल 2015 में उनके प्रतिनिधित्व में और अधिक कमी देखी गई थी जिसमें 864 सदस्यों में मात्र 6 फीसदी महिला वैज्ञानिक शामिल थीं।<br>इसी प्रकार, इन्सा  के शासी निकाय में साल 2020 में कुल 31 सदस्यों में से केवल 7 महिलाएँ थीं, जबकि 2015 में इसमें कोई महिला सदस्य शामिल नहीं थी।</p>
<p style="text-align: justify;">वहीं, विश्व स्तर पर बात करें तो जेंडर इन साइंस, इनोवेशन, टेक्नोलॉजी एंड इंजीनियरिंग , इंटर एकेडमी पार्टनरशिप और इंटरनेशनल साइंस काउंसिल द्वारा संयुक्त रूप से किये गए एक अध्ययन के मुताबिक उच्च अकादमियों में महिलाओं की निर्वाचित सदस्यता में मामूली सी वृद्धि देखने को मिली। ये संख्या वर्ष 2015 में 13 फीसदी थी जो कि वर्ष 2020 में बढ़कर 16 फीसदी हो गई।<br>आखिर क्या है वैज्ञानिक जगत में महिलाओं की कम भागीदारी की वजह</p>
<p style="text-align: justify;">उपर्युक्त आँकड़ों को देखने के बाद हम यह सोचकर खुश हो सकते हैं कि पिछले सालों के मुकाबले महिलाओं की संख्या साल दर साल बढ़ रही है, लेकिन इस बात पर भी गौर करना चाहिए कि इसकी रफ़्तार बहुत धीमी है। महिलाओं की भागीदारी को कम करने वाले कुछ प्रमुख कारण इस प्रकार हैं-</p>
<p style="text-align: justify;">विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं की कमी का एक प्रमुख कारण रूढ़िवादी लैंगिक धारणा है। लोगों के बीच यह मान्यता व्याप्त है कि अधिक परिश्रम व अधिक ज्ञान वाले कार्यों को पुरुष ही बेहतर तरीके से कर सकते हैं। महिलाएँ घर के कार्यों के लिये बनी हैं और इसलिए उन्हें घर के कार्य करने चाहिए या ऐसा व्यवसाय चुनना चाहिए जिसे घर के कार्यों के साथ-साथ आसानी से संभाला जा सके।<br>महिलाओं को काम पर रखने या फेलोशिप और अनुदान आदि देने में पितृसत्तात्मक दृष्टिकोण पर ज़ोर दिया जाता है।<br>महिला रोल मॉडलों की कमी<br>गर्भावस्था के दौरान संस्थागत ढाँचे का सहायक न होना और कार्यस्थल में सुरक्षा-संबंधी समस्याएँ महिलाओं को इस क्षेत्र से बाहर रहने को मज़बूर करती हैं।<br>इन क्षेत्रों में महिलाओं की कम संख्या के लिये न केवल सामाजिक मानदंड बल्कि गुणवत्ताहीन शिक्षा भी ज़िम्मेदार है।<br>महिलाओं को प्रोत्साहन देने हेतु शुरू की गई पहल</p>
<p style="text-align: justify;">देश में विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित  के क्षेत्रों में महिलाओं को करियर बनाने हेतु प्रोत्साहित करने के लिये विज्ञान और प्रौद्योगिकी विभाग (डीएसटी) द्वारा 2019 से ‘विज्ञान ज्योति योजना’ चलाई जा रही है।<br>इसके साथ ही, महिला वैज्ञानिकों को शैक्षणिक और प्रशासनिक स्तर पर अवसर प्रदान करने के उद्देश्य से साल 2014-15 में ‘किरण योजना’ की शुरुआत की गई।<br>स्टेम के क्षेत्र में लैंगिक समानता का आकलन करने के लिये ‘जेंडर एडवांसमेंट फॉर ट्रांसफॉर्मिंग इंस्टीट्यूशंस  कार्यक्रम शुरू किया गया।<br>कुल मिलाकर यह कहना गलत नहीं होगा कि समय के साथ-साथ विज्ञान के क्षेत्र में भी महिलाओं ने मेहनत और लगन से अपनी एक अलग पहचान बनाई है; उनके आविष्कारों व प्रयोगों ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी की उन्नति में चार चांद लगाए हैं लेकिन सरपट भाग रही इस विज्ञान की दुनिया में उनकी रफ्तार का पहिया अभी धीमा है। इसलिए यथास्थिति में तेजी से बदलाव लाने के लिये हमारे परिवार, शैक्षणिक संस्थानों, कंपनियों और सरकारों, सभी को साथ मिलकर कार्य करना होगा। साथ ही, वैज्ञानिक जगत में अपनी अमिट छाप छोड़ने वाली महिलाओं की सफलता की कहानियाँ जन-जन तक पहुँचानी होंगी जिससे संकीर्ण मानसिकता वाले तबके की सोच में बदलाव लाया जा सके और देश की बेटियाँ बढ़-चढ़कर विज्ञान के क्षेत्र में अपनी भागीदारी सुनिश्चित कर सकें।</p>
<p style="text-align: justify;">  विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 14:57:43 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Contribution of women in the field of science  Vijay Garg, विज्ञान के क्षेत्र में महिलाओं का योगदान : विजय गर्ग </media:keywords>
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    <item>
        <title>स्कूल के कैरियर मार्गदर्शन शिक्षक की मदद से छात्र यह निर्णय ले सकते हैं कि दसवीं कक्षा के बाद उन्हें कौन सी स्ट्रीम चुननी</title>
        <link>https://bharatiya.news/Help-of-the-school-career-guidance-teacher</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;">स्कूल के कैरियर मार्गदर्शन शिक्षक की मदद से छात्र यह निर्णय ले सकते हैं कि दसवीं कक्षा के बाद उन्हें कौन सी स्ट्रीम चुननी है। <br>विजय गर्ग </p>
<p style="text-align: justify;"><br>छात्रों के लिए दसवीं कक्षा के बाद कौन सी स्ट्रीम चुननी है, यह निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण होता है। उनका पूरा जीवन इस एक निर्णय पर निर्भर करता है। 11वीं कक्षा में वे जो विषय चुनते हैं, वही उन्हें मास्टर डिग्री तक ले जाता है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि विषय का चयन बहुत सोच-विचार के बाद किया जाए।</p>
<p style="text-align: justify;">छात्रों के लिए दसवीं कक्षा के बाद कौन सी स्ट्रीम चुननी है, यह निर्णय लेना बहुत महत्वपूर्ण होता है। उनका पूरा जीवन इस एक निर्णय पर निर्भर करता है। 11वीं कक्षा में वे जो विषय चुनते हैं, वही उन्हें मास्टर डिग्री तक ले जाता है। इसलिए यह बहुत महत्वपूर्ण है कि विषय का चयन बहुत सोच-विचार के बाद किया जाए। इस चयन के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि विद्यार्थी को अपनी रुचि का पता होना चाहिए। हर छात्र को यह समझ होती है कि उसे किस विषय में रुचि है। किसी को विज्ञान में रुचि है, किसी को कला में, तो किसी को वाणिज्य में। किसी भी छात्र के लिए यह जानना महत्वपूर्ण है कि विषय चुनने के बाद क्या संभावनाएं हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अपने बड़ों से सलाह अवश्य लें।</p>
<p style="text-align: justify;">अक्सर देखा जाता है कि छात्र अपनी रुचि को ध्यान में रखने के बजाय अपने दोस्तों की पसंद के अनुसार विषय चुनते हैं। वे सोचते हैं कि मैं भी वही विषय लूंगा जो मेरे मित्र ने लिया है। लड़कियों में यह अधिक आम है, यह सही नहीं है। विषय चुनने के लिए छात्र को अपने माता-पिता, शिक्षकों और स्कूल के कैरियर मार्गदर्शन शिक्षक से परामर्श करना चाहिए। उस समय इस बात पर विशेष ध्यान देना चाहिए कि उसकी रुचि किस विषय में है। दूसरे लोग उससे क्या अपेक्षा रखते हैं? इससे भी अधिक महत्वपूर्ण यह है कि वह स्वयं क्या चाहता है। उसे यह भी पता होना चाहिए कि यदि वह विज्ञान स्ट्रीम लेता है तो क्या संभावनाएं हैं। इसी प्रकार, कला के बारे में भी सब कुछ जानना चाहिए। गहन अध्ययन</p>
<p style="text-align: justify;">आजकल अधिकतर छात्र प्रशासनिक सेवा परीक्षा की तैयारी करते हैं। इन छात्रों का मन पहले से ही बना हुआ है। इसलिए, उनके लिए ऐसे विषयों का चयन करना बहुत फायदेमंद है जो उनकी परीक्षाओं में मददगार साबित होंगे। यदि 11वीं कक्षा में लिया गया विषय बीए में भी पढ़ा जाए तो यह गहन अध्ययन हो जाता है। प्रशासनिक परीक्षाओं में इस तरह का विषय चुने जाने पर विद्यार्थी के लिए बहुत लाभदायक होता है।</p>
<p style="text-align: justify;">स्कूल मार्गदर्शन शिक्षक सहायता</p>
<p style="text-align: justify;">यदि कोई छात्र सेना में भर्ती होना चाहता है, तो उसे यह पता होना चाहिए कि सेना अधिकारी बनने के लिए उसे कौन से विषय पढ़ने चाहिए, साथ ही उसे अपनी शारीरिक फिटनेस बनाए रखने के लिए क्या करना चाहिए। यह जानकारी हर स्कूल में उपलब्ध है। छात्र यह जानकारी गूगल से भी प्राप्त कर सकते हैं। इसमें स्कूल का मार्गदर्शन शिक्षक सबसे अधिक मददगार हो सकता है। माता-पिता के लिए यह भी बहुत महत्वपूर्ण है कि वे छात्र को अपनी पसंद का विषय चुनने की अनुमति दें। जब माता-पिता अपने बच्चों पर अपनी पसंद थोपते हैं, तो परिणाम अक्सर अच्छे नहीं होते। बच्चे की रुचि ललित कलाओं में है और वे उसे विज्ञान की ओर ले जाते हैं। इस तरह बच्चा खुश नहीं रहता। वह हर समय दबाव में रहता है। इससे उसकी रचनात्मकता प्रभावित होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">कैरियर योजना बनाना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">जब तक एक छात्र मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास कर लेता है, उसे पता होना चाहिए कि उसकी रुचि क्या है। उसके लिए एक कैरियर योजना बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। करियर योजना का मतलब है कि आपको कौन से विषय लेने चाहिए, आगे क्या संभावनाएं हैं और आपको उनके लिए कैसे तैयारी करनी चाहिए। उसके कैरियर प्लान में विकल्प होना बहुत महत्वपूर्ण है। यह जरूरी नहीं है कि जो सोचा जाए वह हासिल हो ही जाए। यदि कोई विद्यार्थी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाता तो वह हतोत्साहित हो जाता है। ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने दो लक्ष्य निर्धारित किए हैं। एक लक्ष्य प्राप्त न होने की स्थिति में वह दूसरे लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।<br>कैरियर योजना बनाना आवश्यक है।</p>
<p style="text-align: justify;">जब तक एक छात्र मैट्रिकुलेशन परीक्षा पास कर लेता है, उसे पता होना चाहिए कि उसकी रुचि क्या है। उसके लिए एक कैरियर योजना बनाना बहुत महत्वपूर्ण है। करियर योजना का मतलब है कि आपको कौन से विषय लेने चाहिए, आगे क्या संभावनाएं हैं और आपको उनके लिए कैसे तैयारी करनी चाहिए। उसके कैरियर प्लान में विकल्प होना बहुत महत्वपूर्ण है। यह जरूरी नहीं है कि जो सोचा जाए वह हासिल हो ही जाए। यदि कोई विद्यार्थी अपना लक्ष्य प्राप्त नहीं कर पाता तो वह हतोत्साहित हो जाता है। ऐसे में यह बहुत महत्वपूर्ण है कि उन्होंने दो लक्ष्य निर्धारित किए हैं। एक लक्ष्य प्राप्त न होने की स्थिति में वह दूसरे लक्ष्य की ओर बढ़ सकता है।</p>
<p style="text-align: justify;">आर्थिक स्थिति पर ध्यान दें। इसमें कोई संदेह नहीं है कि आज शिक्षा बहुत महंगी है, विशेषकर तकनीकी शिक्षा। छात्रों को अपने माता-पिता की वित्तीय स्थिति का भी ध्यान रखना चाहिए। एक और महत्वपूर्ण बात यह है कि यदि कोई विद्यार्थी किसी व्यवसाय में रुचि रखता है तो उसे केवल व्यावसायिक विषय ही लेने चाहिए। आज हमें कई ऐसे व्यवसायों में आसानी से रोजगार मिल जाता है जिनके बारे में हम जानते भी नहीं हैं। मोबाइल मरम्मत का काम सबसे लोकप्रिय है। यदि कोई छात्र चाहे तो ग्यारहवीं या बारहवीं के बाद भी इस तरह का डिप्लोमा कर सकता है। सरकारी आईटीआई कई ऐसे डिप्लोमा प्रदान करते हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">प्रत्येक छात्र में अद्वितीय प्रतिभा होती है।</p>
<p style="text-align: justify;">यह जरूरी नहीं है कि हर बच्चा डॉक्टर या इंजीनियर बने। प्लंबिंग, वेल्डिंग, रेफ्रिजरेशन, डेटा ऑपरेटर, हेयर स्टाइलिस्ट, फैशन डिजाइनर और ऐसे अन्य व्यवसायों की बहुत मांग है। प्रत्येक छात्र में अद्वितीय प्रतिभा होती है। उसे उस कौशल पर काम करना चाहिए। यहां तक कि सेल्समैन बनने के लिए भी कौशल की आवश्यकता होती है। आजकल ब्यूटी पार्लर का काम तेजी से बढ़ रहा है। स्कूल कई अन्य व्यावसायिक विषयों जैसे सौंदर्य और कल्याण, स्वास्थ्य देखभाल, परिधान निर्माण, खाद्य संरक्षण आदि में प्रशिक्षण प्रदान करते हैं। कंप्यूटर व्यवसाय और आधुनिक कार्यालय अभ्यास में नौकरी मिलने की 100 प्रतिशत गारंटी है।</p>
<p style="text-align: justify;">कोई भी पेशा छोटा नहीं होता.</p>
<p style="text-align: justify;">विद्यार्थियों के लिए यह समझना बहुत जरूरी है कि कोई भी पेशा छोटा नहीं होता। आपको अपने लक्ष्य अपनी रुचि, बुद्धि और वित्तीय स्थिति के अनुसार निर्धारित करने चाहिए। इस तरह वह कम खर्च में भी अपने काम में निपुणता हासिल कर सकता है। माता-पिता और शिक्षकों को भी उसे प्रोत्साहित करना चाहिए। माता-पिता के लिए यह समझना भी महत्वपूर्ण है कि हर बच्चे की बुद्धि का स्तर समान नहीं होता। इसलिए उन्हें अपने बच्चे की तुलना किसी और से नहीं करनी चाहिए। दसवीं कक्षा के बाद विषय का चुनाव एक ऐसा चुनाव है जो व्यक्ति के सम्पूर्ण जीवन का आधार होता है। इसलिए यह चुनाव बहुत सोच-समझकर किया जाना चाहिए। इसमें किसी का अनुसरण करना उचित नहीं है। आपको सावधानीपूर्वक विचार करने के बाद अपना निर्णय लेना चाहिए।<br> विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</p> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 09 Apr 2025 14:56:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Help of the school career guidance teacher, स्कूल के कैरियर मार्गदर्शन शिक्षक की मदद से छात्र यह निर्णय ले सकते हैं कि दसवीं कक्षा के बाद उन्हें कौन सी स्ट्रीम चुननी</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>गिल्ली&amp;डंडा और कंचे जैसे खेल भरेंगे बच्चों में नए रंग</title>
        <link>https://bharatiya.news/Games-like-gilli-danda-and-marbles-will-fill-new-colors-in-children</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">गिल्ली-डंडा और कंचे जैसे खेल भरेंगे बच्चों में नए रंग : </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">यदि आपके बच्चे स्कूलों में पढ़ रहे हैं और अब तक गिल्ली-डंडा, कंचे, कबड्डी, गुट्टी व राजा मंत्री-चोर सिपाही जैसे खेलों से परिचित नहीं हैं तो जल्द ही उन्हें इन परंपरागत प्राचीन भारतीय खेलों से परिचित होने का मौका मिल सकता है। आधुनिकता और तकनीक के इस दौर में तेजी से लुप्त हो रहे इन परंपरागत भारतीय खेलों को बचाने को लेकर शिक्षा मंत्रालय ने एक नई मुहिम शुरू की है। जिसमें देश की नई पीढ़ी को इन भारतीय खेलों से स्कूली स्तर पर ही जोड़ा जाएगा। इनमें ऐसे परंपरागत खेलों को अधिक अहमियत दी जाएगी, जो समूहों में खेले जाते हैं। माना जा रहा है कि इससे बच्चों में सामाजिक जुड़ाव की भावना विकसित करने में मदद मिलेगी।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">देश के अलग-अलग हिस्सों में प्राचीन समय से खेले जाने वाले करीब 75 भारतीय खेलों को अब तक इस पहल के तहत चिह्नित किया गया है। इनमें खो-खो, कबड्डी व गिल्ली-डंडा जैसे ऐसे खेल भी शामिल हैं, जो अलग-अलग नामों से देश के कई हिस्सों में और दुनिया के दूसरे देशों में खेले जाते हैं।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मंत्रालय फिलहाल कबड्डी की तर्ज पर इन खेलों के लिए एक स्टैंडर्ड नियम-कायदे बनाने में जुटा है। इसमें इन खेलों से जुड़े विशेषज्ञों की मदद ली जा रही है। अब तक कबड्ड़ी, गिल्ली-डंडा, खो-खो और लगोरी या पिट्ठू जैसे खेलों के नियम कायदे और इसे खेलते हुए वीडियो अपलोड भी किए जा चुके हैं। बाकी खेलों को लेकर भी ऐसी तैयारी चल रही है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के अनुसार, इस पहल के पीछे का उद्देश्य बच्चों को इन खेलों के जरिये भारतीय जड़ों से परिचित कराना है। इसका एक ढांचा तैयार किया जा रहा है। इन खेलों से जुड़े देशभर के प्रतिभाशाली लोगों की पहचान की जा रही है। स्कूलों में तैनात खेल तथा व्यायाम शिक्षकों को इसका प्रशिक्षण देने की तैयारी भी की जा रही है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">यह भी बताया गया है कि स्कूलों से इसका ब्योरा मांगा गया है। इसके साथ ही इन खेलों के प्रति रुझान बढ़ाने के लिए देशभर में इससे जुड़ी प्रतियोगिताएं आयोजित करने जैसी पहल शामिल है। शिक्षा में भारतीय ज्ञान परंपरा को बढ़ावा देने की नई राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) में की गई पहल को इससे जोड़कर देखा जा रहा है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 31 Mar 2025 06:43:42 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Games like gilli danda and marbles will fill new colors in children, गिल्ली-डंडा और कंचे जैसे खेल भरेंगे बच्चों में नए रंग</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>निरंतरता का मोल : विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/The-value-of-continuity-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><strong><span style="font-size: 14pt;">निरंतरता का मोल : </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">सातत्य का आशय किसी भी गतिविधि की निरंतरता से होता | अगर हम अपने चहुंओर के परिवेश या खुद अपने शरीर की किसी भी गतिविधि या क्रियाकलाप का गहन सूक्ष्मता के साथ अवलोकन करें तो हम निश्चित रूप से इस निष्कर्ष पर पहुंचेंगे कि प्रत्येक गतिविधि दो सीमांत बिंदुओं 'आरंभ' और 'अंत' के बीच संचालित होती है। आरंभ और अंत के बीच का अंतराल कितना लंबा होगा, यह पूरी तरह से उस गतिविधि की निरंतरता या सातत्य पर निर्भर करता है। हम कल्पना कर सकते हैं कि हमने किसी नूतन लक्ष्य को केंद्रित करते हुए कोई क्रिया आरंभ की और बहुत कम समय के बाद ही किसी न किसी कारण से हमें उससे खत्म भी करना पड़ा। तब ऐसी दशा में हम अपने लक्ष्य को कभी प्राप्त नहीं कर पाएंगे, क्योंकि हमारे द्वारा क्रियान्वित की गई गतिविधि निरंतरता को प्राप्त नहीं कर पाई । दूसरे शब्दों में कहें तो निरंतरता किसी भी मंजिल या लक्ष्य तक पहुंचने के लिए एक अनिवार्य शर्त है । जब कभी और जहां कहीं निरंतरता खंडित होती है, संबंधित गतिविधि परिणाम के बजाय दुष्परिणाम का वरण कर लेती है। सातत्य या निरंतरता और सफलता के बीच एक नितांत गहरा संबंध है, बल्कि दोनों एक दूसरे के पूरक हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">इसका सर्वोत्तम उदाहरण प्रकृति है । प्रकृति के सभी मूलभूत घटक, उदाहरणार्थ- जल, वायु आदि सभी सातत्य के सिद्धांत का अनुसरण करते हैं। जल और हवा के बहाव में अगर सातत्य या निरंतरता न हो, तो निश्चित ही वे महत्त्वहीन हो जाएंगे। कलकल करती सरिता और शांत तड़ाग में निस्संदेह सततवाहिनी सरिता कहीं अधिक महत्त्व रखती है। इसका कारण केवल इतना है कि बहती हुई सरिता सदैव सातत्य के अंक में रहती है। ठहराव से उसका कोई संबंध नहीं होता। ऐसा नहीं है कि ठहराव आवश्यक नहीं है, लेकिन वह ठहराव लक्ष्य के पड़ाव तक पहुंचने के बाद ही होना चाहिए। नदी जब महासागर में विलीन हो जाती है, तभी उसका अस्तित्व अपनी यात्रा को पूरा करके ठहराव की दशा को प्राप्त कर पाता है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">जीवन की निरंतरता के बने रहने के लिए सांस में सातत्य का होना अनिवार्य है । सांस के असतत होने का सीधा सा अर्थ है- जीवन की मृत्यु में परिणति । जन्म और मृत्यु आत्मा की अनंत यात्रा के दो पड़ाव होते हैं। इन पड़ावों के बीच यानी जन्म से लेकर मृत्यु के बीच की सीमित यात्रा का नाम ही जीवन है। अब इस यात्रा की अवधि सातत्य के स्तर पर निर्भर करती है। यात्रा सातत्य से सिंचित होगी, तो निस्संदेह हम लंबे समय तक जीवन का आनंद भोगने में सफल रहेंगे। वहीं अगर यात्रा का सातत्य किसी भी कारण से खंडित हुआ तो मृत्यु के निकट आने में कोई भी विलंब नहीं होगा ।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">भौतिक और सांसारिक जीवन से परे इन विषयों से थोड़ा-सा संकुचित होकर केवल दैनिक जीवन, क्रियाकलापों और गतिविधियों पर ही केंद्रित रहा जाए तो भी सातत्य की महिमा कहीं न कहीं स्वयंसिद्ध है । सातत्य ही जीवन को सफल बनाने का एक मूल मंत्र है। परिस्थितियों से बिना प्रभावित हुए अपने कार्य को निरंतरता के साथ करते रहना ही सातत्य है । जीवन का कोई भी ऐसा पहलू नहीं है जहां पर सातत्य के बिना सफलता का अर्जन किया जा सके, क्योंकि सफलता का कोई भी लघु मार्ग या सूत्र अभी तक उपलब्ध नहीं है। सफलता के लिए अथक परिश्रम की आवश्यकता होती ही है, जो केवल और केवल सातत्य के माध्यम से ही संभव है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">जीवन में सातत्य का अनुसरण करने से व्यक्ति को लाभों का एक ऐसा पिटारा प्राप्त हो जाता है, जिसकी कल्पना संभवतः उसके द्वारा नहीं की गई होती है । सातत्य की प्रवृत्ति व्यक्ति को द्रुत गति से उसके लक्ष्य तक पहुंचाने में सहायक होती है। यह व्यक्तित्व को अद्भुत तरीके से निखार देता है। व्यक्तित्व के अंदर अनेक दुर्लभ विशिष्टताओं का समावेश सातत्य का अनुसरण करके ही संभव हो पाता है। इनमें सबसे मूल्यवान उपलब्धि होती है- आत्मविश्वास । किसी भी कार्य के प्रति पूर्ण समर्पण का भाव अपनाते हुए उसके क्रियान्वयन में सातत्य को समाविष्ट करने से विभिन्न चरणों में आने वाली बाधाएं व्यक्ति के अंदर आत्मविश्वास के स्तर को उच्चीकृत करने में सहायता करती हैं। मगर सातत्य को विकसित करने के लिए हमें प्रकृति की कुछ शर्तों को स्वीकार करना होगा ।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">इनमें से पहला और सबसे अहम शर्त यह है कि हमें किसी भी कार्य या गतिविधि के रूप वाली वैतरणी को धैर्य की नौका पर सवार होकर ही पार करने की चेष्टा करनी चाहिए, क्योंकि धैर्य वह ब्रह्मास्त्र है जो बड़ी से बड़ी चुनौतियां एवं बाधाओं को अपनी अमोघ शक्ति से चकनाचूर कर देने में सक्षम है। सातत्य के प्रादुर्भाव के लिए धैर्य परम आवश्यक है। इसके अतिरिक्त आत्मानुशासन, सकारात्मकता से परिपूर्ण मनोबल, समय का उचित प्रबंधन और ध्यान का लक्ष्य पर केंद्रित होना । ये कुछ ऐसी शर्तें हैं जो प्रकृति के द्वारा मूक रूप से हमारे समक्ष सातत्य का उपहार प्राप्त करने के बदले में रखी जाती हैं । इनका व्यवस्थित अनुपालन करने के बाद ही हम जीवन में सातत्य की अपेक्षा कर सकते हैं। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">हमें अपने शरीर और मन-मस्तिष्क, दोनों की गतिविधियां सातत्य से युक्त रखनी चाहिए, क्योंकि सातत्य हमारे अंदर विजय प्राप्त करने जैसी भावना को जागृत करता है । सातत्य का खंडित होना हमारे अंदर कहीं न कहीं कुंठा और निराशा को जन्म देता है और ये भाव हमारे व्यक्तित्व में विकृति उत्पन्न करते हैं । सातत्य एक ऐसा अमूल्य रत्न है जो अगर किसी ने एक बार प्राप्त कर लिया तो फिर वह आजीवन उसका लाभ सूद समेत प्राप्त करता रहेगा । साधारण से असाधारण में परिणत होने के लिए सफलता एक आवश्यक तत्त्व है, लेकिन उस सफलता की प्राप्ति के लिए सातत्य एक अपरिहार्य शर्त है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 31 Mar 2025 06:42:29 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>निरंतरता का मोल : विजय गर्ग </media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>पढ़ाई के दौरान सो जाना कैसे बंद करें : विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/How-to-stop-falling-asleep-while-studying-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><strong><span style="font-size: 14pt;">पढ़ाई के दौरान सो जाना कैसे बंद करें : </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 14pt;">बोर्ड परीक्षा या प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि पढ़ाई के दौरान सो जाना कैसे बंद किया जाए। इन वर्षों में, हम में से अधिकांश ने शीर्ष छात्रों को एक खिंचाव पर लंबे समय तक अध्ययन करने या रात भर अध्ययन करने की अपनी क्षमता के बारे में घमंड करते हुए सुना है, जिसमें कोई नींद नहीं है। लेकिन आपको कभी भी अपनी परीक्षा से पहले रात भर जागने के लिए खुद को मजबूर करने की कोशिश नहीं करनी चाहिए क्योंकि यह गहरी नींद या आरईएम नींद है जो आपको दीर्घकालिक स्मृति में अध्ययन करती है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">यहां पढ़ाई के दौरान सो जाने से रोकने और खुद को जागृत रखने और बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए ध्यान केंद्रित करने के टिप्स दिए गए हैं:</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">1.। स्वस्थ आहार से चिपके रहें जो भोजन वसा पर अधिक होता है, वह आपको नींद और सुस्त बना सकता है। पढ़ाई के दौरान खुद को सोने से रोकने के लिए, पोषक तत्वों और फाइबर जैसे सूप और सलाद, दाल और बहुत सारे फल और सब्जियों से भरपूर संतुलित और स्वस्थ आहार खाएं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">यदि आप अपने चीनी के स्तर को बढ़ावा देना चाहते हैं, तो केक और चॉकलेट न खाएं; बल्कि, सेब, संतरे और केले जैसे चीनी से भरपूर फलों के लिए जाएं। लीन प्रोटीन ऊर्जा के लिए महान होते हैं और साथ ही ग्रेनोला या कुछ ट्रेल मिक्स पर स्नैकिंग करने की कोशिश करते हैं या नट्स और बीजों से भरी ऊर्जा पट्टी को काटते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">2.। अच्छी नींद लें पढ़ाई के दौरान नींद महसूस करने का मुख्य कारण रात में पर्याप्त नींद नहीं लेना है। अच्छी सेहत बनाए रखने के लिए हर रात 7 से 8 घंटे सोना अनिवार्य है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">अधिक नींद या नींद न लें और नींद के शेड्यूल से चिपके रहें ताकि आपका मस्तिष्क हर रात एक ही समय में नींद महसूस करने के लिए तैयार हो।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">हर रात 7 से 8 घंटे सोना अच्छी सेहत में रखना और पढ़ाई के दौरान सो जाना बंद करना अनिवार्य है। 3। पावर नैप्स लें यदि आप बोर्ड परीक्षा के दौरान रात में नींद की अपेक्षित मात्रा प्राप्त नहीं कर सकते हैं तो यह समझ में आता है। लेकिन आपको दिन के बीच में इसके लिए मेकअप करने की जरूरत है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">जब भी आपको बहुत नींद आती है, तो पढ़ाई से ब्रेक लें और 20- से 30 मिनट की पावर नैप के लिए जाएं। ऊर्जा का छोटा फट आपको जागने के बाद ध्यान केंद्रित करने में मदद करेगा।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">4। पर्याप्त पानी पिएं एक और कारण है कि आप अध्ययन करते समय सो रहे होंगे क्योंकि आप पर्याप्त पानी नहीं पी रहे हैं। लेकिन एक अध्ययन के अनुसार, निर्जलीकरण सचमुच आपके मस्तिष्क को सिकोड़ सकता है!</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">बोर्ड परीक्षा या प्रतियोगी परीक्षाओं के दौरान समय का ट्रैक खोना और पर्याप्त पानी नहीं पीना आसान है। इससे निपटने के लिए, हर समय अपने अध्ययन डेस्क पर ठंडे पानी की एक पूरी बोतल रखें और इसे पूरे दिन घूंट लेते रहें।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आपको एक दिन में 2 लीटर पानी पीना चाहिए। आप 2-लीटर की बोतल भर सकते हैं और सोते समय इसे खत्म करने का लक्ष्य रख सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">5.। उठो और घूमो</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">पावर नैप्स लेने के अलावा, एक और चीज जो आप कर सकते हैं यदि आप पढ़ाई के दौरान नींद महसूस कर रहे हैं तो वह उठ रही है और थोड़ी देर के लिए घूम रही है। आपको जिम हिट करने की आवश्यकता नहीं है, लेकिन बस अपने रक्त को प्रवाहित करने की आवश्यकता है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आप किसी पसंदीदा गीत में चारों ओर खिंचाव और नृत्य कर सकते हैं या सिर्फ 10 मिनट के लिए बाहर टहल सकते हैं। यहां तक कि आप अपनी किताब भी ले सकते हैं और अपने कमरे में घूमते हुए पढ़ाई कर सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">6। एक खिंचाव पर बहुत लंबा अध्ययन न करें इसके बावजूद कि लोग एक बार में 5-6 घंटे तक अध्ययन करने के बारे में क्या कह सकते हैं, एकाग्रता खोए बिना ऐसा करना लगभग असंभव है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">लगातार अध्ययन की इष्टतम अवधि 2 घंटे है। हर 2 घंटे की अवधि को 5 मिनट के ब्रेक के बाद अध्ययन के 25 मिनट में फिर से तोड़ा जा सकता है। इस समय के दौरान, उठो और खिंचाव करो या एक छोटी साँस लेने का व्यायाम करो। हर 2 घंटे के बाद, आप लगभग 20 मिनट के ब्रेक ले सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">7.। जोर से पढ़ें और अधिक लिखें जोर से पढ़ना आपको अपने दिमाग में पढ़ने से ज्यादा व्यस्त रख सकता है जो आपको पढ़ाई के दौरान सोते रहने में मदद करेगा।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">इसके अलावा, अपने पास एक रफ कॉपी रखें जिसमें आप जो पढ़ रहे हैं उसके महत्वपूर्ण बिंदु लिख सकते हैं। न केवल यह आपके नोट्स को याद करने का सबसे अच्छा तरीका है, बल्कि यह आपके शरीर को भी व्यस्त रखेगा और आपको ध्यान केंद्रित और जागृत रखेगा।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">पढ़ाई के दौरान खुद को जागृत रखने के लिए आप जो पढ़ रहे हैं, उसके महत्वपूर्ण बिंदु लिखें। 8। अपने अध्ययन विषयों को घुमाएं कभी-कभी बहुत लंबे समय तक एक ही विषय या विषय का अध्ययन करने से आपको बहुत नींद आ सकती है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">जब आप अध्ययन करते समय जागते रहने में कठिनाई का सामना करना शुरू करते हैं, तो किसी अन्य विषय या विषय पर शिफ्ट करें जो आपको अधिक दिलचस्प लगता है। यह आपको बोर्ड परीक्षा की तैयारी के दौरान जागृत और केंद्रित रखने में मदद करेगा। इसके अलावा, सुनिश्चित करें कि आप देर रात कठिन विषयों का अध्ययन करने के लिए नहीं चुनते हैं!</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">9। पढ़ाई करते समय बहुत सहज न हों पढ़ाई के दौरान सो जाने का एक बड़ा कारण बहुत आरामदायक हो रहा है। इसके लिए मुख्य टिप आपके बिस्तर में अध्ययन नहीं करना होगा। अपने अध्ययन क्षेत्र और नींद के क्षेत्र को अलग रखें ताकि आपका मस्तिष्क स्पष्ट रूप से दोनों के बीच अंतर कर सके।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">अधिमानतः अपनी पीठ के साथ एक डेस्क और कुर्सी पर बैठें। जागते रहने और अध्ययन करते समय ध्यान केंद्रित करने के लिए उज्ज्वल रोशनी का उपयोग करें।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">अपनी एकाग्रता और स्मृति को बढ़ावा देने के लिए, आप हर दिन भी अपना अध्ययन स्थान बदल सकते हैं, लेकिन ध्यान रखें कि उन स्थानों में से कोई भी आपको नींद महसूस करने के लिए बहुत आरामदायक नहीं बनाता है!</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">10। अपना चेहरा धो लो बोर्ड परीक्षा की तैयारी के दौरान जागते रहने के सबसे व्यावहारिक तरीकों में से एक यह है कि जब भी नींद आए तो अपना चेहरा धो लें। यह सबसे अधिक कोशिश की और परीक्षण किए गए तरीकों में से एक है और एक जो शायद भारत भर के माता-पिता द्वारा सबसे अधिक सलाह दी जाती है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">जब भी आपकी आंखें भारी लगती हैं और आपको खुजली महसूस होती है, तो अपने चेहरे को ठंडे पानी से धो लें। जब आप उस पर हों तो आप अपने दांतों को ब्रश भी कर सकते हैं। यह आपको जागृत और तरोताजा महसूस कराएगा।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">11। खुद से बात करो अपने आप से बात करना पागल सलाह की तरह लग सकता है लेकिन यह वास्तव में काम करता है! अपने आप को जागृत रखने के लिए अपने अध्ययन सत्रों में खुद से बात करते रहें।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">12। अपनी आँखों की रक्षा करो वे दिन गए जब हमने केवल किताबों और नोटबुक से अध्ययन किया। यह डिजिटल युग है और कई छात्र अध्ययन करने के लिए अपने कंप्यूटर स्क्रीन को घूरते हुए घंटों बिताते हैं कि क्या यह ऑनलाइन व्याख्यान देख रहा है या नोट्स पढ़ रहा है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विशेषज्ञ हर 20 मिनट में कंप्यूटर स्क्रीन से दूर देखने की सलाह देते हैं। अपनी आँखें बंद करें और अपने ढक्कन पर थोड़ा दबाएं, उन्हें खोलें और कुछ समय के लिए एक खाली दीवार पर ध्यान केंद्रित करें ताकि आपकी आँखें थक जाएं और नींद महसूस करना बंद कर दें।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">13। च्यूइंग गम का उपयोग करें चबाने वाला गम आपके दांतों के लिए बहुत बुरा है लेकिन अगर आपको बिल्कुल करना है, तो अपने साथ एक पैकेट रखें और जब भी आपको पढ़ाई के दौरान नींद आ रही हो, उसमें एक पॉप करें।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">यदि आपका मुंह लगातार काम कर रहा है, तो अध्ययन सत्रों के बीच में आपके दर्जन भर कम होने की संभावना है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">14। कैफीनयुक्त पेय पिएं कैफीन के साथ कॉफी या अन्य पेय पीने से आपकी ऊर्जा को बढ़ावा मिल सकता है, लेकिन चेतावनी दी जा सकती है कि ऊर्जा में तेजी कम रह सकती है। इसके अलावा, आपके लिए बहुत अधिक कैफीन खराब है। आपको एक दिन में 500-600mg से अधिक कैफीन नहीं पीना चाहिए।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">ऊर्जा पेय को चुगिंग से दूर रहें क्योंकि प्रभाव खराब होने के बाद आप दुर्घटनाग्रस्त हो जाते हैं। 15। दूसरों के साथ अध्ययन करें यदि आप अकेले अध्ययन नहीं कर रहे हैं, तो एक बहुत छोटा सा मौका है कि आप एक अध्ययन सत्र के बीच में बंद कर देंगे।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">दोस्तों के एक समूह के साथ अध्ययन करना विचलित करने वाला हो सकता है, लेकिन यह आपको अपने बोर्ड परीक्षा की तैयारी के लिए बेहतर तरीके से तैयार करने में भी मदद कर सकता है यदि अध्ययन समूह में आप सभी अपने आप को पर्याप्त अनुशासन दे सकते हैं ताकि अध्ययन विषयों से विचलित न हों।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">16। कुछ संगीत पर रखो आप कुछ अध्ययन संगीत पर भी डाल सकते हैं जो आपके मस्तिष्क की तरंगों को संतुलित करने और एकाग्रता में सुधार करने में मदद करता है। कभी-कभी, यदि आप अध्ययन करते समय नींद महसूस कर रहे हैं, तो आप संगीत को बहुत उत्साहित कर सकते हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">हालांकि यह आपको अध्ययन संगीत को आराम देने के विपरीत अपनी पढ़ाई पर ध्यान केंद्रित करने में मदद नहीं कर सकता है, लेकिन आपको अपने स्तूप से जगाना सुनिश्चित है!</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">17। एक्यूप्रेशर का प्रयास करें बोर्ड परीक्षा के लिए अध्ययन करते समय खुद को जागृत रखने का एक नया युग तरीका एक्यूप्रेशर का उपयोग करना है। जब आप बहुत अधिक नींद महसूस करना शुरू करते हैं, तो मानव शरीर पर 5 केंद्रीय दबाव बिंदुओं पर टैप करने के लिए एक छोटे ब्रेक का उपयोग करें, आपके सिर के शीर्ष, आपके हाथों के पीछे, घुटनों के ठीक नीचे, आपकी गर्दन के पीछे का शीर्ष, और आपके पैरों के नीचे। </span><br><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">How to stay awake while studying, tips to avoid sleep while studying, how to stay focused during study, ways to prevent drowsiness while studying, study without feeling sleepy, how to concentrate on studies, stay active while studying, home remedies to avoid sleep while studying, how to stay alert during study, tips to study for long hours without sleeping., पढ़ाई के दौरान सो जाना कैसे बंद करें : विजय गर्ग , पढ़ाई के दौरान नींद दूर भगाने के उपाय, पढ़ाई में आलस्य कैसे दूर करें, पढ़ाई के समय नींद से बचने के तरीके, पढ़ाई में ध्यान कैसे लगाएं, देर रात पढ़ाई के लिए जागने के टिप्स, पढ़ाई करते समय एक्टिव कैसे रहें, नींद भगाने के घरेलू उपाय, स्टडी के दौरान थकान कैसे दूर करें, पढ़ाई में एकाग्रता बढ़ाने के उपाय, लंबे समय तक जागकर पढ़ाई कैसे करे, </span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 31 Mar 2025 06:39:28 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>How to stay awake while studying, tips to avoid sleep while studying, how to stay focused during study, ways to prevent drowsiness while studying, study without feeling sleepy, how to concentrate on studies, stay active while studying, home remedies to avoid sleep while studying, how to stay alert during study, tips to study for long hours without sleeping., पढ़ाई के दौरान सो जाना कैसे बंद करें : विजय गर्ग , पढ़ाई के दौरान नींद दूर भगाने के उपाय, पढ़ाई में आलस्य कैसे दूर करें, पढ़ाई के समय नींद</media:keywords>
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        <title> कहानी: खोखली रस्में; विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Story-Hollow-rituals</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;"> कहानी: खोखली रस्में; </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">ओह…यह एक साल, लमहेलमहे की कसक ताजा हो उठती है. आसपड़ोस, घरखानदान कोई तो ऐसा नहीं रहा जिस ने मुझे बुराभला न कहा हो. मैं ने आधुनिकता के आवेश में अपनी बेटी का जीवन खतरे के गर्त में धकेल दिया था. रुपए का मुंह देख कर मैं ने अपनी बेटी की जिंदगी से खिलवाड़ किया था और गौने की परंपरा को तोड़ कर खानदान की मर्यादा तोड़ डाली थी. इस अपराधिनी की सब आलोचना कर रहे थे. परंतु अंधविश्वास की अंधेरी खाइयों को पाट कर आज मेरी बेटी जिंदा लौट रही है. अपराधिनी को सजा के बदले पुरस्कार मिला है- अपने नवासे के रूप में. खोखली रस्मों का अस्तित्व नगण्य बन कर रह गया.</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">कशमकश के वे क्षण मुझे अच्छी तरह याद हैं जब मैं ने प्रताड़नाओं के बावजूद खोखली रस्मों के दायरे को खंडित किया था. मैं रसोई में थी. ये पंडितजी का संदेश लाए थे. सुनते ही मेरे अंदर का क्रोध चेहरे पर छलक पड़ा था. दाल को बघार लगाते हुए तनिक घूम कर मैं बोली थी, ‘देखो जी, गौने आदि का झमेला मैं नहीं होने दूंगी. जोजो करना हो, शादी के समय ही कर डालिए. लड़की की विदाई शादी के समय ही होगी.’</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अजीब बेवकूफी है,’ ये तमतमा उठे, ‘जो परंपरा वर्षों से चली आ रही है, तुम उसे क्यों नहीं मानोगी? हमारे यहां शादी में विदाई करना फलता नहीं है.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘सब फलेगा. कर के तो देखिए,’ मैं ने पतीली का पानी गैस पर रख दिया था और जल्दीजल्दी चावल निकाल रही थी. जरूर फलेगा, क्योंकि तुम्हारा कहा झूठ हो ही नहीं सकता.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘जी हां, इसीलिए,’ व्यंग्य का जवाब व्यंग्यात्मक लहजे में ही मैं ने दिया.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्योंकि अब हमारी ऐसी औकात नहीं है कि गौने के पचअड़े में पड़ कर 80-90 हजार रुपए का खून करें. सीधे से ब्याह कीजिए और जो लेनादेना हो, एक ही बार लेदे कर छुट्टी कीजिए.’ मैं ने अपनी नजरें थाली पर टिका दीं और उंगलियां तेजी से चावल साफ करने लगीं, कुछ ऐसे ही जैसे मैं परंपरा के नाम पर कुरीतियों को साफ कर हटाने पर तुली हुई थी. एक ही विषय को ले कर सालभर तक हम दोनों में द्वंद्व युद्ध छिड़ा रहा. ये परंपरा और मर्यादा के नाम पर झूठी वाहवाही लूटना चाहते थे. विवाह के सालभर बाद गौने की रस्म होती है, और यह रस्म किसी बरात पर होने वाले खर्च से कम में अदा नहीं हो सकती. मैं इस थोथी रस्म को जड़ से काट डालने को दृढ़संकल्प थी. क्षणिक स्थिरता के बाद ये बेचारगी से बोले, ‘विमला की मां, तुम समझती क्यों नहीं हो?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्या समझूं मैं?’ बात काटते हुए मैं बिफर उठी, ‘कहां से लाओगे इतने पैसे? 1 लाख रुपए लोन ले लिए, कुछ पैसे जोड़जोड़ कर रखे थे, वे भी निकाल लिए, और अब गौने के लिए 80-90 हजार रुपए का लटका अलग से रहेगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘तो क्या करूं? इज्जत तो रखनी ही पड़ेगी. नहीं होगा तो एक बीघा खेत ही बेच डालूंगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्या कहा? खेत बेच डालोगे?’ लगा किसी ने मेरे सिर पर हथौड़े का प्रहार किया हो. क्षणभर को मैं इज्जत के ऐसे रखरखाव पर सिर धुनती रह गई. तीखे स्वर में बोली, ‘उस के बाद? सुधा और अंजना के ब्याह पर क्या करोगे? तुम्हारा और तुम्हारे लाड़लों के भविष्य का क्या होगा? तुम्हारे पिताजी तो तुम्हारे लिए 4 बीघा खेत छोड़ गए हैं जो तुम रस्मों के ढकोसले में हवन कर लोगे, लेकिन तुम्हारे बेटे किस का खेत बेच कर अपनी मर्यादा की रक्षा करेंगे?’ सत्य का नंगापन शायद इन्हें दूर तक झकझोर गया था. बुत बने ये ताकते रह गए. फिर तिक्त हंसी हंस पड़े, ‘तुम तो ऐसे कह रही हो, विमला की मां, मानो 4 ही बच्चे तुम्हारे अपने हों और विमला तुम्हारी सौत की बेटी हो.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘हांहां, क्यों नहीं, मैं सौतेली मां ही सही, लेकिन मैं गौना नहीं होने दूंगी. शादी करो तब पूरे खानदान  को न्योता दो, गौना करो तब फिर पूरे खानदान को बुलाओ. कपड़ा दो,  गहना दो, यह नेग करो वह जोग करो. सिर में जितने बाल नहीं हैं उन से ज्यादा कर्ज लादे रहो, लेकिन शान में कमी न होने पाए.’ इन के होंठों पर विवश मुसकान फैल गई. जब कभी मैं ज्यादा गुस्से में रहती हूं, इसी तरह मुसकरा देते हैं, मानो कुछ हुआ ही न हो. इन के होंठों की फड़कन कुछ कहने को बेताब थी, परंतु कह नहीं सके. उठ खड़े हुए और आंगन पार करते हुए कमरे की ओर चले गए. जब से विमला की शादी तय हुई, शादी संपन्न होने तक यही सिलसिला जारी रहा. ये कंजूसी से ब्याह कर के समाज में अपनी तौहीन करवाने को तैयार नहीं थे, और मैं रस्मों के खोखलेपन की खातिर चादर से पैर निकालने को तैयार नहीं थी. ‘गौने की रस्म अलग से करनी ही होगी. सदियों से यह हमारी परंपरा रही है,’ मैं इस थोथेपन में विश्वास करने को तैयार न थी.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">छोटी ननद के ब्याह पर ही मैं ने यह निर्णय कर के गांठ बांधी थी. याद आता है तो दिल कट कर रह जाता है. ब्याह पर जो खर्च हुआ वह तो हुआ ही, सालभर घर बिठा कर उस का गौना किया गया तो 80 हजार रुपए उस में फूंक दिए गए. गौना करवाने आए वर पक्ष के लोगों की तथा खानदान वालों की आवभगत करतेकरते पैरों में छाले पड़ गए, तिस पर भी ‘मुरगी अपनी जान से गई, खाने वालों को मजा न आया’ वाली बात हुई. चारों ओर से बदनामी मिली कि यह नहीं दिया, वह नहीं दिया. ‘अरे, इस से अच्छी साड़ी तो मैं अपनी महरी को देती हूं… कंजूस, मक्खीचूस’ तथा इसी से मिलतीजुलती असंख्य उपाधियां मिली थीं.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">मुझे विश्वास था कि मैं वर्तमान स्थिति और परिवेश में गौना करने में आने वाली कठिनाइयां बता कर इन्हें मना लूंगी. जल्दी ही मुझे इस में सफलता भी मिल गई. मेरी सलाह इन के निर्णय में परिवर्तित हो गई, किंतु ‘ये नहीं फलता है’ की आशंका से ये उबर नहीं पाए. विवाह संबंधी खरीदफरोख्त की कार्यवाहियां लगभग पूरी हो चुकी थीं. रिश्तेदारों और बरातियों का इंतजार ही शेष था. रिश्तेदारों में सब से पहले आईं इन की रोबदार और दबंग व्यक्तित्व वाली विधवा मौसी रमा, खानदानभर की सर्वेसर्वा और पूरे गांव की मौसी. दोपहर का समय था. विवाह हेतु खरीदे गए गहने, कपड़े एकएक कर मैं मौसीजी को दिखा रही थी. बातों ही बातों में मैं ने अपना फैसला कह सुनाया. सुनते ही मौसीजी ज्वालामुखी की तरह फट पड़ीं. क्रोध से भरी वे बोलीं, ‘क्यों नहीं करोगी तुम गौना?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘दरअसल, मौसीजी, हमारी इतनी औकात नहीं कि हम अलग से गौने का खर्च बरदाश्त कर सकें,’ मैं ने गहनों का बौक्स बंद कर अलमारी में रख दिया और कपड़े समेटने लगी.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे वाह, क्यों नहीं है औकात?’ मौसीजी के आग्नेय नेत्र मेरे तन को सेंकने लगे, ‘क्या तुम जानतीं नहीं कि शादी के समय विदाई करना हमारे खानदान में अच्छा नहीं समझा जाता?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘लेकिन इस से होता क्या है?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘होगा क्या…वर या वधू दोनों में से किसी एक की मृत्यु हो जाएगी. सालभर के अंदर ही जोड़ा बिछुड़ जाता है.’ मैं तनिक भी नहीं चौंकी. पालतू कुत्ते की तरह पाले गए अंधविश्वासों के प्रति खानदान वालों के इस मोह से मैं पूर्वपरिचित थी.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">अलमारी बंद कर पायताने की ओर बैठती हुई मैं ने जिज्ञासा से फिर पूछा, ‘लेकिन मौसीजी, हमारे खानदान में शादी के समय विदाई करना अच्छा क्यों नहीं समझा जाता, इस का भी तो कोई कारण अवश्य होगा?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘हां, कारण भी है, तुम्हारे ससुर के चचेरे चाचा की सौतेली बहन हुआ करती थीं. विवाह के समय ही उन का गौना कर दिया गया था. बेचारी दोबारा मायके का मुंह नहीं देख पाईं. साल की कौन कहे, महीनेभर में ही मृत्यु हो गई.’’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">अब क्या कहूं, सास का खयाल न होता तो ठठा कर हंस पड़ती. तर्कशास्त्र की अवैज्ञानिक परिभाषा याद हो आई. किसी घटना की पूर्ववर्ती घटना को उस कार्य का कारण कहते हैं. आज वैज्ञानिक धरातल पर भी यह परिभाषा किसी न किसी रूप में जिंदा है. परंतु मुंहजोरी से कौन छेड़े मधुमक्खियों के छत्ते को. मैं सहज स्वर में बोली, ‘लेकिन मौसीजी, उन से पहले जो विवाह के समय ही ससुराल जाती थीं क्या उन की भी मृत्यु हो जाया करती थी?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे, नहीं,’ अपने दाहिने हाथ को हवा में लहराती हुई मौसीजी बोलीं, ‘उन के तो नातीपोते भी अब नानादादा बने हुए हैं.’ प्रसन्नता का उद्वेग मुझ से संभल न सका, ‘फिर तो कोई बात ही नहीं है, सब ठीक हो जाएगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘कैसे नहीं है कोई बात?’ मौसीजी गुर्राईं, ‘गांवभर में हमारे खानदान का नाम इसीलिए लिया जाता है…दूरदूर के लोग जानते हैं कि हमारे यहां शादी से भी बढ़चढ़ कर गौना होता है. देखने वाले दीदा फाड़े रह जाते हैं. तेरी फूफी सास के गौने में परिवार की हर लड़की को 2-2 तोले की सोने की जंजीर दी गई थी और ससुराल वाली लड़कियों को जरी की साड़ी पहना कर भेजा गया था.’ तब की बात कुछ और थी, मौसीजी. तब हमारी जमींदारी थी. आज तो 2 रोटियों के पीछे खूनपसीना एक हो जाता है. महीनेभर नौकरी से बैठ जाओ तो खाने के लाले पड़ जाएं. फिर गौना का खर्च हम कहां से जुटा पाएंगे?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">इसे अपना अपमान समझ कर मौसीजी तमतमा कर उठ खड़ी हुईं, ‘ठीक है, कर अपनी बेटी का ब्याह, न हो तो किसी ऐरेगैरे का हाथ पकड़ा कर विदा कर दे, सारा खर्च बच जाएगा. आने दे सुधीर को, अब मैं यहां एक पल भी नहीं रह सकती. जहां बहूबेटियों का कानून चले वहां ठहरना दूभर है.’ मौसीजी के नेत्रों से अंगार बरस रहे थे. वे बड़बड़ाती हुईं अपने कमरे की ओर बढ़ीं तो मैं एकबारगी सकते में आ गई. मैं लपक कर उन के कमरे में पहुंची. वे अपनी साड़ी तह कर रही थीं. साड़ी उन के हाथ से खींच कर याचनाभरे स्वर में मैं बोली, ‘मौसीजी, आप तो यों ही राई का पर्वत बनाने लगीं. मेरी क्या बिसात कि मैं कानून चलाऊं?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे, तेरी क्या बिसात नहीं है? न सास है, न ननद है, खूब मौज कर, मैं कौन होती हूं रोकने वाली?’ उन की आवाज में दुनियाजहान की विवशता सिमट आई. उन की आंखों में आंसू आ गए थे. लगा किसी ने मेरा सारा खून निचोड़ लिया हो. मैं विनम्र स्वर में बोली, ‘मौसीजी, आज तक कभी हम लोगों ने आप की बात नहीं टाली है. मैं हमेशा आप को अपनी सास समझ कर आप से सलाहमशविरा करती आई हूं. फिर भी आप…’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">परंतु मौसीजी का गुस्सा शांत नहीं हुआ. मैं उन का हाथ पकड़ कर उन्हें आंगन में ले आई और उन्हें आश्वस्त करने का प्रयत्न करने लगी. ये शाम को आए. मौसीजी बैठी हुई थीं. दोपहर का सारा किस्सा मैं ने सुना डाला. मौसीजी का क्रोध सर्वविदित था. ये हारे हुए जुआरी के स्वर में बोले, ‘तब?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘तब क्या?’ मैं बोली, ‘50 हजार रुपए मौसीजी से बतौर कर्ज ले लीजिए. 60-70 हजार रुपए चाचाजी से ले लेना. मिलाजुला कर किसी तरह कर दो गौना. मैं और क्या कहूं अब?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘बेटी मेरी है, उन्हें क्या पड़ी है?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्यों नहीं पड़ी है?’ मेरा रोष उमड़ आया, ‘जब बेटी के ब्याह की हर रस्म उन लोगों की इच्छानुसार होगी तो खर्च में भी सहयोग करना उन का फर्ज बनता है.’ संभवतया मेरे व्यंग्य को इन्होंने ताड़ लिया था. बिना उत्तर दिए तौलिया उठा कर बाथरूम में घुस गए. रात में भोजन करने के बाद ये और मौसीजी बैठक में चले गए. बच्चे अपने कमरे में जा चुके थे. पप्पू को सुलाने के बहाने मैं भी अपने कमरे में आ कर पड़ी रही. दिमाग की नसों में भीषण तनाव था. सहसा मैं चौंक पड़ी. मौसीजी का स्वर वातावरण में गूंजा, ‘अरे सुधीर, तेरी बहू कह रही थी कि गौना नहीं होगा. अब बता भला, जब विवाह में विदाई करना हमारे यहां फलता ही नहीं है तब भला गौना कैसे नहीं होगा?’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अब तुम से क्या छिपाना, मौसी?’ यह स्वर इन का था, ‘मैं सरकारी नौकर जरूर हूं, लेकिन खर्च इतना ज्यादा है कि पहले ही शादी में 1 लाख रुपए का कर्ज लेना पड़ गया. 2 और बेटियां ब्याहनी हैं सो अलग. 20-30 हजार रुपए से गौने में काम चलना नहीं है, और इतने पैसों का बंदोबस्त मैं कर नहीं पा रहा हूं.’ मौसीजी के मीठे स्वर में कड़वाहट घुल गई, ‘अरे, तो क्या बेटी को दफनाने पर ही तुले हो तुम दोनों? इस से तो अच्छा है उस का गला ही घोंट डालो. शादी का भी खर्च बच जाएगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे नहीं, मौसीजी, तुम समझीं नहीं. गौना तो मैं करूंगा ही. देखो न, विवाह से पहले ही मैं ने गौने का मुहूर्त निकलवा लिया है. अगले साल बैसाख में दिन पड़ता है.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘सच?’ मौसीजी चहक पड़ीं.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘और नहीं तो क्या? 50 हजार रुपए तुम दे दो, 60-70 हजार रुपए चाचाजी से ले लूंगा. कुछ यारदोस्तों से मिल जाएगा, ठाठ से गौना हो जाएगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्या, 50 हजार रुपए मैं दे दूं?’ मौसीजी इस तरह उछलीं मानो चलतेचलते पैरों के नीचे सांप आ गया हो.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे, मौसी, खैरात थोड़े ही मांग रहा हूं. पाईपाई चुका दूंगा.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘वह तो ठीक है, लेकिन इतने रुपए मैं लाऊंगी कहां से? मेरे पास रुपए धरे हैं क्या?’ मेरी आंखें उल्लास से चमकने लगीं. भला मौसी को क्या पता था कि परंपरा की दुहाई उन की भी परेशानी का कारण बनेगी? मैं दम साधे सुन रही थी. इन का स्वर था, ‘अरे, मौसी, दाई से कहीं पेट छिपा है? तुम हाथ झाड़ दो तो जमीन पर नोटों की बौछार हो जाए. हर कमरे में चांदी के रुपए गाड़ रखे हैं तुम ने, मुझे सब मालूम है.’ ‘अरे बेटा, मौत के कगार पर खड़ी हो कर मैं झूठ बोलूंगी? लोग पराई लड़कियों का विवाह करवाते हैं, और मैं अपनी ही पोती के ब्याह पर कंजूसी करूंगी? लौटाने की क्या बात है, जैसे मेरा श्याम है वैसे तू भी मेरा बेटा है.’ मेरी हंसी फूट पड़ी. लच्छेदार शब्दों के आवरण में मन की बात छिपाना कोई मौसीजी से सीखे. भला उन की कंजूसी से कौन नावाकिफ था.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">क्षणिक निस्तब्धता के बाद इन की थकी सी आवाज फिर उभरी, ‘तब तो मौसी, अब इस परंपरा का गला घोंटना ही होगा. न मैं इतने रुपए का जुगाड़ कर पाऊंगा और न ही गौने का झंझट रखूंगा. बोलो, तुम्हारी क्या राय है?’ ‘जो तुम अच्छा समझो,’ जाने किस आघात से मौसीजी की आवाज को लकवा मार गया और वह गोष्ठी समाप्त हो गई. दूसरे दिन चाचाजी का भी सदलबल पदार्पण हुआ. परंपरा और रस्मों के खंडन की बात उन तक पहुंची तो वे भी आगबबूला हो उठे, ‘सुधीर, यह क्या सुन रहा हूं? मैं भी शहर में रहता हूं. मेरी सोसाइटी तुम से भी ऊंची है. लेकिन हम ने कभी अपने पूर्वजों की भावना को ठेस नहीं पहुंचाई. तुम लोग लड़की की जिंदगी से खिलवाड़ कर रहे हो.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">‘चाचाजी, आप गलत समझ रहे हैं,’ ये बोले थे, ‘गौने के लिए तो मैं खूब परेशान हूं. लेकिन करूं क्या? आप लोगों की मदद से ही कुछ हो सकता है.’</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">चाचाजी के चेहरे पर प्रश्नचिह्न लटक गया. उन की परेशानी पर मन ही मन आनंदित होते हुए ये बोले, ‘मैं चाहता था, यदि आप 80 हजार रुपए भी बतौर कर्ज दे देते तो शेष इंतजाम मैं खुद कर लेता और किसी तरह गौना कर ही देता. आप ही के भरोसे मैं बैठा था. मैं जानता हूं कि आप पूर्वजों की मर्यादा को खंडित नहीं होने देंगे.’ चाचाजी का तेजस्वी चेहरा सफेद पड़ गया. उन के चेहरे पर हवाइयां उड़ने लगीं. थूक निगलते हुए बोले, ‘तुम तो जानते ही हो कि मैं रिटायर हो चुका हूं.</span></div>
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<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">फंड का जो रुपया मिला था उस से मकान बनवा लिया. मेरे पास अब कहां से रुपए आएंगे?’ सुनते ही ये अपना संतुलन खो बैठे. क्रोधावेश में इन की मुट्ठियां भिंच गईं. परंतु तत्काल अपने को संभालते हुए सहज स्वर में बोले, ‘चाचाजी, जब आप लोग एक कौड़ी की सहायता नहीं कर सकते, फिर सामाजिक मर्यादा और परंपरा के निर्वाह के लिए हमें परेशान क्यों करते हैं? यह कहां का न्याय है कि इन खोखली रस्मों के पीछे घर जला कर तमाशा दिखाया जाए? मुझ में गौना करने की सामर्थ्य ही नहीं है.’ इतना कह कर ये चुप हो गए. चाचाजी निरुत्तर खड़े रहे. उन के होंठों पर मानो ताला पड़ गया था. थोड़ी देर पहले तक जो विमला के परम शुभचिंतक बने हुए थे, अब अपनीअपनी बगले झांक रहे थे. अब कोई व्यक्ति मेरी बेटी के प्रति सहानुभूति प्रकट करने वाला नहीं था. आज विमला भरीगोद लिए सहीसलामत अपने मायके लौट रही है. अंधविश्वास और खोखली रस्मों की निरर्थकता पाखंडप्रेमियों को मुंह चिढ़ा रही है. शायद वे भी कुछ ऐसा ही निर्णय लेने वाले हैं.</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 19:18:56 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords> कहानी: खोखली रस्में; विजय गर्ग , Story Hollow rituals</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>आदर्श की असली कहानी</title>
        <link>https://bharatiya.news/The-real-story-of-Aadarsh</link>
        <guid>https://bharatiya.news/The-real-story-of-Aadarsh</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify;"><strong>संपूर्णता की तस्वीर विजय गर्ग </strong></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">
<ul>
<li data-start="73" data-end="99" class=""><strong data-start="103" data-end="126">आदर्श की असली कहानी</strong></li>
</ul>
</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">हम सभी के मन में एक आदर्श तस्वीर हमेशा बनी रहती है, जो भी उसके पैमाने पर खरा उतरता, बस वही हमारे लिए परिपूर्ण बन जाता है और हम उसके प्रशंसक । हम उस व्यक्ति की तरह ही खुश, समृद्ध, संतुष्ट होने की अभिलाषा रखने लगते हैं। बहुत कम लोगों में यह धैर्य रह पाता है यह समझने का कि किस तरह की लंबी यात्रा तय करके यह सुखद छवि उभर कर आई होगी। खिलखिलाते मुस्कुराते व्यक्तित्व को बनाए रखने के लिए कितना साहस दिखाया होगा। कभी, कितनी मेहनत और समर्पण लगा होगा इस मुकाम पर पहुंचने के लिए । परिपक्वता के कितने आयाम तय किए होंगे। यह भी विचार करने की बात है कि समृद्ध नजर आते चेहरों ने कितने लोगों का जीवन वास्तव में रोशन करके जीवन भर के लिए संतुष्टि पा ली होगी या फिर अपनी नींव दूसरों के दुख-दर्द पर स्थापित कर अच्छाई का मुखौटा पहन लिया होगा। यह भी समझना चाहिए कि उजले चेहरे कहीं सिर्फ बनावटी तो नहीं, कुछ रहस्य तो नहीं छिपा रखा अपने भीतर । यों जिन चेहरों के भीतर रहस्य नहीं छिपा होता, कोई छल नहीं होता, उन्हें पहचानना बहुत मुश्किल नहीं है, अगर सिर्फ इतना किया जाए कि अपनी दृष्टि को किसी आग्रह से संचालित न होने दिया जाए। चकाचौंध लोकप्रियता की अपनी कीमत होती है। सुंदरता, पूर्णता, सफलता तो तभी कही जा सकती है जब हमारा अस्तित्व खुद के ही नहीं, कई लोगों के जीवन में भी उजाला भरने में समर्थ हो । किसी भी तरह की तस्वीर या छवि को देखकर तुरंत उसे अपना आदर्श मान लेना भी उचित नहीं है। हां, हमारे आदर्श किसी के अच्छे विचार, अच्छे कर्म हो सकते हैं। पर किसी की निजी उपलब्धि हमारे लिए तब तक आदर्श नहीं हो सकती, जब तक कि हम खुद में सामने वाले के जीवन की यात्रा को समझने का धैर्य न जुटा सकें। ऐसा तो अक्सर होता है, जब हम किसी उद्देश्य की खोज में होते हैं, किन्हीं कारणों से हमारी यात्रा की दिशा में स्पष्टता नहीं बन पाई होती है, तब कोई व्यक्ति अगर अचानक ही आकर अपने दिशा - ज्ञान को सर्वश्रेष्ठ के रूप में प्रस्तुत करने लगता है तब अनायास ही हम उससे प्रभावित होने लगते हैं। जबकि किसी बात की स्वीकार्यता हमारे विवेक और आकलन के आधार पर होना चाहिए ।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">आंखों को दिखती संपूर्णता की तस्वीर असल में सफल, असफल प्रयासों, कमियों, अभावों, निराशा, उत्साह, अपमान, आलोचना, प्रशंसा की छोटी-छोटी कहानियों को आपस में जोड़कर बनी हुई होती है । इसीलिए किसी सफल आदर्श व्यक्तित्व को जानना बहुत सुंदर और रोमांचक अनुभव बन जाता है । जब हम वास्तविक जीवन की कहानियों को सुनते हैं, तब जान पड़ता है कि असल में सफलता किसी मुकाम को पा लेने से परिभाषित नहीं हो जाती। यह तो हर दिन, हर पल घटित होने वाली चीज है। यही कारण है कि एक आम व्यक्ति भी जो अपने रोजमर्रा के जीवन में आती चुनौतियों में साहस, ईमानदारी और संतुष्टि के साथ जीवन निर्वाह कर रहा होता है, तकलीफों के बावजूद अपनों के साथ खुशी के पल बिता पाने का साहस जुटा पाता है, उसका जीवन भी संपूर्ण और सुंदर है ।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">तब संपूर्ण बनने की अभिलाषा लिए जब हम प्रयास करते यह समझ में आने लगता है कि इसका संबंध हमारे हौसले से अधिक है। हम कितनी बार साहस जुटा पाते हैं पूरी तरह टूट- बिखर कर खुद को वापस जोड़ लेने का ? जब भी हम निराशा की जगह हिम्मत को चुनते हैं, हम और निखर जाते हैं । हमारी कुशलता, हमारी ताकत पहले से और अधिक बढ़ जाती है । जापान में जब पुराना मिट्टी का बर्तन टूट जाता है तब उसकी मरम्मत में सोने, चांदी, प्लेटिनम जैसी कीमती धातुओं से उसे जोड़ दिया जाता है। इस कला को 'किंत्सुगी' कहा जाता है। यह माना जाता है कि टूटने से उसकी सुंदरता कम नहीं होती और बढ़ जाती है। इसी सिद्धांत की तरह जीवन में भी हर अभाव, असफलता हमें पहले से और अधिक अनुभवी बनाती है, हमारे भीतर धैर्य विकसित करती है । जो हमें श्रेष्ठता की राह पर अग्रसर कर देता है । जीवन में आए अभाव, उतार-चढ़ाव, चुनौतियां 'किंत्सुगी' में उपयोग में ली गई सोने-चांदी जैसी कीमती धातुओं की तरह ही है, जिनके होने से जीवन परिष्कृत बनता चला जाता । व्यक्तित्व निखर जाता है। जितने संघर्ष हैं जीवन में उतने ही हम समृद्ध भी होते चले जाते हैं । उस समय आई विषमताओं से जरूर हम निराश हो सकते हैं, हमारा मनोबल कमजोर हो सकता है, लेकिन ऐसे समय में हमें याद रखना चाहिए कि हम जीवन का बस एक छोटा-सा दृश्य देख रहे होते हैं और उससे जूझ रहे होते हैं । अपने आप को अपने दुखों को पीछे रख कर थोड़ी-सी हिम्मत दिखाने से हमारे पास निश्चित ही नया आसमान होता है ।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">किसी की देखा-देखी केवल उनके जैसा बन जाना कभी भी हमें संतुष्टि का भाव नहीं दे सकता । संपूर्णता हमें हमारे जीवन की विशिष्ट यात्रा बनाती है, हम उसे किस तरह से जीते हैं, कितने समर्पित हैं, किन मूल्यों को अपने साथ लेकर आगे बढ़ते हैं। कोई मापदंड नहीं है, जिस पर आंका जा सके पूर्णता को। पैसा, शोहरत, परिवार, बुद्धिमत्ता इन सबसे परे अगर अपने संघर्षों में भी मुस्कुराने, आत्मीयता और मनुष्यता बनाए रखने का साहस हम अपने भीतर महसूस कर पाते हैं तो यही हमारी संपूर्ण और सुंदर तस्वीर है ।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 19:16:34 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>The real story of Aadarsh, आदर्श की असली कहानी</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>सूर्य की रोशनी से सेहत का रिश्ता: क्यों कमजोर हो रहा है Vitamin D और Immunity का संबंध</title>
        <link>https://bharatiya.news/Sunlight-relationship-with-health-breaks</link>
        <guid>https://bharatiya.news/Sunlight-relationship-with-health-breaks</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>सूर्य की रोशनी से  सेहत से टूटता रिश्ता: विजय गर्ग </strong></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विटामिन डी एक ऐसा पोषक तत्त्व है, जिसे अक्सर 'सनशाइन विटामिन ' भी कहा जाता है, क्योंकि यह प्राकृतिक रूप से सूर्य की रोशनी से प्राप्त होता है। हमारे शरीर में यह विटामिन हड्डियों को मजबूत कैल्शियम और फास्फोरस के संतुलन को दुनिया बनाने, बनाए रखने तथा प्रतिरक्षा प्रणाली को सुदृढ़ करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाता है। हाल के वर्षों में विटामिन डी की कमी एक गंभीर स्वास्थ्य समस्या के रूप में उभर कर सामने आई है। आधुनिक जीवनशैली, शहरीकरण, प्रदूषण और दफ्तर तथा घर के भीतर लगातार रहने के कारण बहुत से लोगों में विटामिन की कमी हो रही है। यह कमी न केवल शारीरिक स्वास्थ्य पर गहरा असर डालती है, बल्कि मानसिक और सामाजिक स्तर पर भी इसके दूरगामी प्रभाव देखने को मिलते हैं। सूर्य की किरणें हमारे जीवन का एक अनमोल उपहार हैं, लेकिन आज के समय में लोग कंप्यूटर, मोबाइल और अन्य इलेक्ट्रानिक उपकरणों के साथ इतने व्यस्त हो गए हैं कि वे बाहरी वातावरण में निकलने का समय ही नहीं निकाल पाते। परिणामस्वरूप उन्हें सूर्य की किरणों का लाभ नहीं मिल पाता।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">कुछ बड़े शहरों में जहां वातावरण में प्रदूषक कण अधिक मात्रा में होते हैं, वहां सूर्य की किरणें धरती कम पहुंच पाती हैं। इसके अलावा लोग विटामिन डी के प्राकृतिक स्रोतों को समझने और अपनाने में असमर्थ रहते हैं, जिसके कारण उन्हें इस पोषक तत्त्व की कमी होती है। दरअसल, , हमारे शरीर को आवश्यक मात्रा में यह विटामिन प्राप्त करने के लिए सूर्य की रोशनी के साथ-साथ संतुलित आहार भी उतना ही अहम है। कुछ परिस्थितियों में डाक्टर की सलाह पर पूरक के रूप में भी उपयोग किया जाता जाता है, लेकिन यह ध्यान रखना आवश्यक है कि इसकी सही खुराक और सही तरीके से उपयोग ही लाभकारी होता है। आजकल के खानपान में पौष्टिकता की कमी हो गई है। जहां पहले लोग ताजे फल-सब्जियां और प्राकृतिक रूप से उगाए गए खाद्य पदार्थों का सेवन करते थे, वहीं अब 'फास्ट फूड' और प्रसंस्कृत खाद्य का चलन ज्यादा ही बढ़ गया है। इन खाद्य पदार्थों में विटामिन डी की प्राकृतिक मात्रा नहीं होती, जिससे शरीर को इस विटामिन की कमी का सामना करना पड़ता है। इसके अलावा, कुछ लोग आहार में विविधता न होने के कारण आवश्यक पोषक तत्त्वों को संतुलित रूप से नहीं ले पाते, जिसके चलते उनकी सेहत पर नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस समय समाज में विटामिन डी की कमी के प्रति जागरूकता बढ़ाने की आवश्यकता है। जब लोगों को इस विटामिन की महत्ता का पता चलता है, तो वे अपनी जीवनशैली में आवश्यक बदलाव लाते हैं। यह आवश्यक भी है। मसलन, नियमित रूप से थोड़ी-थोड़ी देर के लिए बाहर निकलना, प्राकृतिक धूप का लाभ उठाना, संतुलित आहार लेना और आवश्यकतानुसार पूरक का सेवन करना इस कमी को दूर करने में सहायक हो सकते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">जब हम इस कमी के सामाजिक और आर्थिक प्रभावों की बात करते हैं, तो हमें यह समझना होगा कि यह केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है। जब बड़ी संख्या में लोग विटामिन डी की कमी से ग्रस्त हो जाते हैं, तो यह स्वास्थ्य सेवा प्रणाली पर अतिरिक्त बोझ डालता है। अस्पतालों में हड्डियों और मांसपेशियों से जुड़ी समस्याओं के इलाज में अधिक खर्च आता है और साथ ही लोगों की कार्य क्षमता में भी कमी आती है, जिससे समाज के आर्थिक ढांचे पर भी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। इस प्रकार, विटामिन डी की कमी एक बड़ी समस्या बन चुकी है, जिसके प्रतिकूल प्रभाव को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">इस समस्या से निपटने के लिए व्यक्तिगत प्रयास के साथ-साथ सरकारी नीतियों और सामुदायिक प्रयासों का होना भी जरूरी है। स्वास्थ्य विभागों और सरकारी संस्थाओं द्वारा नियमित स्वास्थ्य जांच, विटामिन डी परीक्षण और पोषक तत्त्व मिलाए गए खाद्य पदार्थों के प्रचार-प्रसार के माध्यम से इस कमी को दूर करने की कोशिश की जा रही है। कई देशों में स्वास्थ्य जागरूकता अभियानों के माध्यम से लोगों को विटामिन डी की महत्ता और इसके स्रोतों के बारे में बताया जा रहा है। स्कूलों, कालेजों और कार्यस्थलों पर भी स्वास्थ्य से जुड़ी जानकारी साझा की जा रही है, ताकि युवा पीढ़ी इस कमी के प्रति सजग रहे। इसके अतिरिक्त, वैज्ञानिक अनुसंधान भी इस दिशा में निरंतर जारी है। अध्ययनों से स्पष्ट है कि इस विटामिन की कमी केवल हड्डियों तक सीमित नहीं है, बल्कि इसका प्रभाव संपूर्ण शरीर की क्रियाओं पर पड़ता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आधुनिक जीवनशैली में स्वास्थ्य के प्रति बढ़ती जागरूकता के बावजूद, कई कई लोग अब भी विटामिन डी की महत्ता को समझ नहीं पाए हैं। लोग अपनी दिनचर्या में व्यस्त रहते हैं और स्वास्थ्य की छोटी-छोटी समस्याओं को नजरअंदाज कर देते हैं। मगर जैसे-जैसे उम्र बढ़ती है, विटामिन डी की की कमी के लक्षण स्पष्ट हो जाते हैं। बच्चे, युवा और सभी को इस प कमी का सामना करना पड़ता है, पर बुजुगों में यह समस्या अधिक गंभीर हो जाती है। इसके अतिरिक्त, मोटापे वाले लोगों में में यह विटामिन शरीर के वसा ऊतक के में जमा जाता है, जिससे इसकी उपलब्धता और भी कम हो जाती है। विटामिन डी की कमी के समाधान के लिए हमें कई स्तरों पर काम करने की आवश्यकता है। सबसे पहले व्यक्तिगत स्तर पर, हमें अपनी दिनचर्या में छोटे-छोटे बदलाव लाने होंगे। इसके साथ ही सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता फैलाने की जरूरत है। सरकार और गैर-सरकारी संस्थाओं द्वारा भी इस दिशा में कई पहल की जा रही है, जैसे विटामिन डी युक्त खाद्य पदार्थों का वितरण, स्वास्थ्य शिविरों का आयोजन और नियमित स्वास्थ्य जांच के कार्यक्रम। इसके अलावा, तकनीकी नवाचार इस कमी को दूर करने में म भूमिका निभा सकते हैं। 'डिजिटल हेल्थ ऐप्स' के माध्यम से लोगों को उनके विटामिन डी की जानकारी उपलब्ध कराई जा सकती है, जिससे उन्हें समय रहते पता चल सके कि उन्हें किस प्रकार के सुधार की आवश्यकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">"विटामिन डी की कमी की समस्या केवल व्यक्तिगत स्वास्थ्य तक सीमित नहीं है, बल्कि पूरे समाज और अर्थव्यवस्था पर इसका प्रभाव पड़ता है। यदि हम इस कमी को समय रहते पहचान कर उचित कदम नहीं उठाते उठाते हैं, तो , तो भविष्य में और अधिक गंभीर स्वास्थ्य समस्याएं उत्पन्न हो सकती है हैं। आज जब हम कई बीमारियों और संक्रमणों से लड़ रहे हैं, तब यह आवश्यक है कि अपने शरीर के मूल पोषक तत्त्वों को नजरअंदाज न करें। विटामिन डी की कमी से निपटने के लिए हमें न केवल अपनी जीवनशैली में सुधार करना होगा, बल्कि सामाजिक स्तर पर भी जागरूकता फैलानी होगी। यह जरूरी है कि हम अपने दैनिक जीवन में स्वास्थ्य संबंधी प्राथमिकताओं को ऊपर रखें और विटामिन डी के खोत का पूरा लाभ उठाएं। अगर हम समय रहते आवश्यक कदम उठाएंगे, तो निश्चित ही हम स्वस्थ और खुशहाल जीवन की ओर अग्रसर हो पाएंगे।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 24 Mar 2025 19:11:38 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Sunlight relationship with health breaks, सूर्य की रोशनी से  सेहत से टूटता रिश्ता: विजय गर्ग , सूर्य की रोशनी, Vitamin D की कमी, धूप और सेहत, इम्युनिटी कमजोर, हड्डियों की बीमारी, सूर्य का महत्व, हेल्थ टिप्स, Natural Vitamin D, Immunity Booster, Modern Lifestyle Health Problems</media:keywords>
    </item>
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        <title>विजय गर्ग की पुस्तक शीर्षक सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा , प्रिंसिपल संध्या बठला द्वारा लोकार्पण की गई जारी &amp;quot;</title>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify;"><strong>विजय गर्ग की पुस्तक शीर्षक सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा , प्रिंसिपल संध्या बठला द्वारा लोकार्पण की गई जारी "</strong></p>
<p style="text-align: justify;">डीएवी एडवर्ड गंज सीनियर सेकेंडरी स्कूल मलोट की प्रिंसिपल श्रीमती संध्या बठला ने आज बुक  लोकार्पण की, "सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा" जो प्रसिद्ध लेखक और सेवानिवृत्त प्राचार्य विजय गर्ग द्वारा लिखी गई थी। इस अवसर पर वरिष्ठ पीजीटी अभय शर्मा, परदीप गुप्ता, श्रीमती आशु गांधी, श्रीमती रचना श्री रविंदर कुमार भी उपस्थित थीं। पुस्तक विमोचन समारोह के दौरान प्रिंसिपल ने शिक्षा क्षेत्र में किए गए विजय गर्ग के कार्यों की सराहना की। उन्होंने कहा कि यह पुस्तक उन छात्रों के लिए बहुत उपयोगी है जो सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा में उपस्थित होने जा रहे हैं। प्रिंसिपल ने आगे कहा कि विजय गर्ग द्वारा लिखी गई यह पुस्तक हमेशा छात्रों और समाज के लिए मार्गदर्शन के लिए काम करेगी और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए बहुत उपयोगी होगी। बुक जारी करने की आपत्ति पर बोलते हुए, विजय गर्ग ने कहा कि नोटों पर मुख्य ध्यान संक्षिप्त और इंगित करने के लिए, कम समय में पूर्ण विषय कवरेज को सक्षम करें। पुस्तक में एक आवश्यक शब्दावली है,</p>
<p style="text-align: justify;">सारांश में, यह पुस्तक एक मूल्यवान उपकरण है जो किसी भी छात्र को परीक्षा में एक्सेल का लक्ष्य देता है। सभी उम्मीदवारों के शिक्षार्थियों को सशक्त बनाने और व्यक्तियों को उनकी बौद्धिक क्षमता को अनलॉक करने में मदद करने के लिए भी। गर्ग ने आगे कहा कि प्रतिष्ठित सैनिक स्कूलों में प्रतिष्ठित स्थान पर छात्रों के लिए पुस्तक विशेष रूप से फायदेमंद है। इस पुस्तक को तैयार करने के लिए एक सावधानीपूर्वक देखभाल की गई है। सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा की तैयारी के लिए अच्छी किताबें महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे एक अच्छी तरह से और प्रभावी ढंग से वर्गीकृत आसान प्रदान करते हैं। सरल भाषा, अभ्यास के लिए पर्याप्त प्रश्न और प्रतियोगी परीक्षाओं के लिए परीक्षक को समग्र रूप से तैयार करता है,</p>
<p style="text-align: justify;">अवधारणाओं की संरचित समझ भी प्रदान करता है, परीक्षा पैटर्न के साथ संरेखित अभ्यास प्रश्न प्रस्तुत करता है, छात्रों को उनकी तत्परता को बढ़ाने में मदद करता है, और सुनिश्चित करता है गर्ग ने आगे कहा कि गुणवत्ता की किताबें जटिल अवधारणाओं को विस्तार से बताती हैं, जिससे विषय वस्तु की गहरी समझ हो जाती है। वे कई अभ्यास प्रश्न प्रदान करते हैं जो सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा परीक्षा प्रारूप की नकल करते हैं, जिससे छात्रों को परीक्षा लेने के कौशल और समय प्रबंधन विकसित करने में मदद मिलती है। विश्वसनीय पुस्तकें नवीनतम सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा पाठ्यक्रम के साथ संरेखित करने के लिए अपडेट की जाती हैं, यह सुनिश्चित करते हुए कि छात्र प्रासंगिक जानकारी का अध्ययन कर रहे हैं।</p>
<p style="text-align: justify;">अभ्यास प्रश्नों का प्रयास करके, छात्र उन क्षेत्रों की पहचान कर सकते हैं जहां उन्हें अधिक ध्यान देने और अपने कमजोर क्षेत्रों में सुधार करने की आवश्यकता है। अच्छी गुणवत्ता के सवालों के साथ लगातार अभ्यास परीक्षा के लिए आत्मविश्वास और तैयारियों को बढ़ावा दे सकता है। एनसीईआरटी की पाठ्यपुस्तकों को प्रवेश परीक्षा की तैयारी की नींव माना जाता है क्योंकि परीक्षा के महत्वपूर्ण भाग सीधे उन पर आधारित होते हैं, गर्ग ने कहा।</p> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 13 Mar 2025 14:47:15 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>विजय गर्ग की पुस्तक शीर्षक सैनिक स्कूल प्रवेश परीक्षा, प्रिंसिपल संध्या बठला द्वारा लोकार्पण की गई जारी, Vijay Garg book titled Sainik School Entrance Exam released by Principal Sandhya Bathla</media:keywords>
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        <title>नोबेल पुरस्कार विज्ञान में महिलाएं की नाम  उनका योगदान और सशक्तिकरण</title>
        <link>https://bharatiya.news/Women-in-Science-Their-Contribution-and-Empowerment</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><strong><span style="font-size: 14pt;">महिलाओं  दिवस,  </span><span style="font-size: 14pt;">विज्ञान में महिलाएं: उनका योगदान और सशक्तिकरण</span></strong><br><br><span style="font-size: 14pt;">हर साल, दुनिया विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाती है। यह विशेष दिन केवल एक फैंसी शीर्षक नहीं है; यह विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित में महिलाओं के अद्भुत योगदान को पहचानने और उनकी सराहना करने का दिन है। यह भी एक समय है कि वे उन बाधाओं को स्वीकार करें जो वे सामना करते हैं और इन क्षेत्रों में लिंग अंतर को बंद करने के लिए प्रतिबद्ध हैं। जैसा कि हम  आईडीडबयुजीआईएस का निरीक्षण करते हैं, हम एक ऐसी कहानी को फिर से लिख रहे हैं, जहां रूढ़िवादिता अब शानदार दिमाग को सीमित नहीं करती है, और लिंग जिज्ञासा को प्रतिबंधित नहीं करता है। इस दुनिया में, ग्राउंडब्रेकिंग खोजें विविध दृष्टिकोणों से निकलती हैं। हम एक ऐसे भविष्य की कल्पना करते हैं जहां विज्ञान को "लड़कों के लिए" के रूप में लेबल नहीं किया जाता है, और महिला और लड़कियां इस समावेशी और अभिनव दुनिया को आकार देने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। आइए हमने जो प्रगति की है, उसे मनाएं और एक ऐसे भविष्य की दिशा में काम करना जारी रखें, जहां हर कोई, चाहे लिंग की परवाह किए बिना, विज्ञान की रोमांचक दुनिया में पनप सकता है।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस का इतिहास 2011 में वापस, महिलाओं की स्थिति पर संयुक्त राष्ट्र आयोग ने एक बड़ी समस्या पर ध्यान दिया: पर्याप्त महिलाएं विज्ञान में नहीं जा रही थीं, भले ही उनके पास बहुत कुछ था। यह लोगों को बात कर रहा था, और 2013 में, संयुक्त राष्ट्र महासभा ने यह सुनिश्चित करने के लिए एक योजना पर सहमति व्यक्त की कि महिलाओं और लड़कियों के पास विज्ञान में एक ही मौके थे। इसमें कुछ साल लग गए, लेकिन 2015 में, उन्होंने आधिकारिक तौर पर 11 फरवरी को विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का पहला अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाया, "इनोवेशन: द मिसिंग लिंक फॉर वीमेन इन साइंस" थीम पर ध्यान केंद्रित किया। विज्ञान विषयों में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस: प्रगति का जश्न मनाना, चुनौतियों को संबोधित करना हर साल, आईडीडबयुजीआईएस एक नया विषय चुनता है जो दिखाता है कि महिलाएं विज्ञान में कैसे प्रगति कर रही हैं। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">अतीत में, हमने 2018 में "सस्टेनेबल डेवलपमेंट में लैंगिक समानता के लिए विज्ञान, प्रौद्योगिकी, और नवाचार और" कल के वैज्ञानिकों के लिए निवेश "जैसी चीजों के बारे में बात की। 2023 में" कल के वैज्ञानिकों के लिए निवेश "। इस बार, हमारा ध्यान" सतत विकास लक्ष्यों को प्राप्त करने में महिला नेतृत्व "पर है। हम उन महत्वपूर्ण भूमिका को उजागर करना चाहते हैं जो महिला वैज्ञानिक बेहतर भविष्य बनाने में निभाते हैं। विज्ञान के लिए महिलाओं का योगदान पूरे इतिहास में, महिलाओं और लड़कियों के दिमाग से शानदार विचारों ने वैज्ञानिकों ने विभिन्न क्षेत्रों में जिस तरह से विचार किया है, उसे आकार दिया है। उनके शोध, आविष्कार, नवाचारों और खोजों ने हमारे जीवन को समृद्ध किया है और एक आशाजनक भविष्य के लिए मार्ग प्रशस्त किया है। उनके महत्वपूर्ण योगदान के बावजूद, वैज्ञानिक क्षेत्रों में उतनी महिलाएं नहीं हैं जितनी पुरुष हैं। महिलाओं ने विज्ञान के लिए अपने जुनून को आगे बढ़ाने के लिए अलग -अलग समय पर बाधाओं को पार कर लिया है, जब सही वातावरण प्रदान करने पर उनकी क्षमता साबित होती है। दुर्भाग्य से, विज्ञान में महिलाओं द्वारा कई ग्राउंडब्रेकिंग योगदान की अनदेखी की गई है। एक उदाहरण रोज़ालिंड फ्रैंकलिन है, एक रसायनज्ञ जिसका काम डीएनए की संरचना की खोज में महत्वपूर्ण था। उनकी महत्वपूर्ण भूमिका के बावजूद, मान्यता केवल मरणोपरांत आ गई। अन्य अनसंग नायिकाओं में नासा में अफ्रीकी-अमेरिकी गणितज्ञ कैथरीन जॉनसन, डोरोथी वॉन और मैरी जैक्सन शामिल हैं। उन्होंने शुरुआती अंतरिक्ष मिशनों में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई, पुस्तक और फिल्म, "हिडन फिगर्स" को प्रेरित किया, जिसने उनकी उपलब्धियों को सुर्खियों में लाया। मैडम क्यूरी से, केवल 8 वर्षों के भीतर भौतिकी और रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार प्राप्त करने वाली एकमात्र महिला, शाकंटला देवी को, जो अपनी अविश्वसनीय गणितीय क्षमताओं के लिए भारत के मानव कंप्यूटर के रूप में जानी जाती है। हम बात करते हैंविज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं के बारे में। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">यूनेस्को के अनुसार, दुनिया भर में 30% शोधकर्ता महिलाएं हैं। हालांकि, यह प्रतिशत एक ही क्षेत्र में पुरुषों की तुलना में एक असमानता को उजागर करता है। इसे पहचानते हुए, विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस को विज्ञान में महिलाओं के योगदान को स्वीकार करने और प्रोत्साहित करने और अनुसंधान में लिंग अंतर को पाटने के लिए मनाया जाता है। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की सूची 1। जनाकी अम्मल उसके बिना, चीनी आज जिस तरह से मीठा हो सकता है। वह पेशे से एक साइटोजेनेटिक और वनस्पति विज्ञानी थीं, जिन्होंने समाज द्वारा लगाए गए रूढ़िवादी नियमों को तोड़ दिया और हजारों पौधों की प्रजातियों पर शोध करने में उनका सर्वश्रेष्ठ प्रदर्शन किया। वह चीनी को मीठा बनाने के पीछे का कारण खोजने वाला था। उसे उस नवाचार का श्रेय दिया जाता है और उसे 1977 में पद्म श्री से सम्मानित किया गया। वह केरल में साइलेंट वैली हाइड्रोइलेक्ट्रिक प्रोजेक्ट के बारे में विद्रोही थी। उन्होंने हजारों पुष्प प्रजातियों के गुणसूत्रों पर व्यापक अध्ययन भी किया और वनस्पति विज्ञान के क्षेत्र में एक उल्लेखनीय योगदान दिया। 2। अन्ना मणि वह 1918 में पैदा हुई थी।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"> फिर, महिलाओं को विज्ञान का अध्ययन करने या तथाकथित सामाजिक नियमों को तोड़ने की अनुमति नहीं थी। वह इन सभी नियमों को धता बताते हुए आगे बढ़ी और मौसम विज्ञान में अपना शोध शुरू किया। उन्होंने प्रो सीवी रमन की प्रतिभा के तहत भी काम किया और मौसम विज्ञान के क्षेत्र में एक महत्वपूर्ण योगदान दिया। सौर विकिरण, पवन ऊर्जा और ओजोन पर उनके शोध ने उन्हें वैश्विक अभिनय लाया। वह भारतीय मौसम विभाग  की उप निदेशक बन गईं। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">3। टेसी थॉमस 1963 में जन्मी, उन्होंने मानक सामाजिक नियमों को तोड़ दिया और एक भारतीय मिसाइल परियोजना के प्रमुख के प्रमुख वैज्ञानिकों में से एक बन गईं। कल्पना कीजिए कि कैसे वह रक्षा अनुसंधान विकास संगठन ( डीआरडीओ) के एक पुरुष-प्रधान वैज्ञानिक क्षेत्र में एक शानदार योगदानकर्ता बनने में कामयाब रही। वह ऐसी महत्वपूर्ण परियोजना का नेतृत्व करने वाली पहली भारतीय वैज्ञानिक थीं, जो अब हमारे पास मौजूद सैन्य शक्ति के स्तर को बढ़ाती थीं। वह एक गृहिणी हैं जो अग्नि IV और वी मिसाइलों के विकास के लिए परियोजना निदेशक बनने के लिए चली गईं। यह 5,500 किमी की सीमा के साथ एक ठोस-ईंधन अंतरमहाद्वीपीय बैलिस्टिक मिसाइल है। 4। कल्पना चावला उसका नाम कौन नहीं जानता है? वह हरियाणा, भारत से पहली भारतीय मूल महिला एरोनॉटिकल इंजीनियर थी। वह अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन जाने के लिए नासा की चुनी हुई इंजीनियर थी। वह राकेश शर्मा के बाद अंतरिक्ष में जाने वाली पहली भारतीय और दूसरी भारतीय हैं। अंतर्राष्ट्रीय अंतरिक्ष स्टेशन में कल्पना चावला उनके योगदान के कारण, उन्हें कांग्रेस के स्पेस मेडल ऑफ ऑनर, नासा के प्रतिष्ठित सेवा पदक और नासा स्पेस फ्लाइट मेडल से सम्मानित किया गया। दुर्भाग्य से, वह सभी 6 अन्य चालक दल के सदस्यों के साथ एसटीएस -107 मिशन में कोलंबिया स्पेस शटल में लौटते समय मर गई।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि वह एक शौकीन भरत्नाम डांसर, एक पेशेवर स्कूबा गोताखोर और एक कराटे चैंपियन थी। 5। शकुंतला देवी जैसा कि पहले उल्लेख किया गया है, उसे भारत के मानव कंप्यूटर के रूप में जाना जाता है। कुछ सेकंड के भीतर जटिल गणितीय संचालन करने की उसकी उल्लेखनीय शक्ति ने पूरी दुनिया को चकित कर दिया। उसने एक बार 2010 अंकों के साथ एक नंबर की 23 वीं रूट की गणना की। उसने किसी भी उपकरण या यहां तक ​​कि एक कलम का उपयोग किए बिना मानसिक रूप से किया और 1977 में सबसे तेज कंप्यूटर यूनीवैक की तुलना में 12 सेकंड तेजी से किया। आपको यह जानकर आश्चर्य होगा कि शाकंटला देवी के पास कोई औपचारिक शिक्षा नहीं थी। जब वह 6 साल की थी, तब उसने अपनी गणितीय क्षमताओं का प्रदर्शन किया। 6। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">मैरी क्यूरी मैरी क्यूरी, वें में एक अग्रणीरेडियोधर्मिता का ई क्षेत्र, विज्ञान में महिलाओं के लिए एक आइकन बना हुआ है। वह नोबेल पुरस्कार जीतने वाली पहली महिला थीं और दो अलग -अलग वैज्ञानिक क्षेत्रों - भौतिकी और रसायन विज्ञान में नोबेल पुरस्कार जीतने वाली एकमात्र महिला बनी हुई हैं। उनकी खोजों ने चिकित्सा उपचारों में प्रगति की नींव रखी और महिला वैज्ञानिकों की भविष्य की पीढ़ियों के लिए मार्ग प्रशस्त किया। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की भूमिका ये सभी नाम इस बात का प्रमाण हैं कि महिलाओं ने विज्ञान और प्रौद्योगिकी के विकास में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई है। ये नाम केवल भारतीय मूल के हैं। इस सूची की लंबाई की कल्पना करें जब महिला वैज्ञानिकों और आविष्कारकों के अंतर्राष्ट्रीय नाम शामिल हैं। विज्ञान और प्रौद्योगिकी में महिलाओं की बढ़ती भागीदारी प्रतिभा पूल को बढ़ाएगी और भविष्य में उत्कृष्ट परिणाम प्रदान करेगी। यह महिलाओं को सशक्त भी करेगा और उन्हें विज्ञान के अपने संबंधित क्षेत्रों को चुनने के लिए प्रोत्साहित करेगा। यह विज्ञान, इंजीनियरिंग, प्रौद्योगिकी और गणित  में महिलाओं के महत्व और भूमिका को समझने का मार्ग भी प्रशस्त करेगा, सामाजिक भूमिका मॉडल को जन्म देगा और भविष्य की पीढ़ी को उसी को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करेगा। विज्ञान में महिलाओं द्वारा सामना की गई चुनौतियां जबकि महिलाओं ने विज्ञान में महत्वपूर्ण योगदान दिया है, वे अक्सर अद्वितीय चुनौतियों का सामना करते हैं। लिंग पूर्वाग्रह, असमान अवसर, और नेतृत्व भूमिकाओं में प्रतिनिधित्व की कमी लगातार मुद्दे हैं।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">पारिवारिक जिम्मेदारियों और कैरियर की आकांक्षाओं को संतुलित करना जटिलता की एक अतिरिक्त परत जोड़ता है। इन चुनौतियों का समाधान करने के लिए, समावेशिता को बढ़ावा देना, रूढ़ियों को चुनौती देना और वैज्ञानिक क्षेत्रों में महिलाओं के लिए समान अवसर प्रदान करना महत्वपूर्ण है। कार्य-जीवन संतुलन और मेंटरशिप कार्यक्रमों का समर्थन करने वाली पहल अधिक सहायक वातावरण बनाने में योगदान कर सकती है। आधुनिक-दिन के नायक: आज विज्ञान को आकार देने वाली महिलाएं चुनौतियों के बावजूद, महिलाएं आज विभिन्न वैज्ञानिक विषयों में महत्वपूर्ण प्रगति कर रही हैं। प्राइमेट्स पर अपने ग्राउंडब्रेकिंग शोध के लिए प्रसिद्ध डॉ। जेन गुडॉल ने न केवल पशु व्यवहार की हमारी समझ को उन्नत किया है, बल्कि एक प्रमुख पर्यावरण कार्यकर्ता भी बन गए हैं। एस्ट्रोफिजिक्स के क्षेत्र में, डॉ। केटी बुमन ने ब्लैक होल की पहली छवि को कैप्चर करने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। उसका काम लिंग बाधाओं पर काबू पाने में सहयोग और दृढ़ संकल्प की शक्ति का उदाहरण देता है। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विज्ञान में महिलाओं को सशक्त बनाना विज्ञान में महिलाओं को सशक्त बनाने के लिए विश्व स्तर पर कई पहल चल रही हैं। मेंटरशिप कार्यक्रम, छात्रवृत्ति और नेटवर्किंग के अवसर महत्वपूर्ण समर्थन प्रदान करते हैं। लड़कियों को कम उम्र से एसटीईएम (विज्ञान, प्रौद्योगिकी, इंजीनियरिंग और गणित) शिक्षा को आगे बढ़ाने के लिए प्रोत्साहित करना एक विविध और समावेशी वैज्ञानिक समुदाय के निर्माण में आवश्यक है। इसके अलावा, वैज्ञानिक संस्थानों और उद्योगों के भीतर समावेशिता की संस्कृति को बढ़ावा देना अनिवार्य है। विज्ञान में महिलाओं की उपलब्धियों को पहचानना और जश्न मनाना, अनुसंधान टीमों में विविधता को बढ़ावा देना, और लिंग पूर्वाग्रहों को संबोधित करना एक अधिक न्यायसंगत वातावरण बनाने में योगदान देता है। भविष्य: अगली पीढ़ी का पोषण करना विज्ञान में महिलाओं को सशक्त बनाना केवल वर्तमान असमानताओं को संबोधित करने के बारे में नहीं है, बल्कि एक उज्जवल भविष्य भी सुनिश्चित करना है। युवा लड़कियों को विज्ञान में अपनी रुचि का पता लगाने, शैक्षिक संसाधनों तक पहुंच प्रदान करने और लिंग रूढ़ियों को खत्म करने के लिए प्रोत्साहित करना एक अधिक समावेशी और विविध वैज्ञानिक समुदाय के लिए मार्ग प्रशस्त करेगा।</span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"> डिजिटल युग में, सोशल मीडिया जागरूकता बढ़ाने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों के अंतर्राष्ट्रीय दिवस में एक वृद्धि हुई हैऑनलाइन अभियान, जहां दुनिया भर के लोग महिला वैज्ञानिकों की कहानियों, उद्धरणों और छवियों को साझा करते हैं जिन्होंने उन्हें प्रेरित किया है। यह एक आभासी उत्सव है जो भौगोलिक सीमाओं को पार करता है, लोगों को विज्ञान के लिए एक साझा जुनून के माध्यम से जोड़ता है। निष्कर्ष विज्ञान में महिलाओं और लड़कियों का अंतर्राष्ट्रीय दिवस मनाना एक महत्वपूर्ण कदम है। लेकिन समानता के लिए लड़ाई एक दिन से परे है। विज्ञान में महिलाओं के योगदान को स्वीकार करते हुए, उनकी निरंतर उन्नति का समर्थन करते हुए, और उनके सामने आने वाली बाधाओं को खत्म करते हुए, हम एक ऐसे भविष्य का निर्माण कर सकते हैं जहां विज्ञान सभी की प्रतिभाओं और दृष्टिकोणों पर पनपता है। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><strong><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल ‌ शैक्षिक स्तंभकार मलोट  पंजाब</span></strong></p> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Mar 2025 08:08:57 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>अंतर्राष्ट्रीय दिवस का इतिहास, Women in Science Their Contribution and Empowerment, विज्ञान में महिलाएं: उनका योगदान और सशक्तिकरण, नोबेल पुरस्कार विज्ञान में महिलाएं की नाम  उनका योगदान और सशक्तिकरण</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>कहानी  डिनर सेट</title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><strong><span style="font-size: 14pt;">कहानी  डिनर सेट : विजय गर्ग </span></strong></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">बेटे की शादी, घर में महीनों से तैयारी चल रही थी। दुनियाभर की लिस्ट बना ली थी कि ऐन मौके पर कुछ छूट न जाए, पर काम खत्म होने का नाम ही नहीं ले रहा था। जब देखो काम सुरसा के मुंह की तरह मुंह खोले खड़ा रहता। नई बहू का आगमन घर में खुशियां लेकर आया था।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">धीरे-धीरे करके सारे मेहमान और रिश्तेदार चले गए थे। आजकल तो रिश्तेदार भी मेहमानों की तरह शादी के दिन या दो दिन पहले हाथ झुलाते आते हैं। जिम्मेदारियों के नाम पर खाया-नाचा और अपने-अपने घर, किसी से क्या उम्मीद करनी। घर समेटते-समेटते अब तो हाथ भी दुखने लगे थे। पारुल को इस घर में आये चार ही दिन तो हुए थे, नई-नवेली दुल्हन से कुछ काम कहते बनता भी नहीं था। तभी सक्सेना जी ने आवाज लगाई।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘निर्मला! काम होता रहेगा, लगे हाथ शादी में आये उपहारों को भी देख लो। कल हमें भी तो देना होगा।’ये काम निर्मला को सबसे ज्यादा खराब लगता था। सक्सेना जी को बातों का पोस्टमार्टम करने में बड़ा मजा आता था। अरे भाई किसी से उपहार लेने के लिए थोड़ी आमंत्रित करते हैं। आदमी की अपनी श्रद्धा और सोच जैसा चाहे वैसा दे। कोई रिश्तेदार या जान-पहचान वाला सस्ता उपहार दे दे तो सक्सेना जी हत्थे से उखड़ जाते।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘ऐसे कैसे दे दिया कम से कम हमारी हैसियत तो देखनी चाहिए थी। लोग एक बार भी सोचते नहीं कि किसके घर दे रहे हैं।’ और अगर कोई अच्छा उपहार दे दे तो…? ‘इसमें कौन-सी बड़ी बात है भगवान ने दिया है तो दे रहे हैं।’ निर्मला कहती,</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘हमें भी तो उन्हें देना पड़ेगा सिर्फ लेना ही तो संभव नहीं है।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘हमारा उनसे क्या मुकाबला, वह चाहें तो इससे भी अच्छा दे सकते थे खैर…।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">सक्सेना जी ने अपने बेटे आयुष और बहू पारुल को आवाज लगाई।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘आयुष! मम्मी का लाल वाला पर्स अलमारी से निकाल लाओ और वहीं बगल में गिफ्ट्स भी रखे हैं। पारुल बेटा ये डायरी और पेन पकड़ो और लिखती जाओ।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘जी पापा!’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘आप भी न, हर बात की जल्दी रहती है आपको…, घर में इतने सारे काम पड़े हैं। अरे हो जाता ऐसी भी क्या जल्दी है।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">निर्मला ने बड़बड़ाते हुए कहा, रंग-बिरंगें कागजों में लिपटे उपहार कितने खूबसूरत लग रहे थे। ये उपहार भी कितनी गजब की चीज़ हैं, कुछ के लिए भावनाओं के उद‍्गार को दिखाने का माध्यम बनते हैं तो कुछ के लिए सिर्फ औपचारिकता…, पुष्प-गुच्छ उसे कभी समझ नहीं आते थे। कभी-कभी लगता सामान देने का मन नहीं, लिफाफा बजट से ऊपर जा रहा तो इसे ही देकर टरका दो। खुशियों की तरह इनकी जिंदगी भी आखिर कितनी होती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘अरे ध्यान से उपहार खोलो, पैकिंग पेपर कितना सुंदर है। गड्ढे के नीचे दबाकर रख दूंगी सब सीधे हो जाएंगे। किसी को लेने-देने में काम आ जाएंगे।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">निर्मला ने हांक लगाई, ‘क्या मम्मी तुम भी न, यहां लाखों रुपये शादी में ख़र्च हो गए और तुम वही दस-बीस रुपये बचाने की बात करती हो।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">नई-नवेली पारुल के सामने आयुष का यूं झिड़कना निर्मला को रास नहीं आया पर क्या कहती…, हम गृहणियां इन छोटी-छोटी बचतों से ही खुश हो जाती हैं। उनकी इस खुशी का अंदाजा पुरुष नहीं लगा सकते। लाखों के गहने खरीदने में उन्हें उतनी खुशी नहीं होती जितनी उसके साथ मिलने वाली मखमली डिबिया, जूट बैग या फिर कैलेंडर के मिलने पर होती है। चार सौ रुपये की सब्जी के साथ दस रुपये की धनिया मुफ्त पाने के लिए वे दो किलोमीटर दूर सब्जी बेचने वाले के पास जाने में भी वे गुरेज नहीं करतीं। दांत साफ करने से शुरू होकर, कुकर के रबड़ साफ करने तक वे एक ही टूथब्रश का इस्तेमाल करती हैं। उनकी यह यात्रा यहां पर भी समाप्त नहीं होती। ब्रश का एक भी बाल न बचने की स्थिति में वो पेटीकोट और पायजामे में नाड़ा डालने में उसका सदुपयोग करती हैं। ये आजकल के बच्चे क्या जानेंगे कि एक औरत किस-किस तरह से जुगाड़ कर गृहस्थी को चलाती है। नीबू की आखिरी बूंद तक निचोड़ने के बाद भी उसकी आत्मा तृप्त नहीं होती और वो नीबू के मरे हुए शरीर को भी तवे और कढ़ाही साफ करने में प्रयोग में लाती हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">निर्मला चुप थी, नई-नवेली बहू के सामने कहती भी तो क्या…? तभी निर्मला की नजर पारुल पर पड़ी, वो न जाने कब रसोईघर से चाकू ले आई थी और सिर झुकाए अपने मेहंदी लगे हुए हाथों से सावधानी से धीरे-धीरे सेलोटेप को काट रही थी। बगल में ही उपहारों में चढ़े रंगीन कागज तह लगे हुए रखे हुए थे। पारुल की निगाह निर्मला से टकरा गई, निर्मला की आंखों में चमक आ गई। दिल में एक भरोसा जाग गया, उसकी गृहस्थी सही हाथों में जा रही है। उसे अब इस घर की चिंता करने की कोई जरूरत नहीं है। पारुल पढ़ी-लिखी लड़की है वो अच्छे से उसकी गृहस्थी सम्भाल लेगी।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘ये जो इतना रायता फैला रखा है पहले इसे समेटो। ऐसा है पहले ये सारे उपहार खोलकर नाम लिखवा दो, फिर लिफाफे देखना।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">निर्मला ने आयुष से कहा, किसी में बेडशीट, किसी में गुलदस्ता, किसी में पेंटिंग तो किसी में घड़ी थी।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘जरा संभालकर! शायद कुछ कांच का है। कहीं टूट न जाये।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">निर्मला के अनुभवी कानों ने आवाज से ही अंदाजा लगा लिया।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘मां! देखो कितना सुंदर डिनर सेट है।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आयुष ने हुलस कर कहा, निर्मला ने डिनर सेट की प्लेट पर प्यार से हाथ फेरा।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘निर्मला जरा इधर तो दिखाओ, किसने दिया है भाई बड़ा सुंदर है।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘मथुरा वाली दीदी ने दिया है, कितना सुंदर है न?’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘हम्म! पर इसमे तो सिर्फ चार प्लेट और चार कटोरियां हैं। ये कौन-सा फैशन है। आजकल की कंपनियों के चोंचले समझ ही नहीं आते।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘समझना क्या है ठीक तो है। मां-बाप और बच्चे।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘और हम?’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">सक्सेना जी ने दबे स्वर में कहा, सक्सेना जी का चेहरा उतर गया था, निर्मला कुछ-कुछ समझ रही थी। आखिर तीस साल साथ बिताए थे। निर्मला ने हमेशा की तरह बात को संभाला,</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘वो भी तो वही कह रहा है, मां-बाप और बच्चे।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">सक्सेना जी ने दबे स्वर में बड़बड़ाते हुए कहा-‘कौन से मां-बाप और कौन से बच्चे…, वर्तमान वाले या फिर भविष्य वाले?’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">सक्सेना जी अनमन्य से हो गए और सब कुछ छोड़ बैठक में आकर बैठ गए। मन-मस्तिष्क में इतना कुछ चल रहा था जिसकी तपिश उनके चेहरे पर साफ देखी जा सकती थी। कितना लंबा-चौड़ा परिवार था उनका,… सब मिल-जुलकर रहते थे पर वक्त की ऐसी आंधी चली सब बिखर गए। काम की तलाश में सब अलग-अलग आसमानों में उड़ गए। अब तो बस भाई-भतीजों से तीज़-त्योहार और शादी-ब्याह में ही मुलाकात हो पाती थी। भाइयों का हाल भी बहुत अच्छा नहीं था। बहू के आने के बाद परिस्थितियां बदल गई थीं। उनका क्या होगा यह सोच-सोच कर वह परेशान होते रहते थे।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">इस समय समाज में जो हवा चल रही थी उसकी वजह से इस तरह के विचार आना स्वाभाविक ही था। सक्सेना जी के मन में एक असुरक्षा की भावना घर कर गई थी। सक्सेना जी का चिड़चिड़ापन स्वाभाविक था।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘जो होना होगा, होगा ही… उसमें डरने की क्या बात है। कोई हमारे साथ नया तो नहीं होगा।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">कहने को तो निर्मला ने कह दिया था पर कहीं न कहीं एक डर उसके मन-मस्तिष्क में भी पल रहा था। अपनी कोख से पैदा की हुई संतान को दूसरे घर की लड़की के साथ बांट पाना इतना आसान नहीं था पर निर्मला जी सक्सेना जी को खुश करने के लिए हर बात को हवा में उड़ा देती पर उन्होंने अपना दर्द कभी दिखाया नहीं था।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">कौन कहता है एक नई नवेली बहू को ही अपने ससुराल में सामंजस्य बैठाना पड़ता है पर लोग यह भूल जाते हैं कि ससुराल वालों को भी नई बहू के साथ सामंजस्य बैठाना पड़ता है। अपनी घर की चाबियों से लेकर घर के दुख-दर्द भी साझे करने होते हैं। एक अजनबी लड़की को सिर्फ आप अपने घर की चाबियां नहीं, अपने घर की जिम्मेदारियां और विश्वास भी सौंप रहे होते हैं। वह आपके हर चीज़ की राजदार होती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">शायद उनके अन्तिम वाक्य को नई नवेली पारुल ने सुन लिया था। सक्सेना जी आंखें मूंदे सोफे पर पड़े हुए था। उस चार प्लेट वाले डिनर सेट को देख उनका मूड खराब हो चुका था। तभी पारुल अपने हाथ में एक बड़ा-सा डिब्बा लेकर कमरे में घुसी।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘क्या हुआ बेटा, ये तुम्हारे हाथों में क्या है?’- सक्सेना जी ने पूछा</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘पापा ये मेरे मायके से डिनर सेट मिला है। छह प्लेट वाला…... आप, मम्मी, आयुष, मैं और भविष्य में होने वाले आपके...?’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">शब्द उसके गले में अटक गए और गाल शर्म से लाल हो चुके थे। सक्सेना जी अभी भी उसकी बात को समझ नहीं पा रहे थे।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">‘पापा आप चिंता न करें, चार प्लेट वाला डिनर सेट हम किसी को गिफ्ट कर देंगे। इस घर में तो छह प्लेट वाला ही डिनर सेट रहेगा।’</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 05:32:22 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>कहानी  डिनर सेट, Story Dinner Set</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>परीक्षाओं में अंकों की होड़ क्यों: विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Why-competition-for-marks-in-exams-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify;"><strong>परीक्षाओं में अंकों की होड़ क्यों: विजय गर्ग </strong></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">देश में वार्षिक परीक्षाएं छात्रों के भविष्य को निर्धारित करने का प्रमुख माध्यम हैं। लेकिन हाल के वर्षों के दौरान, शिक्षा का मूल उद्देश्य ज्ञान अर्जन से हटकर केवल उच्च अंक प्राप्त करने तक ही सीमित होता जा रहा है। खासकर देहाती क्षेत्रों के विद्यार्थी अब नियमित कक्षाओं में पढऩे की बजाय कोचिंग सैंटरों पर अधिक निर्भर होते जा रहे हैं, क्योंकि वहां कम समय में अधिक अंक प्राप्त करने के आसान तरीके बताए जाते हैं। यह प्रवृत्ति न केवल शिक्षा प्रणाली को प्रभावित कर रही है, बल्कि ग्रामीण क्षेत्रों के छात्रों के समग्र विकास के लिए भी एक चुनौती बनती जा रही है। इसके पीछे शिक्षा प्रणाली की कई खामियां जिम्मेदार मानी जा सकती हैं। इनमें अहम हैं ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की कमी, कमजोर आधारभूत संरचना और अपर्याप्त शिक्षण सामग्री के कारण विद्यार्थी नियमित कक्षाओं में रुचि नहीं लेते। </div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">इसके अलावा कोचिंग संस्कृति का प्रभाव इतना बढ़ गया है कि छात्रों को लगता है कि विद्यालय में पढऩे की तुलना में कोचिंग सैंटरों में परीक्षा के लिए विशेष तरीके सिखाए जाते हैं, जिससे वे कम समय में अधिक अंक प्राप्त कर सकते हैं। इतना ही नहीं, गांव के भोले-भाले युवकों को लुभाने की मंशा से कई कोचिंग सैंटर यह दावा भी करते हैं कि वे छात्रों को परीक्षा में अधिक अंक दिलाने में मदद करेंगे। ऐसे में यदि शिक्षक भी उदासीन रवैया अपनाना शुरू कर दें तो वह आग में घी का काम करता है। आज से कुछ वर्ष पूर्व ‘थ्री इडियट्स’ फिल्म में भी यह दिखाया गया था कि अधिक अंकों की होड़ का छात्रों पर काफी नकारात्मक प्रभाव पड़ता है। जबकि होना यह चाहिए कि हर नौजवान को अपने दिल की आवाज सुनकर अपनी जिंदगी की राह तय करनी चाहिए, जिससे खुशी भी होती है और सही मायने में सफलता भी मिलती है। केवल ज्यादा पैसे कमाने के लिए बिना समझे रट्टा मारने वाले कोल्हू के बैल ही होते हैं। जिनकी जिंदगी में रस नहीं आ पाता। </div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">दूसरी तरफ इंजीनियरिंग की डिग्री की भूख इस कदर बढ़ गई है कि एक-एक शहर में दर्जनों प्राईवेट इंजीनियरिंग  कॉलेज खुलते जा रहे हैं, जिनमें दाखिले का आधार योग्यता नहीं, मोटी रकम होता है। इन कॉलेजों में योग्य शिक्षकों और संसाधनों की भारी कमी रहती है। फिर भी ये छात्रों से भारी रकम फीस में लेते हैं। बेचारे छात्र अधिकतर ऐसे परिवारों से होते हैं, जिनके लिए यह फीस देना जिंदगी भर की कमाई को दाव पर लगा देना होता है। इतना रुपया खर्च करके भी जो डिग्री मिलती है उसकी बाजार में कीमत कुछ भी नहीं होती। तब उस युवा को पता चलता है कि इतना रुपया लगाकर भी उसने दी गई फीस के ब्याज के बराबर भी पैसे की नौकरी नहीं पाई। तब उनमें हताशा आती है।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">आज हालत यह है कि एम.बी.ए. की डिग्री प्राप्त लड़के साडिय़ों की दुकानों पर सेल्समैन का काम कर रहे हैं। समय और पैसे का इससे बड़ा दुरुपयोग और क्या हो सकता है।ऊपर से कोचिंग सैंटरों की बढ़ती फीस ग्रामीण और आॢथक रूप से कमजोर छात्रों के लिए एक अतिरिक्त बोझ बन रही है। सोचने वाली बात यह है कि जब छात्र स्कूल की पढ़ाई को महत्व नहीं देते, तो विद्यालयों की गुणवत्ता और भी गिरती जाती है। इससे शिक्षा प्रणाली कमजोर होती है। वहीं परीक्षा में अच्छे अंक पाने के दबाव में कई छात्र नकल और अन्य अनुचित तरीकों का सहारा भी लेने लगते हैं।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">ऐसे में विद्यालयों की शिक्षा और गुणवत्ता में सुधार की बहुत जरूरत है। सभी ग्रामीण स्कूलों में शिक्षकों की जवाबदेही तय और विद्यालयों में शिक्षण सामग्री व संसाधनों को बेहतर किया जाना चाहिए। यदि सरकार विद्यालयों में परीक्षा की अच्छी तैयारी के लिए विशेष कक्षाएं संचालित करेगी तो विद्यार्थियों को कोचिंग सैंटर जाने की जरूरत ही नहीं पड़ेगी। परीक्षाओं को केवल अंकों के आधार पर तय करने की बजाय, प्रायोगिक ज्ञान, परियोजना कार्य और गतिविधि-आधारित मूल्यांकन को बढ़ावा देना चाहिए।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">शिक्षकों को इस बात पर विशेष जोर देना चाहिए कि उन्हें विद्याॢथयों को अंकों की होड़ में धकेलने की बजाय, उन्हें वास्तविक ज्ञान अर्जित करने और रचनात्मकता विकसित करने के लिए प्रेरित करना चाहिए। यदि शिक्षा प्रणाली को अधिक प्रभावी और समावेशी नहीं बनाया गया, तो यह प्रवृत्ति शिक्षा के व्यवसायीकरण को और अधिक बढ़ावा देगी। आवश्यक है कि विद्यालयों में गुणवत्ता सुधार के साथ-साथ परीक्षाओं में सफलता का मूल्यांकन केवल अंकों के आधार पर न किया जाए, बल्कि छात्रों की संपूर्ण योग्यता और कौशल को ध्यान में रखा जाए। जब शिक्षा का असली उद्देश्य ज्ञानार्जन बनेगा, तभी समाज का वास्तविक विकास संभव होगा।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</div> ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 05:30:51 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>परीक्षाओं में अंकों की होड़ क्यों: विजय गर्ग, Why competition for marks in exams Vijay Garg,  </media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>क्या बच्चे वीडियो देखने या किताबें पढ़ने के माध्यम से बेहतर सीखते हैं</title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">क्या बच्चे वीडियो देखने या किताबें पढ़ने के माध्यम से बेहतर सीखते हैं?</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सीखना अलग-अलग तरीकों से हो सकता है, और वीडियो और किताबें दोनों आपके बच्चे के सीखने में मददगार हैं। लेकिन बच्चे बेहतर कैसे सीखते हैं? क्या एक दूसरे से बेहतर है?</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">वीडियो देखने के माध्यम से सीखना</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वीडियो देखना सीखने का एक मजेदार तरीका है! डिजिटल मीडिया के इस युग में, सूचना और सोशल मीडिया चैनलों जैसे  युटुब तक बेहतर पहुंच है, जिससे शैक्षिक सामग्री की तलाश करना आसान हो जाता है। यहां अन्य कारण दिए गए हैं कि वीडियो देखने से बच्चों को सीखने में मदद मिलती है:</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">यह तुरंत आकर्षक है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">एनिमेशन, विशेष रूप से, बच्चों का ध्यान आकर्षित करने और किसी विशेष विषय में रुचि पैदा करने में एक लंबा रास्ता तय करता है। और वास्तविक जीवन के वीडियो छात्रों के लिए बाहरी दुनिया लाते हैं - इसे तुरंत समृद्ध अनुभव बनाते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">यह एक मल्टीसेंसरी गतिविधि है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">दृष्टि और ध्वनि एक शक्तिशाली संयोजन हैं। वीडियो मजबूत दृश्य संकेत प्रदान करता है जो शिक्षार्थियों को विषय को समझने में मदद करता है, भले ही भाषा का पालन करना कठिन हो।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">सुझाव: म्यूट पर एक वीडियो चलाएं, फिर अपने बच्चे को यह अनुमान लगाने के लिए कहें कि क्या हो रहा है। यह एक पढ़ने की भविष्यवाणी गतिविधि के समान है जिसका उपयोग शिक्षक छात्रों को चर्चा की जाने वाली सामग्री की तैयारी में मदद करने के लिए करते हैं। यह भी मजेदार है!</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">यह व्यावहारिक कौशल विकसित करने के लिए अच्छा है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">गिनती, लेखन और पढ़ने (डिकोडिंग) के मौलिक सीखने के कौशल को वीडियो द्वारा आसानी से प्रदर्शित किया जाता है। कैसे-कैसे वीडियो बच्चों को वास्तविक जीवन में देखी गई बातों को आसानी से याद रखने और लागू करने में मदद करते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">दूसरी ओर, ये वीडियो देखते समय बच्चों को पूरी तरह से सीखने में बाधा डाल सकते हैं:</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">वे आसानी से विचलित हो सकते थे।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वीडियो देखते समय, बाहरी विवरण छात्रों का ध्यान आकर्षित कर सकते हैं कि उन्हें वास्तव में क्या सीखने की आवश्यकता है: लापता महत्वपूर्ण विवरण सीखने को कम प्रभावी बनाता है। सहायता के बजाय एनिमेशन विचलित हो सकते हैं, और पॉप-अप विज्ञापन हमेशा बाधित होने के लिए होंगे। छात्रों के लिए ऊब जाने पर आवेदन स्विच करने की भी प्रवृत्ति होती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">सामग्री विश्वसनीय नहीं हो सकती है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">हर वीडियो विश्वसनीय स्रोतों से नहीं आता है। कुछ लोकप्रिय हो सकते हैं यहां तक कि उनमें सही जानकारी नहीं है। बच्चों का मार्गदर्शन करना और उन्हें यह सिखाना सबसे अच्छा है कि कैसे जांच करें।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">पढ़ने के माध्यम से सीखना</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">पढ़ना कुछ बच्चों के लिए एक आसान या दिलचस्प गतिविधि नहीं है, लेकिन यह जानकारी प्राप्त करने और संज्ञानात्मक कौशल विकसित करने के लिए आवश्यक है। पढ़ने के माध्यम से सीखने के लाभों में निम्नलिखित शामिल हैं:</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">यह फोकस, एकाग्रता और स्मृति को बढ़ाता है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वीडियो देखने की तुलना में, बच्चे केवल दृष्टि का उपयोग करते हैं और वास्तव में रुचि होने पर विचलित होने की संभावना कम होती है। एकाग्रता के अलावा, पढ़ना भी उनकी स्मृति को बढ़ाता है: वे प्रिंट में पढ़ते समय दीर्घकालिक ज्ञान को बेहतर बनाए रखते हैं। जब आपका बच्चा कोई पुस्तक पढ़ता है, तो वे पृष्ठ की दृश्य छवि को याद करते हैं, जिससे सबसे छोटे विवरणों को याद करना आसान हो सकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">यह कल्पनाशील कौशल विकसित करता है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">एक कहानी पढ़ते समय, बच्चे अपने मन में अपनी तस्वीरें बनाते हैं - जो वे देखते हैं उसे खुद को सीमित नहीं करते। सबसे अच्छे बच्चों की पुस्तक चित्र का उद्देश्य कल्पना को और बढ़ाना और रचनात्मकता विकसित करने के लिए अच्छा व्यायाम प्रदान करना है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">सिद्धि की भावना है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">एक पुस्तक के अंत में, एक कार्य को पूरा करने की भावना है। आप इसे बच्चों में देख सकते हैं जब वे दूसरों के साथ जो पढ़ते हैं उसे साझा करते हैं और जब भी वे पहले पढ़ते हैं तो खुश और गर्व महसूस करते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">दूसरी ओर, ऐसे कारण हैं कि बच्चे पढ़ने से अधिक बार वीडियो देखते हैं:</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">यह कम सुलभ हो सकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">हालांकि ई-बुक्स और अन्य शिक्षण सामग्रियों को इंटरनेट पर मुफ्त में एक्सेस किया जा सकता है, लेकिन वीडियो की तुलना में इनकी तलाश करना अधिक कठिन है। फोन और वाईफाई वाला कोई भी बच्चा आसानी से YouTube तक पहुंच सकता है और देखने के लिए वीडियो चुन सकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">इसके लिए अधिक समय और प्रयास की आवश्यकता होती है।</span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वीडियो देखते समय, बच्चे वापस बैठते हैं और आराम करते हैं; पढ़ने के लिए उन्हें ध्यान केंद्रित करने और अधिक प्रयास करने की आवश्यकता होती है, खासकर जब सामग्री को उच्च-क्रम समझ कौशल की आवश्यकता होती है। यह कुछ बच्चों के लिए एक कठिन काम पढ़ने बनाता है। यह अभ्यास के साथ आसान हो जाता है, हालांकि! अपने बच्चे को पढ़ने के लिए कैसे प्रोत्साहित करें? हमारे यहां कुछ टिप्स हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">देखने और पढ़ने के माध्यम से सीखने के बीच अंतर हो सकता है, लेकिन वे दोनों आपके बच्चे के लिए अच्छी सीखने की गतिविधियाँ हैं! सही संतुलन बनाने के लिए विभिन्न शिक्षण सामग्रियों का कुशलतापूर्वक उपयोग करने का तरीका जानने में समय लगता है। इसके अलावा, यह देखना कि आपके बच्चे के लिए सबसे अच्छा क्या काम करता है, और कब, महत्वपूर्ण है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 05:30:05 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>children learn better through watching videos reading books, क्या बच्चे वीडियो देखने या किताबें पढ़ने के माध्यम से बेहतर सीखते हैं</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>मोबाइल और कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं मिला</title>
        <link>https://bharatiya.news/No-relation-found-between-mobile-and-cancer</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify;"><strong>मोबाइल और कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं मिला</strong></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">विजय गर्ग </div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">मोबाइल फोन की का इस्तेमाल करने वालों के दिमाग में यह ख्याल आता है कि कहीं इसके उपयोग से उन्हें कैंसर तो नहीं हो जाएग। लेकिन विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के सहयोग से किए गए अध्ययन ने इन अटकलों को खारिज कर दिया है। आस्ट्रेलिया की परमाणु और विकिरण सुरक्षा एजेंसी द्वारा किए गए शोध में मोबाइल फोन के उपयोग और विभिन्न कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया है। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) द्वारा किए गए और मंगलवार को प्रकाशित शोध में मोबाइल फोन से रेडियो तरंगों के संपर्क और ल्यूकेमिया, लिम्फोमा और थायरायड और ओरल कैविटी सहित विभिन्न कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं पाया गया। शिन्हुआ समाचार एजेंसी रिपोर्ट के अनुसार यह आस्ट्रेलियाई विकिरण सुरक्षा और परमाणु सुरक्षा एजेंसी (एआरपीएएनएसए) द्वारा की गई डब्ल्यूएचओ के दूसरे आयोग की व्यवस्थित समीक्षा थी। सितंबर 2024 में प्रकाशित पहली समीक्षा में मोबाइल फोन के उपयोग और मस्तिष्क व सिर के अन्य हिस्से के कैंसर के बीच संबंध की खोज की गई और उनके बीच किसी प्रकार का कोई संबंध नहीं पाया गया। दोनों अध्ययनों के प्रमुख लेखक और एआरपीएएनएसए में स्वास्थ्य प्रभाव आकलन के सहायक निदेशक केन कारिपिडिस ने कहा कि नए शोध में मोबाइल फोन, फोन टावर और कैंसर के बीच संबंध पर सभी उपलब्ध साक्ष्यों का मूल्यांकन किया गया है। उन्होंने कहा कि शोधकर्ताओं को रेडियो तरंगों के संपर्क और विभिन्न कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं मिला, लेकिन टीम मस्तिष्क कैंसर पर समीक्षा की तुलना में परिणामों के बारे में निश्चित नहीं पाई गई।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">कारिपिडिस ने कहा, ऐसा इसलिए क्योंकि इन कैंसर और वायरलेस तकनीक से रेडियो तरंगों के संपर्क के बीच संबंध के बारे में उतने सुबूत नहीं हैं। अध्ययन में योगदान देने वाले एआरपीएएनएसए के विज्ञानी रोहन मेट ने कहा कि इसके निष्कर्ष वायरलेस तकनीक और कैंसर के बारे में जनता को सूचित करने के लिए ज्ञान के भंडार के रूप में वृद्धि करेंगे। डब्ल्यूएचओ द्वारा दो व्यवस्थित समीक्षाएं वर्तमान में रेडियो तरंगों के संपर्क में आने से के स्वास्थ्य प्रभावों के मूल्यांकन को सूचित करेंगी।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">डब्ल्यूएचओ के अनुसार, कैंसर बीमारियों का एक बड़ा समूह है जो शरीर के लगभग किसी भी अंग या ऊतक में शुरू होता है, जब कोशिकाएं अनियंत्रित रूप से बढ़ती हैं और शरीर के आस-पास के हिस्सों पर आक्रमण करने के लिए अपनी सामान्य सीमाओं से आगे निकल जाती हैं। इसके बाद धीरे-धीरे अन्य अंगों में फैल जाती हैं। बाद की प्रक्रिया को मेटास्टेसिसिंग कहा जाता है और यह कैंसर से मृत्यु का एक प्रमुख कारण है।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">दुनिया भर में मौत का प्रमुख कारण है कैंसर कैंसर दुनिया भर में मौत का दूसरा सबसे बड़ा कारण है। कैंसर के कारण 2018 में अनुमानित 96 लाख मौतें हुई हैं। यानी छह में से एक मौत कैंसर के कारण हुई। फेफड़े, प्रोस्टेट, कोलोरेक्टल, पेट और लीवर कैंसर पुरुषों में होने वाले कैंसर के सबसे आम प्रकार हैं, जबकि ब्रेस्ट, कोलोरेक्टल, फेफड़े, गर्भाशय व थायरायड कैंसर महिलाओं में सबसे आम हैं। कैंसर का बोझ दुनिया भर में बढ़ता जा रहा है, जिससे व्यक्तियों, परिवारों, समुदायों व स्वास्थ्य प्रणालियों पर जबरदस्त शारीरिक, भावनात्मक और वित्तीय दबाव पड़ रहा है। निम्न और मध्यम आय वाले देशों में कई स्वास्थ्य प्रणालियां इस बोझ को संभालने के लिए तैयार नहीं हैं दुनिया भर में बड़ी संख्या में कैंसर रोगियों को समय पर गुणवत्तापूर्ण निदान और उपचार नहीं मिल पाता है।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट</div> ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 05:28:16 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>मोबाइल और कैंसर के बीच कोई संबंध नहीं मिला</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>कामकाजी महिलाओं की चुनौतियां क्या है :  विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Challenges-of-working-women-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>कामकाजी महिलाओं की चुनौतियां : विजय गर्ग </strong></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">वैश्वीकरण के दौर में शुरू किए गए आर्थिक और तकनीकी परिवर्तनों के फलस्वरूप महिलाओं की तुलना में पुरुषों को आमतौर पर अपेक्षाकृत अधिक प्रशिक्षण और रोजगार के अवसर मिले। इसके कारण अधिकतर महिलाओं को अनौपचारिक क्षेत्र या आकस्मिक श्रमबल में प्रवेश करना पड़ा। भारत में कुल कामगारों में से असंगठित क्षेत्र में कार्यरत कार्यबल का लगभग 33 फीसद हिस्सा महिलाओं का है। यह स्पष्ट है कि अनौपचारिक क्षेत्र भारत में बड़ी संख्या में महिला श्रमिकों को आजीविका प्रदान करता है।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">भारतीय परिवारों पर आर्थिक दबाव दिन-प्रतिदिन बढ़ रहा है। देश में जीवन निर्वाह लागत, बच्चों की शिक्षा के लिए खर्च और आवास संपत्तियों की लागत में तेजी से वृद्धि हुई है, जिससे हर परिवार को अपनी आय बढ़ाने के 5 तरीके तलाश करने के लिए मजबूर होना पड़ा है। इस कारण देश में रोजगार मामले में महिलाओं की सहभागिता बढ़ी है। भारत सरकार के सांख्यिकी मंत्रालय की रपट के अनुसार असंगठित क्षेत्र में महिलाओं के स्वामित्व वाले प्रतिष्ठानों की संख्या वर्ष 2022-23 के 22.9 फीसद से स बढ़ कर वर्ष 23-24 में 26.2 फीसद हो गई। श्रम मंत्रालय की ओर से जारी आंकड़ों के अनुसार कर्मचारी भविष्य निधि संगठन के नए सदस्यों में महिलाओं की हिस्सेदारी बीते सितंबर के 26.1 फीसद से बढ़ कर अक्तूबर में 27.9 फीसद हो गई। यह वृद्धि कोई उल्लेखनीय नहीं कही जा सकती।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">कामकाजी महिलाओं के संबंध में 'एनएसओ' की वर्ष 2024 में जारी रपट के अनुसार शहरों में कुल 52.1 फीसद महिलाएं और 45.7 फीसद पुरुष कामकाजी हैं। मगर ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाएं नौकरियों में अब भी पुरुषों से पीछे हैं, हालांकि पिछले छह वर्षों में उनकी हिस्सेदारी दोगुनी हो गई और यह 5.5 फीसद से 10.5 फीसद तक पहुंच गई। शहरी कामकाजी महिलाओं में से 52.1 फीसद नौकरीपेशा, 34.7 फीसद स्वरोजगार में तथा 13.1 फीसद अस्थायी श्रमिक हैं। 'इंडिया एट वर्क' की रपट 2024 अनुसार इस साल नौकरियों के लिए कुल सात करोड़ आवेदन आए, जिनमें 2.8 करोड़ महिलाओं के थे। यह संख्या 2023 की तुलना में 20 फीसद अधिक है। देश के रोजगार परिदृश्य में बदलाव आ रहा है और कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी बढ़ रही है। रपट के अनुसार 2023 के मुकाबले 2024 में महिला पेशेवरों के औसत वेतन में भी 28 फीसद की वृद्धि हुई। इस सब के बावजूद संगठित क्षेत्र में असंगठित क्षेत्र की तुलना में महिलाओं के कम रोजगार का मुख्य कारण कम कौशल और कम वेतन पर काम करने के लिए तैयार होने की मजबूरी है। देश में पुरुषों और महिलाओं के बीच वेतन में लगभग 25.4 फीसद का अंतर है। अधिकांश असंगठित क्षेत्र के व्यवसाय जैसे मिट्टी के बर्तन बनाने, कृषि, निर्माण कार्य, हथकरघा, घरेलू सेवाएं और घरेलू उद्यमों में महिलाएं कार्यरत हैं। असंगठित क्षेत्र में महिला श्रमिक आमतौर पर बहुत कम वेतन पर बीच-बीच में काम करने वाले आकस्मिक श्रमिक के रूप में कार्यरत हैं। उनको अत्यधिक शोषण का सामना करना पड़ता है, जिनमें काम की लंबी अवधि अस्वीकार्य कार्य परिस्थितियां और स्वास्थ्य संबंधी समस्याएं बनी रहती हैं।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">भर्ती एजंसी 'टीमलीज सर्विसेज' की एक रपट के अनुसार भारत में दस में से पांच महिला कर्मचारियों ने किसी न किसी तरह के लैंगिक भेदभाव का अनुभव किया है। यह भेदभाव वेतन, कार्य के घंटे, अवकाश, अवसर और पदोन्नति के मामले में है। इस सर्वेक्षण के अनुसार, गर्भवती महिलाओं और छोटे बच्चों वाली महिलाओं को भी भर्ती प्रक्रिया के दौरान और नौकरी की संभावनाओं के लिए प्रतिस्पर्धा करते समय नुकसान उठाना पड़ता है। कामकाजी महिलाएं हों या अपना कारोबार करने वाली, उन्हें काम पर तुलनात्मक रूप से अधिक चुनौतियों का सामना सिर्फ इसलिए करना पड़ रहा है, क्योंकि वे महिला हैं। यह धारणा कि महिलाएं केवल विशिष्ट कार्यों के लिए ही उपयुक्त हैं। यहां तक कि बेहतर योग्यता वाली महिलाओं के समांतर समान योग्यता वाले पुरुष उम्मीदवार को वरीयता दी जाती है। भले ही कानून भर्ती और पारिश्रमिक में समानता की घोषणा करता है, लेकिन इसका हमेशा पालन नहीं किया जाता है। एक ही काम के लिए महिलाओं और पुरुषों को अलग-अलग वेतन मिलता है। देश में संगठित और असंगठित कार्यबल में महिलाओं की भागीदारी में सुधार के लिए समय-समय पर प्रयास भी किए गए हैं। इसके लिए बने कार्यबल ने अगस्त 2024 में अपनी सातवीं बैठक में इस बात पर जोर दिया कि कार्यबल में महिलाओं की सक्रिय और सार्थक भागीदारी को बढ़ावा देना सामाजिक न्याय के साथ-साथ जीवंत, नवोन्मेषी और समतामूलक समाज के निर्माण के लिए आवश्यक आर्थिक और रणनीतिक अनिवार्यता है। टास्क फोर्स ने देखभाल अर्थव्यवस्था को एक ऐसे क्षेत्र के रूप में पहचाना, जिसमें महिला कार्यबल भागीदारी बढ़ाने की महत्त्वपूर्ण संभावना है। टास्क फोर्स ने उद्योग संघों आग्रह किया कि वे आर्थिक गतिविधियों में महिलाओं की भागीदारी बढ़ाने के लिए जागरूकता पैदा और नियोक्ताओं को प्रोत्साहित करें।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">महिला रोजगार की स्थिति को संतोषजनक बनाने के लिए अंतरराष्ट्रीय स्तर पर भी समय-समय पर प्रयास हुए हैं। संयुक्त राष्ट्र का मानना है कि हमारी प्राथमिक अवधारणा यह है कि महिलाओं के लिए समान अवसर होने चाहिए। महिलाओं को रोजगार में समान अवसर दिलाने की दृष्टि से वर्ष 2006 के अंतरराष्ट्रीय श्रम सम्मेलन में इस हेतु प्रस्ताव में इसकी पुष्टि भी की गई। महिलाओं के अधिकारों की स्थिति पर आयोग ने कई अहम मुद्दों पर सिफारिशें की हैं, जिनका लक्ष्य पुरुषों और महिलाओं के लिए समान अधिकार के सिद्धांत को व्यवहार में लाना है।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">देश में कार्यस्थल पर महिलाओं का यौन उत्पीड़न ( रोकथाम, निषेध और निवारण) अधिनियम, 2013 के माध्यम से महिलाओं को उनके कार्यस्थल पर यौन उत्पीड़न से बचाने के लिए प्रावधान किए गए हैं। मातृत्व लाभ (संशोधन) विधेयक, 2016 में संगठित क्षेत्र में काम करने वाली महिलाओं को मौजूदा 12 सप्ताह से बढ़ा कर 26 सप्ताह का मातृत्व अवकाश देने का प्रावधान किया गया। यह कानून दस या उससे अधिक कर्मचारियों वाले सभी व्यवसायों पर लागू है। अन्य कानूनों जैसे कारखाना अधिनियम, समान मजदूरी अधिनियम, न्यूनतम मजदूरी अधिनियम आदि में भी यथास्थान महिलाओं के हितों की सुरक्षा के लिए प्रावधान किए गए हैं।</div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify;">देश के संगठित और असंगठित क्षेत्र में महिलाओं के रोजगार की गुणवत्ता में सुधार की दृष्टि से सरकार व्यावसायिक संगठनों और अन्य सभी संबंधित पक्षकारों के मिले-जुले प्रभावी प्रयासों से ही महिलाओं के रोजगार अवसरों में वृद्धि और कार्यदशाओं में सुधार संभव है। उनको घर का काम भी करना पड़ता है। ऐसी महिलाओं को अंशकालिक रोजगार के समुचित अवसर मिलने चाहिए। जो महिलाएं पढ़ी-लिखी हैं वे आनलाइन पोर्टल के जरिए अपना काम शुरू कर सकती हैं जैसे शिक्षण, कपड़ा व्यवसाय, फास्ट फूड जैसे केक, पिज्जा बर्गर आइसक्रीम आदि का कारोबार वे घरों से सिलाई, कढ़ाई, मेहंदी, पापड़, अचार और टिफिन सेंटर जैसे गृह कार्यों से अपना व्यवसाय शुरू कर सकती हैं। परंपरागत लघु उद्योगों को नई तकनीक से शुरू कर महिलाओं को ज्यादा अवसर दिए जा सकते हैं</div> ]]></description>
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        <pubDate>Sun, 09 Feb 2025 05:26:53 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Challenges of working women Vijay Garg, कामकाजी महिलाओं की चुनौतियां  विजय गर्ग,  </media:keywords>
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        <title>भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्वविद्यालय की आवश्यकता विजय गर्ग</title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्वविद्यालय की आवश्यकता विजय गर्ग</strong></span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">उद्योगों में एआई को बढ़ाने के कारण भारत ने आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस (एआई) शिक्षा की बढ़ती मांग देखी है। भारत में विशेष एआई विश्वविद्यालयों की स्थापना कई कारणों से महत्वपूर्ण है</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">1.। स्किल गैप को संबोधित करते हुए एआई स्वास्थ्य सेवा, वित्त और विनिर्माण जैसे उद्योगों को बदल रहा है, लेकिन कुशल पेशेवरों की कमी है। एक समर्पित एआई विश्वविद्यालय उद्योग के लिए तैयार प्रतिभा का उत्पादन कर सकता है।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">2.। अनुसंधान और नवाचार भारत को स्थानीय चुनौतियों के लिए स्वदेशी एआई समाधान विकसित करने की आवश्यकता है। एक विशेष एआई विश्वविद्यालय प्राकृतिक भाषा प्रसंस्करण (एनएलपी), कंप्यूटर दृष्टि और रोबोटिक्स जैसे क्षेत्रों में अनुसंधान को बढ़ावा देगा।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">3। वैश्विक प्रतिस्पर्धा अमेरिका और चीन जैसे देशों ने एआई में महत्वपूर्ण प्रगति की है। एआई को समर्पित एक विश्वविद्यालय भारत को विश्व स्तर पर प्रतिस्पर्धा करने और अंतरराष्ट्रीय एआई अनुसंधान में योगदान करने में मदद करेगा।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">4। एआई फॉर सोशल गुड एआई भारतीय-विशिष्ट मुद्दों जैसे कृषि उत्पादकता में सुधार, चिकित्सा निदान को बढ़ाने और यातायात प्रबंधन को अनुकूलित करने को संबोधित कर सकता है। एक केंद्रित एआई विश्वविद्यालय ऐसे समाधान चला सकता है।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">5.। स्टार्टअप और उद्यमिता विकास भारत में एक तेजी से एआई स्टार्टअप पारिस्थितिकी तंत्र है। एक समर्पित एआई विश्वविद्यालय इनक्यूबेटर, मेंटरशिप और फंडिंग के अवसरों के साथ स्टार्टअप का समर्थन कर सकता है।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">6। सरकार और उद्योग सहयोग एआई में विशेषज्ञता रखने वाला विश्वविद्यालय शिक्षा, उद्योग और सरकार के बीच की खाई को पाट सकता है, यह सुनिश्चित करता है कि एआई विकास राष्ट्रीय हितों और नीतियों के साथ संरेखित हो।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">भारत में मौजूदा एआई शिक्षा जबकि भारत में अभी तक एक स्टैंडअलोन एआई विश्वविद्यालय नहीं है, कई संस्थान एआई-केंद्रित कार्यक्रमों की पेशकश करते हैं, जिनमें शामिल हैं:</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आईआईटी (आईआईटी मद्रास, आईआईटी हैदराबाद, आईआईटी दिल्ली, आदि) - एआई और डेटा साइंस प्रोग्राम आईआईटी हैदराबाद - सेंटर फॉर एआई एंड मशीन लर्निंग भारतीय विज्ञान संस्थान ( आईआईएससी) बैंगलोर - ऐआई &amp; रोबोटिक्स अनुसंधान प्लाक्षा विश्वविद्यालय और अशोक विश्वविद्यालय - एआई और एमएल पाठ्यक्रम एमिटी, एसआरएम और मणिपाल जैसे निजी विश्वविद्यालय भी एआई कार्यक्रम प्रदान करते हैं </span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">निष्कर्ष तेजी से एआई विकास को देखते हुए, भारत को एक समर्पित एआई विश्वविद्यालय से लाभ होगा जो शिक्षा, अनुसंधान और उद्योग सहयोग को एकीकृत करता है। सरकारी और निजी क्षेत्र को एआई क्रांति में भारत के नेतृत्व को सुनिश्चित करते हुए ऐसी संस्था स्थापित करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए।</span></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="auto" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्राचार्य शैक्षिक स्तंभकार गली कौर चंद एमएचआर मलोट</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 06 Feb 2025 05:54:46 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>आईआईटी हैदराबाद, भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्वविद्यालय, एआई विश्वविद्यालय इनक्यूबेटर, भारत में विशेष एआई विश्वविद्यालयों, भारत में कृत्रिम बुद्धिमत्ता विश्वविद्यालय की आवश्यकता विजय गर्ग, Need for Artificial Intelligence University India Vijay Garg</media:keywords>
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        <title>क्यों ज़रूरी है मैरिज सर्टिफिकेट बनवाना : विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">क्यों ज़रूरी है मैरिज सर्टिफिकेट बनवाना ? </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विवाह के बाद कई दंपती विवाह प्रमाणपत्र नहीं बनवाते। परंतु यह एक कानूनी दस्तावेज़ है जो पति-पत्नी दोनों के विवाह का वैध प्रमाण होता है। यह न केवल विवाह की पंजीकरण प्रक्रिया को सुनिश्चित करता है, बल्कि विवाह संबंधी अधिकारों की सुरक्षा भी करता है। भारत के सर्वोच्च न्यायालय ने 2006 में महिलाओं के अधिकारों की रक्षा के उद्देश्य से विवाह पंजीकरण को अनिवार्य घोषित किया।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">मैरिज सर्टिफिकेट क्यों होना चाहिए ? विवाह के बाद जो लड़कियां अपना सरनेम नहीं बदलतीं, उनके लिए यह दस्तावेज़ विवाह का क़ानूनी सबूत प्रदान करता है। विदेश में वीज़ा और इमिग्रेशन प्रक्रियाओं में पति/पत्नी के रिश्ते को प्रमाणित करने के लिए विवाह प्रमाणपत्र अनिवार्य होता है। बैंक जमा या जीवन बीमा लाभ प्राप्त करने के लिए यह आवश्यक है, ख़ासकर जब नामांकित व्यक्ति का नाम दर्ज नहीं हो । पेंशन योजनाओं और अन्य वित्तीय लाभों का दावा करने के लिए भी सर्टिफिकेट आवश्यक है। तलाक़, संपत्ति विवाद और उत्तराधिकार के मामलों में विवाह की वैधता साबित करने के लिए यह एक महत्वपूर्ण साक्ष्य है। यदि पति- पत्नी के सरनेम अलग हैं, तो बच्चों की वैधता प्रमाणित करने में यह सहायक होता है । मैरिज सर्टिफिकेट विवाह से संबंधित धोखाधड़ी और अवैध गतिविधियों से महिलाओं की रक्षा करता है और उनके अधिकारों को सुनिश्चित करता है। यदि विवाह प्रमाणपत्र नहीं होगा ... जिन पति-पत्नी की विदेश में साथ रहने या जाने की योजना है उनके लिए विवाह प्रमाणपत्र प्रस्तुत न कर पाने की स्थिति में वीज़ा और इमिग्रेशन प्रक्रिया में समस्याएं उत्पन्न हो सकती हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">बैंक जमा, जीवन बीमा या कर्मचारी बीमा पेंशन योजना के तहत, एक विवाहित व्यक्ति अपनी मृत्यु के बाद लाभ के लिए केवल अपनी पत्नी और बच्चों को नामांकित कर सकता है। बिना मैरिज सर्टिफिकेट के इन लाभों का दावा करना मुश्किल हो जाता है। पति की मृत्यु के बाद उसकी संपत्ति और पैतृक संपत्ति पर महिला के अधिकारों और हितों के दावे को सामान्यतः विवाह की वैधता के आधार पर चुनौती दी जाती है। मैरिज सर्टिफिकेट न होने की स्थिति में महिला अपने अधिकारों का दावा नहीं कर सकेगी। वैवाहिक विवादों या तलाक़ की स्थिति में, मैरिज सर्टिफिकेट न होने के कारण विवाह को अमान्य घोषित किया जा सकता है। उदाहरण के तौर पर, मई 2024 में सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश में बिना पंजीकरण और रीति-रिवाजों के किए गए विवाह को अमान्य करार दिया गया था। कई मामलों में, बिना रीति-रिवाजों के विवाह करने या धर्मस्थल में विवाह कर धोखाधड़ी की घटनाएं सामने आती हैं। ऐसी स्थिति में, शिक्षित होने के बावजूद, महिलाएं विवाह प्रमाणपत्र के अभाव में अपने अधिकारों से वंचित रह जाती हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 08:17:19 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>क्यों ज़रूरी है मैरिज सर्टिफिकेट बनवाना : विजय गर्ग, Why is it important to get marriage certificate made Vijay Garg,  </media:keywords>
    </item>
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        <title>सोशल मीडिया के निशान विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">सोशल मीडिया के निशान विजय गर्ग </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आज सोशल मीडिया हमारे जीवन का एक अभिन्न अंग बन गया है, खासकर बच्चों और युवा वयस्कों के लिए। हालाँकि ये प्लेटफॉर्म संचार, आत्म-अभिव्यक्ति और सूचना तक पहुंच के लिए ढेर सारे लाभ प्रदान करते हैं, लेकिन इनके अत्यधिक उपयोग से मानसिक स्वास्थ्य पर हानिकारक प्रभाव पड़ सकता है, विशेष रूप से शरीर की छवि के संदर्भ में। सोशल मीडिया पर सावधानी से तैयार की गई और अक्सर अवास्तविक छवियों की लगातार बाढ़ सुंदरता की विकृत धारणा पैदा करती है, जिससे अपर्याप्तता, असुरक्षा और कम आत्मसम्मान की भावनाएं पैदा होती हैं। युवा व्यक्तियों पर ऐसे संदेशों की बौछार की जाती है जो शारीरिक उपस्थिति को मूल्य के बराबर मानते हैं, जिससे पूर्णता की निरंतर खोज को बढ़ावा मिलता है जिसे कभी भी पूरी तरह से प्राप्त नहीं किया जा सकता है। एक अप्राप्य आदर्श की यह निरंतर खोज खाने के विकार, चिंता और अवसाद सहित गंभीर मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं को जन्म दे सकती है। अवास्तविक सौंदर्य मानकों के अनुरूप होने का दबाव व्यक्तियों को अत्यधिक आहार, व्यायाम और यहां तक कि खुद को नुकसान पहुंचाने जैसे अस्वास्थ्यकर व्यवहार में शामिल होने के लिए प्रेरित कर सकता है। शरीर की छवि पर सोशल मीडिया का प्रभाव इन प्लेटफार्मों में व्याप्त तुलना की संस्कृति से और भी बढ़ गया है। युवा व्यक्ति लगातार अपनी तुलना अपने साथियों से करते हैं, जिससे अक्सर उनमें ईर्ष्या, असंतोष और बेकार की भावनाएँ पैदा होती हैं। इसके अलावा, सोशल मीडिया पर गुमनामी और जवाबदेही की कमी व्यक्तियों को साइबरबुलिंग में शामिल होने के लिए प्रोत्साहित कर सकती है, जिससे युवा उपयोगकर्ताओं के आत्मसम्मान और मानसिक स्वास्थ्य को और नुकसान पहुंच सकता है। नकारात्मक टिप्पणियों और आहत करने वाली टिप्पणियों का लगातार संपर्क स्थायी निशान छोड़ सकता है, जिससे सामाजिक अलगाव, अलगाव और यहां तक कि आत्म-विनाशकारी व्यवहार भी हो सकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">इस महत्वपूर्ण मुद्दे को संबोधित करने के लिए स्कूलों और शैक्षणिक संस्थानों को मीडिया साक्षरता कार्यक्रमों को पाठ्यक्रम में एकीकृत करना चाहिए, छात्रों को ऑनलाइन सामने आने वाली छवियों का गंभीर मूल्यांकन करना और सोशल मीडिया चित्रण की अवास्तविक प्रकृति को पहचानना सिखाना चाहिए। माता-पिता और शिक्षकों को आत्म स्वीकृति, शरीर की सकारात्मकता और स्वस्थ आत्म-सम्मान के महत्व के बारे में बच्चों और युवा वयस्कों के साथ खुली और ईमानदार बातचीत में शामिल होना चाहिए। उन्हें उनकी शारीरिक बनावट के बजाय उनकी शक्तियों, मूल्यों और जुनून पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करें। सरकार को साइबरबुलिंग के खिलाफ सख्त नीतियां भी लागू करनी चाहिए और विविधता और समावेशिता का जश्न मनाने वाले शरीर सकारात्मकता अभियानों को बढ़ावा देना चाहिए। युवा व्यक्तियों को अपने सोशल मीडिया के उपयोग के प्रति सचेत रहना और आवश्यक होने पर इन प्लेटफार्मों से ब्रेक लेने के लिए प्रोत्साहित करना एक कठिन काम होगा। लेकिन हमें ऐसी गतिविधियों को बढ़ावा देना चाहिए जो आत्म स्वीकृति को बढ़ावा दें, जैसे शौक पूरा करना, प्रकृति में समय बिताना और आत्म- देखभाल प्रथाओं में संलग्न होना ।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आत्म-स्वीकृति, आलोचनात्मक सोच और खुले संचार की संस्कृति को बढ़ावा देकर, हम बच्चों और युवा वयस्कों को लचीलेपन और सकारात्मक आत्म - छवि के साथ डिजिटल दुनिया में नेविगेट करने के लिए सशक्त बना सकते हैं, जिससे लंबे समय में उनके मानसिक स्वास्थ्य और कल्याण की रक्षा हो सके।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 08:16:29 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>सोशल मीडिया के निशान विजय गर्ग, social media marks vijay garg,  </media:keywords>
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        <title> वृद्ध पशुओं के संरक्षण का महत्व :विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"> वृद्ध पशुओं के संरक्षण का महत्व :विजय गर्ग </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">जीव-जंतुओं का संरक्षण आज के समय में पर्यावरणीय चिंताओं का एक महत्वपूर्ण पहलू है। परंतु देखा गया है कि यह चर्चा अक्सर विलुप्तप्राय प्रजातियों और उनके बचाव तक ही सीमित रहती है। वृद्ध जानवरों के संरक्षण का महत्व, जो उनके झुंड या समाज में मार्गदर्शक और संरक्षक की भूमिका निभाते हैं, आमतौर पर उपेक्षित रह जाता है। हाल ही में एक अध्ययन में पाया गया है कि बूढ़े और बुद्धिमान जानवर अपने समूहों एवं पर्यावरण में स्थायित्व बनाए रखने के लिए बेहद जरूरी हैं। पृथ्वी के पारिस्थितिक संतुलन के लिए भी यह जरूरी है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">मानवीय गतिविधियों के कारण न केवल वृद्ध व बुद्धिमान जीवों की संख्या में गिरावट आ रही है, बल्कि उनके साथ पर्यावरणीय और जैविक जानकारियां भी विलुप्त हो रही हैं। हालिया अध्ययन चार्ल्स डार्विन विवि, आस्ट्रेलिया के नेतृत्व में किया गया है और इसे साइंस जर्नल में प्रकाशित किया गया है। अध्ययन में बताया गया है कि वृद्ध व बुद्धिमान जानवर जैव विविधता, पारिस्थितिकी तंत्र और वैज्ञानिक अध्ययन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">हाथी, व्हेल, बंदर और अन्य लंबे समय तक जीने वाली प्रजातियां अपने समूह के लिए अनुभवजन्य ज्ञान का स्रोत होते हैं, जो उनकी संतानों और समुदाय के लिए फायदेमंद होता है। उदाहरण के तौर पर, वृद्ध हाथियों (मैट्रियार्क्स) को सूखे के समय जल स्रोतों का पता लगाने और समूह की सुरक्षा का मार्गदर्शन करने में कुशल माना जाता है। इसी तरह वृद्ध व्हेल अपनी संतानों को भोजन प्राप्त करने एवं जटिल समुद्री वातावरण में नेविगेट करने का प्रशिक्षण देती हैं। विशेष रूप से मनुष्यों में, दादी-नानी जैसी संरचनाओं का प्रभाव संतानों के जीवित रहने और उनकी प्रजनन क्षमता पर भी देखा गया है। इसी तरह मछलियों और ठंडे खून वाले जीवों में वृद्ध और बड़े जीव लंबे समय तक प्रजनन कर सकते हैं और अपनी संतानों की संख्या बढ़ा सकते हैं। कई जानवरों के समूहों में वृद्ध सदस्य नेतृत्व और निर्णय लेने में अहम भूमिका निभाते हैं। वे युवा सदस्यों को प्रशिक्षित करते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वृद्ध जीवों की घटती संख्या के लिए मानवीय गतिविधियां जिम्मेदार हैं। अवैध शिकार और मनोरंजन के लिए जानवरों का शिकार इन प्रजातियों की घटती संख्या का प्रमुख कारण हैं। इसके अलावा जलवायु परिवर्तन, प्राकृतिक आवास की कमी और बीमारियां भी इन जीवों की संख्या को प्रभावित कर रही हैं। वृद्ध जीव न केवल अपने समूह के लिए बल्कि मानव समाज और प्रकृति के लिए भी अनमोल हैं। उनके अनुभव और ज्ञान को सुरक्षित रखना हमारी जिम्मेदारी है। यदि हमने अभी कदम नहीं उठाए, तो इसके परिणाम भावी पीढ़ियों के लिए भयावह हो सकते हैं। इसलिए वृद्ध जानवरों को संरक्षित करना हमारी प्राथमिकता होनी चाहिए। यह प्रकृति और मानवता के हित में भी है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 08:15:36 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Importance of protection of old animals Vijay Garg</media:keywords>
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    <item>
        <title>डिजिटल युग में स्त्री सशक्तीकरण : विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <div class="aju" style="line-height: 1.5;"><strong><span style="text-align: justify; font-size: 14pt;">डिजिटल युग में स्त्री सशक्तीकरण : विजय गर्ग </span></strong></div>
<div class="gs">
<div id=":16j" style="text-align: justify; line-height: 1.5;">
<div class="wl4W9b" jsaction="LNSvUb:.CLIENT;xSdBYb:.CLIENT;CDWmBe:.CLIENT;EtHLdc:.CLIENT;pQnh7:.CLIENT;pKHw7e:.CLIENT;Z03mxd:.CLIENT;NZLNxf:.CLIENT;bXglpe:.CLIENT;mzh2Bc:.CLIENT"></div>
</div>
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<div id=":s1" class="ii gt" jslog="20277; u014N:xr6bB; 1:WyIjdGhyZWFkLWY6MTgxNzI5MTk5MjA0NDY5OTQ5NyJd; 4:WyIjbXNnLWY6MTgxNzI5MTk5MjA0NDY5OTQ5NyIsbnVsbCxudWxsLG51bGwsMCwwLFsyMjIsMTYyLDBdLDI1NDUsMTQwMzAsbnVsbCxudWxsLG51bGwsbnVsbCxudWxsLDEsbnVsbCxudWxsLFszXSxudWxsLG51bGwsbnVsbCxudWxsLG51bGwsbnVsbCwwXQ..">
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<div dir="auto">
<div dir="ltr">
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">आ ज के डिजिटल युग में इंटरनेट तक महिलाओं की पहुंच में सुधार सिर्फ उनकी व्यक्तिगत सशक्तीकरण के लिए नहीं, बल्कि यह समग्र सामाजिक और आर्थिक विकास के लिए भी आवश्यक है। डिजिटल प्रौद्योगिकी महिलाओं को शिक्षा, स्वास्थ्य सेवाओं और वित्तीय स्वतंत्रता के नए अवसर प्रदान कर सकती है, जो समाज में लैंगिक असमानता को कम करने में मदद करती है। हालांकि, भारत सरकार ने डिजिटल इंडिया पहल के माध्यम से डिजिटल पहुंच बढ़ाने के लिए महत्त्वपूर्ण कदम उठाए हैं, लेकिन यह सुनिश्चित करना आवश्यक है कि इन प्रयासों में महिलाओं की कमजोरियों और सुरक्षा संबंधित समस्याओं का भी समाधान किया जाए। भारत में 'डिजिटल डिवाइड', विशेष रूप से महिलाओं और लड़कियों के संदर्भ में, एक प्रमुख समस्या बनकर उभरी है। 'ग्लोबल सिस्टम फार मोबाइल कम्युनिकेशंस एसोसिएशन' और 'आक्सफैम ' के 2022 और 2023 के आंकड़ों के अनुसार यह स्पष्ट होता है कि महिलाओं की इंटरनेट तक पहुंच सुधार की आवश्यकता है। मसलन, 2022 में मोबाइल स्वामित्व में लैंगिक अंतर में 11 फीसद की कमी आई है, लेकिन मोबाइल इंटरनेट उपयोग में महिलाओं का हिस्सा 130 1 फीसद पर स्थिर है, जिससे लैंगिक अंतर 40 फीसद तक बढ़ गया है। इसके अलावा, महिलाओं में मोबाइल इंटरनेट जागरूकता 60 फीसद से भी कम है। यह दर्शाता है कि महिलाओं को डिजिटल दुनिया पूरी तरह से समाहित करने के लिए अभी भी बड़ी चुनौतियां बनी हुई हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">'महिलाओं के लिए डिजिटल': जुड़ाव की चुनौतियां सिर्फ तकनीकी नहीं, बल्कि सामाजिक और मानसिक स्वास्थ्य से भी जुड़ी हैं। महिलाओं को साइबर दुर्व्यवहार, आनलाइन उत्पीड़न और मानसिक स्वास्थ्य समस्याओं का सामना करना पड़ता है, खासकर जब वे सोशल मीडिया मंचों का उपयोग करती हैं। यह न केवल उनकी व्यक्तिगत सुरक्षा को बल्कि उनके डिजिटल जुड़ाव को भी नकारात्मक रूप से प्रभावित करता है। भारत में इंटरनेट, मोबाइल फोन की पहुंच और वित्तीय सेवाओं तक पहुंच में सुधार महत्त्वपूर्ण है, लेकिन यह भी आवश्यक है कि इन इन सुधारों को लैंगिक समानता की दृष्टि से लागू किया जाए। ग्रामीण क्षेत्रों में महिलाओं और पुरुषों के बीच इंटरनेट उपयोग में गहरा अंतर है, जहां पुरुषों द्वारा इंटरनेट का उपयोग करने की संभावना महिलाओं की तुलना में दोगुनी है। नतीजतन, महिलाओं के लिए डिजिटल अवसरों तक पहुंच में बाधाएं उत्पन्न होती हैं, जिससे उनके आर्थिक अवसरों में समझौता होता है। | डिजिटल साक्षरता की कमी और मोबाइल इंटरनेट उपयोग की जटिलताएं इस अंतर को और बढ़ा देती हैं। भारत सरकार द्वारा शुरू की की गई 'डिजिटल इंडिया' पहल ने डिजिटल पहुंच को बढ़ाने का महत्वपूर्ण किया है, लेकिन इस पहल में महिला केंद्रित मुद्दों को पूरी तरह से नजरअंदाज किया गया है। गुरुमूर्ति और चामी (2018) के अनुसार, डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के दस्तावेज में कोई स्पष्ट लिंग-विभाजित प्रशिक्षण लक्ष्यों का उल्लेख नहीं किया गया, जिससे महिलाओं को डिजिटल दुनिया में समावेशी रूप से शामिल करने में असमर्थता व्यक्त होती है। इसके अलावा, यह पहल यह पहचानने में भी विफल है कि महिलाओं द्वारा इंटरनेट उपयोग की दर में वृद्धि के लिए डिजिटल साक्षरता और कौशल के अवसरों की आवश्यकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">डिजिटल प्रौद्योगिकियों का समावेशी विकास समाज में सभी वर्गों को आर्थिक मौके, शिक्षा और गतिशीलता संबंधी बाधाओं को पार करने का अवसर प्रदान कर सकता है। डिजिटल तकनीकें नई नौकरियां पैदा कर, डिजिटल वित्तीय सेवाओं तक पहुंच को सुगम बना और डिजिटल व्यवसायों के विकास को प्रोत्साहित कर सकती हैं। इसके अलावा, डिजिटल प्रौद्योगिकी से सार्वजनिक सेवा वितरण को बेहतर बनाने और नागरिकों की अधिक सहभागिता को बढ़ावा देने में भी मदद मिल सकती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">भारत में इंटरनेट उपयोग तेजी से बढ़ा है, लेकिन इस प्रगति के बावजूद, डिजिटल विभाजन अभी भी एक बड़ी चुनौती है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण-5 के अनुसार भारत में केवल 33 फीसद महिलाओं ने इंटरनेट का इस्तेमाल किया है, जबकि 57 फीसद पुरुषों ने इसका उपयोग किया है। स्मार्टफोन के आंकड़े इस असमानता को और स्पष्ट करते हैं। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण 2020-21 के अनुसार, ग्रामीण भारत में केवल 26 फीसद महिलाओं के पास स्मार्टफोन है, जबकि 49 फीसद पुरुष स्मार्टफोन का उपयोग करते हैं। ग्रामीण क्षेत्रों में असमानता और गहरी है। राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के अनुसार, ग्रामीण भारत पुरुषों द्वारा इंटरनेट का उपयोग करने की संभावना महिलाओं की तुलना में ल‍ लगभग दोगुनी है। पूरे भार भारत में ऐसा कोई भी राज्य या केंद्र शासित प्रदेश नहीं है, जहां महिलाओं ने पुरुषों की तुलना में इंटरनेट का अधिक उपयोग किया हो। महिलाओं की डिजिटल कनेक्टिविटी का सीधा असर उनके वित्तीय सशक्तीकरण पर भी पड़ता है। 'डिजिटल बैंकिंग' और 'मोबाइल मनी ट्रांजेक्शन' ने महिलाओं के लिए वित्तीय लेन- देन को अधिक सुविधाजनक और लचीला बना दिया है। 'इंटरनेट एंड मोबाइल एसोसिएशन आफ इंडिया' की 2022 की रपट' अनुसार, डिजिटल साक्षरता और कनेक्टिविटी में सुधार से 2025 तक भारत के सकल घरेलू उत्पाद में सौ अरब डालर की वृद्धि हो सकती है। इस संभावित वृद्धि का सबसे अधिक लाभ महिलाओं को होगा, क्योंकि डिजिटल मंच उन्हें कौशल विकास, रोजगार और उद्यमशीलता के नए अवसर प्रदान करते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">डिजिटल कौशल में प्रशिक्षित महिलाओं की संख्या हर साल लगभग 2.5 फीसद की दर से बढ़ रही है। इससे न केवल महिलाएं 'स्टार्टअप्स' में भागीदारी कर रही हैं, बल्कि वे नेतृत्वकारी भूमिका निभाकर तकनीकी नवाचार को भी बढ़ावा दे रही हैं। डिजिटल इंडिया कार्यक्रम के तहत ग्रामीण महिलाओं को डिजिटलीकरण के माध्यम से सशक्त बनाया जा रहा है। इसने उन्हें आनलाइन मंचों पर अपने छोटे व्यवसायों को विस्तार देने और आर्थिक रूप से आत्मनिर्भर बनने में मदद द की है। । रपटों के मुताबिक जिन महिलाओं के की पहुंच वे लगभग 140 फीसद अधिक आय अर्जित करती हैं। इंटरनेट उपभोग बढ़ाने के प्रयासों में 'डिजिटल डिवाइड' खत्म करना प्राथमिकता होनी चाहिए, इन प्रयासों में महिलाओं और लड़कियों को इंटरनेट से होने वाली परेशानियों पर भी विचार करना चाहिए। भारत सरकार ने अपने 'डिजिटल इंडिया' कार्यक्रम के माध्यम से पूरे भारत में डिजिटल पहुंच और बुनियादी ढांचे का विस्तार करने के लिए एक स्पष्ट प्रतिबद्धता जताई है, जिसमें गूगल, फेसबुक और अमेजन जैसे उद्योग दिग्गजों द्वारा इस पहुंच में तेजी लाई गई है। राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण द्वारा प्रदान किए गए डेटा इन मुद्दों पर हमारी प्रगति के संदर्भ में महत्त्वपूर्ण जानकारी प्रदान करते हैं, लेकिन यह भी जांचना महत्त्वपूर्ण है कि अपनाए गए दृष्टिकोण पितृसत्तात्मक मानदंडों और संरचनाओं को मजबूत नहीं करते, जो असमानताएं बढ़ाते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">'डिजिटल इंडिया' जैसे कार्यक्रमों का उद्देश्य 'डिजिटल डिवाइड' को समाप्त करना है, लेकिन यह सुनिश्चित करने की आवश्यकता है कि महिलाएं पूरी तरह अवसरों से लाभ उठा सकें। महिलाओं के लिए डिजिटल सशक्तीकरण को बढ़ावा देने के लिए डिजिटल साक्षरता, साइबर सुरक्षा और मानसिक स्वास्थ्य सुरक्षा के उपायों को बढ़ावा देना चाहिए, ताकि वे इंटरनेट का उपयोग सुरक्षित और सशक्त रूप से कर सकें।</span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div>
</div> ]]></description>
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        <pubDate>Mon, 02 Dec 2024 08:14:49 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Women empowerment in the digital age Vijay Garg</media:keywords>
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        <title>पाठ्यक्रम में रचनात्मकता का महत्व : विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18pt;">पाठ्यक्रम में रचनात्मकता का महत्व : विजय गर्ग </span></strong><br><br><span style="font-size: 14pt;">जैसे-जैसे शिक्षा की दुनिया विकसित हो रही है, एक आम सहमति उभर रही है कि शिक्षा के भविष्य को परिभाषित करने के लिए रचनात्मकता आवश्यक है। पाठ्यपुस्तकों और मानकीकृत मूल्यांकनों पर भरोसा करने के बजाय, छात्रों की क्षमता को उजागर करने के साधन के रूप में पाठ्यक्रम के प्रति रचनात्मक दृष्टिकोण तेजी से लोकप्रिय हो रहा है। रचनात्मकता न केवल एक कला है बल्कि एक संज्ञानात्मक क्षमता भी है जो कई विषयों तक फैली हुई है और छात्रों को महत्वपूर्ण सोच और समस्या-समाधान कौशल विकसित करने में सक्षम बनाती है। शिक्षक एक ऐसा वातावरण बना सकते हैं जो शैक्षिक पाठ्यक्रम में रचनात्मक तत्वों को शामिल करके शिक्षार्थियों को विभिन्न नवाचारों और कौशल पर ध्यान केंद्रित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। एक रचनात्मक पाठ्यक्रम विविध शिक्षण शैलियों और प्राथमिकताओं को समायोजित करता है। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">छात्रों को अपनी शैक्षिक यात्रा में स्वायत्तता और वैयक्तिकरण की भावना को बढ़ावा देते हुए, अपने हितों का पता लगाने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है। सभी कौशल मस्तिष्क से शुरू होते हैं। चाहे ब्रेस्टस्ट्रोक तैरना सीखना हो या किसी समीकरण को हल करना, यह सब मस्तिष्क के सही क्षेत्र में न्यूरॉन्स के बार-बार सक्रिय होने से शुरू होता है जब तक कि आप इसमें महारत हासिल नहीं कर लेते। रचनात्मकता की सही मात्रा बच्चों को नई चीजें सीखने के लिए प्रेरित करती है और नवाचार को बढ़ावा देती है। नवोन्मेषी शैक्षिक वातावरण में छात्रों के सीखने के तरीके को महत्वपूर्ण रूप से बदलने और जो कुछ वे सीखते हैं उसे वास्तविक दुनिया में लागू करने की शक्ति होती है। भावनात्मक और सामाजिक विकास: रचनात्मक गतिविधियों में अक्सर आत्म-अभिव्यक्ति और सहयोग शामिल होता है, जो भावनात्मक और सामाजिक कौशल विकास में योगदान देता है। छात्र खुद को आत्मविश्वास से व्यक्त करना और दूसरों के दृष्टिकोण को समझना सीखते हैं। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">उन्नत आलोचनात्मक सोच: यह छात्रों को गंभीर रूप से सोचने, जानकारी का विश्लेषण करने और समस्या-समाधान कौशल विकसित करने के लिए प्रोत्साहित करता है। इससे, बदले में, उनकी समग्र संज्ञानात्मक क्षमताओं में सुधार होता है। कौशल विकास: छात्रों में कौशल विकास की एक विस्तृत श्रृंखला है। एक बार रचनात्मक गतिविधियों में संलग्न होने के बाद अक्सर उनके संचार कौशल, सहयोग क्षमता और अनुकूलन क्षमता में वृद्धि होती है। बढ़ी हुई व्यस्तता और प्रेरणा: पाठ्यक्रम में रचनात्मक तत्व सीखने को अधिक मनोरंजक और छात्रों के हितों के लिए प्रासंगिक बनाते हैं। यह बढ़ी हुई व्यस्तता आंतरिक प्रेरणा को बढ़ावा देती है, जिससे प्रयास, भागीदारी और शैक्षणिक कार्यों के प्रति सकारात्मक दृष्टिकोण बढ़ता है। वैयक्तिकृत शिक्षण: रचनात्मक गतिविधियों में शामिल होने से छात्रों को विविध शिक्षण शैलियों को पूरा करते हुए अभिव्यक्ति के विभिन्न रूपों को विकसित करने की अनुमति मिलती है। उदाहरण के लिए, जो छात्र पारंपरिक तरीकों से संघर्ष करते हैं, वे आगे बढ़ सकते हैं जब उन्हें खुद को रचनात्मक रूप से व्यक्त करने की अनुमति दी जाती है, जिससे सीखने का माहौल अधिक समावेशी और प्रभावी हो जाता है। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">धारण शक्ति: रचनात्मकता सूचना और ज्ञान की धारण क्षमता को बढ़ाती है। जब छात्र अकादमिक सामग्री को रचनात्मक परियोजनाओं या वास्तविक दुनिया के अनुप्रयोगों से जोड़ते हैं, तो उन्होंने जो सीखा है उसे याद रखने और लागू करने की अधिक संभावना होती है। पाठ्यक्रम में रचनात्मकता को शामिल करने से छात्रों के प्रदर्शन पर सकारात्मक प्रभाव पड़ता है। यह सीखने को एक गतिशील और सार्थक अनुभव बनाता है जो छात्रों को कक्षा और जीवन भर में सफलता के लिए तैयार करता है। एआई, रोबोटिक्स, 3डी प्रिंटिंग, एआर/वीआर और बायोटेक में तेजी से प्रगति के युग में, यह सवाल महत्वपूर्ण है: क्या हमारे स्कूल वास्तव में हमारे बच्चों को इस भविष्य के लिए तैयार कर रहे हैं? भारत व्यक्तिगत शिक्षण अवधारणाओं को अपनाकर शिक्षा पारिस्थितिकी तंत्र को बदलने की कगार पर है। हमें आगे बढ़ने की जरूरत हैसमय के साथ और एक सीखने का पारिस्थितिकी तंत्र बनाएं जो भविष्य के पेशेवरों और नागरिकों को तैयार करे जो दुनिया में कहीं भी प्रतिस्पर्धा कर सकें और फल-फूल सकें। रचनात्मक पाठ्यक्रम में निवेश यह सुनिश्चित करता है कि छात्र विश्व मंच पर सार्थक योगदान देने के लिए सुसज्जित हैं। ऐसे पाठ्यक्रम को अपनाकर जो रचनात्मकता को महत्व देता है और उसका पोषण करता है, शिक्षक शिक्षा को बदल सकते हैं।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"> विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार मलोट</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">(शिक्षा में रचनात्मकता ज्ञान को नवाचार में बदलने, शिक्षार्थियों को सोचने, अन्वेषण करने और जुड़ने के लिए प्रोत्साहित करने के लिए उत्प्रेरक है) </span><br><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 Nov 2024 08:00:11 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Importance of creativity in curriculum Vijay Garg</media:keywords>
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        <title>कॅरिअर ग्रोथ के लिए कौशल हो आधार:  विजय गर्ग</title>
        <link>https://bharatiya.news/Skills-should-be-the-basis-for-career-growth-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>कॅरिअर ग्रोथ के लिए कौशल हो आधार: </strong></span><span style="font-size: 14pt;"><strong> विजय गर्ग</strong></span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">इन्फॉर्मेशन ऐज में कौशल की मांग</span></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आज के डिजिटल युग में कौशल का विस्तार हर पेशेवर और युवा की प्राथमिकता बन गया है। तेजी से बदलते माहौल और बढ़ती रोजगार संभावनाओं को देखते हुए, नई तकनीकों के साथ तालमेल बिठाना आवश्यक हो गया है। कॅरिअर ग्रोथ के लिए यह जरूरी है कि व्यक्ति अपने कौशल में सुधार लाए और नए विकल्प तलाशे।</span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">कॅरिअर पर प्रभाव डालने वाले कौशल</span></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">कॅरिअर के शुरुआती दौर में यह समझना जरूरी है कि कौन से कौशल अधिक मांग में हैं। सही कौशल की पहचान आपके दीर्घकालीन कॅरिअर विकास में अहम भूमिका निभा सकती है। डिजिटल क्रांति के दौर में तकनीकी कौशलों का विकास करना न केवल आज की जरूरत है, बल्कि भविष्य के लिए भी यह अनिवार्य है।</span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">मौजूदा कौशल और पसंदीदा कॅरिअर का मेल</span></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">अपने मौजूदा कौशल और पसंदीदा कॅरिअर के बीच तालमेल बिठाना जरूरी है। यह आकलन करें कि आपके पास कौन से कौशल हैं और किन कौशलों की कमी आपको आपकी पसंदीदा नौकरी तक पहुंचने से रोक रही है। यह प्रक्रिया आपको आत्म-मूल्यांकन करने और सुधार के लिए आवश्यक कदम उठाने में मदद करेगी।</span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">कौशल सीखने के स्रोत</span></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">ऑनलाइन कोर्स, वर्कशॉप और प्रमाणपत्र जैसे संसाधनों का उपयोग कौशल विकसित करने का बेहतरीन तरीका है। सही प्लेटफॉर्म का चयन करना और नियमित रूप से नए कौशल सीखना आपके कॅरिअर ग्रोथ को तेज कर सकता है।</span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">सही मेंटर का महत्व</span></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">कॅरिअर में सही दिशा में आगे बढ़ने के लिए मेंटर का मार्गदर्शन महत्वपूर्ण है। मेंटर के सुझाव आपके कौशल और कॅरिअर के बीच की दूरी को कम कर सकते हैं। सही मेंटर का चुनाव आपके व्यक्तिगत और पेशेवर विकास में सहायक सिद्ध होगा।</span></p>
<h3 style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></h3>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आज का युग कौशल और ज्ञान के सही उपयोग का है। बेहतर कॅरिअर ग्रोथ के लिए नए कौशलों को अपनाना, सही मेंटर का चयन करना, और उपलब्ध संसाधनों का सही उपयोग करना अनिवार्य है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><em>(विजय गर्ग, सेवानिवृत्त प्रिंसिपल एवं शैक्षिक स्तंभकार, मलोट)</em></span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Sat, 30 Nov 2024 07:55:59 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>कॅरिअर ग्रोथ के लिए कौशल हो आधार:  विजय गर्ग, Skills should be the basis for career growth Vijay Garg</media:keywords>
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    <item>
        <title>विश्व कौशल के अनुरूप शिक्षा</title>
        <link>https://bharatiya.news/Education-in-line-with-world-skills</link>
        <guid>https://bharatiya.news/Education-in-line-with-world-skills</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">यह कहना एक सत्य है कि दुनिया एक जटिल समस्या बनती जा रही है और इससे निपटने के तरीकों को संरचित और समझने की आवश्यकता है। केवल यही बात दुनिया में मामलों के काम करने के तरीके पर बढ़ते दुख और घबराहट से बचाएगी। वित्त के क्षेत्र से एक उदाहरण स्थिति को स्पष्ट कर सकता है। यह इंगित करना एक स्पष्ट बात है कि जीवित रहने के लिए सभी को वित्त की आवश्यकता होती और यदि कहीं से कमाया नहीं जाता है तो वित्त प्राप्त करना ही पड़ता है। वित्त या कमाई को समझने के इस व्यवसाय के लिए यह समझने की क्षमता की आवश्यकता होती है कि वित्त क्या है और इसे कैसे कमाया जा सकता है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">वित्त कई रूपों और रंगों में आता है। सभी वित्त में एक सामान्य कारक यह है कि यह किसी के प्रयास को मौद्रिक मूल्य देता है। और यह किसी सिस्टम को चालू रखने के लिए किए गए काम का प्रतिपूर्ति है। वित्त प्रयास और उसके प्रतिपूर्ति के बीच समीकरण निर्धारित करता है और वित्त बदले में खरीद और खरीद से परे जीवन की जरूरतों को प्राप्त करने दोनों के लिए एक उपकरण बन जाता है। ऐसा करने के लिए, किसी को मुद्रा, उसकी समतुल्यता और मुद्रा को प्रयास में कैसे मापा जाता है, यह समझने की आवश्यकता है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">यह हमारे प्रचलित स्कूल और कॉलेज प्रणाली की पहेली में से एक है कि इन मामलों को शायद ही कभी पाठ्यक्रम के माध्यम से या औपचारिक स्थिति में समझाया जाता है। वित्त के बारे में बहुत कुछ अवलोकन और घरेलू वातावरण के माध्यम से सीखा जाता है जिसमें कोई बड़ा हुआ है, जिसे परिचालन जीवन में लेन-देन में बदल दिया जाता है और किसी के जीवन में काफी पहले ही यह सीख लिया जाता है कि पैसे कमाने और इसलिए वित्त से निपटने के लिए उसके पास क्षमताएँ होनी चाहिए। प्रत्येक प्रणाली में प्रयासों और मुआवजे के बीच समतुल्यता के अपने तरीके होते हैं और इसे निर्धारित करने वाली शक्तियों को अक्सर बाजार की शक्तियाँ कहा जाता है। यह अपने आप में एक कला है जिसे जीवन कभी-कभी सरलता से और अक्सर परीक्षण और त्रुटि के माध्यम से सिखाता है। इस प्रकार, यह है कि वित्त न केवल पेचीदा है, बल्कि यह समझने की ओर ले जाता है और फिर भी यह किसी के जीवन की आधारशिलाओं में से एक है। बातचीत को आगे बढ़ाते हुए, यह महसूस करने की आवश्यकता है कि वित्त के कुछ बुनियादी घटक हैं जैसे कमाई, बचत, निवेश, मूर्त संपत्ति में परिवर्तित करना और बहुत कुछ। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">प्रत्येक क्षेत्र समय के साथ सीखने और वास्तव में किसी के अस्तित्व की खुशी या अन्यथा का एक विशेष क्षेत्र बन गया है। स्कूल की उच्च कक्षाओं में वित्त में कुछ ताकतें हैं जहाँ कुछ बुनियादी अवधारणाओं को समझाया जाता है और वित्त पर कुछ आवश्यक आधारभूत विचार साझा किए जाते हैं। जरूरत है इसे एक व्यावहारिक अभिविन्यास देने और फील्डवर्क के माध्यम से लोगों को वित्त के मूल्य और मानव जीवन में इसकी केंद्रीय भूमिका सिखाने की। अधिकांश कक्षाएँ सोच के उस चरण या उस तरह की सोच तक नहीं पहुँची हैं जिसका सीधा सा मतलब है कि अधिकांश लोग वित्त की अनिवार्यताओं और जीवन की नींव के बीच संबंध को समझे बिना ही अपनी स्कूली शिक्षा पूरी कर लेते हैं। स्थिति तब और जटिल हो जाती है जब कोई कॉलेज या विश्वविद्यालय स्तर से स्नातक होता है और फिर जब तक कोई वित्त में कोई विशिष्ट पाठ्यक्रम नहीं करता है, तब तक वह स्कूल में वित्त के बारे में जो कुछ भी सीखा है, उससे आगे कभी कुछ नहीं सीख सकता है। यह एक नुकसान है क्योंकि, जैसा कि ऊपर बताया गया है, स्कूल में वित्त के बारे में जो पढ़ाया जाता है, वह वित्त के अभ्यास में बहुत दूर तक नहीं जाता है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"> हर किसी को यह जानने की जरूरत है कि कौशल और जानकारी को संभालने में किसी के मूल्य और पर्यावरण द्वारा वित्तीय रूप से इसकी भरपाई कैसे की जाती है, के बीच संबंध क्या है यह अपने आप में एक पेचीदा प्रस्ताव है और जैसा कि पहले सुझाया गया है, इसके लिए फील्डवर्क की आवश्यकता है। फिर वित्त के अंतिम क्षेत्र हैं जिन्हें व्यावहारिक दुनिया से अवगत कराए बिना नहीं सीखा जा सकता है और यह ऐसा विषय नहीं है जिसे कक्षा में लाया जा सके। साथ ही, एक सामान्य शिक्षा प्रणाली में, फिर से अंतराल होते हैं जहां यह सीखना डिफॉल्ट रूप से होता है और लोगों को परीक्षण और त्रुटि के माध्यम से खुद के लिए भुगतान करने के लिए छोड़ दिया जाता है। इससे न केवल बहुत सी समस्याएं पैदा होती हैं, बल्कि कई तरह की जटिलताएं भी पैदा होती हैं। किसी को धोखा दिया जा सकता है या उसे यह नहीं पता हो सकता है कि कई मामलों में, किसी तरह के मुआवजे के बिना सेवाएं प्रदान नहीं की जा सकती हैं और वह मुआवजा अक्सर पैसे के रूप में ही दिया जाता है। लोगों को पैसे, वित्त और प्रयास के बीच के संबंध को समझाना एक सार्थक दृष्टिकोण होगा।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">ऐसा दृष्टिकोण न केवल स्कूलों बल्कि कॉलेजों के पाठ्यक्रम को भी सार्थक और व्यक्ति के अपने जीवन में अधिक व्यावहारिक बनाने में मदद करेगा। जैसा कि मामला है, अगर कोई भौतिकी, रसायन विज्ञान, इतिहास, मनोविज्ञान, भूगोल या किसी अन्य विषय में विशेषज्ञता हासिल करता है, तो उसे शायद ही यह एहसास हो कि तथाकथित विशेषज्ञता से परे, उसे एक सामान्य शिक्षा की आवश्यकता है। यह सामान्य शिक्षा दूसरों के प्रति व्यवहार, स्वयं का प्रबंधन, आय को समझना, व्यय को समझना, बचत को समझना आदि हो सकती है। इसे सरल शब्दों में कहें तो वयस्कता प्रवेश करने और आर्थिक रूप से व्यवहार्य इकाई बनने से पहले सीखने की सीमा पर भी ध्यान देने की आवश्यकता है। जैसा कि पहले बताया गया है, यह सब परीक्षण और त्रुटि के माध्यम से हो रहा है, एक विधि को अपनाना; कुछ मामलों में काम करती है लेकिन अन्य में नहीं। औपचारिक इनपुट के माध्यम से वास्तविक जीवन में समायोजन के लिए खजाने को कम करने की स्पष्ट आवश्यकता है, इससे पहले कि कोई वयस्कता में स्नातक हो और खुले समुद्र में फेंक दिया जाए जैसे कि खुद की देखभाल करना।</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 28 Nov 2024 20:37:33 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Global skills, skills-based education, global education standards, skill development, modern education system, NCERT skill education, education and skill development, technical education, global education benchmarks, Indian education and skills, changes in education, skill education from grade 6, benefits of skill education, skill development for children, future skills in education., विश्व कौशल, कौशल आधारित शिक्षा, वैश्विक शिक्षा मानक, कौशल विकास, आधुनिक शिक्षा प्रणाली, NCERT कौशल शिक्षा, शिक्षा</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>भारत में वायु प्रदूषण और जल को बचने लिए उठाने होंगे सख्त कदम : विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Strict-steps-will-have-to-be-taken-to-avoid-air-pollution-and-water-pollution-in-India</link>
        <guid>https://bharatiya.news/Strict-steps-will-have-to-be-taken-to-avoid-air-pollution-and-water-pollution-in-India</guid>
        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 14pt;">भारत में वायु प्रदूषण और जल को बचने लिए उठाने होंगे सख्त कदम : </span><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग </span></strong></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">उत्तर भारत सर्दी के साथ उच्च वायु प्रदूषण के एक और सीजन में पहुंच गया है। मध्य नवंबर से वायु गुणवत्ता सूचकांक (एक्यूआई) 400 से ऊपर पहुंच जाने के कारण, राष्ट्रीय राजधानी क्षेत्र में स्कूलों को बंद करने और निजी क्षेत्र के आधे कर्मचारियों को वर्क फ्राम होम देने जैसे कई आपातकालीन उपाय लागू किए गए हैं। भले ही वायु प्रदूषण की चर्चाओं के केंद्र में दिल्ली रहती हो, लेकिन यह उत्तर भारत के दूसरे हिस्सों के लिए उतना ही महत्वपूर्ण संकट है। पिछले सप्ताह कई उत्तर भारतीय शहरों ने बहुत खराब एयर क्वालिटी दर्ज की है। उच्च वायु प्रदूषण से बच्चे, गर्भवती महिलाएं और बुजुर्गों के स्वास्थ्य को विशेष तौर पर खतरा है। इससे सांस संबंधी गंभीर संक्रमण और हृदय रोगों सहित कई स्वास्थ्य समस्याएं हो सकती हैं। लेकिन हर बार सर्दियां आते ही उत्तर भारत धुंध या स्माग में क्यों घिर जाता है ? </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">धुंध या स्माग एक तरह का वायु प्रदूषण है, जो धुंए, कोहरे और अन्य प्रदूषकों का मिश्रण होता है। ऐसा इस क्षेत्र की खराब वायु गुणवत्ता के कारण होता है, जिसमें स्थानीय और क्षेत्रीय दोनों स्त्रोतों से आने वाला प्रदूषण शामिल है। कच्चे रास्तों और निर्माण गतिविधियों की धूल, वाहनों और खुले में कूड़ा जलाने के धुएं जैसे स्थानीय स्त्रोत प्रदूषण बढ़ाते हैं। लेकिन सर्दी के महीनों में पराली जलाने जैसे कुछ मौसमी स्त्रोत और उत्तर-पश्चिमी हवाएं चलने, हवा की रफ्तार घटने और तापमान गिरने जैसी प्रतिकूल मौसमी परिस्थितियों के कारण हालात और भी बदतर हो जाते हैं। इसलिए, वायु प्रदूषण के समाधान के लिए पूरे वर्ष ऐसे लक्षित कदम उठाने की जरूरत है, जो धुंध के मूल कारणों और इसके समाधानों पर केंद्रित हों।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">सबसे पहले, उत्तर भारत के शहरों को धुंध वाले दिनों को घटाने के लिए पूर्वानुमान आधारित निवारक उपायों को अपनाना चाहिए। अब कई शहरों में अत्याधुनिक एयर क्वालिटी डिसीजन सपोर्ट सिस्टम (एडीएसएस), जो पूर्वानुमान और माडलिंग के आंकड़ों का उपयोग करता हैं। काउंसिल आन एनर्जी, एनवायरनमेंट एंड वाटर (सीईईडब्ल्यू) का आकलन है कि पूर्व सक्रियता के साथ लागू किए गए पूर्वानुमान आधारित आपातकालीन उपायों ने दिल्ली जैसे शहरों में गंभीर वायु प्रदूषण वाले दिनों की संख्या घटाई है। अब ऐसे पूर्वानुमान अमृतसर, भिवानी, गुरुग्राम और पटना सहित 45 अन्य शहरों के लिए भी उपलब्ध हैं, ताकि प्रदूषण का उच्च स्तर सामने आने के बाद कदम उठाने की जगह पर पूर्व सक्रियता के साथ स्वच्छ वायु नियोजन किया जा सके। महाराष्ट्र के ठाणे जैसे कुछ शहर तो अवैध निर्माण व विध्वंस अपशिष्ट फेंकने जैसे वायु प्रदूषण स्त्रोतों पर कार्रवाई करने के लिए एक्यूडीएसएस का उपयोग कर रहे हैं, जो शहरों में प्रदूषण का एक प्रमुख स्त्रोत है। उत्तर भारत के ज्यादा से ज्यादा शहरों को ऐसे उपायों पर विचार करना चाहिए। दूसरा, उत्तर भारत में किसानों को धान की पराली के बेहतर प्रबंधन के लिए प्रोत्साहित करना चाहिए। पराली जलने को लेकर दोषारोपण के बजाए इसके इन सीटू और एक्स - सीटू प्रबंधन विकल्पों के लिए, जमीनी सुविधाएं सुधारने पर ध्यान देने की जरूरत है। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">सीईईडब्ल्यू के एक अध्ययन के अनुसार, सरकारी प्रयासों ने पंजाब में पराली प्रबंधन मशीनों की उपलब्धता बढ़ाई है, और लगभग 58 प्रतिशत से अधिक किसानों ने इनका उपयोग करने की जानकारी दी है। किसानों को यह जानकारी देने के लिए जागरूकता अभियान पूरे वर्ष चलाना चाहिए कि पराली न जलाने के विकल्पों को अपनाने से उर्वरकों का खर्च और पानी का उपयोग घट सकता है और मिट्टी की सेहत सुधर सकती है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">तीसरा, सर्दियों में तापमान गिरने के साथ उत्तर भारत में शहरी प्राधिकरणों को पर्याप्त गर्म आश्रय स्थल बनाने की तैयारी करनी चाहिए और सुरक्षा गार्डों को हीटर उपलब्ध कराने का आदेश देना चाहिए। रात के समय काम करने वाले व्यक्ति और बेघर लोग अक्सर गर्मी के लिए बायोमास जलाते हैं, जिससे शहरी वायु प्रदूषण में आवधिक वृद्धि ( अलग-अलग समय में वृद्धि होती है। चौथा, पूरे वर्ष प्रदूषण में योगदान देने वाले निर्माण और परिवहन जैसे स्त्रोतों को सुधारने के लिए प्रणालीगत सुधार लाना चाहिए। उदाहरण के लिए, निर्माण स्थलों के लिए निर्धारित शर्तों के अनुपालन के बारे में सिर्फ सर्दी के महीनों में ध्यान दिया जाता है। </span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">इस सीमित सक्रियता को बदलने की जरूरत है। परिवहन के मामले में, शहर मौजूदा मोबिलिटी पालिसी और सरकारी योजनाओं का लाभ लेते हुए पुराने वाहनों को चरणबद्ध रूप से हटाने और सार्वजनिक परिवहन सहित इलेक्ट्रिक बसों बेड़े की दिशा में बदलाव तेज कर सकते हैं। इसके साथ, शहरों को सार्वजनिक परिवहन की लास्ट माइल कनेक्टिविटी, समयबद्धता और सेवा गुणवत्ता में सुधार लाते हुए इसके इस्तेमाल के लिए अधिक से अधिक यात्रियों को आकर्षित करने पर ध्यान देना चाहिए। अंत में, स्वच्छ वायु से जुड़े प्रयासों में नागरिकों को भी शामिल करना होगा।</span><br><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 28 Nov 2024 20:34:02 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Air pollution in India, water conservation, strict measures, environmental protection, pollution control, water crisis, climate change, pollution solutions, water conservation measures, environmental conservation., भारत में वायु प्रदूषण, जल संरक्षण, सख्त कदम, पर्यावरण सुरक्षा, प्रदूषण नियंत्रण, जल संकट, जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण समाधान, जल संरक्षण उपाय, पर्यावरण संरक्षण, Strict steps will have to be taken to avoid air pollution and water pollution in India</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>बचपन, परिवार और अनुभवों से सबक  लेते हैं बच्चे : विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Lessons-from-childhood-family-and-experiences</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>बचपन, परिवार और अनुभवों से सबक: विजय गर्ग </strong></span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">अतीत हमारे वर्तमान को आकार देता है। भविष्य के लिए रास्ता बनाने के लिए वर्तमान अगले ही क्षण अतीत हो जाता है। हमारे पास यादें बची हैं जो हमें अमूल्य सबक भी सिखाती हैं</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मैं भी अपनी उम्र के किसी भी अन्य युवा लड़के की तरह एक शरारती बच्चा था। जब भी मेरे माता-पिता मुझे डाँटना चाहते थे, तो मुझे अपनी दादी के पीछे छुपने के लिए एक आश्रय का आश्वासन दिया जाता था। फिर वह मेरे माता-पिता को अधिक दयालु होने की सलाह देती थी, साथ ही हमें अपने व्यवहार के बारे में विशेष रूप से सावधान रहने के लिए कहती थी।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मुझे बचपन की एक और याद याद आती है। हमारी स्कूल से घर वापसी उसी समय हुई जब मेरी माँ सो रही थी। हम दबे पाँव घर में घुसते थे, सावधान रहते थे कि उसे परेशान न करें। एक दोपहर मैं इतना उत्साहित था कि मैंने उसे जगाकर परीक्षाओं में अपने उत्कृष्ट परिणामों के बारे में बताया। फिर भी वह सुस्त थी, उसने अपनी नींद जारी रखने से पहले मुझे गले लगाया और आशीर्वाद दिया। मैं अभी भी उसकी सहज प्रतिक्रिया को नहीं भूल सकता, भले ही मैंने उसे बहुत आवश्यक आराम में बाधा डाली थी।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मेरे पिता अपनी जवानी के दिनों में गुस्सैल स्वभाव के थे। वह आमतौर पर रविवार की दोपहर को आराम करते और सोते थे। हमने बच्चों की तरह शांत रहने की कोशिश की। एक दिन, हम सामान्य से अधिक शोर-शराबे वाले रहे होंगे, और अंत में उसके द्वारा बुरी तरह पिटाई कर दी गई। बाद में शाम को, मैंने अपने पिता के व्यक्तित्व का एक अलग पहलू देखा। उन्होंने मुझे ठेस पहुंचाने के लिए गंभीर रूप से माफ़ी मांगी। मैंने एक महत्वपूर्ण सबक सीखा. अपनी गलती स्वीकार करने में कोई शर्म नहीं है.</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मुझे वह दिन याद है जब मैं उस युवा लड़की से मिला जो अगले कुछ महीनों में मेरी पत्नी और जीवन साथी बन गई। मुझे यह भी याद है कि शादी के रिसेप्शन के दौरान मेरी नजरें सिर्फ उसी पर थीं। वे कठिन दिन थे जब हम एक साथ जीवन बिताने के गंभीर कार्य के लिए तैयार हो गए थे। हमारी शादी को 40 साल हो गए हैं. जीवन की कठोर वास्तविकताओं का सामना करने वाले ये दशक आसान नहीं रहे हैं। चाहे कितनी भी कठिनाइयां आएं, हम कभी हार नहीं मानते। हम एक साथ सुखी और संतुष्ट जीवन जीने के सामान्य लक्ष्य की दिशा में काम करते हैं। प्रत्येक व्यक्ति के लिए एक व्यक्ति के रूप में विकसित होने के लिए सम्मान और स्थान की आवश्यकता की मान्यता है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">एक और पुरानी याद पुरी की बहुत पुरानी छुट्टियों की है। हमारा गेस्ट हाउस समुद्र तट से कुछ सौ मीटर की दूरी पर था। हमारी बेटियाँ बहुत छोटी थीं। मैं उनकी सुरक्षा की चिंता करते हुए एक सुरक्षात्मक पिता था और रहूंगा। उस एक दिन, मैं बरामदे में बैठा, समुद्र तट पर खेल रहे दो बच्चों को प्यार से देख रहा था। मुझे उनकी खुशी पर गर्व था क्योंकि वे रेत से कुछ बनाते हुए खुशी से चिल्ला रहे थे।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मेरी माँ अपने प्रार्थना कक्ष में रामचरितमानस की एक प्रति रखती थीं। मैंने कहीं पढ़ा है कि आप किसी भी समस्या का समाधान महाकाव्य से पा सकते हैं। आपको बस कोई भी पेज खोलना है, और शीर्ष पंक्ति आपको अपने सबसे महत्वपूर्ण मुद्दे से निपटने के तरीके ढूंढने में मदद करेगी। मैंने भी कभी-कभी इसे आजमाया. मैंने सीखा कि जीवन की जटिल उलझनों से गुजरते हुए मैं हमेशा पारंपरिक सोच के माध्यम से स्थितियों से नहीं निपट सकता।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">निष्पक्ष खेल, टीम के सदस्यों का मार्गदर्शन करना, निष्पक्षता, टीम के सदस्यों को पूरा समय देना, चाहे आप कितने भी व्यस्त हों, सहानुभूति, टीम के लिए काम करना, टीम के सदस्यों के प्रदर्शन पर गर्व और आउट-ऑफ़-बॉक्स सोच, ये कुछ ही थे उन अमूल्य पाठों के बारे में जो मेरे अनुभवों ने मुझे सिखाए। जीवन की कठिन परिस्थितियों में उन्होंने मेरा साथ दिया है।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><br><span style="font-size: 14pt;">मनोचिकित्सक, अब्राहम ट्वर्सकी के शब्द कई लोगों को पसंद आएंगे, “अतीत के बारे में चिंतन करने से आप कहीं नहीं पहुंचेंगे। इसलिए आगे बढ़ें और अतीत से जो कुछ भी आप सीख सकते हैं सीखें, और फिर उसे अपने पीछे छोड़ दें। याद रखें, आप इसे बदलने के लिए कुछ नहीं कर सकते, लेकिन आप इसके पाठों का उपयोग अपने भविष्य को बेहतर बनाने के लिए कर सकते हैं।</span></p>
<p style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल एजुकेशनल कॉलमनिस्ट स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Thu, 28 Nov 2024 20:30:57 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Childhood, Family, Experiences, Lessons, Vijay Garg, Education, Child Development, Life Values, Importance of Education, Family Values, Inspiration, Motivational Quotes for Children, विजय गर्ग, Vijay Garg, बचपन, परिवार, अनुभव, सबक, विजय गर्ग, शिक्षा, बच्चों का विकास, जीवन के मूल्य, शिक्षा के महत्व, पारिवारिक मूल्य, बाल विकास, प्रेरणा, बच्चों के लिए प्रेरक विचार</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>भारत में प्राकृतिक खेती: अंकुरण की दिशा में बढ़ते कदम, जड़ें मजबूत हो रही हैं</title>
        <link>https://bharatiya.news/bharat-mein-prakritik-kheti-ankuran-ki-disha-mein-badhte-kadam</link>
        <guid>https://bharatiya.news/bharat-mein-prakritik-kheti-ankuran-ki-disha-mein-badhte-kadam</guid>
        <description><![CDATA[ <div dir="ltr">
<h3><strong>प्राकृतिक खेती में प्रगति: सरकारी समर्थन और जमीनी स्तर पर आंदोलन</strong></h3>
<ol>
<li>
<p><strong>सरकारी समर्थन</strong><br>भारत सरकार प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाओं पर काम कर रही है। <strong>परम्परागत कृषि विकास योजना (PKVY)</strong> और <strong>भारतीय प्राकृतिक कृषि पद्धति (BPKP)</strong> जैसी पहलें राज्यों में प्राकृतिक खेती को प्रोत्साहित कर रही हैं। राज्य जैसे आंध्र प्रदेश, गुजरात और हिमाचल प्रदेश इस दिशा में अग्रणी हैं। इन राज्यों में प्राकृतिक कृषि को बढ़ावा देने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी प्रयास मिलकर काम कर रहे हैं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>जमीनी स्तर पर आंदोलन</strong><br>किसानों और संगठनों द्वारा प्राकृतिक खेती के लाभों के बारे में जागरूकता बढ़ाने की कोशिशें जारी हैं। कई किसान सफलता की कहानियाँ साझा कर रहे हैं और एक दूसरे को प्रशिक्षित कर रहे हैं। विशेष रूप से सूखा-प्रवण क्षेत्रों में प्राकृतिक खेती को अपनाने से किसानों को लाभ हुआ है। यह आंदोलन अब पूरी तरह से जमीनी स्तर पर फैल चुका है।</p>
</li>
<li>
<p><strong>पर्यावरणीय लाभ</strong><br>प्राकृतिक खेती से पर्यावरण को कई लाभ होते हैं। यह <strong>मिट्टी की उर्वरता</strong> बढ़ाने, <strong>पानी का संरक्षण</strong> करने और <strong>जैव विविधता</strong> को बढ़ावा देने में मदद करता है। इसके अलावा, यह जलवायु परिवर्तन के खिलाफ भी एक मजबूत कदम है, क्योंकि यह पर्यावरण के अनुकूल कृषि पद्धतियाँ अपनाता है।</p>
</li>
</ol>
<h3><strong>चुनौतियाँ: रास्ते में अड़चनें और समाधान</strong></h3>
<ol>
<li>
<p><strong>ज्ञान की कमी</strong><br>कई किसानों को प्राकृतिक खेती के बारे में सही जानकारी नहीं है और उन्हें इस पद्धति को अपनाने के लिए उचित प्रशिक्षण की आवश्यकता है। किसानों तक सही जानकारी पहुंचाने के लिए सरकारी और गैर-सरकारी संगठनों को मिलकर काम करना होगा।</p>
</li>
<li>
<p><strong>प्रारंभिक संक्रमण की समस्याएँ</strong><br>प्राकृतिक खेती अपनाने के शुरुआती वर्षों में किसान अक्सर कम पैदावार का सामना करते हैं, जो उन्हें इस पद्धति को छोड़ने के लिए प्रेरित कर सकता है। हालांकि यह एक दीर्घकालिक लाभ प्रदान करने वाली प्रणाली है, शुरुआती कठिनाइयाँ किसानों के लिए चुनौतीपूर्ण हो सकती हैं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>बाजार तक पहुंच की समस्या</strong><br>रसायन-मुक्त उत्पादों की उपभोक्ता मांग बढ़ रही है, लेकिन इन उत्पादों के लिए एक विश्वसनीय बाजार और प्रीमियम मूल्य निर्धारण प्रणाली अभी भी विकसित हो रही है। किसानों को अपने उत्पादों के लिए उचित बाजार संपर्क की आवश्यकता है, ताकि वे अपनी मेहनत का सही मूल्य प्राप्त कर सकें।</p>
</li>
<li>
<p><strong>नीति और पैमाना</strong><br>सरकार ने प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के लिए कई योजनाएँ बनाई हैं, लेकिन इन्हें बड़े पैमाने पर लागू करने के लिए एक मजबूत और व्यापक नीति ढांचा की आवश्यकता है। बिना इस ढांचे के, प्राकृतिक खेती को बड़े स्तर पर फैलाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।</p>
</li>
</ol>
<h3><strong>आगे का रास्ता: प्राकृतिक खेती को बढ़ावा देने के उपाय</strong></h3>
<ol>
<li>
<p><strong>किसानों के लिए उन्नत प्रशिक्षण और विस्तार सेवाएँ</strong><br>प्राकृतिक खेती को सफल बनाने के लिए किसानों को सही प्रशिक्षण देना आवश्यक है। उन्हें यह समझाना होगा कि रसायन-मुक्त खेती से उन्हें दीर्घकालिक लाभ मिलेंगे, भले ही शुरुआती वर्षों में कुछ कठिनाइयाँ आएं।</p>
</li>
<li>
<p><strong>सशक्त विपणन तंत्र और प्रमाणन प्रणाली</strong><br>प्राकृतिक खेती के उत्पादों के लिए एक मजबूत बाजार तंत्र और प्रमाणन प्रणाली की आवश्यकता है। यदि किसानों को उनके उत्पादों के लिए उचित मूल्य मिलता है, तो वे इस पद्धति को अपनाने में अधिक रुचि दिखाएँगे।</p>
</li>
<li>
<p><strong>अनुसंधान और विकास में निवेश</strong><br>प्राकृतिक खेती के तरीकों को और अधिक वैज्ञानिक रूप से मान्य बनाने के लिए निरंतर अनुसंधान और विकास आवश्यक है। यह न केवल किसानों को सही मार्गदर्शन देगा, बल्कि प्राकृतिक खेती के तरीकों को और अधिक प्रभावी बनाएगा।</p>
</li>
<li>
<p><strong>समुदाय-संचालित जागरूकता कार्यक्रम</strong><br>प्राकृतिक खेती के दीर्घकालिक लाभों को समझाने और इसके महत्व को बढ़ाने के लिए समुदायों में जागरूकता बढ़ाने के प्रयास किए जाने चाहिए। यह जागरूकता किसानों और उपभोक्ताओं दोनों के बीच प्राकृतिक खेती के लिए एक सकारात्मक दृष्टिकोण विकसित करने में मदद करेगी।</p>
</li>
</ol>
<h3><strong>- प्राकृतिक खेती का भविष्य -</strong></h3>
<p>भारत में प्राकृतिक खेती को एक स्थायी और लाभकारी कृषि पद्धति के रूप में अपनाने की पूरी क्षमता है। यह केवल पर्यावरण के लिए फायदेमंद नहीं है, बल्कि किसानों के लिए भी दीर्घकालिक लाभ प्रदान करती है। हालांकि इसके रास्ते में कुछ चुनौतियाँ हैं, लेकिन सही दिशा में उठाए गए कदम इसे एक क्रांतिकारी परिवर्तन बना सकते हैं। किसानों को आवश्यक प्रशिक्षण, उपयुक्त बाजार प्रणाली और सरकार से पर्याप्त समर्थन मिलने पर प्राकृतिक खेती भारत के कृषि परिदृश्य को पूरी तरह बदल सकती है।</p>
<p><strong>लेखक:</strong> विजय गर्ग</p>
<p><img src="https://bharatiya.news/uploads/images/202411/image_870x_673c078c4939b.jpg" alt="Vijay Garg" width="65" height="90"></p>
<p><strong>सेवानिवृत्त प्रिंसिपल, शैक्षिक स्तंभकार, स्ट्रीट कौर चंद, एमएचआर मलोट, पंजाब</strong></p>
</div> ]]></description>
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        <pubDate>Tue, 19 Nov 2024 06:20:54 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>प्राकृतिक खेती, शून्य बजट प्राकृतिक खेती, ZBNF, टिकाऊ कृषि, पर्यावरण-अनुकूल खेती, भारत में प्राकृतिक खेती, रसायन-मुक्त कृषि, जैविक खेती, सुभाष पालेकर, गोबर मूत्र खेती, सिंथेटिक उर्वरक मुक्त खेती, प्राकृतिक कृषि पद्धतियाँ, भारतीय कृषि, कृषि में क्रांति, सतत कृषि, प्राकृतिक खेती के लाभ, कृषि विकास, किसान प्रशिक्षण, प्राकृतिक खेती के तरीके, पर्यावरण संरक्षण, कृषि जागरूकता</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>क्या नीट युजी परीक्षा की तैयारी शुरू करने का कोई आदर्श समय है? </title>
        <link>https://bharatiya.news/Is-there-any-ideal-time-to-start-preparing-for-NEET-UG-exam</link>
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        <description><![CDATA[ <p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 12pt;">क्या नीट युजी परीक्षा की तैयारी शुरू करने का कोई आदर्श समय है?  : विजय गर्ग </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><br><span style="font-size: 12pt;"> हर साल, देश भर में लाखों उम्मीदवार शीर्ष प्रतिष्ठित मेडिकल कॉलेजों में से एक में अध्ययन करने के अपने सपने को साकार करने के लिए नीट युजी (राष्ट्रीय पात्रता सह प्रवेश परीक्षा) परीक्षा में शामिल होते हैं। एनटीए (राष्ट्रीय परीक्षण एजेंसी) द्वारा आयोजित, एनईईटी वर्ष में एक बार आयोजित किया जाता है और इसे देश में सबसे चुनौतीपूर्ण और कठिन मेडिकल प्रवेश परीक्षाओं में से एक माना जाता है। केवल कुछ आवेदक ही अच्छे ग्रेड के साथ परीक्षा उत्तीर्ण कर पाते हैं। एनईईटी की तैयारी करने वाले छात्रों को परीक्षा के लिए पहले से तैयारी करने का सुझाव दिया जाता है ताकि परीक्षा से पहले अंतिम समय की कमियों और शंकाओं को दूर करने के लिए उनके पास पर्याप्त समय हो। इससे हर छात्र के मन में एक सवाल उठता है: "नीट की तैयारी कब शुरू करें?" क्या नीट युजी की तैयारी शुरू करने का कोई आदर्श समय है? जब मेडिकल या जेईई जैसी किसी अन्य प्रवेश परीक्षा की तैयारी शुरू करने की बात आती है, तो छात्र अक्सर पूछते हैं, "मुझे एनईईटी की तैयारी कब शुरू करनी चाहिए?" यद्यपि यह किसी व्यक्ति की अवधारणाओं को समझने की क्षमता और क्षमताओं पर निर्भर करता है, लेकिन यह सुझाव दिया जाता है कि सभी एनईईटी अभ्यर्थी अपनी तैयारी यथाशीघ्र शुरू कर दें। जल्दी शुरुआत करने से आपको अपने कमजोर क्षेत्रों पर काम करने और स्पष्ट समझ के साथ अवधारणाओं पर मजबूत पकड़ बनाने के लिए पर्याप्त समय मिलेगा। आपने सुना होगा, "जितनी जल्दी शुरू हुआ, उतनी जल्दी पूरा होगा।"  नीट की तैयारी शुरू करने का सबसे अच्छा समय वह है जब आप मुख्य विषयों और अवधारणाओं के साथ पूरे पाठ्यक्रम को कवर कर सकते हैं। लेकिन जब भी आप शुरुआत करें, तो अपनी पढ़ाई पर लगातार और केंद्रित रहना बेहद महत्वपूर्ण है। नीट युजी एक अत्यधिक प्रतिस्पर्धी परीक्षा है और उम्मीदवारों को इसकी तैयारी जल्द से जल्द शुरू कर देनी चाहिए।   </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 12pt;">प्रारंभिक नीट युजी तैयारी के लाभ आपकी नीट की तैयारी जल्दी शुरू करने के कई फायदे हैं। उनमें से कुछ यहाँ इस प्रकार हैं: 1. पुनरीक्षण के लिए पर्याप्त जगह किसी भी प्रतियोगी परीक्षा में चीजों को दोहराने के महत्व पर ध्यान दें। अपनी अवधारणाओं को बढ़ावा देने और पढ़ाई को लंबे समय तक याद रखने के लिए रिवीजन महत्वपूर्ण है। नीट युजी परीक्षा के लिए जल्दी तैयारी करने से आपको रिवीजन के लिए पर्याप्त समय मिलता है। आप अपने पाठ्यक्रम और महत्वपूर्ण विषयों को कई बार दोहरा सकते हैं और परीक्षा तक मानसिक शांति सुनिश्चित कर सकते हैं। 2. अवधारणाओं का संपूर्ण ज्ञान  छात्र अक्सर पूछते हैं, "नीट के लिए पढ़ाई कैसे शुरू करें?" सबसे अच्छा विचार अवधारणाओं पर मजबूत पकड़ रखना है ताकि आप परीक्षा में किसी भी प्रश्न को कठिनाई स्तर की परवाह किए बिना हल कर सकें। और जल्दी तैयारी शुरू करने से आपको किसी विशेष विषय और अध्याय की अवधारणाओं को अच्छी तरह से सीखने और समझने के लिए पर्याप्त समय मिलता है। आप परीक्षाओं की झंझट से बच सकते हैं। 3. पाठ्यक्रम को कवर करने के लिए अधिक समय नीट पाठ्यक्रम को कवर करना नीट की तैयारी के लिए पहली और सबसे महत्वपूर्ण सलाह है। लेकिन नीट युजी पाठ्यक्रम बहुत बड़ा है और इसमें भौतिकी, रसायन विज्ञान और जीव विज्ञान के प्रश्न शामिल हैं। एनईईटी परीक्षा के लिए जल्दी शुरुआत करने से आपको परीक्षा से पहले पूरा पाठ्यक्रम पूरा करने के लिए पर्याप्त समय का अतिरिक्त लाभ मिलेगा, जिससे संशोधन के लिए पर्याप्त गुंजाइश बचेगी। 4. मॉक टेस्ट के माध्यम से कौशल में सुधार मॉक टेस्ट हल करना अपनी तैयारी के स्तर को परखने और अपने कमजोर क्षेत्रों पर काम करने का एक शानदार तरीका है। साथ ही, यह आपको परीक्षा में प्रश्नों को हल करने की गति और सटीकता में सुधार करने में मदद करता है। एनईईटी परीक्षा के लिए जल्दी तैयारी शुरू करने से आप नियमित मॉक टेस्ट देकर अपनी तैयारी के स्तर को माप सकेंगे। 5. तनाव दूर करें  जब आपके पास परीक्षा की तैयारी के लिए केवल कुछ महीने बचे होते हैं, </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 12pt;">तो आप महत्वपूर्ण विषयों और संशोधनों पर अतिरिक्त ध्यान दिए बिना पाठ्यक्रम पूरा करने की होड़ में लग जाते हैं। यह, इसके विपरीत, आपका नुकसान करता हैतैयारी. जल्दी शुरुआत करने से आपको अपनी पढ़ाई के लिए पर्याप्त समय मिलेगा, जिससे तैयारी के दौरान तनाव और भागदौड़ दूर होगी। अब आपको नीट की तैयारी कब शुरू करनी है इसका जवाब पता चल गया होगा। नीट युजी परीक्षा जल्दी शुरू करने के कई फायदे हैं। इसके अलावा, हम आपको परीक्षा में सफल होने में मदद करने के लिए कुछ युक्तियां साझा करते हैं। नीट युजी परीक्षा की तैयारी के टिप्स और ट्रिक्स  नीट परीक्षा को क्रैक करने के लिए एक अच्छी रणनीतिक अध्ययन योजना और प्रभावी समय प्रबंधन की आवश्यकता होती है। इसलिए, कुछ महीने पहले परीक्षा की तैयारी करने के बजाय अभी से शुरुआत करें। आपकी नीट की तैयारी में मदद के लिए यहां कुछ तरकीबें दी गई हैं। नज़र रखना: 1. एनईईटी पाठ्यक्रम से परिचित हों अपनी तैयारी शुरू करने से पहले आपको सबसे पहले नीट परीक्षा पाठ्यक्रम से परिचित होना चाहिए। इससे आपको परीक्षा की समग्र संरचना के साथ-साथ शामिल किए जाने वाले विषयों के बारे में भी जानकारी मिल जाएगी। पूरे पाठ्यक्रम को ठीक से पढ़ें और सभी महत्वपूर्ण विषयों और पर्याप्त समय आवंटन को शामिल करते हुए NEET के लिए सर्वोत्तम समय सारिणी बनाएं। इसका समर्पित भाव से पालन करें. 2. एनसीईआरटी की किताबें पढ़ने के लिए अच्छी हैं परीक्षा के कठिनाई स्तर और एनईईटी पाठ्यक्रम की विशालता को ध्यान में रखते हुए आपको यह लग सकता है कि इनका कोई उपयोग नहीं है, लेकिन यह छात्रों की सबसे बड़ी गलती है। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 12pt;">जेईई या एनईईटी जैसी प्रतिस्पर्धी परीक्षाओं के लिए एनसीईआरटी की किताबें महत्वपूर्ण हैं ताकि आपको अवधारणाओं पर मजबूत पकड़ बनाने में मदद मिल सके। एनईईटी और कक्षा 11वीं और 12वीं के पाठ्यक्रम में कई सामान्य विषय शामिल हैं, इसलिए उनका संदर्भ लेने से आपको काफी लाभ होगा। 3. पिछले वर्ष के पेपर और मॉक टेस्ट का अभ्यास करें  पिछले वर्ष के प्रश्न पत्रों और मॉक टेस्ट का अभ्यास करने से आपको अपनी नीट की तैयारी के लिए एक निश्चित दिशा मिलेगी। आप कठिनाई स्तर और प्रश्नों के प्रकार आदि से अवगत हो सकते हैं। साथ ही, मॉक टेस्ट को हल करने से आपको एक निर्दिष्ट समय अवधि के भीतर प्रश्नों का उत्तर देने में अपनी गति और सटीकता को बेहतर बनाने में मदद मिलेगी। 4. समय पर संशोधन यदि हम नियमित रूप से चीजों को दोहराना छोड़ देते हैं तो हमने जो पढ़ा है उसे भूलने की अधिक संभावना है। और हम नीट परीक्षा में शामिल होने के दौरान पहले से ही सीखी गई चीजों को फीका नहीं कर सकते। इसलिए, विलंब से बचें और पढ़ाई को पटरी पर रखने के लिए बार-बार रिवीजन करें। निष्कर्ष आप अपनी समग्र एनईईटी तैयारी को बेहतर बनाने के लिए इन कुछ एनईईटी तैयारी युक्तियों का पालन कर सकते हैं। हालाँकि, जहाँ तक आपकी चिंता है कि नीट की तैयारी कब शुरू करें, तो जितनी जल्दी हो सके शुरुआत करने की सलाह दी जाती है ताकि आपके पास अवधारणाओं को समझने और मुख्य बिंदुओं को कवर करने के लिए पर्याप्त समय हो। </span></p>
<p style="text-align: justify; line-height: 1.5;"><span style="font-size: 12pt;"> विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></p> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 13 Nov 2024 18:02:14 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>Is there any ideal time to start preparing for NEET UG exam, क्या नीट युजी परीक्षा की तैयारी शुरू करने का कोई आदर्श समय है?,   Best time to start NEET UG preparation, NEET UG preparation schedule, ideal preparation time for NEET UG, NEET exam preparation timeline, NEET UG study plan, NEET UG preparation strategy, when to start preparing for NEET UG</media:keywords>
    </item>
    <item>
        <title>शिक्षा में बुनियादी कौशलों की अनदेखी: बुनियादी ढांचा सशक्त, पर सीखने की गुणवत्ता कमजोर &amp; विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Basic-skills-ignored-in-education-Strong-infrastructure</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;"><strong>भारत की शिक्षा प्रणाली को बुनियादी ढांचे से अधिक सीखने को प्राथमिकता देनी चाहिए - विजय गर्ग </strong></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"> स्कूल छात्रों से भरे होने के बावजूद, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता जैसे बुनियादी कौशल पिछड़ रहे हैं स्वतंत्रता प्राप्त करने के बाद से, भारत ने शिक्षा के क्षेत्र में महत्वपूर्ण प्रगति की है, विशेष रूप से बुनियादी ढांचे और स्कूलों तक पहुंच के विस्तार के मामले में। कक्षाएँ अब जीवन के सभी क्षेत्रों के बच्चों को समायोजित करती हैं, और सरकारी पहल लाखों छात्रों को शिक्षा प्रणाली में लाने में सफल रही है। हालाँकि, इन उपलब्धियों के बावजूद, एक महत्वपूर्ण घटक - सीखने की गुणवत्ता - उपेक्षित है। बुनियादी ढांचा भले ही फल-फूल रहा हो, लेकिन छात्रों को भविष्य की सफलता के लिए जिन मूलभूत कौशलों की आवश्यकता होती है, वे अक्सर पीछे रह जाते हैं। इसे समझने के लिए, एक ऐसे किसान की कल्पना करें जो मेहनत से अच्छी जुताई वाली मिट्टी में बीज बोता है, लेकिन फसल अपर्याप्त पाता है क्योंकि बीज मिट्टी के लिए उपयुक्त नहीं थे।  उसी तरह, बुनियादी ढांचे में भारत की शैक्षिक प्रगति सराहनीय है, लेकिन छात्रों के मूलभूत कौशल - शिक्षा के बीज - अभी भी उतने मजबूत परिणाम नहीं दे रहे हैं जिनकी हम उम्मीद करते हैं। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">साल-दर-साल, वार्षिक शिक्षा स्थिति रिपोर्ट (एएसईआर) और राष्ट्रीय उपलब्धि सर्वेक्षण (एनएएस) जैसे सर्वेक्षण एक चौंकाने वाली वास्तविकता को उजागर करते हैं: छात्रों का एक बड़ा हिस्सा बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मकता जैसे आवश्यक कौशल के साथ संघर्ष करता है। ये शिक्षा के निर्माण खंड हैं, जिनके बिना संपूर्ण भवन अस्थिर रहता है। छात्र स्कूल में वर्षों बिता रहे हैं, लेकिन कई लोग अपेक्षित स्तर पर नहीं सीख रहे हैं। स्कूली शिक्षा और वास्तविक शिक्षा के बीच चिंताजनक अंतर प्रणाली में एक महत्वपूर्ण दोष की ओर इशारा करता है। यदि मूलभूत कौशलों को शुरू से ही विकसित नहीं किया गया, तो शैक्षिक प्रगति के लाभ भी किसानों की खराब फसल की तरह ही अस्पष्ट बने रहेंगे। राष्ट्रीय शिक्षा नीति (एनईपी) 2020 की शुरूआत आशा की एक नई भावना लेकर आती है। यह परिवर्तनकारी परिवर्तन और एक ऐसी प्रणाली की ओर बदलाव का वादा करता है जो न केवल शिक्षा तक पहुंच बल्कि सीखने की गुणवत्ता को भी महत्व देती है। मूलभूत और स्कूली शिक्षा के लिए राष्ट्रीय पाठ्यचर्या की रूपरेखा के साथ, एनईपी 2020 अच्छी तरह से डिजाइन किए गए मूल्यांकन के माध्यम से शैक्षिक प्रगति को मापने और तदनुसार हस्तक्षेप करने की आवश्यकता पर जोर देता है। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">लक्ष्य स्पष्ट है: शिक्षार्थियों की एक ऐसी पीढ़ी तैयार करना जो न केवल ज्ञान से सुसज्जित हो बल्कि आधुनिक दुनिया में आगे बढ़ने के लिए आवश्यक महत्वपूर्ण सोच कौशल से भी सुसज्जित हो। अनुसंधान लगातार दिखाता है कि आकलन शिक्षा को बेहतर बनाने में परिवर्तनकारी भूमिका निभाते हैं। उनका प्राथमिक लक्ष्य छात्रों या स्कूलों को रैंक करना नहीं है, बल्कि यह जानकारी प्रदान करना है कि शिक्षार्थी अपनी शैक्षिक यात्रा में कहां खड़े हैं। व्यक्तिगत, स्कूल और सिस्टम स्तर पर छात्र क्या जानते हैं और क्या कर सकते हैं, इसकी पहचान करके, मूल्यांकन शिक्षकों को लक्षित हस्तक्षेप विकसित करने के लिए एक रोडमैप प्रदान करता है जो विशिष्ट सीखने के अंतराल को संबोधित कर सकता है। सीखने में बदलाव की तलाश में, एएसईआर और एनएएस जैसे बड़े पैमाने पर मूल्यांकन महत्वपूर्ण होंगे। एएसईआर, एक घरेलू-आधारित सर्वेक्षण, बुनियादी साक्षरता और संख्यात्मक कौशल में अंतर्दृष्टि प्रदान करता है, जबकि एनएएस छात्रों की पाठ्यचर्या परिणामों की उपलब्धि का व्यापक दृष्टिकोण प्रदान करता है। हाल ही में, शैक्षिक प्रगति में राज्य-स्तरीय अंतर्दृष्टि प्रदान करने के लिए एनसीईआरटी द्वारा राज्य शैक्षिक उपलब्धि सर्वेक्षण (एसईएएस) आयोजित किया गया था। केवल छात्रों के प्रदर्शन पर रिपोर्ट कार्ड तैयार करना पर्याप्त नहीं है। डेटा का उपयोग नीतिगत निर्णयों को सूचित करने और सीखने के परिणामों में सुधार लाने के उद्देश्य से विशिष्ट हस्तक्षेपों को लागू करने के लिए किया जाना चाहिए। यदि नहीं, तो छात्रों को इसका सामना करना पड़ता रहेगासाल-दर-साल चुनौतियाँ, थोड़े सुधार के साथ। शैक्षिक असमानताओं को दूर करने के लिए बड़े पैमाने पर मूल्यांकन को एक बड़ी रणनीति में पहले कदम के रूप में देखा जाना चाहिए। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">जबकि एनएएस शिक्षा प्रणाली का एक व्यापक अवलोकन प्रदान करता है, राज्य-स्तरीय मूल्यांकन सर्वेक्षण (एसएएस) में स्कूल स्तर पर विशिष्ट मुद्दों पर ज़ूम करने की क्षमता है। एनईपी 2020 इन सर्वेक्षणों के महत्व को पहचानता है और सिफारिश करता है कि प्रत्येक राज्य निरंतर सुधार लाने के लिए अपना स्वयं का जनगणना-आधारित मूल्यांकन करे। स्थानीय संदर्भों पर ध्यान केंद्रित करके, एसएएस अधिक लक्षित हस्तक्षेपों को सक्षम करते हुए, अलग-अलग राज्यों के सामने आने वाली अनूठी चुनौतियों में मूल्यवान अंतर्दृष्टि प्रदान कर सकता है। हालाँकि, एसएएस की प्रभावशीलता इस बात पर निर्भर करती है कि राज्य अपने उद्देश्यों को कितनी अच्छी तरह परिभाषित करते हैं। एसएएस को वास्तव में प्रभावशाली बनाने के लिए, राज्यों को अपने मूल्यांकन ढांचे को स्पष्ट उद्देश्यों के साथ संरेखित करने की आवश्यकता है। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">एक अच्छी तरह से डिज़ाइन किए गए मूल्यांकन में राज्य स्तर पर शैक्षिक प्रणाली की जरूरतों पर विचार किया जाना चाहिए, और एकत्र किए गए डेटा का उपयोग स्कूलों को रैंकिंग देने के बजाय उन्हें समर्थन देने और सुधारने के लिए किया जाना चाहिए। भारत के राज्यों को यह सुनिश्चित करना होगा कि शिक्षा प्रणाली में सभी हितधारकों-शिक्षकों, स्कूल प्रशासकों और जिला-स्तरीय शिक्षकों-को डेटा उपयोग और विश्लेषण में प्रशिक्षित किया जाए। आगे का रास्ता चुनौतीपूर्ण है, लेकिन जनगणना-आधारित राज्य मूल्यांकन का वादा परिवर्तनकारी है। छात्रों की प्रगति की निगरानी और डेटा-संचालित अंतर्दृष्टि प्रदान करके, एसएएस भारत के शैक्षिक परिदृश्य को नया आकार दे सकता है। एनएएस जैसे राष्ट्रीय स्तर के आकलन के साथ संयुक्त होने पर, एसएएस में अधिक उत्तरदायी, न्यायसंगत शिक्षा प्रणाली बनाने की शक्ति होती है। रणनीतिक दृष्टिकोण और मजबूत शासन के साथ, भारत यह सुनिश्चित कर सकता है कि प्रत्येक छात्र को आगे बढ़ने का अवसर मिले। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"><strong>विजय गर्ग - सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</strong></span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Oct 2024 10:12:50 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>शिक्षा में बुनियादी कौशलों की अनदेखी: बुनियादी ढांचा सशक्त, पर सीखने की गुणवत्ता कमजोर - विजय गर्ग, Basic skills ignored in education Strong infrastructure,  </media:keywords>
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        <title> मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण निष्क्रियता की कीमत  &amp; विजय गर्ग </title>
        <link>https://bharatiya.news/Human-health-and-the-cost-of-environmental-inaction-Vijay-Garg</link>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: center;"><span style="font-size: 18pt;"><strong> मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण निष्क्रियता की कीमत  विजय गर्ग </strong></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">यह इस बात पर अधिक ध्यान देने की मांग करता है कि जलवायु परिवर्तन, प्रदूषण और अस्थिर प्रथाओं के कारण पर्यावरणीय गिरावट सीधे तौर पर सार्वजनिक स्वास्थ्य को कैसे प्रभावित करती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">आँकड़े एक गंभीर तस्वीर पेश करते हैं। विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) के अनुसार, सालाना 12.6 मिलियन से अधिक मौतें पर्यावरणीय मुद्दों के कारण होती हैं। श्वसन संबंधी बीमारियाँ, कैंसर और जलजनित संक्रमण सहित 100 से अधिक बीमारियाँ पर्यावरणीय क्षरण से जुड़ी हैं। इसका असर गरीबों पर असमान रूप से पड़ता है, जो अक्सर सबसे प्रदूषित क्षेत्रों में रहते हैं और उनके पास स्वास्थ्य देखभाल के बुनियादी ढांचे तक पहुंच नहीं है। यह असमानता कमजोर समुदायों की रक्षा करने में प्रणालीगत विफलता को रेखांकित करती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">वायु प्रदूषण सबसे गंभीर पर्यावरणीय खतरों में से एक है। भारत जैसे देशों में शहरी क्षेत्रों को अनियंत्रित औद्योगिक उत्सर्जन, वाहन प्रदूषण और निर्माण गतिविधियों के कारण गंभीर वायु गुणवत्ता संकट का सामना करना पड़ता है। ये बड़े पैमाने पर श्वसन और हृदय संबंधी बीमारियों में योगदान करते हैं। ग्रामीण इलाके भी अछूते नहीं हैं. कई घरों में, खाना पकाने के लिए बायोमास जलाने से लाखों लोग घर के अंदर वायु प्रदूषण का शिकार हो रहे हैं, जिससे रोकी जा सकने वाली मौतें हो रही हैं। स्वच्छ ऊर्जा विकल्पों के सरकारी वादों के बावजूद, परिवर्तन धीमा और अपर्याप्त है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">जल प्रदूषण, एक और गंभीर मुद्दा है, जो शहरी और ग्रामीण दोनों क्षेत्रों को परेशान करता है। दूषित जल स्रोत और खराब स्वच्छता के कारण हैजा, दस्त और पेचिश जैसी बीमारियाँ फैलती हैं। विभिन्न "स्वच्छ भारत" अभियानों के बावजूद, देश जलजनित बीमारियों से जूझ रहा है। औद्योगिक रसायनों और कीटनाशकों सहित खतरनाक कचरे का अनुचित निपटान, मिट्टी और पानी को भी प्रदूषित करता है, जिससे बच्चों में कैंसर और विकासात्मक विकारों जैसे दीर्घकालिक स्वास्थ्य प्रभाव पड़ते हैं।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">त्रासदी इस तथ्य में निहित है कि जो लोग पर्यावरणीय क्षति के लिए सबसे कम ज़िम्मेदार हैं - हाशिए पर रहने वाले समुदाय - वे ही सबसे अधिक पीड़ित हैं। जबकि वैश्विक नीतियों का लक्ष्य पर्यावरणीय स्वास्थ्य को संबोधित करना है, वे अक्सर स्थानीय स्तर पर सार्थक परिवर्तन लाने में विफल रहती हैं। कमजोर प्रशासन, कॉर्पोरेट लापरवाही और जवाबदेही की कमी पारिस्थितिकी तंत्र के विनाश को बढ़ावा दे रही है, जो बदले में सार्वजनिक स्वास्थ्य प्रयासों को कमजोर करती है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">पर्यावरण संरक्षण में तत्काल सुधार महत्वपूर्ण हैं। सरकारों को औद्योगिक नियमों को सख्ती से लागू करना चाहिए और उन निगमों पर जुर्माना लगाना चाहिए जो सार्वजनिक स्वास्थ्य पर मुनाफे को प्राथमिकता देते हैं। विशेषकर उच्च जोखिम वाले क्षेत्रों में साफ पानी, सुरक्षित स्वच्छता और बेहतर वायु गुणवत्ता तक पहुंच सुनिश्चित करने के लिए सार्वजनिक बुनियादी ढांचे को उन्नत करने की आवश्यकता है।</span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 14pt;">पर्यावरणीय न्याय मानव स्वास्थ्य से अविभाज्य है। निष्क्रियता की कीमत - बढ़ती बीमारियाँ, मौतें और विस्थापन - प्राकृतिक संसाधनों के दोहन से होने वाले किसी भी अल्पकालिक आर्थिक लाभ से कहीं अधिक होगी।</span></div> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Oct 2024 10:08:51 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords> मानव स्वास्थ्य और पर्यावरण निष्क्रियता की कीमत  विजय गर्ग,   Human health and environmental costs of inaction, Environment</media:keywords>
    </item>
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        <title>भारतीय छात्र विदेश में मेडिकल अध्ययन कार्यक्रम क्यों चुन रहे हैं &amp; विजय गर्ग </title>
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        <description><![CDATA[ <div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 18pt;"> भारतीय छात्र विदेश में मेडिकल अध्ययन कार्यक्रम क्यों चुन रहे हैं  - विजय गर्ग </span></strong></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;">
<p><span style="font-size: 12pt;">सीमित भारतीय मेडिकल स्कूल सीटों के कारण, विदेश में अध्ययन करना इच्छुक डॉक्टरों के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। हाल के वर्षों में भारतीय छात्रों द्वारा विदेश में मेडिकल डिग्री हासिल करने के रुझान में उल्लेखनीय वृद्धि देखी गई है। इस प्रवृत्ति के प्राथमिक चालकों में से एक भारत में मेडिकल सीटों के लिए तीव्र प्रतिस्पर्धा है। 2024 में, भारत के 706 मेडिकल कॉलेजों में लगभग 1,08,915 उपलब्ध एमबीबीएस सीटों के लिए प्रतिस्पर्धा करते हुए, 24 लाख (2.4 मिलियन) से अधिक छात्र NEET परीक्षा में शामिल हुए। इसमें सरकारी कॉलेजों में लगभग 55,000 सीटें और निजी संस्थानों में 53,915 सीटें शामिल हैं।</span></p>
<h3><span style="font-size: 12pt;">सीमित विकल्प और उच्च फीस</span></h3>
<p><span style="font-size: 12pt;">प्रतिस्पर्धा का यह उच्च स्तर कई इच्छुक डॉक्टरों के पास सीमित विकल्प छोड़ देता है, खासकर उन लोगों के लिए जो सरकारी संस्थानों में सीटें सुरक्षित करने में असमर्थ हैं, जहां लागत अपेक्षाकृत सस्ती है। भारत में निजी मेडिकल कॉलेज अक्सर अत्यधिक फीस वसूलते हैं, जिससे कई छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा अप्रभावी हो जाती है। इसके अलावा, विदेशों में सस्ती और उच्च गुणवत्ता वाली शिक्षा की उपलब्धता, वैश्विक प्रदर्शन और उन्नत नैदानिक प्रशिक्षण के अवसरों के साथ मिलकर, कई छात्रों को अंतरराष्ट्रीय विकल्प तलाशने के लिए प्रेरित किया है।</span></p>
<h3><span style="font-size: 12pt;">विदेश में अध्ययन के लाभ</span></h3>
<p><span style="font-size: 12pt;">कई देश, जैसे गुयाना, अब छात्रों के लिए आकर्षक गंतव्य बन गए हैं। यहाँ अध्ययन करना भारत के निजी चिकित्सा संस्थानों की तुलना में कहीं अधिक किफायती हो सकता है। गुयाना में ट्यूशन फीस पूरे पाठ्यक्रम के लिए काफी सस्ती होती है, जो निजी भारतीय कॉलेजों की लागत से काफी कम है। इसके अतिरिक्त, गुयाना में विश्वविद्यालयों द्वारा अमेरिकी मानकों के अनुरूप पाठ्यक्रम का संरेखण छात्रों के लिए गंतव्य को अधिक लाभप्रद बनाता है। ये चिकित्सा कार्यक्रम विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त हैं, जिससे छात्रों को भारत लौटने पर विदेशी मेडिकल ग्रेजुएट परीक्षा (FMGE) जैसी आवश्यक परीक्षाओं को पास करने के बाद चिकित्सा का अभ्यास करने की अनुमति मिलती है।</span></p>
<h3><span style="font-size: 12pt;">व्यापक पाठ्यक्रम और आधुनिक सुविधाएं</span></h3>
<p><span style="font-size: 12pt;">विदेश में चिकित्सा कार्यक्रम भारतीय छात्रों के लिए कई लाभ प्रदान करते हैं। एक व्यापक पाठ्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि छात्रों को एक सर्वांगीण शिक्षा प्राप्त हो जो वैश्विक मानकों के अनुरूप हो। कई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल स्कूल व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ाते हुए व्यापक नैदानिक प्रदर्शन प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये संस्थान अक्सर सिमुलेशन लैब और आधुनिक शिक्षण विधियों जैसी उन्नत शिक्षण सुविधाएं प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के माध्यम से सीखने की अनुमति मिलती है।</span></p>
</div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">विदेश में चिकित्सा कार्यक्रमों के लाभ विदेशों में चिकित्सा कार्यक्रम भारतीय छात्रों के लिए कई लाभ प्रदान करते हैं। एक व्यापक पाठ्यक्रम यह सुनिश्चित करता है कि छात्रों को एक सर्वांगीण शिक्षा प्राप्त हो जो वैश्विक मानकों के अनुरूप हो। कई अंतरराष्ट्रीय मेडिकल स्कूल व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ाते हुए व्यापक नैदानिक ​​​​प्रदर्शन प्रदान करते हैं। इसके अतिरिक्त, ये संस्थान अक्सर सिमुलेशन लैब और आधुनिक शिक्षण विधियों जैसी उन्नत शिक्षण सुविधाएं प्रदान करते हैं, जिससे छात्रों को अत्याधुनिक प्रौद्योगिकियों के माध्यम से सीखने की अनुमति मिलती है। विदेशों में कार्यक्रम आमतौर पर प्रमुख चिकित्सा परिषदों द्वारा मान्यता प्राप्त होते हैं, जिससे वैश्विक मान्यता सुनिश्चित होती है और स्नातकों के लिए विभिन्न देशों में चिकित्सा का अभ्यास करना आसान हो जाता है। इसके अलावा, लचीली प्रवेश आवश्यकताएं अत्यधिक प्रतिस्पर्धी भारतीय प्रणाली की तुलना में एक आसान मार्ग प्रदान करती हैं, जिससे छात्रों को बिना अपने मेडिकल सपनों को पूरा करने की अनुमति मिलती हैसीमित सीटों और उच्च लागत का तनाव। अंतर्राष्ट्रीय चिकित्सा कार्यक्रम, जैसे प्री-मेडिकल और एमबीबीएस कार्यक्रम, विश्व स्तर पर मान्यता प्राप्त पाठ्यक्रम के साथ प्रारंभिक तैयारी प्रदान करते हैं। ये कार्यक्रम छात्रों को सिद्धांत और व्यवहार दोनों में मजबूत आधार के साथ विश्व स्तरीय शिक्षा प्रदान करने के लिए डिज़ाइन किए गए हैं। इसके अतिरिक्त, गुयाना और अमेरिका के शीर्ष अस्पतालों में क्लिनिकल रोटेशन छात्रों को दुनिया भर के प्रमुख अस्पतालों में व्यावहारिक अनुभव प्राप्त करने की अनुमति देता है, जिससे उन्हें वास्तविक दुनिया के चिकित्सा परिदृश्यों का व्यावहारिक अनुभव मिलता है। छात्र स्नातकोत्तर विकल्पों और मार्गों का भी पता लगा सकते हैं, जो उन्नत अध्ययन और विशेषज्ञता के द्वार खोलते हैं जो कैरियर की संभावनाओं को व्यापक बनाते हैं, जिससे उन्हें वैश्विक चिकित्सा पेशेवर बनने में मदद मिलती है। अंतर पाटना: </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;">भारतीय छात्रों के लिए चिकित्सा शिक्षा का भविष्य भारत में चिकित्सा पेशेवरों की कमी को दूर करने में विदेश से मेडिकल डिग्री हासिल करना महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है। भारतीय मेडिकल स्कूलों में सीमित सीटों और स्वास्थ्य कर्मियों की बढ़ती मांग के साथ, विदेश में अध्ययन करना इच्छुक डॉक्टरों के लिए एक वैकल्पिक मार्ग प्रदान करता है। कई छात्र अपनी डिग्री पूरी करने के बाद भारत लौटते हैं, और वंचित क्षेत्रों में कमी को पूरा करके स्वास्थ्य देखभाल प्रणाली में योगदान देते हैं। इसके अतिरिक्त, वे वैश्विक चिकित्सा पद्धतियों और नवाचारों को वापस लाते हैं, स्वास्थ्य सेवा वितरण को बढ़ाते हैं। जो लोग वैश्विक अवसरों को चुनते हैं वे विशिष्ट करियर अपना सकते हैं और विश्वव्यापी चिकित्सा समुदाय में योगदान कर सकते हैं। निष्कर्ष भविष्य के स्वास्थ्य देखभाल पेशेवरों को आकार देने वाले सुलभ, उच्च गुणवत्ता वाले अंतरराष्ट्रीय कार्यक्रमों के कारण भारतीय छात्रों द्वारा विदेश में मेडिकल शिक्षा चुनने का रुझान लगातार बढ़ रहा है। ये कार्यक्रम व्यावहारिक अनुभव, वैश्विक प्रदर्शन और मान्यता प्राप्त योग्यताएं प्रदान करते हैं। छात्रों को अपने अवसरों और करियर के विकास को अधिकतम करने के लिए अंतरराष्ट्रीय मेडिकल स्कूल चुनते समय सोच-समझकर निर्णय लेना चाहिए। </span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><span style="font-size: 12pt;"></span></div>
<div dir="ltr" style="line-height: 1.5; text-align: justify;"><strong><span style="font-size: 12pt;">लेखक -- विजय गर्ग सेवानिवृत्त प्रिंसिपल शैक्षिक स्तंभकार स्ट्रीट कौर चंद एमएचआर मलोट पंजाब</span></strong></div> ]]></description>
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        <pubDate>Wed, 02 Oct 2024 09:57:39 +0530</pubDate>
        <dc:creator>VIJAY GARG</dc:creator>
        <media:keywords>विजय गर्ग,   Why Indian students are choosing medical study programs abroad</media:keywords>
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